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Friday, 27 February, 2026
होमThe FinePrint‘मुसलमानों को कंबल नहीं’ विवाद के बाद बदला गांव का माहौल—‘अब संभलकर रहना होगा’

‘मुसलमानों को कंबल नहीं’ विवाद के बाद बदला गांव का माहौल—‘अब संभलकर रहना होगा’

राजस्थान के टोंक जिले के करेड़ा बुजुर्ग गांव में धर्म रोज़ की दरार नहीं है, लेकिन बीजेपी नेता सुखबीर सिंह जौनापुरिया की एक सामान्य कंबल वितरण मुहिम सार्वजनिक वफादारी की छंटनी में बदल गई.

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टोंक (राजस्थान): शाकुरन बानो उस दिन सच में कंबल नहीं चाहती थीं. वह फिर भी गईं क्योंकि गांव की एक और महिला ने उन्हें जाने के लिए कहा, लेकिन राजस्थान के टोंक जिले के करेड़ा बुजुर्ग गांव की रहने वाली बानो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता सुखबीर सिंह जौनापुरिया के राहत वितरण कार्यक्रम में गईं और वहां से अपमानित होकर खाली हाथ लौट आईं. अब वह भारत के मुसलमानों के साथ बीजेपी के रिश्ते को लेकर बड़े राजनीतिक विवाद के केंद्र में आ गई हैं.

इस घटना ने उस गांव में भी साम्प्रदायिक कड़वाहट छोड़ दी है, जहां रोज़मर्रा की ज़िंदगी में धर्म पर कम ही बात होती थी. 22 फरवरी का सामान्य कंबल बांटने का कार्यक्रम सार्वजनिक वफादारी की छंटनी में बदल गया—कौन “हमारा” है, कौन नहीं और जब राजनीति शर्तें तय करती है तो किसे राहत मिलेगी. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के भी खिलाफ जाता है.

मंगलवार को बीजेपी के पूर्व सांसद ने लगभग 30 महिलाओं के समूह में से मुस्लिम महिलाओं को अलग कर दिया, जिन्हें उन्होंने कंबल देने के लिए बुलाया था. एक महिला से नाम पूछने और उनके मुस्लिम होने का पता चलने के बाद, जौनापुरिया ने उन्हें और पास बैठी अन्य मुस्लिम महिलाओं से अलग बैठने को कहा. उन्होंने कहा कि वह “मोदी को गाली देने वालों” को कंबल नहीं देंगे.

60 साल से ऊपर की बानो ने कहा, “मुझे कोई कंबल नहीं चाहिए था, लेकिन इस तरह बेइज़्ज़ती करने की क्या ज़रूरत थी”. वे बीजेपी नेता के आरोपों से हैरान भी हैं.

“मैं मोदी को गाली क्यों दूंगी? उन्होंने कब मुझे गाली देते सुना?” वह अभी भी इस घटना को समझने की कोशिश कर रही हैं. “यह अपमानजनक था. उन्होंने साफ कह दिया कि वह मुसलमानों को कंबल नहीं देंगे.”

राजस्थान के टोंक जिले के करेड़ा बुजुर्ग गांव में वह खुली जगह, जहां कंबल बांटने का कार्यक्रम हुआ | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
राजस्थान के टोंक जिले के करेड़ा बुजुर्ग गांव में वह खुली जगह, जहां कंबल बांटने का कार्यक्रम हुआ | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

जयपुर से करीब 70 किलोमीटर दूर करेड़ा बुजुर्ग करीब 2,000-3,000 लोगों का गांव है, जहां ज्यादातर परिवार छोटी ज़मीन पर खेती करते हैं और युवा पुरुष काम के लिए शहर जाते हैं. यहां बुनियादी सुविधाओं की कमी है—ऊबड़-खाबड़ सड़कें, अधूरी सफाई व्यवस्था और सीमित रोज़गार.

