कपूरथला: अमृतसर के एक प्राइवेट क्लिनिक के बाहर 28-साल की रंजीत मदद के लिए तकरीबन पांच घंटे तक इंतज़ार करती रहीं. डॉक्टर ने उन्हें तब तक देखने से मना कर दिया, जब तक कोई महिला अटेंडेंट नहीं आ जाती, लेकिन कोई नहीं आया. आखिर में उन्होंने सफाई करने वाली महिला को बुलाया, ताकि वह रंजीत को अंदर ले जा सके.
रंजीत ने कहा, “उसने मुझे ‘स्मैकन’ कहा.” यह नशे की लत वाले लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक अपमानजनक शब्द है.
उन्होंने कहा, “मुझे आज भी याद है कि जब डॉक्टर ने मुझे अंदर आने नहीं दिया, तो मुझे कितना बुरा लगा था. पूरी मुलाकात सिर्फ पांच मिनट में खत्म हो गई. उस समय मुझे लगा कि मेरे लिए ठीक होना नामुमकिन है.”
वे सिर्फ हेरोइन की आदी नहीं थीं. वे एक महिला हेरोइन की आदी थीं और पंजाब की ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई में, उनके जैसी महिलाओं की लड़ाई लगभग दिखाई ही नहीं देती. नशे की आदी महिलाओं को अक्सर उनके परिवार छोड़ देते हैं, पड़ोसी उन्हें शर्मिंदा करते हैं और जिन डॉक्टरों को उनकी मदद करनी चाहिए, वही उन्हें ‘खतरनाक’ का ठप्पा दे देते हैं. उनके इलाज के लिए बहुत कम सुविधाएं हैं.
अब 33 साल की हो चुकीं रंजीत, कपूरथला सिविल अस्पताल के नवजीवन नशा मुक्ति केंद्र में बिलिंग काउंटर पर अपनी बारी का इंतज़ार कर रही है—कॉरिडोर की दीवारों से पेंट उखड़ा हुआ है और पास में कुछ महिलाएं प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठी हैं. वह यहां पिछले तीन साल से मेथाडोन इलाज ले रही हैं और हर हफ्ते यहां आने के लिए ब्यास से लगभग 60 किलोमीटर तक बस से सफर तय करती हैं.
उनके पास कोई और सस्ता विकल्प नहीं है. पूरे राज्य में सरकार द्वारा चलाए जा रहे 31 नशा मुक्ति केंद्रों में, नवजीवन ही एकमात्र केंद्र है, जहां महिलाओं को खास सेवाएं मिलती हैं.
महिलाओं में नशे की लत कितनी है, इसके सही आंकड़े मौजूद नहीं है क्योंकि इस पर चुप्पी रहती है और हाल की स्टडी भी कम हैं. हालांकि, 2023 में राज्यसभा में दिए गए जवाब में 2018 के नेशनल सर्वे के राज्य के आंकड़ों का हवाला दिया गया, जिसमें बताया गया कि पंजाब में 7.87 लाख महिलाएं गांजा लेती हैं (6.44 प्रतिशत), 45,000 महिलाएं ओपिओइड लेती हैं (0.37 प्रतिशत) और 52,000 महिलाएं नींद की दवाओं का इस्तेमाल करती हैं (0.43 प्रतिशत).
जब नवजीवन ने 2017 में कपूरथला जिले में 225 महिलाओं को ध्यान में रखकर एक पायलट प्रोग्राम चलाया, तो उन्हें 400 महिलाएं मिलीं. आउटरीच वर्कर्स का अनुमान है कि सिर्फ इसी जिले में असली संख्या 1,000 से ज्यादा है.
कपूरथला सिविल अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. सुमीत कौर मदान ने कहा: “ज्यादातर मामलों में माता-पिता अपनी बेटियों को नशा करने पर छोड़ देते हैं. लड़कों को घर का चिराग माना जाता है, इसलिए उनकी मदद के लिए ज्यादा संसाधन और सहयोग दिया जाता है, जबकि लड़कियों को उतनी मदद नहीं मिलती.”
