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Monday, 2 February, 2026
होमफीचरअत्याधुनिक ढांचा, फिर भी सन्नाटा: जम्मू का वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज क्यों पड़ा है खाली

अत्याधुनिक ढांचा, फिर भी सन्नाटा: जम्मू का वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज क्यों पड़ा है खाली

जम्मू में नया खुला एक मेडिकल कॉलेज मुस्लिम बहुल छात्र प्रवेश को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद बंद कर दिया गया, जिससे छात्र और स्टाफ असमंजस में हैं.

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जम्मू: नदीफ ने वह सब किया था, जो किसी भी मेडिकल एस्पिरेंट से कहा जाता है—नीट पास किया, मेरिट पर सीट हासिल की और क्लास के लिए रिपोर्ट किया. जम्मू के श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस में फर्स्ट ईयर के एमबीबीएस स्टूडेंट नदीफ ने अभी एनाटॉमी की क्लास और लैब सेशन्स में कदम ही रखा था कि आदेश आ गया: कॉलेज की अनुमति वापस ले ली गई है. क्लास निलंबित कर दी गईं और स्टूडेंट्स से कहा गया कि वे सामान बांधकर घर लौट जाएं.

बारामुल्ला में घर लौटकर अपने बैग खोल रहे 20-वर्षीय नदीफ ने कहा, “मैं मेरिट पर यहां आया था. यह दुख देता है कि मुझे जाना पड़ रहा है. मैंने यह कॉलेज इसलिए चुना क्योंकि यह नया था और यहां फैकल्टी अच्छी थी. मुझे पता है कि यहां मुझे जो सुविधाएं मिल रही थीं, वह अपने घर के सरकारी कॉलेज में नहीं मिलेंगी.”

कैंपस में बिताए कुछ ही हफ्तों में नदीफ ने उस तरह की मेडिकल एजुकेशन देखी, जो जम्मू-कश्मीर के भीड़भाड़ वाले सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कम ही देखने को मिलती है—ऑडिटोरियम जैसी लेक्चर हॉल्स, 50 स्टूडेंट्स के छोटे बैच, फैकल्टी से एक-एक करके मार्गदर्शन और अपग्रेडेड टूल्स से सुसज्जित नई लैब्स. उनके मुताबिक, ऐसी सुविधाएं पुराने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भी दुर्लभ हैं.

फिर, लगभग रातों-रात, कॉलेज बंद हो गया.

श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस (एसएमवीडीआईएमई) के बंद होने से 50 एमबीबीएस स्टूडेंट्स अनिश्चितता में फंस गए हैं. सैकड़ों फैकल्टी और कर्मचारियों की ज़िंदगी प्रभावित हुई है और स्वास्थ्य ढांचे में किए गए करोड़ों रुपये के सार्वजनिक निवेश पर ताला लग गया है. यह मामला सिर्फ व्यक्तिगत नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि कैसे देश के शीर्ष नियामक से स्वीकृत, राष्ट्रीय मेरिट प्रक्रिया के ज़रिये स्टूडेंट्स को प्रवेश देने वाला एक पूरी तरह कार्यरत मेडिकल कॉलेज जम्मू-कश्मीर में धर्म, पहचान और राजनीतिक दबाव की लड़ाई का शिकार बन गया.

माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा बड़े स्वास्थ्य विस्तार के तहत बनाए और फंड किए गए इस मेडिकल कॉलेज को सितंबर में नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) से ज़रूरी ‘लेटर ऑफ परमिशन’ मिला था. दाखिले जम्मू-कश्मीर बोर्ड ऑफ प्रोफेशनल एंट्रेंस एग्ज़ामिनेशन्स के ज़रिये, सख्ती से नीट रैंक के आधार पर हुए थे. क्लासें शुरू हो चुकी थीं, फैकल्टी जॉइन कर चुकी थी और ढांचा पूरी तरह काम कर रहा था.

समस्या तब शुरू हुई जब अंतिम छात्र सूची सार्वजनिक हुई. दाखिला पाए 50 स्टूडेंट्स में से 44 मुस्लिम थे.

