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Thursday, 18 July, 2024
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इंदौर के सिंधी, जैन, यादव और मुस्लिम समुदाय अदालतों की बजाए मध्यस्थता केंद्रों पर कर रहे भरोसा

हमें उम्मीद नहीं थी कि जून में सेंटर खुलने के बाद इतनी जल्दी इतने मामले आने लगेंगे. सिंधी मध्यस्थता केंद्र प्रमुख का कहना है कि हमने 56 मामलों में से 12 का निपटारा कर दिया है.

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इंदौर: बड़ा सा कमरा एक अदालत कक्ष जैसा दिखता है, न्यायाधीश धैर्यपूर्वक सुनवाई करते हैं और दोनों पक्ष अपने विवाद को निपटाने के लिए आए हैं. सिवाय इसके कि यह कोई अदालत कक्ष नहीं है. यह इंदौर में एक सिंधी समुदाय मध्यस्थता केंद्र है जो एक अदालत की तरह काम कर रहा है लेकिन वास्तव में इंदौर की जिला अदालत और उच्च न्यायालय में मामले कम दायर हो, इसके लिए काम कर रहा है.

सुबह के 10 बजे हैं और इंदौर की भीड़भाड़ वाली सिंधी कॉलोनी में स्वामी प्रीतमदास सभागार का एक कमरा खचाखच भरा हुआ है, जो सेवकानी परिवार विवाद की 8वीं सुनवाई के लिए तैयार है. परिवार के सदस्य बड़े से कमरे में प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठे हैं, वे सुनवाई का हिस्सा बनने के लिए उत्सुक हैं, जबकि पास की आटा चक्की से लगातार शोर आ रहा है. निष्पक्षता से फैसला करना पहली प्राथमिकता है. दोनों बहनों में छोटी बहन 33 तोला सोना, सारी पैतृक संपत्ति की गठरी लेकर मध्यस्थता केंद्र पहुंची है. वादी और मध्यस्थ सिंधी बोलते हैं, जो उन्हें बेहतर ढंग से खुद को व्यक्त करने में मदद करता है. मुख्य मध्यस्थ किशोर कोडवानी, पारंपरिक टोपी पहने हुए, कार्यवाही का नेतृत्व करते हैं जबकि दो अन्य मध्यस्थ, दोनों सिंधी, मामले के कागजात तैयार करने में उनकी मदद करते हैं. 10 मिनट के ब्रेक को छोड़कर, ढाई घंटे से अधिक समय तक चलने वाली सुनवाई से परिवार की महिलाओं की आंखें नम हो जाती हैं. उनका कहना है कि पैसे और संपत्ति की लड़ाई ने उनके बीच का सारा प्यार खत्म कर दिया है.

लेकिन सामुदायिक मध्यस्थता केंद्र को लेकर लोगों में उम्मीद है, भले ही उसके पास नियमित अदालत के कानूनी अधिकार न हों. वादी के साथ काम करने वाले मध्यस्थ भारत की न्याय वितरण प्रणाली में एक महत्वपूर्ण कमी को भर रहे हैं. यह प्रयोग इंदौर क्षेत्र के अन्य समुदायों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और इनमें से कुछ केंद्र धर्मशालाओं और मंदिर परिसरों से काम कर रहे हैं, जहां मामलों की सुनवाई साप्ताहिक या मासिक आधार पर की जाती है. नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार, इंदौर में 49,550 सिविल मामले और उज्जैन में 11,713 सिविल मामले लंबित हैं.

और यह सब एक न्यायाधीश की लीक से हटकर सोच के साथ शुरू हुआ, जिन्होंने अनौपचारिक रूप से मध्य प्रदेश राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (एमपी एसएएलएसए) को मुकदमेबाजी से पहले मामलों की मध्यस्थता का विचार प्रस्तावित किया था.सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश सुदेश धमवानी कहते हैं, “अदालतों की अपनी सीमाएं हैं और वे उनके तहत काम करती हैं. लेकिन मध्यस्थता सभी पक्षों- दोनों पक्षों को समाधान देती है. मध्यस्थता में कोई भी हार नहीं सकता है और लोगों को शारीरिक, मानसिक और वित्तीय समस्याओं से भी छुटकारा मिल जाता है, जिनका सामना उन्हें अदालती मामलों में करना पड़ता है.”