कपूरथला के डॉक्टरों का कहना है कि पुरुषों और महिलाओं में नशे का पैटर्न लगभग एक जैसा है. ज्यादातर मरीज 15 से 35 साल की उम्र के हैं और हेरोइन या चिट्टा, शराब और दवाइयों वाले ओपिओइड जैसे प्रेगाबालिन और बुप्रेनॉर्फिन के आदी हैं.
पिछले साल मार्च में पंजाब सरकार ने ‘युद्ध नशेयां विरुद्ध’ अभियान शुरू किया, जिसके तहत अब तक राज्य में ड्रग्स की सप्लाई चेन तोड़ने पर फोकस किया गया है. पहले ही महीने में पुलिस ने ड्रग्स तस्करी के आरोप में 407 महिलाओं के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की, लेकिन नशा करने वालीं महिलाओं के इलाज पर बहुत कम ध्यान दिया गया है.

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि महिलाएं खुद सामाजिक बदनामी के डर से मदद लेने नहीं आतीं.
पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री के विशेष कार्य अधिकारी शालीन मित्रा ने कहा, “हम महिलाओं में नशे की समस्या को जानते हैं. सबसे ज़रूरी है बदनामी को खत्म करना. अगर सुविधाएं भी हों, तो भी महिलाएं बाहर नहीं आएंगी. अगर आप कपूरथला जाएंगे, तो वहां भी बहुत कम महिलाएं भर्ती मिलेंगी.”
लेकिन नवजीवन केंद्र में महिलाएं कभी-कभी 100 किलोमीटर से ज्यादा दूर से ओपीडी में आने के लिए सफर करती हैं, जो सुबह 9 से 11 बजे के बीच चलता है. डॉक्टरों का कहना है कि वे रोज़ 15-20 महिलाओं को देखते हैं. कुछ महिलाओं के लिए दूर आना उनकी पहचान छिपाने में मदद करता है.
लुधियाना के खन्ना से 121 किलोमीटर दूर से आने वाली खुशप्रीत ने कहा, “यहां मेरी पहचान छिपी रहती है, यहां कोई मुझे नहीं जानता, यह सुरक्षित है. मेरे इलाके में लोगों ने मेरे भाई से कहा था कि उसकी बहन का ‘ब्लैकिया’ होना शर्म की बात है.”
छूना बहुत ‘खतरनाक’
कपूरथला सिविल अस्पताल में पुरुषों और महिलाओं के नशा मुक्ति वार्ड अलग-अलग तरीके से बनाए गए हैं, जहां महिलाओं के वार्ड में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, वहीं पुरुषों के वार्ड में कोई कैमरा नहीं है.
एक स्टाफ सदस्य ने कहा, “यह सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए है क्योंकि महिला मरीजों के साथ काम करना ज्यादा जोखिम भरा माना जाता है.” डर यह नहीं होता कि महिलाएं खुद को नुकसान पहुंचाएंगी, बल्कि यह होता है कि वे स्टाफ के लिए ‘मुश्किल’ खड़ी कर सकती हैं.
यह सोच प्राइवेट मेडिकल सेक्टर में भी दिखती है. कई क्लिनिक महिलाओं के लिए अपने दरवाजे बंद कर देते हैं और उन्हें इलाज की ज़रूरत वाले मरीज की जगह एक जोखिम मानते हैं.
अमृतसर में एक प्राइवेट नशा मुक्ति केंद्र चलाने वाले दमनप्रीत ने कहा, “महिला नशेड़ियों को ज्यादा देखभाल की ज़रूरत होती है, उनके लिए अलग वार्ड और स्टाफ चाहिए होता है, वे झूठे कानूनी आरोप भी लगा सकती हैं, इसलिए कई लोग उनकी मदद करने से हिचकते हैं.”