जो बात क्षेत्रीय जनसंख्या और मेरिट का सामान्य प्रतिबिंब होनी चाहिए थी, वह जल्दी ही जम्मू में विवाद का कारण बन गई. हफ्तों तक विरोध प्रदर्शन हुए, यह सवाल उठाया गया कि क्या श्राइन दान से फंड होने वाला संस्थान मुस्लिम स्टूडेंट्स को दाखिला दे सकता है या नहीं. कुछ ही महीनों में, नियामक ने कॉलेज की अनुमति वापस ले ली—इस कदम का प्रदर्शनकारियों ने स्वागत किया, जबकि स्टूडेंट्स को घर भेज दिया गया और डॉक्टरों की कमी झेल रहे क्षेत्र को वह मेडिकल संस्थान खोना पड़ा, जिसका वह सालों से इंतज़ार कर रहा था.

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के वकील शेख शकील अहमद ने कहा, “दाखिला प्रक्रिया में कोई अवैधता नहीं थी. इसलिए धर्म का एंगल खड़ा किया गया. इसी वजह से अचानक निरीक्षण हुआ.”

मेडिकल कॉलेज के लिए लगा ‘Admissions Open’ बोर्ड | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट
मेडिकल कॉलेज के लिए लगा ‘Admissions Open’ बोर्ड | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट

उन्हें यहां क्यों पढ़ना चाहिए?

प्रवेश प्रक्रिया पूरी होते ही विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. इन प्रदर्शनों का नेतृत्व श्री माता वैष्णो देवी संघर्ष समिति के बैनर तले हिंदू समूहों ने किया. उनकी मुख्य मांग साफ थी—हिंदू श्राइन के दान से बने मेडिकल कॉलेज में मुस्लिम बहुल प्रवेश नहीं होना चाहिए.

कॉलेज प्रबंधन से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि यह विरोध कानून और स्थापित परंपराओं—दोनों को नज़रअंदाज़ करता है.

नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “जम्मू के मेडिकल कॉलेजों में छात्रों का बहुमत मुस्लिम होता है क्योंकि उनकी आबादी ज़्यादा है. हर कॉलेज में आमतौर पर अनुपात 60-40 या 70-30 रहता है. यहां यह थोड़ा अधिक था, लेकिन पूरी प्रक्रिया के अनुसार ही हुआ.”

लेकिन पुराने मेडिकल कॉलेजों के उलट, यह संस्थान नया था और प्रतीकात्मक रूप से भी संवेदनशील. जैसे-जैसे विरोध तेज़ हुआ, वह सड़कों से निकलकर सोशल मीडिया तक फैल गया. धीरे-धीरे मुद्दा प्रवेश प्रक्रिया से हटकर धार्मिक स्वामित्व के सवाल में बदल गया.

प्रदर्शन के नेता यह भी मान चुके हैं कि प्रवेश में कोई कानूनी उल्लंघन नहीं हुआ. उनका विरोध सिर्फ इस बात को लेकर है कि श्राइन-फंडिड संस्था में मुस्लिम छात्रों की संख्या अधिक क्यों है.

जम्मू में विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता और आंदोलन का नेतृत्व करने वाले कार्तिक सुदान ने कहा, “हमें उन्हें यहां पढ़ने की अनुमति क्यों देनी चाहिए? जम्मू-कश्मीर में कई कॉलेज हैं, इस मेडिकल कॉलेज की क्या ज़रूरत है? हमें यहां गुरुकुल या संस्कृत विश्वविद्यालय खोलना चाहिए.”

उन्होंने काउंसलिंग प्रक्रिया में गड़बड़ियों का आरोप भी लगाया—यह दावा करते हुए कि कॉलेज दो राउंड के बाद खुला और जम्मू के छात्र पहले ही अन्य संस्थानों में जा चुके थे. हालांकि, अधिकारियों ने इन आरोपों को खारिज किया है और इनके समर्थन में कोई सबूत पेश नहीं किया गया है.

प्रवेश सूची सार्वजनिक होते ही प्रदर्शनकारियों की एक ही केंद्रीय मांग सामने आई, कि श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस में केवल हिंदू छात्रों को ही प्रवेश दिया जाए. संवैधानिक रूप से ऐसी किसी मांग को लागू करने का कोई रास्ता नहीं है.

जब यह तर्क टिक नहीं पाया, तो कुछ समूहों ने कॉलेज को अल्पसंख्यक दर्जा देने का दबाव बनाना शुरू किया. ऐसा होने पर नीट काउंसलिंग के दौरान धर्म के आधार पर सीटें आरक्षित की जा सकती थीं, लेकिन मौजूदा कानून के तहत यह मेडिकल कॉलेज ऐसे किसी दर्जे के लिए पात्र नहीं है.

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के वकील अहमद ने कहा, “यहां जो कुछ हुआ, वह जानबूझकर किया गया लगा.”

