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लाल कृष्ण आडवाणी । पीटीआई
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लाल कृष्ण आडवाणी आज 91 साल के हो रहे हैं. वे भाजपा के उस दौर के द्योतक हैं जब केवल तीन दशकों में लोकसभा में पार्टी दो से 282 सीटों का सफर कर पाई.

नई दिल्ली: एक समय में लौह पुरुष माने जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी अपनी राजनीतिक संध्या में बीजेपी के मार्गदर्शक होने के इस के सफर में, वे भाजपा मशीनरी के एक ज़रूरी पुर्जे रहे हैं. और इस दौरान उन्होंने बहुत उतार-चढ़ाव झेले.

कराची में एक सिंधी परिवार में पैदा हुए आडवाणी-गुरुवार को 91 साल के हो गए, लेकिन शायद उनकी किस्मत में प्रधानमंत्री की कुर्सी न थी. उनके बड़े से राजनीतिक जीवन में शायद ये ही एक कमी रह गई थी.

भाजपा के बाकी मंझे हुए नेताओं की तरह आडवाणी की राजनीतिक जड़ें आरएसएस से जुड़ी हैं, जिसको आप भाजपा की जननी कह सकते हैं. और इसमें वे 1941 में शामिल हुए थे जब वो एक युवा थे.

जनसंघ और आरएसएस से संबंध

बंटवारे के वक्त उनको मजबूरन दिल्ली विस्थापित होना पड़ा था और वे राजस्थान में आरएसएस प्रचारक बने. वे बाद में भारतीय जनसंघ के सदस्य बने जोकि बाद में भाजपा बनी. जनसंघ की स्थापना 1951 में हुई थी. अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी वो धुरी थे जिस पर 1980 में भाजपा स्थापित हुई थी.

विडंबना देखिये मृदुभाषी और नर्म आचार व्यवहार वाले आडवाणी भाजपा के साहसी, जुझारू और आक्रामक हिंदुत्व का चेहरा बने. वाजपेयी के साथ उन्होंने ईंट से ईंट जोड़कर भाजपा की स्थापना की और नब्बे के दशक में उसको नई उंचाई पर पहुंचाया.

वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी सोची समझी रणनीति के तहत काम कर रही थी. अगर वाजपेयी नरमपंथी थे तो आडवाणी कट्टरपंथी. अगर वाजपेयी रूमानी थे, कवि थे तो आडवाणी लौह पुरुष. और अगर वाजपेयी राजनेता थे तो आडवाणी सड़क पर काम करने वाला नेता थे.

राम जन्मभूमि आंदोलन

दस बार सांसद रहे आडवाणी राम जन्मभूमि आंदोलन का चेहरा बने जिसने भाजपा की चुनावी और राजनीतिक दिशा और दशा तय की.

भाजपा के शीर्ष नेता, जिन्होंने गृह मंत्री, उप प्रधानमंत्री के पद संभाले और जिनकी पार्टी को बनाने में उतनी ही भूमिका और अहमियत थी जितनी पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी की. पर आडवाणी का राजनीतिक सफर आसान कभी नहीं रहा और उनको खराब और कई बार शत्रुतापूर्ण व्यवहार का सामना भी करना पड़ा.

नब्बे के दशक के मध्य में जैन हवाला मामले में कई नेताओं समेत उनका नाम भी सामने आया. हालांकि बाद में उन को सुप्रीम कोर्ट ने दोषी नहीं माना था. वो विवाद उनके जीवन में एक शर्मनाक घटना थी. पर शायद पार्टी से उनके संबंधों में ऊंच-नीच उनके राजनीतिक सफर के बुरे दिन लेकर आया.

जिन्ना पर बयान

सन 2005 में, जब वे तीसरी बार भाजपा के अध्यक्ष थे, आडवाणी पाकिस्तान की यात्रा पर गए थे. ये यात्रा काफी उथल पुथल लेकर आई. जिन्ना पर बयान ने कई लोगों को सकते में डाल दिया. यहां तक कि आरएसएस और स्वयं उनकी पार्टी के लोगों के कोप का उनको सामना करना पड़ा और पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

और ये तब हुआ जब एक साल पहले ही 2004 के लोकसभा चुनावों में, पार्टी की हार हुई थी. हार का ठीकरा भी वाजपेयी-आडवाणी के माथे मढ़ा गया था क्योंकि अति आत्मविश्वास में उन्होंने चुनाव की तारीख आगे बढ़ा ली थी.

राजनीतिक शक्ति का पतन

2009 के आम चुनावों के पहले बहुत से भाजपा नेता उनके स्वयं को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने से नाराज़ थे. पर आडवानी ने अपना दावा ठोका. कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए के हाथों करारी हार ने आडवाणी के कद, छवि और पार्टी में उनकी जगह को कम किया. पर शायद उनको इस बात का इल्म नहीं था कि अगले चुनावों तक वे पार्टी के लिए पूरी तरह से अप्रासंगिक बन जायेंगे

आडवाणी जो कि एक बार फिर 2014 में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी चाहते थे, वे अपने ही शिष्य (नरेंद्र मोदी) के हाथों हार गए. आडवाणी और मोदी कैंप के बीच तनाव जगजाहिर था और ये मसालेदार राजनीतिक कहानियों के रूप में अखबारों के पहले पन्नों पर छाई रहीं.

मोदी ने 2014 में भारी जीत हासिल कर आडवाणी को मार्गदर्शक मंडल का रास्ता दिखाया. जहां उनके साथ अन्य वरिष्ठ नेता जैसे मुरली मनोहर जोशी थे. ये मोदी की तरफ से साफ संकेत था कि वे अब भाजपा की सक्रिय राजनीति से दूर केवल एक गाईड की भूमिका में रहेंगे.

किताबों के प्रेमी, सिनेमा और थियेटर का शौक रखने वाले आडवाणी के ये पक्ष उनकी आक्रामक राजनीतिक शैली से बिलकुल अलग हैं.

अब जबकि वे 91 साल के हो गए हैं, वे उस युग को परिभाषित करते हैं जिसने महज तीन दशकों में भाजपा को लोक सभा की दो सीटों वाली पार्टी से बढ़ाकर 282 सीटों वाली पार्टी बना दिया.

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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