नशा करने वालीं महिलाओं को अक्सर ‘दोगुना गलत’ माना जाता है—वो न सिर्फ ड्रग्स लेकर सामाजिक नियम तोड़ती हैं, बल्कि अपने तय किए गए महिला रोल और नैतिक नियमों का भी उल्लंघन करती हैं. ऐसी सोच के कारण महिलाओं का इलाज करना ज्यादा मुश्किल माना जाता है.
ठीक हो रही ड्रग एडिक्ट कमलप्रीत ने कहा: “पुरुष स्टाफ ने मेरी मदद करने के बजाय मुझे डांटना शुरू कर दिया. उन्होंने कहा कि मुझे छूना खतरनाक है क्योंकि मैं एक महिला हूं और नशे की आदी महिलाएं झूठे आरोप लगाकर उन्हें कानूनी परेशानी में फंसा सकती हैं.”
जो महिलाएं मदद लेने की कोशिश करती हैं, उनके लिए शक का यह माहौल बहुत अपमानजनक और हतोत्साहित करने वाला होता है. रंजीत के लिए, जिन्होंने नशे की शुरुआत में ही इलाज लेने की कोशिश की थी, अमृतसर का अनुभव इतना बुरा था कि उन्होंने कई साल तक इलाज ही छोड़ दिया.

इसी तरह, 30 साल की कमलप्रीत ने पाया कि इलाज लेने का मतलब एक ऐसी दुनिया से गुज़रना है, जहां डॉक्टर, आउटरीच वर्कर और यहां तक कि एनजीओ स्टाफ भी उनसे दूरी बनाकर रखते थे. उन्होंने अपने शहर मोगा के एक केंद्र की घटना याद की, जब वह चक्कर और थकान से गिर गई थीं.
कमलप्रीत ने कहा, “पुरुष स्टाफ ने मेरी मदद करने के बजाय मुझे डांटना शुरू कर दिया. उन्होंने कहा कि मुझे छूना खतरनाक है क्योंकि मैं महिला हूं और नशे की आदी महिलाएं झूठे आरोप लगाकर उन्हें कानूनी मामले में फंसा सकती हैं.”
विडंबना यह है कि ड्रग एडिक्ट महिलाएं अक्सर सबसे ज्यादा शोषण की शिकार होती हैं, जहां सिस्टम उन्हें कानूनी जोखिम मानता है, वहीं उन्हें शारीरिक और यौन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं ज्यादा होती हैं.
कपूरथला सिविल अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ. संदीप भोला ने कहा, “महिला ड्रग एडिक्ट्स में पुरुषों की तुलना में यौन संचारित बीमारियां होने की संभावना ज्यादा होती है. महिलाओं के शरीर की बनावट और पुरुष-महिला संबंधों की स्थिति के कारण महिलाओं में एसटीडी के मामले ज्यादा होते हैं.”
नवजीवन केंद्र में, 22 साल की शीतल की शुरुआती जांच में एचआईवी पॉजिटिव पाया गया. कई अन्य महिलाओं की तरह, उनकी नशे की लत ने उन्हें यौन शोषण के खतरे में डाल दिया.
उन्होंने कहा, “एक ट्रक ड्राइवर, जो ड्रग्स बेचता था, उसने मुझसे कहा कि अगर मैं उसके साथ संबंध बनाऊं, तो वह मुझे लगातार ड्रग्स देगा. मैं जवान थी, नासमझ थी और नशे की आदी थी, इसलिए मैंने इसे एक मौका समझा.”
शीतल का हाल ही में तलाक हुआ है और वह अपने भाई के साथ रह रही हैं. फिलहाल उनके पास नौकरी का कोई मौका नहीं है.
‘गिरी हुई’
एक वर्क डे की सुबह, करीब पांच या छह महिलाएं अपनी अपॉइंटमेंट के लिए इंतज़ार कर रही थीं, जिनमें से कुछ अपने परिवार के सदस्यों के साथ आई थीं.
एक मां अपनी बेटी के पास खड़ी थीं, लेकिन उन्होंने अपनी नाराज़गी छिपाई नहीं.
