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Saturday, 7 February, 2026
होमफीचरबिहार में सबसे ज्यादा सक्रिय क्यों है सवर्ण आयोग, मंडलवाद से खुद को ठगा महसूस कर रहे सवर्ण

बिहार में सबसे ज्यादा सक्रिय क्यों है सवर्ण आयोग, मंडलवाद से खुद को ठगा महसूस कर रहे सवर्ण

नीतीश कुमार सरकार ने विधानसभा चुनाव से पहले बिहार के सवर्ण आयोग को फिर से सक्रिय किया. यह उन जाति समूहों के लिए ‘उम्मीद की किरण’ है, जो महत्वाकांक्षी अखिल भारतीय जाति जनगणना से पहले संगठित हो रहे हैं.

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पटना: बिहार की सामाजिक न्याय की राजनीति में, ऊंची जातियों के लिए अपने अधिकारों की बात करना कभी आसान नहीं रहा है, लेकिन जब हाल ही में राज्य के सवर्ण आयोग के सदस्य मुजफ्फरपुर चर्चा के लिए पहुंचे, तो लोगों की बेचैनी देखकर वे हैरान रह गए.

एक गांव के व्यक्ति ने उनसे सवाल किया.

विनोद मिश्रा ने आयोग से पूछा, जिसे बिहार राज्य उच्च जाति विकास आयोग भी कहा जाता है, “सिर्फ हालात पर चर्चा करने और देखने के लिए मीटिंग में आने के बजाय, आप ऊंची जातियों के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाने पर ध्यान क्यों नहीं देते? जाति सर्वेक्षण ने ज़मीनी सच्चाई सामने ला दी है, अब काम करने का समय है.”

सवर्ण आयोग की टीम, जो 2011 में बिहार की 15.5 प्रतिशत ऊंची जाति की आबादी की स्थिति और अधिकारों को देखने के लिए बनाई गई थी, इस प्रतिक्रिया से सुखद रूप से हैरान थी. कलेक्ट्रेट ऑडिटोरियम में मिश्रा की यह बात सवर्ण समूहों के बीच ज़मीनी स्तर पर मौजूद तात्कालिक चिंता को सामने लाती है. यह बढ़ती आवाज़ आयोग के सदस्यों के लिए राहत की बात है, क्योंकि अलग-अलग जाति समूह आने वाले अप्रैल में शुरू होने वाली अखिल भारतीय जाति जनगणना से पहले संगठित हो रहे हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य चुनावों से कुछ महीने पहले, मई 2025 में इस निष्क्रिय आयोग को फिर से सक्रिय किया था.

ग्राफिक: सोनाली डूब/दिप्रिंट
ग्राफिक: सोनाली डूब/दिप्रिंट

मंडल आयोग के बाद के ओबीसी-प्रधान राजनीति के दौर में, बिहार में सवर्ण या ऊंची जाति के समूह खुद को इतिहास में पीछे छूट जाने के बोझ तले दबा हुआ महसूस करते हैं. अब आयोग का उद्देश्य ऊंची जातियों के भीतर गरीब और पिछड़े परिवारों की पहचान करना है, ताकि इन पारंपरिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त माने जाने वाले समूहों की शिकायतों को दूर किया जा सके.

अपने दूसरे कार्यकाल में, सवर्ण आयोग बिहार के पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक आयोगों की तुलना में ज़्यादा सक्रिय रहा है. पटना में इसका दफ्तर लगातार व्यस्त है. पूरे राज्य से ऊंची जातियों की याचिकाएं बड़ी संख्या में यहां पहुंच रही हैं. आयोग के सदस्य जिला आईएएस अधिकारियों के साथ बैठकें कर रहे हैं और उन्हें ऊंची जातियों पर खास ध्यान देने और ग्राम सभाओं में उनकी समस्याएं सुनने के निर्देश दे रहे हैं.