उन्होंने कहा कि सामुदायिक मध्यस्थता केंद्र जैसे प्रयास समाज का भला करते हैं और त्वरित न्याय मिलता है और हर कोई इससे खुश होता है.

समय की पाबंदी, गोपनीयता और अदालत कक्ष जैसा अनुशासन इस सिंधी पंचायत की प्रमुख विशेषताएं हैं. सिवाय इसके कि यहां कोई न्यायाधीश नहीं होता जो आदेश देता है, बल्कि एक समुदाय का ताकतवर व्यक्ति होता है जिसका अपने लोगों के बीच काफी प्रभाव होता है. मध्यस्थता केंद्र सोमवार से शुक्रवार शाम 5 बजे से 8 बजे के बीच विवादों की सुनवाई करता है.

सिंधी पंचायत सिंधी कॉलोनी में दो मंजिला इमारत की पहली मंजिल से चलती है, लेकिन सेवकानी परिवार के मामले में बड़ी संख्या में परिवार के सदस्य होने के कारण कार्यवाही को बगल के सभागार में ले जाना पड़ा. पंचायत केंद्र में तीन कमरे हैं और अलग-अलग कमरों में अलग-अलग पार्टियों की सुनवाई होती है. केंद्र के एक कमरे की दीवार पर लिखा है: क्षमा ही छुटकारा है और समझौता ही समाधान है. वहीं कोडवानी की मेज़ पर कानून की किताबें भी रखी हैं, जिनमें हिंदू लॉ, क्रिमिनल मेजर एक्ट, विवाह और तलाक कानून की किताबें हैं और साथ ही दीवार पर भगवान विश्वकर्मा की एक बड़ी सी तस्वीर भी लगी है.

इंदौर में कोरी-कोली समुदाय के मध्यस्थता केंद्र में पंचायत चल रही है | फोटो: विशेष प्रबंध

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समाज पर पकड़

समुदाय में अक्सर ‘इंदौर का गांधी’ के रूप में जाने जाने वाले, सामाजिक कार्यकर्ता और मुख्य मध्यस्थ कोडवानी सिंधी पंचायत के स्तंभ हैं. एक प्रभावशाली सदस्य के रूप में, वह अपने लोगों के बीच विश्वास जगा रहे हैं.

एक लेन-देन से संबंधित विवाद जिसमें 3.5 लाख रुपये की राशि शामिल थी, तीन वर्षों से अधिक समय से अनसुलझा था. मध्यस्थता केंद्र से दोनों पक्षों को नोटिस भेजा गया. कोडवानी कहते हैं, “कभी-कभी मेरे प्रभाव के कारण मामले सुलझ जाते हैं. जब उन्हें पता चला कि किशोर कोडवानी इस समाधान में शामिल थे, तो दोनों ने मामले को आपस में सुलझाने पर सहमति व्यक्त की, वे केंद्र आए और दस्तावेज़ीकरण करवा कर मामले को सुलझा लिया.”

68 वर्षीय कोडवानी इंदौर के सिंधी समाज में एक अलग पहचान रखते हैं. पिछले कुछ महीनों में आए मामलों के दस्तावेज़ पलटते हुए वे कहते हैं, “इस परिवार (सेवकानियों) में पैतृक संपत्ति का असमान वितरण है. जब मामला हमारे पास आया तो हमने सभी पक्षों को बुलाया और मध्यस्थता करने की कोशिश की.” सेवकानी परिवार प्रतिष्ठित है और कई सदस्यों का व्यवसाय इंदौर और भोपाल में फैला हुआ है.

जब परिवार के सबसे बड़े भाई अपनी पत्नी और बेटे के साथ प्रीतमदास सभागार में आए, तो वह मध्यस्थता के माध्यम से समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे. तब कोडवानी ने हस्तक्षेप किया: “यदि आप सहमत नहीं हैं, तो इसे कागज पर लिखें ताकि हम इसे आगे (अदालत में) ले जा सकें.” परिवार के सदस्य ने हार मान ली. कोडवानी का अपने लोगों के बीच यही प्रभाव है. एमपीएसएएलएसए द्वारा मध्यस्थता केंद्रों को उनके पास आने वाले सभी विवादों के बारे में सूचित करने का आदेश दिया गया है.