गांव वालों ने कहा कि यहां बातचीत में जाति की बात आसानी से आ जाती है, लेकिन धर्म रोज़ की दरार नहीं था.

लेकिन मंगलवार के बाद कुछ बदल गया है.

स्थानीय निवासी जाकिर खान ने कहा, “इससे माहौल अजीब हो गया है. पहले हम इस तरह नहीं सोचते थे. अब हमें सतर्क रहना होगा.”

हिंदुओं की ओर से विरोध

बद्रीलाल जाट अपने सरसों के खेत में काम कर रहे थे, तभी उन्होंने शोर-शराबा सुना. गांव वाले बीजेपी नेता से पूछ रहे थे कि महिलाओं को धर्म के आधार पर अलग क्यों किया गया.

गांव वालों ने उनसे पूछा, “अगर आपको कंबल वापस ही लेने थे, तो दिए ही क्यों?”

गांव के बुजुर्गों में से एक जाट कई बार बानो के घर जा चुके हैं, उन्हें भरोसा दिलाने के लिए कि सब ठीक है और गांव उनके साथ है.

बद्रीलाल जाट और शाकुरन बानो, करेड़ा बुजुर्ग में उनके घर पर | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
बद्रीलाल जाट और शाकुरन बानो, करेड़ा बुजुर्ग में उनके घर पर | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

उन्होंने कहा, “हमारे गांव में हिंदू और मुसलमानों के बीच कोई झगड़ा नहीं है, पीढ़ियों से कभी नहीं हुआ. जब कोई बाहर का व्यक्ति आकर ऐसे बीज बोने की कोशिश करता है, तो हमें विरोध के लिए आगे आना पड़ता है.”

न तो पुलिस तैनात की गई और न ही कोई शिकायत दर्ज हुई. गांव वालों ने उसी दिन बाद में जौनापुरिया के पुतले जलाए और “जौनापुरिया मुर्दाबाद” के नारे लगाए, लेकिन कोई हिंसा नहीं हुई. सोशल मीडिया पर यह दावा किया गया कि हिंदू महिलाओं ने विरोध में अपने कंबल लौटा दिए, लेकिन यह दावा गलत निकला.

शाम को राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी (अल्पसंख्यक विभाग) के अध्यक्ष महबूब दीवान चोपदार कंबलों का एक सेट लेकर पहुंचे और बानो से कहा कि वह उन्हें हिंदू और मुस्लिम महिलाओं में बांटें.

बानो एक कच्ची ईंटों के घर में रहती हैं, जिसका वह 1,000 रुपये महीना किराया देती हैं. वह वहां अपने लोहार बेटे, बहू और पोते-पोतियों के साथ रहती हैं. उनके पति की करीब छह साल पहले मौत हो गई थी. उनका दूसरा बेटा और बेटी पास के कस्बों में रहते हैं.

पड़ोसी और कंटेंट क्रिएटर सुनील दोराया, जिन्होंने बीजेपी नेता द्वारा मुस्लिम महिलाओं को अलग करने वाला वायरल वीडियो अपलोड किया था, उन्होंने कहा, “मैंने उन्हें वितरण कार्यक्रम में जाने को कहा क्योंकि वह बहुत गरीब हैं. उनके पास ज्यादा कुछ नहीं है.”

टोंक के विधायक सचिन पायलट समेत कई नेताओं ने जौनापुरिया की आलोचना की.

पायलट ने हिंदी में ट्वीट किया, “एक गरीब, ज़रूरतमंद महिला को कंबल से वंचित करना और उसका अपमान करना बेहद निंदनीय और दुर्भाग्यपूर्ण है. धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन भी है.”

राजस्थान मुस्लिम एलायंस के राज्य प्रभारी और कांग्रेस नेता अशोक गहलोत के करीबी मोहसिन राशिद टोंक ने जौनापुरिया की इस कार्रवाई को 28 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अजमेर यात्रा से पहले का राजनीतिक संदेश बताया.