आज़ादी के बाद से किसी भी नेतृत्व ने ऊंची जाति समुदाय पर गंभीरता से विचार नहीं किया है. नीतीश कुमार को यह साफ तौर पर समझ है कि सवर्णों में भी गरीबी है और उनका समावेशी विकास बहुत ज़रूरी है

— एमपी सिंह, अध्यक्ष, बिहार सवर्ण आयोग

सवर्ण आयोग के अध्यक्ष और बीजेपी के वरिष्ठ नेता महाचंद्र प्रसाद सिंह ने कहा, “आज ऊंची जातियां बहुत कठिन दौर से गुज़र रही हैं. उनकी ज़मीनें बंट चुकी हैं और कई जगह मालिकाना हक पिछड़ी जातियों के पास चला गया है. इससे आर्थिक परेशानियां बढ़ी हैं. अब आयोग की ज़िम्मेदारी है कि वह इन हालात की जांच करे और सवर्णों के लिए सकारात्मक कदम सुझाए.”

सिंह ने यह भी कहा कि बिहार जाति सर्वे से पता चला है कि हिंदू ऊंची जातियों की 9.98 प्रतिशत आबादी राज्य से बाहर पलायन कर चुकी है, जो ओबीसी और ईबीसी की तुलना में कहीं ज़्यादा है.

ग्राफिक: सोनाली डूब/दिप्रिंट
ग्राफिक: सोनाली डूब/दिप्रिंट

उन्होंने आगे कहा, “आज़ादी के बाद से किसी भी सरकार ने ऊंची जाति समुदाय पर ध्यान नहीं दिया. नीतीश कुमार समझते हैं कि सवर्णों में भी गरीबी है और उनका समावेशी विकास ज़रूरी है.”

जहां नीतीश कुमार सरकार इस आयोग को आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्ण समूहों के प्रति अपनी चिंता का सबूत बताती है, वहीं आलोचक और संभावित लाभार्थी दोनों का कहना है कि यह आयोग भी बिहार के उन कई चर्चित आयोगों की सूची में शामिल हो सकता है, जिनकी सिफारिशें कभी लागू नहीं हुईं. वे भूमि सुधार से जुड़े बंद्योपाध्याय आयोग और शिक्षा सुधार से जुड़े मुचकुंद दुबे आयोग का उदाहरण देते हैं.

पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के अर्थशास्त्री और पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर ने कहा, “बिहार में नीतीश कुमार सरकार ने कई आयोग बनाए हैं, लेकिन बार-बार उनकी सिफारिशों को लागू नहीं किया गया. अक्सर आयोग किसी खास समुदाय को संदेश देने के लिए बनाए जाते हैं, ताकि यह लगे कि सरकार उनके लिए काम कर रही है.”

पिछले आठ महीनों में, आयोग को विपक्षी दलों की आलोचना भी झेलनी पड़ी है. 20 जनवरी को सांसद चंद्रशेखर आज़ाद की आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) ने आयोग को ‘मनुवादी’ बताया.

पार्टी के आधिकारिक एक्स हैंडल से पोस्ट किया गया, “सरकार का काम जाति व्यवस्था को खत्म करना है, न कि ‘ऊंची’ और ‘नीची’ जातियों के नाम से सरकारी प्रमाण पत्र देना. जब राज्य खुद किसी जाति को ‘ऊंची’ घोषित करता है, तो वह समानता नहीं, बल्कि असमानता को मजबूत करता है.”

दिवाकर ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि बिहार में ऊंची जातियों के बीच भी शिक्षा और आर्थिक पिछड़ापन मौजूद है. उन्होंने यह भी कहा कि ज़्यादातर राजनीतिक दलों को ऊंची जातियों के वोटों की ज़रूरत होती है और सवाल यह है कि क्या इस आयोग के पीछे सच में राजनीतिक इच्छाशक्ति है.

उन्होंने कहा, “कड़वी सच्चाई यह है कि अगर इच्छाशक्ति होती है तो रास्ता निकल आता है. और अगर इच्छाशक्ति नहीं होती, तो बिहार में एक कमेटी बना दी जाती है.”