जम्मू और कश्मीर श्री माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय अधिनियम, 1999 के तहत यह विश्वविद्यालय सभी धर्मों, जातियों और समुदायों के छात्रों के लिए स्पष्ट रूप से खुला है. मेडिकल कॉलेज को न तो अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त है और न ही मौजूदा कानून के तहत वह इसका दावा कर सकता है.

अहमद ने कहा, “यह हिंदू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है. अल्पसंख्यक दर्जा किसी राष्ट्रपति या किसी प्राधिकरण द्वारा मनमाने ढंग से नहीं दिया जा सकता. जम्मू में हिंदू अल्पसंख्यक नहीं हैं, इसलिए कॉलेज को यह दर्जा नहीं मिल सकता.”

प्रदर्शनकारियों द्वारा बार-बार दिया गया उदाहरण आचार्य श्री चंदर कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (एएसकॉम्स) का था—जो जम्मू का एकमात्र मेडिकल कॉलेज है, जहां कानूनन हिंदू अल्पसंख्यक माने जाते हैं. एएसकॉम्स को अल्पसंख्यक दर्जा इसलिए मिला, क्योंकि इसे एक हिंदू धार्मिक ट्रस्ट—श्री चंदर चिनार बड़ा अखाड़ा उदासीन सोसाइटी, द्वारा स्थापित और संचालित किया जाता है और यह वैधानिक शर्त को पूरा करता है कि इसकी प्रबंधन समिति का बहुमत अल्पसंख्यक समुदाय से हो.

एक बार यह दर्जा मान्यता मिलने के बाद, जम्मू और कश्मीर बोर्ड ऑफ प्रोफेशनल एंट्रेंस एग्ज़ामिनेशन्स (जेकेबीओपीईई) को नीट काउंसलिंग के दौरान हिंदू अल्पसंख्यक कोटे के तहत एमबीबीएस सीटें आरक्षित करने की अनुमति दी गई. यह प्रक्रिया कई वर्षों से लागू है और स्पष्ट नियामक दिशानिर्देशों पर आधारित है.

इसके उलट, श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा संचालित है, जो कानून के तहत गठित एक वैधानिक निकाय है. भले ही कॉलेज को श्राइन के दान से वित्तपोषित किया गया हो, लेकिन इसे किसी धार्मिक ट्रस्ट द्वारा संचालित नहीं किया जाता. यही कारण है कि यह न तो राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग और न ही नेशनल मेडिकल कमीशन द्वारा मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थान की श्रेणी में आता है. इसलिए इसके प्रवेश केवल जम्मू-कश्मीर के डोमिसाइल छात्रों के बीच नीट मेरिट के आधार पर ही हो सकते थे.

जब कानूनी रास्ता बंद हो गया, तो प्रदर्शनकारियों ने एक व्यापक वैचारिक तर्क उठाया, कि श्राइन बोर्ड को मेडिकल कॉलेज चलाने का अधिकार ही नहीं है.

जम्मू में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले सेवानिवृत्त कर्नल सुखवीर मंगोटिया ने कहा, “माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड का एक तय दायित्व-पत्र है. मेडिकल कॉलेज चलाना उसका हिस्सा नहीं है. अगर बोर्ड शिक्षा के क्षेत्र में काम करना चाहता है, तो उसे वेदों और सनातन धर्म से जुड़े शोध पर ध्यान देना चाहिए, न कि पेशेवर मेडिकल एजुकेशन पर.”

जम्मू-कश्मीर में सरकारी और निजी मिलाकर कुल 13 मेडिकल कॉलेज हैं. इन सभी में मुस्लिम बहुल छात्र आबादी है. श्राइन बोर्ड का नर्सिंग कॉलेज भी इसी जनसांख्यिकीय पैटर्न का पालन करता है और उसे कभी इस तरह के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा.

कॉलेज प्रबंधन से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “जम्मू-कश्मीर में लगभग 5,000 छात्र नीट पास करते हैं, लेकिन सिर्फ करीब 2,000 को सरकारी और निजी कॉलेजों में प्रवेश मिल पाता है. आप सूची देख सकते हैं—वह अपने आप बहुत कुछ कह देती है. मुस्लिम छात्र बहुमत में हैं. इसलिए जो भी नीट पास करता है और इस कॉलेज को अपनी प्राथमिकता देता है, वह यहां आएगा.”

