Wednesday, 19 January, 2022
होमफीचरशौक, टशन, लगाव— कैसे देश के छोटे शहरों के स्ट्रिंगर खतरा मोल लेकर भी पत्रकारिता कर रहे हैं

शौक, टशन, लगाव— कैसे देश के छोटे शहरों के स्ट्रिंगर खतरा मोल लेकर भी पत्रकारिता कर रहे हैं

लखीमपुर खीरी हिंसा के दौरान एक स्ट्रिंगर की मौत ने यह बात उजागर कर दी कि देश के छोटे शहरों के पत्रकारों को कितना कम पैसा और कितनी कम पहचान मिलती है जबकि, वे तमाम तरह के जोखिम उठाने में पीछे नहीं रहते.

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अयोध्या/प्रयागराज/मैनपुरी: ‘शौक’, ‘टशन’ और ‘लगाव’ कुछ ऐसे शब्द हैं जो उत्तर प्रदेश में कई स्ट्रिंगर के दिमाग में सबसे पहले आते हैं जब उनसे पूछा जाता है कि क्या चीज उन्हें पत्रकार के तौर पर काम करने के लिए प्रेरित करती है? अयोध्या, मैनपुरी, प्रयागराज, वाराणसी, मेरठ और सहारनपुर में अपनी आजीविका चलाने के लिए निजी स्कूल में पढ़ाने, खेती-बड़ी, इंटरनेट कैफे, मैरिज हॉल, यूट्यूब चैनल और किराना स्टोर जैसे साइड बिजनेस के साथ तमाम स्ट्रिंगर बतौर पत्रकार लगातार अपने काम में जुटे हैं—जिसमें फुटेज इकट्ठा करना और क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मीडिया समूहों के लिए रॉ न्यूज जुटाना शामिल है.

हाल में लखीमपुर खीरी हिंसा के दौरान रमन कश्यप की मौत ने यह बात उजागर कर दी है कि छोटे शहरों के स्ट्रिंगर किस तरह शोषण झेलकर अपना काम कर रहे हैं, न उन्हें किसी संस्थान का समर्थन मिलता है, न कोई फायदा. यही नहीं उन्हें न केवल वेतन कम मिलता है बल्कि काम के लिए कोई निर्धारित समय भी नहीं होता. अक्सर वे जो स्टोरी ब्रेक करते हैं उसके लिए बाइलाइन तक नहीं मिलती. इन सबके बावजूद उनमें से ज्यादातर को अपने काम पर गर्व है—अपनी हीरो होंडा बाइक पर शानदार तरीके से ‘पत्रकार’ लिखाकर चलना उनका शगल बन चुका है.

24×7 टीवी न्यूज का चलन बढ़ने के साथ स्ट्रिंगर पत्रकारों के लिए स्वर्णिम काल की शुरुआत हुई. यही वो समय था जब सबकी निगाहें भारत के छोटे शहरों पर टिकी थीं क्योंकि मार्केटिंग, विज्ञापन और बॉलीवुड पटकथा लेखन के क्षेत्र के दिग्गजों का बड़े महानगरों जी भर चुका था. 2005 में हरियाणा के कुरुक्षेत्र में बोरवेल में गिरे प्रिंस नाम के बच्चे की कहानी ने छोटे शहरों में आने वाले बदलावों की कहानियां सामने लाने की भूख को जन्म दिया और स्ट्रिंगर को इसी लहर पर सवार होने का मौका मिल गया.

दिप्रिंट ने 2022 में विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुटे एक राज्य उत्तर प्रदेश के कई शहरों का दौरा किया और यह जानने की कोशिश की कि भारतीय पत्रकारिता में अक्सर ‘पैदल सिपाही’ माने जाने वाले ग्रामीण क्षेत्र के स्ट्रिंगर आखिर कैसा जीवन जी रहे हैं.

‘एक्सीडेंटल जर्नलिस्ट’

किसी भी जिले में कलेक्ट्रेट, अस्पतालों, शिक्षा विभागों और राजनीतिक आयोजनों में अक्सर अखबारों और टीवी के पत्रकारों (ज्यादातर पुरुष) को अपनी बाइक और कारों से आते देखा जाता है जहां इन स्थापित पत्रकारों को बाइलाइन और मान्यता मिली होती है. वहीं उनके साथ आने वाले स्ट्रिंगर पर शायद ही कभी किसी का ध्यान जाता हो.