नई ऊर्जा, बढ़ता सब्र

सवर्ण आयोग के दोबारा शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद, भूमिहार नेता आशुतोष कुमार ने बिहार में सामान्य वर्ग के युवाओं के अधिकारों के लिए एक अभियान की घोषणा की, जिसका नाम है सामान्य वर्ग अधिकार यात्रा.

कुमार का नारा था—‘सवर्ण युवाओं ललकार दो, सरकार से कहो अधिकार दो’.

सवर्ण आयोग 2.0 के लॉन्च से ऊंची जाति के समूहों में एक नई ऊर्जा दिखने लगी है और उन्हें संगठित होने के लिए एक नया मंच मिला है.

बेगूसराय के रहने वाले 22 साल के अवनीश मिश्रा ने कहा, “मंडल राजनीति के बाद ऊंची जातियां बिहार में पीछे छूट गईं. उन्होंने न सिर्फ अपना दबदबा खोया, बल्कि आर्थिक परेशानियों का भी सामना किया. 35 साल के लंबे अंधेरे के बाद, सवर्ण आयोग ऊंची जातियों के लिए उम्मीद की एक किरण है.”

बिहार में सवर्ण आयोग की डिवीजन स्तर की बैठकों के दौरान सारण में एमपी सिंह. आयोग के दोबारा शुरू होने से इन समुदायों में नई तरह की सक्रियता शुरू हो गई है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
बिहार में सवर्ण आयोग की डिवीजन स्तर की बैठकों के दौरान सारण में एमपी सिंह. आयोग के दोबारा शुरू होने से इन समुदायों में नई तरह की सक्रियता शुरू हो गई है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

बिहार के 2023 के जाति सर्वे के मुताबिक, राज्य की कुल 15.5 प्रतिशत ऊंची जाति की आबादी में ब्राह्मण 3.65 प्रतिशत, राजपूत 3.45 प्रतिशत, भूमिहार 2.87 प्रतिशत और कायस्थ 0.60 प्रतिशत हैं.

मिश्रा अब सरकार से इस बात का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं कि आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (EWS) में सवर्णों के लिए खास योजनाएं बनाई जाएं. पटना यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट मिश्रा ने पिछले साल यूपीएससी में आरक्षण के लिए योग्य होने के लिए EWS सर्टिफिकेट के लिए आवेदन किया था, लेकिन अब तक उन्हें यह नहीं मिला है.

मिश्रा ने कहा, “पिछले साल जब आयोग की घोषणा हुई थी, तब हमें लगा था कि इससे बदलाव आएगा, लेकिन कई महीने बीत गए और यह अब भी सिर्फ मीटिंग तक ही सीमित है. ज़मीन पर कुछ ठोस होता नहीं दिख रहा.”

हालांकि, आयोग ने लोगों तक पहुंच बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है और हाल के हफ्तों में इसे और तेज़ किया गया है.

सवर्ण आयोग की गतिविधियां

जनवरी के दूसरे हफ्ते में, नालंदा से सवर्णों का एक प्रतिनिधिमंडल पटना की विधायक कॉलोनी में आयोग के अध्यक्ष एमपी सिंह के घर पहुंचा.

सफेद धोती पहने बीजेपी नेता ने बेहद सादगी से मेहमानों का स्वागत किया, उन्हें मिठाई खिलाई और फिर आराम से बैठकर उनकी बातें सुनीं. उनके होम ऑफिस की मेज़ आने वाले प्रतिनिधिमंडलों द्वारा दिए गए गुलदस्तों से भरी हुई थी.

पिछले कुछ महीनों में यह घर ऊंची जातियों की मांगों और समस्याओं को उठाने का एक अहम केंद्र बन गया है.

सिंह ने कहा, “लोगों को आयोग से बहुत उम्मीदें हैं. वे ऊंची जातियों की समस्याएं लेकर आते हैं. वे मुझमें उम्मीद देखते हैं और अध्यक्ष के तौर पर उनकी चिंताओं को दूर करना मेरी बड़ी ज़िम्मेदारी है.”