‘हमें बाहर न निकलने को कहा गया’

स्टूडेंट्स के लिए इस पूरे घटनाक्रम का असर तुरंत और बेहद निजी था.

19 साल के साकिब फारूक अपने परिवार में एमबीबीएस करने वाले पहले व्यक्ति थे. शुरुआत में सब कुछ ठीक लग रहा था—कॉलेज, इंफ्रास्ट्रक्चर और फैकल्टी. परिवार भी खुश था, लेकिन एक हफ्ते के भीतर ही माहौल बदलने लगा और चेतावनियां मिलने लगीं.

उन्होंने कहा, “पहले कुछ दिनों तक कुछ भी गलत नहीं लगा. फिर हमने ऑनलाइन विरोध प्रदर्शन देखना शुरू किया.”

जैसे-जैसे विरोध बढ़ा, फैकल्टी सदस्यों ने छात्रों को कैंपस से बाहर न निकलने की सलाह देना शुरू कर दिया क्योंकि प्रदर्शनकारी कॉलेज में उनके प्रवेश का खुलकर विरोध करने लगे थे.

अब कुलगाम लौट चुके फारूक ने कहा, “मैं सोशल मीडिया पर प्रदर्शन देखता था. वे बहुत क्रूर और आहत करने वाले थे. मेरा परिवार चिंतित था. मेरी मां ने कहा कि ज़्यादा बाहर मत जाना. हमारी फैकल्टी ने भी यही सलाह दी.”

उनके मुताबिक, छात्रों के कैंपस पहुंचने के शुरुआती दिनों में किसी तरह का तनाव दिखाई नहीं देता था.

उन्होंने बताया, “पहले पांच-छह दिन कुछ भी नहीं हुआ. लोगों को हिंदू-मुस्लिम मुद्दे के बारे में पता भी नहीं था. यह करीब एक हफ्ते बाद शुरू हुआ.”

फारूक ने यह भी बताया कि वह 2 या 3 नवंबर के आसपास जम्मू पहुंचे थे.

क्लास निलंबित करने और छात्रों को घर भेजने का आदेश उनके लिए एक झटके जैसा था. फारूक को यह फैसला कानूनी नहीं लगा.

उन्होंने कहा, “हमें इसकी बिल्कुल उम्मीद नहीं थी. कॉलेज के पास अनुमति थी और अचानक दो या ढाई महीने बाद सब कुछ रुक गया. यह धर्म का मुद्दा सामने आने के बाद हुआ. यह पूरी तरह अप्रत्याशित था.”

कॉलेज छोड़ने के बाद छात्रों से आगे के निर्देशों का इंतज़ार करने को कहा गया.

उन्होंने कहा, “हम बस घर पर बैठे हैं. हमें एनओसी के ज़रिये क्लियरेंस मिला था और अब हम इंतज़ार कर रहे हैं.”

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने फारूक का डॉक्टर बनने का संकल्प नहीं तोड़ा.

उन्होंने कहा, “जो कुछ हुआ, वह बहुत दुखद है. मैं एक किसान परिवार से आता हूं और अपने परिवार में पहला डॉक्टर बनने जा रहा हूं, लेकिन मैं इस नफरत को खुद पर हावी नहीं होने दूंगा. मैं अपना एमबीबीएस पूरा करूंगा, फिर अच्छे कॉलेज से पोस्ट ग्रेजुएशन करूंगा और अपने देश की सेवा करूंगा.”

श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस के अंदर खाली पड़े गलियारे | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट
श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस के अंदर खाली पड़े गलियारे | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट

‘यह जानबूझकर किया गया लगा’

जैसे ही प्रवेश सूची सार्वजनिक हुई, प्रदर्शनकारियों की एक ही केंद्रीय मांग सामने आई—श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस में केवल हिंदू छात्रों को ही प्रवेश दिया जाए. संवैधानिक रूप से ऐसी मांग को लागू करने का कोई रास्ता नहीं है.

जब यह तर्क टिक नहीं पाया, तो कुछ समूहों ने कॉलेज को अल्पसंख्यक दर्जा देने की मांग शुरू कर दी, ताकि नीट काउंसलिंग के दौरान धर्म के आधार पर सीटें आरक्षित की जा सकें, लेकिन मौजूदा कानून के तहत मेडिकल कॉलेज इसके लिए पात्र नहीं है.

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के वकील अहमद ने कहा, “यहां जो हुआ, वह जानबूझकर किया गया लगा.”