उन्होंने कहा, “लोग कहते हैं बेटियां देखभाल करती हैं, लेकिन मुझे अपनी बेटी को इस परेशानी के इलाज के लिए इधर-उधर लेकर जाना पड़ रहा है. कम से कम पुरुष और महिलाओं में कुछ फर्क तो होना चाहिए.” यह सुनकर उनकी बेटी का चेहरा उतर गया.
जहां नशे के आदी पुरुषों को अक्सर माफ कर दिया जाता है क्योंकि उन्हें परिवार का कमाने वाला और सहारा माना जाता है, वहीं महिलाओं को शायद ही कभी ऐसी छूट मिलती है.
ठीक हो रही ड्रग एडिक्ट रंजीत ने कहा: “मेरे ससुराल वालों ने मुझे अपने पति को तलाक देने के लिए मजबूर कर दिया. मैंने ठीक होने की इच्छा जताई, लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं छोड़ा गया…मेरे इलाके की एक महिला ने मुझे सेक्स वर्कर कहा.”
कपूरथला सिविल अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. सुमीत कौर मदान ने कहा, “ज्यादातर मामलों में माता-पिता अपनी बेटियों को ड्रग्स लेने पर छोड़ देते हैं. पुरुषों को घर का चिराग माना जाता है, इसलिए उनके लिए ज्यादा आसानी से पैसे और मदद मिल जाती है, महिलाओं की तुलना में.”
महिलाओं में ड्रग्स का इस्तेमाल अक्सर परिवारों के अंदर छिपा दिया जाता है और इसे चुप्पी और शर्म के साथ रखा जाता है. कई महिलाएं इस शर्म को खुद ही महसूस करने लगती हैं.
लाइन में खड़ी खुशप्रीत भी इंतज़ार कर रही थीं. उनका अपराधबोध बहुत गहरा है. वह खुद को ‘गिरी हुई’ कहती हैं. कई सालों तक सामाजिक शर्म के डर से उन्हें मेडिकल मदद नहीं मिली. उनकी मां ने उनसे कहा था कि वह खुद पर ‘काबू’ रखें.
उन्होंने कहा, “मेरी गलतियों की वजह से मेरी बहन की पढ़ाई रुक गई. एक रिश्तेदार ने कहा कि ऐसे माहौल की वजह से लड़कियां गलत काम करती हैं. मैंने सिर्फ अपनी नहीं, बल्कि अपनी बहन की ज़िंदगी भी बर्बाद कर दी.”

अपनी गलती सुधारना आसान नहीं है, लेकिन वह चाहती हैं कि जुलाई में अपनी बहन की शादी से पहले वह नशा छोड़ दें.
रंजीत की नशे की लत ने उनकी नौकरी और शादी दोनों छीन लीं. उन्होंने बताया कि उन्होंने पार्लर में काम करते समय हेरोइन लेना शुरू किया, ताकि पैसे बचाकर अमेरिका में अपने पति के पास जा सके, जो तीन साल पहले डंकी रूट से वहां गए थे.
उन्होंने कहा, “काम खत्म होने के बाद पार्लर में एक पुरुष सहकर्मी मुझे रिलैक्स करने के लिए बुलाता था. हम शराब पीते थे.” बाद में उन्होंने हेरोइन लेना शुरू कर दिया. “एक हफ्ते के अंदर ही मुझे चिट्टा की लत लग गई. उस समय की मेरी यादें धुंधली हैं. मैं अपने काम के दौरान भी नशे में रहती थी.”
उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया, लेकिन उनके पुरुष सहकर्मी को नहीं निकाला गया.
उन्होंने कहा, “उसे नौकरी पर रहने दिया गया, क्योंकि उसने वादा किया कि वह दोबारा ऐसा नहीं करेगा और इलाज कराएगा. मैनेजर ने मुझसे कहा कि नशे की आदी महिला ज्यादा परेशानी पैदा करती हैं और मेरे कारण कस्टमर पार्लर आना बंद कर देंगे.”