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आठ साल पहले पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने वाले प्रयागराज के स्ट्रिंगर 32 वर्षीय पवन पटेल का कहना है, ‘ज़्यादातर स्ट्रिंगर ऐसे ही सीखते हैं. पहले कई साल तक रिपोर्टर के साथ घूमते हैं फिर खुद फील्ड पर अकेले उतर आते हैं.’

आमतौर पर किसी भी जिले में नगर पालिका, अपराध, अस्पताल, राजनीति और शिक्षा जैसी बीट्स स्थापित पत्रकारों को दी जाती हैं. पटेल बताते हैं कि स्ट्रिंगर सोशल स्टोरीज और लोगों पर ध्यान केंद्रित करते हैं. पूर्वांचल यूनिवर्सिटी से स्नातक पटेल कई सालों तक प्रमुख मीडिया घरानों में नौकरी पाने की कोशिश करने के बाद अब पब्लिक एप, ग्लोबल भारत, न्यूज नेशनल और वतन एप जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए काम करते हैं. एक वरिष्ठ पत्रकार ने उन्हें इस क्षेत्र से परिचित कराया था.

सर्द नवंबर के महीने में एक दिन प्रयागराज के इंडियन कॉफी हाउस में दिप्रिंट से बात करते हुए पटेल ने कहा, ‘स्ट्रिंगर का मतलब है बाइक उठाओ, जहां नाली, पानी, घर, सड़क की समस्या है उसे स्टोरी बना दो.’

उसके पास पत्रकारिता की डिग्री नहीं है. इसी तरह अयोध्या के 47 वर्षीय शंकर श्रीवास्तव के पास भी कोई डिग्री नहीं है वो केवल आठवीं कक्षा तक पढ़े हैं.

अयोध्या के अभिषेक सावंत जिनके पास डिग्री है और पांच साल तक पंजाब केसरी के लिए काम करने का अनुभव भी है वो कहते हैं, ‘एक्सीडेंटल जर्नलिस्ट कहे लीजिए. अधिकांश स्ट्रिंगर के पास डिग्री नहीं होती है वो अभ्यास से ही पत्रकारिता सीखते हैं.’

श्रीवास्तव ने 2007 में अखबार के लिए काम करने वाले दो वरिष्ठ पत्रकारों से पत्रकारिता सीखी थी. वह उनके लिए तस्वीरें खींचते थे और धीरे-धीरे रिपोर्टिंग करना सीख गए.

सावंत और श्रीवास्तव दोनों ही पत्रकार संजीव आजाद और कुछ अन्य लोगों द्वारा चलाए जा रहे एक स्थानीय मीडिया कार्यालय में एकत्र होते हैं. अयोध्या के भीड़भाड़ भरे रिकाबगंज चौक बाजार क्षेत्र में एक दुकान की पहली मंजिल पर स्थित इस मीडिया हाउस में श्रीवास्तव जैसे स्ट्रिंगर का आना-जाना लगा रहा है जो न तो किसी प्रेस एसोसिएशन में रजिस्टर्ड हैं और न ही किसी मीडिया हाउस के वेतनभोगी कर्मचारी हैं.

Rented media office run by Sanjeev Azad and few others in Faizabad | Jyoti Yadv/ThePrint
फैजाबाद में संजीव आजाद और अन्य लोगों द्वारा संचालित किराए का मीडिया ऑफिस | ज्योति यादव | दिप्रिंट

मीडिया सेंटर में एक बैनर लगा है ‘खबरों की तलाश में, कलाम के सिपाही.’ पत्रकारों का समूह ने ‘टीम जुझारू’ के रूप में अपनी पहचान बना रखी है.

बतौर स्ट्रिंगर शुरुआत करने वाले संजीव आजाद अब एक प्रभावशाली क्षेत्रीय मीडिया हाउस भारत समाचार के एक रिपोर्टर हैं. उनका कहना है कि उनमें से ज्यादातर लोग 7-8 साल कोशिश करने के बाद भी रिपोर्टर नहीं बन पाते हैं तो फिर स्थिर आय के लिए अन्य व्यवसायों की तरफ रुख करते हैं.

स्ट्रिंगर की समस्याओं की अनदेखी के लिए प्रेस संघों के खिलाफ भी नाराजगी है.

