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Wednesday, 7 January, 2026
होमThe FinePrintपंजाब में अपराध का फैलता जाल: गैंग, हथियार और दबाव में कानून व्यवस्था

पंजाब में अपराध का फैलता जाल: गैंग, हथियार और दबाव में कानून व्यवस्था

युवाओं में बेरोज़गारी ज़्यादा है और हथियार आसानी से मिल जाते हैं. ऐसे में राज्य के युवा जल्दी पैसे और ताकत के लिए गैंग में शामिल हो रहे हैं. परिवार जबरन वसूली और हिंसा के डर में जी रहे हैं. वहीं पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पुलिस बल पर काम का बहुत ज़्यादा बोझ है.

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मोहाली/चंडीगढ़/अमृतसर: पंजाब के बंगा कस्बे में एक उजली सोमवार की दोपहर, भीड़-भाड़ और शोर वाले चौराहे से गुज़रती एक स्कॉर्पियो के पीछे एक आई20 और एक बलेनो लगी हुई थीं. स्कॉर्पियो में बैठे लोग एक दुकान जा रहे थे, उन्हें उम्मीद थी कि वे अपनी एसयूवी बेच देंगे, लेकिन उन्हें मौका ही नहीं मिला.

अचानक आई20 के दरवाज़े खुल गए. तीन बंदूकधारी बाहर निकले और ताबड़तोड़ गोलियां चलाने लगे. एक और व्यक्ति ने धारदार हथियार से हमला किया. सड़क के बीच, सबके सामने, कम से कम 40 गोलियां चलाई गईं.

ड्राइवर सीट पर बैठे हरप्रीत सिंह उर्फ हनी बल बेहोश होकर गिर पड़े, उनके शरीर में 11 गोलियां लगी थीं. एक और सवारी, रिंपल, के सिर में गोली लगी. उनकी मौके पर ही मौत हो गई. तीन अन्य लोग घायल हुए; उन्हें बाद में अस्पताल से छुट्टी मिल गई.

आस-पास खड़े लोग जमे रह गए. गोलीबारी जितनी अचानक शुरू हुई थी, उतनी ही अचानक खत्म भी हो गई. बलेनो, जो इस हमले को देख रही थी, चुपचाप वहां से निकल गई—मानो एक छाया गाड़ी, जो तब काम आती अगर आई20 में आए लोग काम पूरा न कर पाते.

अब एक प्राइवेट अस्पताल के आईसीयू में, 30 साल के हनी बिना हिले-डुले पड़े हैं. उनके शरीर से नलियां निकलकर मशीनों से जुड़ी हैं. बिस्तर के पास उनका भाई पवनदीप और पिता मलकीर सिंह खड़े हैं. हफ्तों से उनकी यह निगरानी खत्म नहीं हुई है.

परिवार अपनी जगह बताने को तैयार नहीं है, उन्हें डर है कि हमलावर फिर लौट सकते हैं. पवनदीप ने धीमी आवाज़ में कहा, “हमने (हनी के) इलाज के लिए अपनी सारी गाड़ियां बेच दी हैं. प्लीज़ किसी को मत बताना कि वह यहां है. वो वापस आकर काम पूरा कर देंगे.”

17 नवंबर को बंगा में हुई यह गोलीबारी पंजाब जैसे राज्य के लिए भी बहुत बेखौफ थी, जहां गोलीबारी आम बात है. लोगों के ज़ेहन में 2022 के मध्य में मानसा में मशहूर पंजाबी रैपर सिद्धू मूसेवाला की हत्या का मंज़र अब भी ताज़ा है.

लेकिन हनी के मामले में जांचकर्ताओं को जिस बात ने चौंकाया, वह संदिग्ध हमलावर की पहचान थी: अजय राल्ह.

पुलिस के मुताबिक, राल्ह नारंगी जैकेट पहनकर स्कॉर्पियो के पास गया और बिना किसी को देखे गोलियां चलाने लगा. बाद में जांच में पता चला कि वह एक जबरन वसूली के मामले में ज़मानत पर बाहर था और उसके पास लाइसेंसी पिस्तौल थी.