रंजीत के पास पास के नशा मुक्ति केंद्र में इलाज कराने का विकल्प नहीं था क्योंकि वह सिर्फ पुरुषों के लिए था. अमृतसर के क्लिनिक में हुए अपमानजनक अनुभव ने उन्हें और भी ज्यादा दुखी कर दिया. इसके कारण उनकी नशे की लत और बढ़ गई.
ऐसे परिवारों में, जहां इज्जत और सम्मान महिलाओं से जुड़ा होता है, वहां नशे को बीमारी नहीं, बल्कि चरित्र पर दाग माना जाता है.
रंजीत ने उदास होकर कहा, “मेरे ससुराल वालों ने मुझे अपने पति को तलाक देने के लिए मजबूर कर दिया. मैंने ठीक होने की इच्छा जताई, लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था.”
अब वह ब्यास में अपनी मां के साथ रहती हैं, लेकिन यहां भी उन्हें ताने सुनने पड़ते हैं. छोटी-छोटी पड़ोस की लड़ाइयां उनके चरित्र पर आरोप लगाने तक पहुंच जाती हैं.
उन्होंने कहा, “मेरे इलाके की एक महिला ने मुझे सेक्स वर्कर कहा.” और यह भी बताया कि नशे के आदी पुरुषों को इस तरह की बातों का सामना नहीं करना पड़ता.
एक अनदेखी लड़ाई
पिछले महीने, भगवंत मान की अगुआई वाली सरकार ने पंजाब को ‘ड्रग फ्री’ बनाने के लिए ‘युद्ध नशेयां विरुद्ध’ का दूसरा चरण शुरू किया, जहां पहले चरण में छापेमारी और गिरफ्तारियों पर ध्यान था, वहीं दूसरा चरण समुदाय को जोड़ने, गांव-गांव जाकर लोगों से संपर्क करने और नशा छोड़ चुके लोगों को “मोटिवेशनल स्पीकर” के रूप में शामिल करने पर केंद्रित है.
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अभी जोर जागरूकता बढ़ाने और लोगों को इलाज के लिए आगे आने के लिए प्रोत्साहित करने पर है. वे नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेज (एनडीपीएस) एक्ट 1985 की धारा 64ए के बारे में भी जानकारी दे रहे हैं, जिसके तहत अगर कोई नशे का आदी व्यक्ति खुद सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए आता है, तो छोटे अपराधों में उसे कानूनी कार्रवाई से छूट मिल सकती है.
लेकिन एक बार फिर, महिलाओं के लिए कोई अलग रणनीति नहीं है. ज़मीन पर काम कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ जागरूकता से ढांचे की कमियां दूर नहीं होंगी.
डॉ. भोला ने बताया कि इलाज के तरीके और नीतियां ज्यादातर युवा पुरुषों पर किए गए रिसर्च पर आधारित हैं. महिलाओं की ज़रूरतें, जो जैविक और सामाजिक रूप से अलग होती हैं, योजना और सुविधाओं दोनों में पीछे रह जाती हैं.
यहां तक कि जब महिलाएं इलाज पूरा कर लेती हैं, तब भी सामान्य जीवन में लौटना उनके लिए अलग तरह की चुनौतियां लेकर आता है.
26 साल की इंदरजीत, तीन साल में पांचवीं बार फिर से नशा करने के बाद नवजीवन केंद्र लौटी हैं. उन्होंने कहा कि समाज का तिरस्कार हर कदम पर उनके साथ रहा है.
उन्होंने कहा, “जब भी मैं बाहर जाती हूं, लोग मुझसे दूरी बनाकर रखते हैं. मेरे माता-पिता को सिर्फ मेरी शादी की चिंता है और मुझे समाज में दोबारा शामिल होने के लिए कोई मदद नहीं मिलती. अकेलेपन में, मुझे सुकून के लिए फिर से नशे की तरफ जाना पड़ता है.”
अंकिता ठाकुर दिप्रिंट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म की स्टूडेंट रह चुकी हैं. उन्होंने दिप्रिंट में इंटर्नशिप की.
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