उन्होंने बताया कि जम्मू और कश्मीर श्री माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय अधिनियम, 1999 के तहत यह विश्वविद्यालय सभी धर्मों, जातियों और समुदायों के छात्रों के लिए खुला है. मेडिकल कॉलेज को अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त नहीं है और मौजूदा कानून के तहत वह इसका दावा भी नहीं कर सकता.

अहमद ने कहा, “यह हिंदू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है. अल्पसंख्यक दर्जा किसी राष्ट्रपति या प्राधिकरण द्वारा मनमाने ढंग से नहीं दिया जा सकता. जम्मू में हिंदू अल्पसंख्यक नहीं हैं, इसलिए कॉलेज को यह दर्जा नहीं मिल सकता.”

प्रदर्शनकारियों द्वारा बार-बार जिस उदाहरण का ज़िक्र किया गया, वह आचार्य श्री चंदर कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (एएसकॉम्स) है, जम्मू का एकमात्र मेडिकल कॉलेज, जहां कानूनन हिंदू अल्पसंख्यक हैं. एएसकॉम्स को यह दर्जा इसलिए मिला क्योंकि इसे एक हिंदू धार्मिक ट्रस्ट—श्री चंदर चिनार बड़ा अखाड़ा उदासीन सोसाइटी, द्वारा स्थापित और संचालित किया जाता है और इसकी प्रबंधन समिति में अल्पसंख्यक समुदाय का बहुमत है.

एक बार यह दर्जा मिलने के बाद, जम्मू और कश्मीर बोर्ड ऑफ प्रोफेशनल एंट्रेंस एग्ज़ामिनेशन्स (जेकेबीओपीईई) को नीट काउंसलिंग के दौरान हिंदू अल्पसंख्यक कोटे के तहत एमबीबीएस सीटें आरक्षित करने की अनुमति दी गई—एक प्रक्रिया जो वर्षों से चल रही है और स्पष्ट नियमों पर आधारित है.

इसके विपरीत, एसएमवीडीआईएमई माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा संचालित है, जो कानून के तहत बना एक वैधानिक निकाय है. भले ही कॉलेज को श्राइन के दान से वित्तपोषित किया गया हो, लेकिन इसे किसी धार्मिक ट्रस्ट द्वारा संचालित नहीं किया जाता और यह न तो राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग और न ही नेशनल मेडिकल कमीशन द्वारा मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थान है. इसलिए यहां प्रवेश केवल जम्मू-कश्मीर के डोमिसाइल छात्रों के बीच नीट मेरिट के आधार पर ही हो सकता था.

कानूनी रास्ता बंद होने के बाद, प्रदर्शनकारियों ने एक वैचारिक तर्क उठाया, कि श्राइन बोर्ड को मेडिकल कॉलेज चलाने का अधिकार ही नहीं है.

कॉलेज की स्किल लैब में उन्नत सिमुलेशन डमीज़ लगी हुई हैं | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट
कॉलेज की स्किल लैब में उन्नत सिमुलेशन डमीज़ लगी हुई हैं | फोटो: नूतन शर्मा/दिप्रिंट

जम्मू में आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सेवानिवृत्त कर्नल सुखवीर मंगोटिया ने कहा, “माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड का एक तय दायित्व-पत्र है. मेडिकल कॉलेज चलाना उसका हिस्सा नहीं है. अगर बोर्ड एजुकेशन में काम करना चाहता है, तो उसे वेदों और सनातन धर्म से जुड़े शोध पर ध्यान देना चाहिए, न कि पेशेवर मेडिकल शिक्षा पर.”

जम्मू-कश्मीर में सरकारी और निजी मिलाकर कुल 13 मेडिकल कॉलेज हैं और सभी में मुस्लिम बहुल छात्र आबादी है. श्राइन बोर्ड का नर्सिंग कॉलेज भी इसी जनसांख्यिकीय पैटर्न का पालन करता है और उसे कभी ऐसे विरोध का सामना नहीं करना पड़ा.

कॉलेज प्रबंधन से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “जम्मू-कश्मीर में करीब 5,000 स्टूडेंट्स नीट पास करते हैं और सिर्फ लगभग 2,000 को सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में दाखिला मिलता है. आप सूची देख सकते हैं—वह खुद सब कुछ बता देती है. मुस्लिम छात्र बहुमत में हैं. इसलिए जो भी नीट पास करता है और इस कॉलेज को अपनी प्राथमिकता देता है, वह यहां आएगा.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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