सिंधी पंचायत में अपने कार्यालय में बैठे, अपने बाएं हाथ की मुट्ठी पर अपना सिर झुकाए, कोडवानी सामुदायिक कार्य के तनाव से निपटने के लिए अक्सर सिगरेट पीते हैं, जिसके लिए वह प्रतिदिन 8-10 घंटे देते हैं. कोडवानी 40 वर्षों से अधिक समय से सामाजिक कार्यों में हैं. उनके पिता इंदौर के एक प्रसिद्ध पत्रकार थे जो एक सिंधी अखबार चलाते थे. कोडवानी विभिन्न पर्यावरणीय मामलों से भी जुड़े रहे हैं.

वह कहते हैं, “मैं यह सुनिश्चित करने के लिए बहुत अधिक भार के साथ काम करता हूं कि किसी के साथ अन्याय न हो. लोग भरोसे के साथ मेरे पास आते हैं.”

स्वामी प्रीतमदास सभागार में मौजूद एक वादी का कहना है, “हमने मध्यस्थता केंद्र का रुख किया क्योंकि यह हमारे समाज के लोगों के लिए है और यहां केवल हमारे लोग ही सुनवाई करते हैं. अपनी बात रखने में आत्मविश्वास होता है और सब कुछ गोपनीय रहता है.”

सितंबर 2023 तक, सिंधी मध्यस्थता केंद्र में 56 मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें वित्तीय से लेकर पारिवारिक विवाद (विभाजन, तलाक आदि) शामिल थे.

कोडवानी कहते हैं, “हमें उम्मीद नहीं थी कि जून के अंत में केंद्र खुलने के तुरंत बाद इतने सारे मामले आने लगेंगे. 56 मामलों में से, हमने 12 का निपटारा कर दिया है. हमारा लक्ष्य 10 सप्ताह में समाधान प्रदान करना है लेकिन कुछ मामले पहले ही निपटा दिए जाते हैं.”

कोडवानी की टीम में 26 लोग हैं और सभी लोग हर हफ्ते दो घंटे केंद्र को देते हैं. उनकी टीम में वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, वकील और सेवानिवृत्त न्यायाधीश शामिल हैं.

सिंधी मध्यस्थता केंद्र चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

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अदालतों से बेहतर

सिंधी मध्यस्थता केंद्र समुदाय संचालित न्याय पहलों की बढ़ती सूची में से एक है जो मालवा बेल्ट में तेजी से बढ़ रहा है. हालांकि, सिंधी प्रयोग के विपरीत, जो बुनियादी ढांचे और मामलों की संख्या की दृष्टि से विस्तृत प्रतीत होता है, अन्य अभी भी आकार ले रहे हैं. मुस्लिम, अग्रवाल, बोहरा, जैन, ब्राह्मण, यादव, वैश्य, कोरी-कोली, सिंधी, नेमा सहित अन्य समुदाय न्याय की इस पद्धति को अपना रहे हैं.

सिंधी समुदाय से आने वाले वकील राहुल सुखानी इंदौर मध्यस्थता केंद्र में हर हफ्ते अपने दो घंटे देते हैं. उन्होंने कहा, “मैंने अदालतों में देखा है कि पारिवारिक विवाद, संपत्ति या आर्थिक विवाद में वादी वर्षों तक अदालत के चक्कर लगाता रहता है और उसे नुकसान के अलावा कुछ नहीं मिलता.”

सुखानी इस नई विकसित हो रही प्रणाली के प्रति आश्वस्त दिखते हैं और कहते हैं कि यदि यह समाधान तंत्र ठीक से काम करता है, तो इससे वकीलों के व्यवसाय को नुकसान हो सकता है क्योंकि उनके पास आने वाले मामले कम हो जाएंगे. वे कहते हैं, “सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी बहुत महत्वपूर्ण है और हमें इन मुद्दों को सामुदायिक स्तर पर हल करना चाहिए.”

इस साल की शुरुआत में सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने लंबित मामलों से निपटने में मध्यस्थता के महत्व का उल्लेख किया था. उन्होंने कहा था, “हम मध्यस्थता के स्वर्ण युग की शुरुआत में खड़े हैं. मध्यस्थता को केवल एक वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र के रूप में नहीं माना जाना चाहिए.”