छह बार के एमएलसी और बीजेपी नेता महाचंद्र प्रसाद सिंह पटना में अपने डेस्क पर, जहां ऊंची जातियों के प्रतिनिधिमंडल उनसे अपनी मांगें और अर्ज़ियां लेकर मिलने आते हैं | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
छह बार के एमएलसी और बीजेपी नेता महाचंद्र प्रसाद सिंह पटना में अपने डेस्क पर, जहां ऊंची जातियों के प्रतिनिधिमंडल उनसे अपनी मांगें और अर्ज़ियां लेकर मिलने आते हैं | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

करीब आधे घंटे तक सिंह ने नालंदा से आए प्रतिनिधिमंडल को आयोग के काम के बारे में बताया और उनके सवालों के जवाब दिए. एक सदस्य ने EWS सर्टिफिकेट मिलने में हो रही दिक्कतों की बात उठाई.

उसने कहा, “आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के बावजूद हमारे बच्चे EWS के लिए योग्य नहीं माने जा रहे हैं. सर, इस पर जल्दी कार्रवाई कीजिए, यह हमारे बच्चों के भविष्य से जुड़ा मामला है.”

यह मानते हुए कि यह समस्या पूरे राज्य में आम है, सिंह ने भरोसा देने वाले आंकड़े सामने रखे. उन्होंने मुज़फ्फरपुर का उदाहरण दिया, जहां 2025 और 2026 के बीच 6,270 EWS आवेदन आए और उनमें से 6,222 मंज़ूर कर लिए गए.

उन्होंने कहा, “हमने ज़िला अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि 48 रिजेक्ट किए गए आवेदनों की वजह की जांच करें और आयोग को रिपोर्ट भेजें.” उन्होंने यह भी कहा कि आयोग हर आवेदन पर नज़र रखे हुए है.

मंडल राजनीति के बाद बिहार में ऊंची जातियां पीछे रह गईं. उन्होंने न सिर्फ अपना दबदबा खोया, बल्कि आर्थिक परेशानियों का भी सामना किया. 35 साल के अंधेरे के बीच, सवर्ण आयोग ऊंची जातियों के लिए उम्मीद की किरण है

— अवनीश मिश्रा, बेगूसराय निवासी

आयोग ने केवल कल्याण से जुड़े मुद्दों तक ही खुद को सीमित नहीं रखा है. 11 जनवरी को, NEET की तैयारी कर रही एक लड़की पटना के एक हॉस्टल में बेहोश पाई गई थी और कुछ दिनों बाद उसकी मौत हो गई. शुरुआत में इसे आत्महत्या बताया गया, लेकिन परिवार ने यौन उत्पीड़न और हत्या का आरोप लगाया. इसके बाद पूरे शहर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. 20 जनवरी को एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाई गई और हॉस्टल को सील कर दिया गया.

22 जनवरी को जहानाबाद में पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे सिंह ने कहा, “एक सभ्य समाज में हमारी बेटियों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं हो सकता. उसकी मौत के पीछे की सच्चाई सामने आनी चाहिए और दोषियों को तय समय में सज़ा मिलनी चाहिए.”

एक फेसबुक लाइव में उन्हें गांव वालों की बड़ी भीड़ के सामने बोलते हुए देखा गया.

सवर्ण समुदाय की समस्याएं उठाने के लिए महाचंद्र सिंह के घर पहुंचे प्रतिनिधिमंडल | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
सवर्ण समुदाय की समस्याएं उठाने के लिए महाचंद्र सिंह के घर पहुंचे प्रतिनिधिमंडल | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

पिछले साल मई में नेहरू पथ स्थित अपने दफ्तर से आयोग का काम शुरू करने के बाद से सिंह के लिए बीते आठ महीने लगातार काफी व्यस्त रहे हैं. जून 2025 में हुई पहली बैठक में आयोग ने तीन उप-समितियां बनाई थीं, जो मुफ्त कोचिंग, गरीब छात्रों के लिए हॉस्टल और सवर्णों के लिए सरकारी नौकरियों में उम्र में छूट जैसे प्रस्तावों पर काम कर रही हैं. इसके बाद आयोग ने पटना, मगध, मुंगेर, तिरहुत, सारण, दरभंगा और कोसी—इन सात प्रशासनिक डिवीजनों में एक दर्जन से ज़्यादा बैठकें की हैं.