रशीद ने कहा, “यह सब ड्रामा है. चुनाव हारने के बाद आप क्या करते हैं? आप एकजुट करते हैं, लेकिन यह घटना सिर्फ ध्यान खींचने के लिए थी. उन्हें सोशल मीडिया पर अपनी वायरलिटी मिल गई.”

उन्होंने यह भी सवाल किया कि क्या जौनापुरिया उस अस्पताल की सामुदायिक रसोई में मुसलमानों को खाने से रोकते हैं, जिसे वह रोज चलाते हैं.

करेड़ा बुजुर्ग गांव की एक गली का दृश्य | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
करेड़ा बुजुर्ग गांव की एक गली का दृश्य | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

बीजेपी नेता अपने रुख पर कायम

पूर्व टोंक–सवाई माधोपुर सांसद के लिए सार्वजनिक वितरण कार्यक्रम कोई नई बात नहीं हैं. गुरुग्राम में कारोबारी आधार रखने वाले जौनापुरिया 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हरीश चंद्र मीणा से हारने के बावजूद प्रभाव बनाए हुए हैं. कोविड-19 महामारी के दौरान उन्होंने यह कहकर सुर्खियां बटोरी थीं कि कीचड़ में बैठना और शंख बजाना इम्युनिटी बढ़ाता है और शरीर को कोरोना वायरस से लड़ने में मदद करता है.

गुरुवार को दिप्रिंट से बात करते हुए वे वितरण कार्यक्रम में मुस्लिम महिलाओं को अलग करने के अपने फैसले पर कायम रहे.

उन्होंने कहा, “वे हमेशा बुर्का पहनती हैं, लेकिन इस बार ये महिलाएं कंबल लेने के लिए सलवार-कमीज पहनकर आई थीं. ये लोग हमारे और हमारे लोगों के लिए रखे कंबल ले रहे थे. मैं उन्हें हमारे लोगों को देने के बाद दे सकता था, लेकिन क्यों दूं? वे मोदी को गाली देते हैं, कभी उन्हें वोट नहीं देते.”

उन्होंने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक महिलाएं बड़ी संख्या में कांग्रेस का समर्थन करती हैं.

उन्होंने कहा, “वे सब कांग्रेस हैं. सारी अल्पसंख्यक महिलाएं कांग्रेस हैं. पूरा देश जानता है. मैं बीजेपी कार्यकर्ता हूं, क्या मुझे नहीं पता?”

टोंक–सवाई माधोपुर से पूर्व बीजेपी सांसद सुखबीर सिंह जौनापुरिया की फाइल फोटो | फेसबुक | सुखबीर सिंह जौनापुरिया
टोंक–सवाई माधोपुर से पूर्व बीजेपी सांसद सुखबीर सिंह जौनापुरिया की फाइल फोटो | फेसबुक | सुखबीर सिंह जौनापुरिया

यह पहली बार नहीं है जब किसी बीजेपी नेता ने कल्याण या चैरिटी को मोदी का समर्थन करने या बीजेपी को वोट देने से जोड़ा हो.

पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने 2019 लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में कथित तौर पर कहा था कि अगर मुसलमान उन्हें वोट नहीं देंगे तो उन्हें नौकरी नहीं मिलेगी.

पिछले साल अक्टूबर में, 2025 बिहार विधानसभा चुनाव से पहले, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने अरवल जिले की एक रैली में कहा था कि जो लोग कल्याण योजनाएं लेने के बावजूद बीजेपी को वोट नहीं देते, वे “नमक हराम” हैं.

दिसंबर में, अरुणाचल प्रदेश के रोइंग में चुनाव प्रचार के दौरान ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री ओजिंग तासिंग ने कहा था, “जिन पंचायत क्षेत्रों में बीजेपी उम्मीदवार हारेंगे, वहां कोई योजना नहीं दी जाएगी. पंचायती राज मंत्री के तौर पर मैं जो कहता हूं, उसका मतलब होता है.”