सितंबर में, भारत ने मध्यस्थता अधिनियम 2023 पारित किया है. इसमें लिखा है, “किसी भी क्षेत्र या इलाके के निवासियों या परिवारों के बीच शांति, सद्भाव और शांति को प्रभावित करने की संभावना वाले किसी भी विवाद को विवाद के पक्षों की पूर्व आपसी सहमति से सामुदायिक मध्यस्थता के माध्यम से निपटाया जा सकता है.”

इंदौर में सिंधी मध्यस्थता केंद्र | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

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कानून के दायरे में सामुदायिक मध्यस्थता केंद्र

इंदौर, उज्जैन, देवास के मध्यस्थता केंद्रों को एमपीएसएलएसए से कानूनी मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है जो संबंधित समुदायों के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को प्रशिक्षण दे रहा है, जिसके बाद मध्यस्थता शुरू की जाती है. एमपीएसएलएसए समुदायों से प्रतिष्ठित व्यक्तियों को चुनता है – प्रोफेसर, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, डॉक्टर, शहर काजी.

देश में कई अदालत द्वारा संचालित मध्यस्थता केंद्र हैं और मध्यस्थता के अन्य तरीके भी हैं जैसे निजी मध्यस्थता, सामुदायिक मध्यस्थता और मुकदमे-पूर्व मध्यस्थता.

विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी में सीनियर रेजिडेंट फेलो और जल्दी (भारत में न्याय, पहुंच और देरी को कम करना) पहल की टीम लीड दीपिका किन्हल कहती हैं, “मामलों को हमेशा बुजुर्गों को शामिल करके समाज के स्तर पर हल किया जाता रहा है.”

किन्हल कहती हैं कि खाप पंचायतें भी सामुदायिक मामलों को सुलझाती हैं लेकिन जिस तरह उन्होंने शादी और लिंग से जुड़े मामलों पर अपनी राय व्यक्त की, उससे वे बदनाम हो गईं.

दिसंबर 2021 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति डिवीजन बेंच, इंदौर ने 16 समुदायों के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को सामुदायिक मध्यस्थता का प्रशिक्षण दिया था. हालांकि सिंधी समुदाय का कोई भी सदस्य उस प्रशिक्षण में शामिल नहीं था लेकिन उन्हें कानूनी सेवा समिति द्वारा एक अन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने के लिए कहा गया था.

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति की ओर से मास्टर ट्रेनर मोहम्मद शमीम विभिन्न समुदाय के लोगों को मध्यस्थता का प्रशिक्षण देते हैं. वे कहते हैं, “ये प्रशिक्षण कार्यक्रम मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ में न्यायमूर्ति विवेक रुसिया के सामुदायिक मध्यस्थता के दृष्टिकोण के कारण शुरू किए गए थे.”

शमीम का कहना है कि प्रतिष्ठित लोगों को 20 घंटे की ट्रेनिंग दी जाती है जिसमें उन्हें मध्यस्थता की बुनियादी बातों की जानकारी दी जाती है. उन्होंने कहा, “प्रशिक्षण में मध्यस्थता कैसे करनी है, किन बातों का ध्यान रखना है और कानून के दायरे में मध्यस्थता कैसे करनी है, ये सब सिखाया जाता है.”

इन केंद्रों का उद्घाटन जिला अदालतों के अधिकारियों द्वारा किया जाना एक बार फिर न्यायपालिका की इच्छाशक्ति को रेखांकित करता है, जब मामले को कम करने की बात आती है.

शमीम का कहना है कि इंदौर में यह मॉडल काफी सफल साबित हो रहा है. उन्होंने कहा, “अदालतों पर बढ़ते दबाव ने इसे एक विकल्प के रूप में खड़ा किया है और इससे लोगों को ही फायदा होगा.”


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चुनौतियां

मामलों के लिए सिंधी सेंटर में तीन सदस्यीय पीठ का गठन किया जाता है, जिसमें एक महिला, एक वकील और एक सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होते हैं और वादी की पहचान गोपनीय रखी जाती है. लेकिन सिंधी पंचायत में मामले को सुलझाने की शर्त यह है कि कम से कम एक व्यक्ति इंदौर का निवासी और समुदाय से संबंधित होना चाहिए. हालांकि, अन्य मध्यस्थता केंद्र मामलों की सुनवाई तभी करते हैं जब दोनों पक्ष समुदाय से संबंधित हों.