आयोग के सभी सदस्यों का कार्यकाल तीन साल का है, इसलिए समय कम है. पहले योजना थी कि सभी 38 जिलों का दौरा किया जाएगा, लेकिन चुनावों को देखते हुए समय बचाने के लिए डिवीजन के हिसाब से काम करने का फैसला किया गया. हर पूरे दिन की बैठक तीन हिस्सों में होती है—अधिकारियों से बातचीत, समाज के प्रमुख लोगों से सुझाव और मीडिया से संवाद.

लगभग हर बैठक में नई मांगें सामने आती हैं. मुज़फ्फरपुर में राष्ट्रीय भूमिहार ब्राह्मण परिषद के सचिव केशव उर्फ मिंटू ने पांच बिंदुओं वाला एक ज्ञापन सौंपा. इसमें आधिकारिक जाति सूची में “भूमिहार ब्राह्मण” को फिर से एक अलग श्रेणी के रूप में शामिल करने की मांग भी थी.

सिंह ने कहा, “आने वाले दिनों में हम पूर्णिया और भागलपुर जाएंगे. उसके बाद सभी सुझावों के आधार पर एक ठोस रिपोर्ट तैयार की जाएगी.”


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सवर्ण आयोग में कौन-कौन हैं?

एमपी सिंह का घर उनकी सोच और विरासत का एक प्राइवेट म्यूजियम जैसा है. दीवारों पर भूमिहार क्रांतिकारी सहजानंद सरस्वती और बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की तस्वीरें लगी हैं. उनके दफ्तर में किताबों का बड़ा कलेक्शन है, जिसमें सहजानंद सरस्वती, ज्योति कलश और अमृत कलश पर उनकी खुद की लिखी किताबें भी शामिल हैं.

वह एक जाने-माने भूमिहार नेता हैं. वे पहले मंत्री रह चुके हैं और छह बार एमएलसी रहे हैं. पहले वह जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) से जुड़े थे, लेकिन 2019 में पार्टी छोड़कर हिंदुस्तानी आवामी मोर्चा यूनाइटेड बनाई और बाद में भाजपा में शामिल हो गए.

पांच सदस्यों वाले इस पैनल में वह अकेले बड़े नेता नहीं हैं. इसमें एक और भाजपा नेता, एक पूर्व आरएसएस प्रचारक और एक जदयू प्रवक्ता भी शामिल हैं.

8 जनवरी 2026 को मुजफ्फरपुर में ‘ऊंची जातियों के विकास’ के लिए हुई एक डिवीजन-स्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान सवर्ण आयोग के सदस्य | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
8 जनवरी 2026 को मुजफ्फरपुर में ‘ऊंची जातियों के विकास’ के लिए हुई एक डिवीजन-स्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान सवर्ण आयोग के सदस्य | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

राजनीतिक पहुंच भी इसका एक अहम हिस्सा है. जब आयोग के सदस्य और भाजपा नेता राजकुमार सिंह पिछले जून में अपने गृहनगर भागलपुर गए, तो ज़ीरो माइल चौक पर उनका शॉल और गुलदस्ते देकर स्वागत किया गया. उनका पहला पड़ाव प्रतीकात्मक था—बिहार के भोजपुर इलाके से 1857 के विद्रोह के एक बड़े नेता और राजपूत प्रतीक बाबू वीर कुंवर सिंह की मूर्ति पर माला चढ़ाना.

उन्होंने कार्यक्रम में कहा, “भाजपा सरकार समाज के हर वर्ग के लिए काम कर रही है. ऊंची जातियों के हितों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाएगा. हम आयोग के ज़रिये समुदाय की चिंताओं को सरकार तक पहुंचाएंगे.”