पटेल कहते हैं, ‘लखीमपुरी जैसी घटना होने पर तो वो आवाज उठा सकते हैं लेकिन उन मुद्दों को नहीं उठाते हैं जो सालों-साल से तमाम स्ट्रिंगर को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं. इससे उनकी यथास्थिति के लिए चुनौती उत्पन्न हो जाएगी. उदाहरण के तौर पर वे सभी स्ट्रिंगर के पंजीकरण का मुद्दा नहीं उठाते हैं.’

कौन बन पाते हैं रिपोर्टर

ओबीसी जाति से आने वाले पवन पटेल का स्पष्ट मानना है कि उनकी जाति की वजह से अवसर नहीं मिल पाते हैं.

पवन के मुताबिक, ‘अगर आप मुझसे पूछें तो दर्जनों ऐसी घटनाएं बता सकता हूं जब उच्च जाति का कोई व्यक्ति अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक हैसियत के कारण अवसरों का लाभ उठाने में आगे रहा.’

मैनपुरी में भी उनके जैसे स्टिंगर इस बात पर सहमति जताते हैं.

पिछले 24 सालों से इस पेशे में लगे अनिल शाक्य आज भी स्ट्रिंगर हैं. उन्होंने कहा, ‘जातिवाद से कोई इनकार नहीं कर सकता.’ साथ ही एक किस्सा भी सुनाया कि कैसे जिले के ब्राह्मण नेता ने मिलने-जुलने के लिए सिर्फ ब्राह्मण पत्रकारों को ही आमंत्रित किया था.

इस छोटी-सी दुनिया में कनेक्शन बहुत मायने रखते हैं और ये कनेक्शन तभी आसान हो सकता है जब आप सामाजिक और आर्थिक तौर पर सक्षम हों.

शाक्य के मुताबिक, ‘रिपोर्टर बनने के लिए आपके मीडिया में लिंक होने चाहिए, प्रेस क्लब के लोगों के साथ उठना-बैठना होना चाहिए और स्टेड हेड को संतुष्ट करने के लिए विज्ञापन होने चाहिए.’ वहीं, पटेल कहते हैं कि आप सीखने की इच्छा रखते हैं और आपके पास उच्च जाति का विशेषाधिकार नहीं हैं तो आपके लिए काम कर पाना मुश्किल है.

प्रयागराज के इंडियन कॉफी हाउस में अपनी वीडियो रिपोर्ट दिखाते हुए पवन पटेल | ज्योति यादव | दिप्रिंट

मैनपुरी के प्रमोद झा जो एक पूर्व-नौसैनिक हैं वो इस बात से असहमति जताते हुए कहते हैं कि ‘जब तक आपने कोई अध्ययन न किया हो, तब तक ऐसा कोई तर्क नहीं दे सकते.’

स्ट्रिंगर जातिवाद की बात पर विभाजित हैं लेकिन इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी के सवाल को काफी हद तक नजरअंदाज कर दिया गया है. यहां पर पुरुषों का ही वर्चस्व है. प्रयागराज, अयोध्या और मेरठ जैसे जिलों में पुरुष पत्रकार केवल एक या दो महिला स्ट्रिंगर का ही नाम ले पाए. ज्यादातर महिला पत्रकार विशेष कवरेज के लिए राज्यों की राजधानियों और दिल्ली से यहां आती हैं.

भारत समाचार के रिपोर्टर नरेंद्र प्रताप बताते हैं कि पुरुषों के होने का एक फायदा यह भी है इस क्षेत्र की जरूरत के हिसाब से ‘भागदौड़’ कर पाते हैं.

नरेंद्र प्रताप कहते हैं, ‘अगर आप मुझसे किसी पुरुष स्ट्रिंगर के बारे में कहें तो किसी भी जिले में 15 लोगों के नाम बता सकता हूं लेकिन मुझसे किसी महिला स्ट्रिंगर के बारे में पूछें तो बहुत सोचना पड़ेगा.’