कोडवानी कहते हैं, “कभी-कभी, मामले जटिल होते हैं. इसका समाधान ढूंढना मुश्किल हो जाता है.” कोडवानी का कहना है कि यही कारण है कि वे कार्यवाही शुरू करने से पहले सभी पक्षों के साथ छोटी-छोटी बैठकें करते हैं.

कोडवानी के मुताबिक, सामुदायिक मध्यस्थता केंद्र का मॉडल इंदौर, उज्जैन जैसे शहरी इलाकों में तो सफल हो सकता है लेकिन ग्रामीण इलाकों में यह काम नहीं करेगा. वे कहते हैं, “गांवों में जाति संरचना काफी मजबूत है, इसे लागू करने में चुनौतियां आ सकती हैं.”

कुछ हलकों में चर्चा के बावजूद, इन मध्यस्थता केंद्रों को अभी भी व्यापक पैमाने पर प्रचारित नहीं किया गया है और कुछ को व्यावहारिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा है. इंदौर में कोरी-कोली समुदाय ने पिछले एक साल में सामने आए 60 मामलों में से 55 का सफलतापूर्वक निपटारा किया लेकिन लोग इस बात से खुश नहीं थे कि सुनवाई उनके ड्राइंग रूम में लाई गई. कोरी-कोली मध्यस्थता केंद्र के सदस्य और मध्यस्थ महेश वर्मा कहते हैं कि शुरुआत में वे मामलों की सुनवाई के लिए लोगों के घर जाते थे. लेकिन ऐसी घटनाएं भी हुईं जहां हमें संबंधित पक्षों की आलोचना का सामना करना पड़ा जिन्होंने आरोप लगाया कि न्याय से समझौता किया गया क्योंकि सुनवाई तटस्थ आधार पर नहीं हुई. वह कहते हैं, “बाद में, हमने सुनवाई को सोसायटी की धर्मशाला में स्थानांतरित कर दिया जो मासिक आधार पर होती है.”

सिंधी पंचायत के बाहर लगा मध्यस्थता केंद्र का बोर्ड | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

समुदाय की सीमाओं और उनकी संवेदनशीलता के भीतर मामलों को सुलझाने के लिए आवश्यक बारीकियों को रेखांकित करते हुए, वर्मा कहते हैं, “हर समुदाय की प्रकृति अलग है लेकिन अदालत केवल न्याय के आधार पर चलती है. इन केंद्रों में समुदाय की प्रकृति के अनुसार न्याय किया जाता है और सभी को समझाने का प्रयास किया जाता है.”

सितंबर में कोरी-कोली समुदाय में तलाक का मामला सामने आया. शुरुआत में दोनों पक्षों की समझाइश की गई लेकिन जब बात नहीं बनी तो सभी की मौजूदगी में तलाक को मंजूरी दे दी गई. वर्मा का कहना है कि उनके समुदाय में 11 उपजातियां हैं और प्रत्येक से एक व्यक्ति को समूह से जोड़ा गया है. वर्मा कहते हैं, “मामलों का रिकॉर्ड रखने, प्रक्रिया और सुनवाई की तारीखों पर निर्णय के लिए सामंजस्य व्हाट्सएप समूह के जरिए किया जाता है.”

पिछले एक साल में जैन समाज के छह मामले मध्यस्थता केंद्र में आए, जिनमें से तीन का निपटारा हो गया. जैन मध्यस्थता केंद्र के प्रमुख और देवी अहिल्या बाई विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति नरेंद्र धाकड़ कहते हैं, “मध्यस्थता में हर किसी की जीत होती, किसी की हार नहीं होती. साथ ही समय और पैसे की बचत होती है.”


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महिला प्रतिनिधियों की कमी

इंदौर में जब 16 अलग-अलग समुदायों के लोगों को ट्रेनिंग दी गई तो महिलाओं की भागीदारी कम थी. पिछले साल 75 लोगों ने मध्यस्थता प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिनमें से केवल 10 महिलाएं थीं. प्रशिक्षण लेने वाली महिलाओं का कहना है कि सामाजिक स्तर पर उन्हें न्याय प्रक्रिया में शामिल किया गया है, लेकिन उनकी आवाज दबा दी जाती है.