2017 में भाजपा में शामिल होने से पहले वह जदयू में थे और 2023 से पार्टी के बांका ज़िले के प्रभारी हैं.

सरकार आर्थिक रूप से कमज़ोर ऊंची जाति के परिवारों के बच्चों की पढ़ाई को बढ़ावा देने के लिए सभी ज़िलों में लड़कों और लड़कियों के लिए हॉस्टल जैसी लक्षित कल्याणकारी योजनाएं बना रही है

— जय कृष्ण झा, सवर्ण आयोग सदस्य

2011 के पैनल के मुकाबले, इस बार आयोग की बनावट पूरी तरह हिंदू है. इसमें भूमिहार, कायस्थ, ब्राह्मण और राजपूत समुदायों के सदस्य हैं. ऊंची जाति के मुसलमान—जैसे सैयद, शेख और पठान—जो बिहार की आबादी का करीब 4.8 प्रतिशत हैं, उन्हें इस पैनल में कोई जगह नहीं मिली है.

उपाध्यक्ष राजीव रंजन प्रसाद, जो एक कायस्थ नेता हैं, जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं और अक्सर टीवी पर पार्टी का पक्ष रखते हुए दिखाई देते हैं.

सवर्ण आयोग के उपाध्यक्ष राजीव रंजन प्रसाद एक कायस्थ नेता और जदयू के प्रवक्ता हैं | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
सवर्ण आयोग के उपाध्यक्ष राजीव रंजन प्रसाद एक कायस्थ नेता और जदयू के प्रवक्ता हैं | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

ब्राह्मण वर्ग से जदयू के वरिष्ठ नेता दयानंद राय और भाजपा के जय कृष्ण झा आयोग में शामिल हैं.

दरभंगा के कारोबारी दयानंद राय, जदयू अध्यक्ष संजय झा के क़रीबी माने जाते हैं. 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें जदयू की दिल्ली इकाई का अध्यक्ष बनाया गया था, जब पार्टी ने दो सीटों पर चुनाव लड़ा था.

समस्तीपुर के पूर्व आरएसएस विभाग प्रचारक जय कृष्ण झा अपने सोशल मीडिया पर खुद को सुधारक, राजनीतिक विश्लेषक और राष्ट्रवादी बताते हैं. मई 2025 में उन्हें बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान से शिक्षा और समाज कल्याण, खासकर वंचित लड़कियों के लिए किए गए काम के लिए चैंपियंस ऑफ चेंज अवॉर्ड मिला था.

बिहार सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए झा ने कहा कि राज्य में करीब 49 प्रतिशत ऊंची जाति के लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं.

उन्होंने कहा, “सरकार आर्थिक रूप से कमज़ोर ऊंची जाति के परिवारों के बच्चों की पढ़ाई को बढ़ाने के लिए सभी ज़िलों में लड़कों और लड़कियों के लिए हॉस्टल सहित खास कल्याणकारी योजनाएं तैयार कर रही है.”


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सवर्ण आयोग 1.0 का इतिहास

यह पहली बार नहीं है जब बिहार ने ‘वंचित’ सवर्ण जातियों की शिकायतों को दूर करने की कोशिश की है. 2011 में विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के एक साल बाद, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सवर्ण जातियों के लिए एक आयोग बनाने की घोषणा की थी, जिसे आमतौर पर सवर्ण आयोग कहा गया.

जदयू के एमएलसी और प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा, “मंडल की राजनीति ने सवर्ण जातियों के एक बड़े हिस्से में सामाजिक दूरी पैदा कर दी थी. नीतीश कुमार ने इस दूरी को कम करने का काम किया. मोदी ने 2019 में सवर्णों के लिए EWS कोटा जो लागू किया, वह नीतीश आठ साल पहले ही कर चुके थे.”