जौनापुरिया ने यह भी आरोप लगाया कि यह वीडियो कांग्रेस समर्थकों ने फैलाया है. उन्होंने खुद भी कार्यक्रम का एक वीडियो अपने सोशल मीडिया पर डाला था. हालांकि, उसका आखिरी हिस्सा संपादित था.

उन्होंने सामुदायिक रसोई में भेदभाव के आरोपों को भी खारिज किया और कहा कि वहां सभी समुदायों के लोग खाना खाते हैं.

उन्होंने कहा, “मेरे पास वीडियो हैं जो दिखाते हैं कि वहां सब खाते हैं. कांग्रेस वाले ऐसा करते रहते हैं. वे विधानसभा में मुख्यमंत्री को गुमराह करने की कोशिश करते हैं और प्रधानमंत्री के खिलाफ बहुत कुछ कहते हैं.”

उन्होंने कहा कि वह अगले दिन गांव गए थे और वहां स्थिति “ठीक” थी.

किसान और सपने देखने वाले

लेकिन करेड़ा बुजुर्ग के लोगों के लिए यह घटना सामाजिक शांति को तो नहीं तोड़ पाई, लेकिन इसने धर्म की पहचान को लेकर एक नई बातचीत शुरू कर दी है, जिसे पहले गांव वाले ज़रूरी नहीं मानते थे.

करेड़ा बुजुर्ग ऐसा गांव नहीं है जो आसानी से साम्प्रदायिक खांचों में बात करे. हिंदू और मुस्लिम परिवार एक-दूसरे की शादियों और त्योहारों में शामिल होते हैं. वे पानी के स्रोत और बाज़ार साझा करते हैं और रोज़मर्रा की ज़िंदगी इस तरह जुड़ी हुई है कि उस पर सवाल कम ही उठते हैं.

जाट ने कहा, “हमारे गांव में मस्जिद के सामने भी डीजे बजता है.” उनका कहना था कि जो घटनाएं कहीं और तनाव का कारण बन जाती हैं, वे इस गांव में परेशानी नहीं बनतीं.

करेड़ा बुजुर्ग गांव की एक मस्जिद | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
करेड़ा बुजुर्ग गांव की एक मस्जिद | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
करेड़ा बुजुर्ग गांव का स्थानीय मंदिर | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
करेड़ा बुजुर्ग गांव का स्थानीय मंदिर | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

ज्यादातर लोग किसान हैं, जो सुबह से शाम तक खेतों में काम करते हैं. लेकिन यहां के युवाओं की सोच अलग है. कुछ लोग काम के लिए जयपुर जाते हैं और फिर गांव लौटकर नालियों, सड़कों और रोजगार के अवसरों को बेहतर बनाने की योजना बनाते हैं.

28 साल के रमेश मीणा, जो 30 साल की उम्र से पहले सरपंच बनना चाहते हैं, उन्होंने कहा, “हम ऐसी घटनाओं का विरोध करना चाहते हैं. अगर गांव को आगे बढ़ाना है, तो ऐसी चीज़ें नहीं होनी चाहिए.”

अगले दिन तक रोज़मर्रा की ज़िंदगी फिर सामान्य हो गई. किसान खेतों में लौट गए और बच्चे स्कूल चले गए. मस्जिद का लाउडस्पीकर और मंदिर की घंटियां अपने समय पर बजती रहीं.

किसी भी हिंदू महिला ने विरोध में अपना कंबल वापस नहीं किया. किसी भी मुस्लिम परिवार ने धमकी की शिकायत नहीं की.

जब शाकुरन बानो से पूछा गया कि क्या वह गुस्से में हैं, तो उन्होंने कंधे उचकाए.

उन्होंने कहा, “कोई फायदा नहीं. मैं अपनी पूरी ज़िंदगी यहां रही हूं. हिंदू और हम भाई-बहन की तरह रहते हैं. जौनापुरिया जैसे लोग हमें अपमानित ही कर सकते हैं और क्या करेंगे?”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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