एक निजी बैंक में काम करने वाली 29 वर्षीय तरन्नुम उन लोगों में से थीं, जिन्होंने मुस्लिम समुदाय से प्रशिक्षण लिया था. वह कुछ वर्षों से इंदौर में मुस्लिम महिलाओं के लिए काम कर रही हैं.

मुस्लिम समुदाय में दहेज और तलाक के कई मामले सामने आते हैं. वह कहती हैं, “बहुविवाह एक बड़ी समस्या है और ऐसे मामले मध्यस्थता केंद्रों में आते हैं लेकिन इन मामलों को अक्सर महिलाओं के नजरिए से नहीं देखा जाता है.”

प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले मुस्लिम समुदाय के 22 लोगों में से केवल दो महिलाएं थीं. तरन्नुम कहती हैं, “पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के रूप में, हमें न्याय प्रणाली में शामिल किया गया है लेकिन हमें अभी भी बोलने का मौका नहीं मिलता है. हमें अक्सर समुदाय के वरिष्ठ लोगों द्वारा बोलने से रोका जाता है.”

लेकिन सामुदायिक स्तर पर मामलों की सुनवाई का एक फायदा यह है कि वहां के मध्यस्थों को वादकारियों के बारे में पता होता है, जिससे विश्वास बढ़ता है. किन्हल कहती हैं, “लेकिन सरकारी मध्यस्थता केंद्रों में, मध्यस्थ अजनबी होते हैं. यह सुनिश्चित करने के लिए कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिलाओं के साथ कोई अन्याय न हो, मध्यस्थों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और अधिक से अधिक महिलाओं को इसमें शामिल किया जाना चाहिए.”

हालांकि, कोडवानी का दावा है कि सिंधी पंचायत ने अपनी व्यवस्था में इन सभी चुनौतियों और कमियों को दूर करने का काम किया है. उन्होंने कहा, “मेरे समुदाय का केंद्र सबसे अंत में स्थापित किया गया था. मैंने सबसे पहले दूसरे समुदायों के काम करने के तरीके को समझा और उन कमियों को दूर करने की दिशा में काम किया.”

वह कहते हैं, “जब भी कोई मामला मेरे पास आता है तो सुनवाई के लिए उसमें एक महिला को जरूर शामिल किया जाता है ताकि मुद्दे को महिलाओं के नजरिए से भी समझने में मदद मिले.”

किसी विशेष मध्यस्थता केंद्र में जो कुछ होता है वह भी किसी समुदाय के आंतरिक सांस्कृतिक रीति-रिवाजों द्वारा सीमित या नियंत्रित होता है. न्याय की सीमाएं समाज की सामूहिक दीवारों के भीतर निर्धारित होती हैं.

उज्जैन के माहेश्वरी समाज ने अपने केंद्र में महिलाओं को भी शामिल किया है. विभिन्न समुदायों के 72 लोगों ने उज्जैन में प्रशिक्षण प्राप्त किया है. उज्जैन में माहेश्वरी सामुदायिक केंद्र में मुख्य मध्यस्थ, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार भूपेंद्र भूतड़ा कहते हैं, “हमारे समुदाय से पांच लोग हैं, जिनमें दो महिलाएं भी शामिल हैं और सभी को मध्यस्थता का प्रशिक्षण मिला है.”

संपत्ति, विभाजन और विवाह विवादों के अलावा, कुछ ऐसे विवाद भी हैं जो वास्तव में एक अनुभवी मध्यस्थ के धैर्य की भी परीक्षा लेते हैं. एक बुजुर्ग महिला सिंधी पंचायत में मामला लेकर आई कि वह अपने बेटे से मिलना चाहती है लेकिन उसका बेटा मिलने से मना कर रहा है.

कोडवानी के लिए ये अब तक का सबसे मुश्किल मामला था. वह कहते हैं, “एक तरफ उसकी मां रो रही थी और दूसरी तरफ मैं रो रहा था. मुझे नहीं समझ आ रहा था कि क्या करना है.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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