पहले आयोग की अध्यक्षता इलाहाबाद हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज डीके त्रिवेदी ने की थी. अन्य चार सदस्य थे—कृष्ण प्रसाद सिंह, नरेंद्र प्रसाद सिंह, फरहत अब्बास और संजय मयूख (बाद में उनकी जगह रिपुदमन श्रीवास्तव आए).

हालांकि, आयोग का काम बहुत धीमी गति से चला. इतना धीमा कि 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने मीडिया के सामने जनरल एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट के प्रिंसिपल सेक्रेटरी को स्पीकरफोन पर कॉल करके नाराज़गी जताई.

उन्होंने कहा, “अब तक 15 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च हो चुके हैं, लेकिन रिपोर्ट की एक लाइन तक नहीं लिखी गई है.”

मैंने सिफारिश की थी कि सवर्ण जातियों को सिर्फ शिक्षा और आर्थिक सुधार की ज़रूरत है. वे पहले से ही सामाजिक रूप से आगे हैं

— डीएम दिवाकर, अर्थशास्त्री

आखिरकार रिपोर्ट आने में एक और साल लग गया. ‘बिहार में सवर्ण जातियों की आबादी की आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का सर्वे’ नाम की यह रिपोर्ट पटना स्थित एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (ADRI) की मदद से तैयार की गई थी.

2015 की रिपोर्ट में बताया गया कि औसत आय ज़्यादा होने के बावजूद, कई सवर्ण परिवार गरीबी रेखा से नीचे रहते थे. ग्रामीण इलाकों में सवर्ण हिंदुओं में गरीबी 10.3 प्रतिशत और शहरों में 5.4 प्रतिशत थी. सवर्ण मुसलमानों में यह आंकड़ा ग्रामीण इलाकों में 10.7 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 10.4 प्रतिशत था.

रिपोर्ट में कहा गया कि “राज्य सरकार को सवर्ण जातियों की आबादी की मदद के लिए कुछ खास कदम उठाने की ज़रूरत है.”

यह डेटा राजनीतिक बहस का हिस्सा बना. इसमें जदयू के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी का 2015 में लिखा लेख ‘सवर्णों में भी पिछड़ापन’ भी शामिल था.

उन्होंने लिखा, “नौकरी के अवसर कम होने की वजह से कई ऊंची जाति के परिवार आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं.”

लेकिन धीरे-धीरे यह मामला ठंडा पड़ गया और रिपोर्ट की सिफारिशों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया गया. रिपोर्ट में सुझाव था कि सालाना 1.5 लाख रुपये तक कमाने वाले सवर्णों को गरीब माना जाए, जबकि उस समय बिहार में दूसरे समूहों के लिए ऐसी कोई आय सीमा नहीं थी. बाद में जाति सर्वे के बाद राज्य ने सालाना 72,000 रुपये को गरीबी की सीमा मान लिया. आयोग ने गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले ऊंची जाति के छात्रों के लिए कल्याण योजनाएं और छात्रवृत्ति देने की भी मांग की थी. नीतीश कुमार सरकार ने सिर्फ एक कदम उठाया—10वीं कक्षा पहली डिवीजन से पास करने वाले सवर्ण छात्रों को 10,000 रुपये का प्रोत्साहन.

अब सवर्णों की मांगें और बढ़ गई हैं. इनमें केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों में EWS छात्रों के लिए आरक्षित सीटें, राज्य की प्रतियोगी परीक्षाओं में EWS उम्मीदवारों के लिए ज़्यादा उम्र सीमा और EWS सर्टिफिकेट की वैधता और ज़मीन से जुड़े नियमों में बदलाव शामिल हैं.

अर्थशास्त्री डीएम दिवाकर, जो विशेषज्ञ के तौर पर आयोग की शुरुआती बैठकों में शामिल थे, ने कहा कि उनकी सिफारिशें सीमित थीं.

उन्होंने कहा, “मैंने यही सिफारिश की थी कि ऊंची जातियों को केवल शिक्षा और आर्थिक सुधार की ज़रूरत है. वे पहले से ही सामाजिक रूप से बेहतर स्थिति में हैं.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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