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खुद को साबित करने के लिए मोल लेते हैं खतरा

देश में कुछ स्ट्रिंगर ने हाल के वर्षों में कुछ बड़ी खबरें ब्रेक की हैं. यूपी में महिलाओं के खिलाफ अपराध पर कई नेशनल स्टोरी सबसे पहले किसी स्ट्रिंगर की तरफ से ही रिपोर्ट की गई होती हैं. सोनिया फलेरियो अपनी किताब ‘द गुड गर्ल्स: एन ऑर्डिनरी किलिंग’ में लिखा है कि कैसे 2014 में बदायूं गैंगरेप की घटना में दो लड़कियों के शवों को एक स्थानीय स्ट्रिंगर ने देखा था और फिर इनपुट एक राष्ट्रीय टीवी चैनल को भेजा गया. नरेंद्र प्रताप 2016 में ईटीवी के साथ एक स्ट्रिंगर थे, जब उन्होंने एक हाईवे पर एक मां-बेटी के बलात्कार की घटना—बुलंदशहर सामूहिक बलात्कार कांड—की जानकारी ब्रेक की. यह घटना एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गई और हर मीडिया हाउस ने इसे कवर किया. 2020 के हाथरस रेप और मर्डर केस में भी यही पैटर्न रहा है. राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आने से पहले अमूमन स्थानीय स्ट्रिंगर ही पहले दिन ऐसी खबरों को सामने लाते हैं.

लेकिन वेतन और क्रेडिट मिलना खतरा मोल लेने वाले इन स्ट्रिंगर के लिए दूर की कौड़ी ही है.

शंकर श्रीवास्तव कहते हैं, ‘हम तो बस दौड़ लेते हैं जब तक हिम्मत है, करते रहेंगे.’

चित्रकूट यूनिवर्सिटी से समाजशास्त्र में मास्टर डिग्री करने वाले आफाक अली खान को वीडियो स्टोरी के लिए मुश्किल से 300-400 रुपए मिलते हैं और भुगतान नियमित नहीं होता है.

मैनपुरी में कलेक्ट्रेट के बाहर एक टपरी में 15 स्ट्रिंगर के एक समूह के साथ मौजूद आफाक अली ने दिप्रिंट को बताया, ‘हमें कभी छह महीने तो कभी-कभी एक साल में भुगतान मिलता है लेकिन हमें डिजिटल प्लेटफॉर्म का आई-कार्ड, माइक और लेटरहेड पाने में बहुत पैसा खर्च करना पड़ता है.’

इन पत्रकारों को गुमराह करना भी कई लोगों के लिए एक फायदे का सौदा बनता जा रहा है.

पटेल दो अन्य स्ट्रिंगर के साथ 2018 में एक चैनल के संपादक से मिलने गए थे. उन्होंने 30,000 रुपए के बदले उन्हें लोगो के साथ लेटरहेड, आईडी और माइक देने का वादा किया लेकिन उन्हें केवल लेटरहेड मिला है.

स्ट्रिंगर को काम पर रखने का दूसरा तरीका यह है कि मीडिया हाउस के लिए विज्ञापन कौन ला सकता है.

आफाक अली खान बताते हैं, ‘अगर आप विधायकों या सांसदों से होली, दिवाली और गणतंत्र दिवस आदि पर विज्ञापन ला सकते हैं तो आपको स्ट्रिंगर या रिपोर्टर का पद मिल सकता है.’

देश में कोविड के प्रकोप से पहले वह मीडिया घरानों के लिए कॉलेजों और विधायकों से 20-30 हजार रुपए के विज्ञापन ले आते थे लेकिन वो बताते हैं कि अब कोई भी विज्ञापन के लिए 5,000 रुपए से अधिक खर्च नहीं करना चाहता.

मैनपुरी जिले में एक मीडिया हाउस | ज्योति यादव | दिप्रिंट

एक बड़ी बाइलाइन का इंतजार

हमने जिन स्ट्रिंगर्स से बात की उनमें से अधिकांश को याद नहीं कि उन्होंने कौन-सी बड़ी स्टोरी की है.

प्रयागराज के पटेल कहते हैं, ‘अवैध भूमि पर बने एक घर के बारे में मेरी एक सोशल स्टोरी एक एप पर वायरल हो गई थी. मुझे लगता है कि वही सबसे बड़ी खबर थी.’

मैनपुरी में मिले पत्रकारों के समूह की बात करें तो 15 स्ट्रिंगर में से किसी को भी नहीं लगता कि अभी तक उनकी कोई बड़ी स्टोरी प्रकाशित हुई है.

आजाद बताते हैं, ‘दूसरी लहर के दौरान जिले के पत्रकार बाहर कदम नहीं रखते थे. हम सभी कोविड वार्डों और श्मशान घाटों से शंकर के फुटेज पर निर्भर थे. अधिकांश मान्यता प्राप्त जिला पत्रकार शंकर श्रीवास्तव जैसे स्ट्रिंगर के फुटेज के आधार पर अपने डिस्पैच भेजते हैं फिर भी उन्हें किसी बड़े या वीआईपी कार्यक्रमों को कवर करने के लिए पास नहीं मिलता क्योंकि वो पंजीकृत नहीं हैं.

एबीपी गंगा के संपादक रोहित सांवल ने खबरों की दुनिया में किसी स्ट्रिंगर की भूमिका के बारे में बताया.

वह बताते हैं, ‘स्ट्रिंगर न्यूज चैनल की एक जरूरी कड़ी होते हैं लेकिन वेतनभोगी कर्मचारी नहीं होते हैं और उन्हें उनकी हर खबर के हिसाब से भुगतान किया जाता है.’

स्ट्रिंगर को सबसे ज्यादा अहमियत तब मिलती है जब चुनाव होते हैं. दरअसल, वे ठोस खबर का पता लगाने के साथ हवा का रुख भांपने में भी सक्षम माने जाते हैं.

पीलीभीत के जिला मजिस्ट्रेट पुलकित खरे कहते हैं, ‘चुनाव के दौरान उन्हें चुनाव/मतगणना कवर करने के लिए जिला चुनाव अधिकारी की तरफ से एक पत्र की जरूरत पड़ती है. तभी मीडिया घराने स्ट्रिंगर की लिस्ट भेजते हैं. तभी केवल चुनाव के समय वे कहीं सूचीबद्ध होते हैं.’ साथ ही जोड़ा कि जिला प्रशासन तक पहुंच केवल ब्यूरो प्रमुखों और बड़े पत्रकारों को ही मिलती है.

एक स्ट्रिंगर की डायरी

शंकर श्रीवास्तव की पत्नी का एक दशक पहले निधन हो चुका है. उनकी दो बेटियों की शादी हो चुकी है. उनके बेटे टेक्नीशियन के रूप में काम करते हैं. जब उन्होंने इस क्षेत्र में काम करना शुरू किया तो उन्हें 22,000 रुपए में एक पैनासोनिक कैमरा खरीदना पड़ा. वह रिपोर्टिंग के साथ-साथ अपनी कमाई के लिए शादी की फोटोग्राफी भी करते थे लेकिन अब डिजिटल दुनिया में उनका कैमरा किसी काम का नहीं रहा है. उनके बड़े बेटे ने अपना रेडमी स्मार्टफोन श्रीवास्तव को दे दिया है ताकि वह अपना काम करते रह सकें.

Shanker Sriwastava with his bike | Jyoti Yadav/ThePrint
अपनी बाइक के साथ शंकर श्रीवास्तव | ज्योति यादव | दिप्रिंट

श्रीवास्तव का पूरा दिन तमाम फुटेज रिकॉर्ड करने और उसे हर जिले के पत्रकारों के समूह को भेजने में बीत जाता है. वह सुबह करीब 10 बजे अपने काम पर निकलते हैं और देर रात तक लौटते हैं.

उन्होंने कहा, ‘लगाव है तो कर रहे हैं. कोरोना के दौरान भी हम हर वार्ड में गए, हर श्मशान में गए.

पवन पटेल की 26 वर्षीय पत्नी मीनू पटेल के लिए अपने बल-बूते पर सब कुछ संभालना मुश्किल हो जाता है.

उन्होंने बताया, ‘हमारी दो साल की एक बेटी है. कभी-कभी वह दो-दो दिनों तक बाहर रहते हैं और मुझे फिक्र होती है कि पता नहीं खाना खाया या नहीं लेकिन अच्छा लगता है जब लोग मुझे ‘रिपोर्टर की वाइफ’ कहकर बुलाते हैं और किसी काम में मदद मांगते हैं. एक परिवार के तौर पर हम ज्यादा कुछ अपेक्षा नहीं रखते क्योंकि मेरे पति की कमाई बहुत ज्यादा नहीं है.’

पीपली लाइव में नवाजुद्दीन सिद्दीकी के निभाए किरदार राजेश की तरह छोटे शहर के ज्यादातर स्ट्रिंगर हमेशा किसी बड़े ब्रेक का इंतजार करते रहते हैं. वहीं तमाम लोगों की नजर में वही भारत के असली पत्रकार हैं.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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