हनी बल के पिता (दाएं) और भाई | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
हनी बल के पिता (दाएं) और भाई | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

हिंसा से भरा एक महीना

बंगा में हुआ हमला पंजाब में फैली हिंसा की लहर का सिर्फ एक हिस्सा है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जिन्हें दिप्रिंट ने एक्सेस किया है, केवल ग्रामीण अमृतसर में 15 नवंबर से 15 दिसंबर के बीच संगठित अपराध गिरोहों से जुड़े कथित तौर पर 10 गोलीबारी की घटनाएं हुईं.

स्थानीय लोगों का कहना है कि हत्याएं और गोलीबारी अब ज़्यादा होने लगी हैं. इनमें कुछ हाई-प्रोफाइल लोग भी निशाने पर रहे हैं—जैसे कबड्डी प्रमोटर कंवर दिग्विजय सिंह उर्फ राणा बलाचौरिया. 15 दिसंबर को मोहाली में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई.

इससे पहले, 15 नवंबर को फिरोजपुर में आरएसएस नेता के बेटे की हत्या हुई; 21 नवंबर को बटाला में एक कांग्रेस नेता पर मोबाइल फोन की दुकान में हमला हुआ; 11 दिसंबर को फाजिल्का में अदालत की पार्किंग में कई आपराधिक मामलों का सामना कर रहे एक व्यक्ति को गोली मार दी गई और 18 नवंबर को अमृतसर के इंटर-स्टेट बस टर्मिनस के पास एक बीजेपी नेता द्वारा चलाई जा रही निजी परिवहन सेवा के एक सहायक प्रभारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई.

डर की अर्थव्यवस्था

ग्रामीण अमृतसर में अपने घर के बाहर बैठे 55 साल के दुकानदार गुरप्रताप सिंह ने कहा कि उनके पास लाइसेंसी पिस्तौल है, जिसे वह हर जगह साथ रखते हैं. उन्होंने कहा, “राज्य की हालत बहुत खराब है. यहां पूरी तरह अराजकता फैली है.”

अधिकतर गोलीबारी गैंग नेटवर्क से जुड़ी होती है, जो पैसे जुटाने के लिए जबरन वसूली की कॉल करते हैं. जिन परिवारों को ऐसी कॉल आती हैं, और जिन्होंने अपनों को खोया है, वे अक्सर डर के कारण न तो हत्यारों के नाम बताते हैं और न ही वजहों पर बात करते हैं. गैंग के लोग राज्य की सामाजिक बनावट में इतने गहरे घुसे हुए हैं कि उन्हें पता होता है—किसने नई कार खरीदी है, कब एनआरआई घर लौटे हैं, कौन-सी शादियां तय हैं और उनमें कितना खर्च होगा.

अमृतसर में अपने खेत में मटर तोड़ रहे 60 साल के एक व्यक्ति ने दिप्रिंट को बताया कि उनके भतीजे को तीन दिनों में 40 लाख रुपये देने की धमकी भरी कॉल आई. नाम न छापने की शर्त किसान ने कहा, “मेरा भतीजा अपनी नई कार में एक पारिवारिक शादी में गया था. किसी ने वहां देख लिया होगा. अब उसे जबरन वसूली की कॉल आ गई है.”

इटली में कार-वॉश की दुकान चलाने वाले लखविंदर सिंह का अनुभव और भी डरावना था.

अक्टूबर के आखिर में वे अमृतसर के धुलका में अपने परिवार से मिलने आए थे, तभी पुर्तगाल के एक नंबर से उन्हें 50 लाख रुपये की फिरौती का मैसेज मिला, जिसे उन्होंने नज़रअंदाज़ कर दिया.

उन्होंने कहा, “उस रात दो लोग मोटरसाइकिल पर आए और हमारे घर पर कई गोलियां चलाईं. उस समय हमें समझ नहीं आया क्योंकि दीवाली का वक्त था. अगले दिन सुबह नुकसान दिखा.”

कॉल और मैसेज के ज़रिए मांगें जारी रहीं और लखविंदर पैसे देने से मना करते रहे.

16 नवंबर को लखविंदर के पिता, 66 साल के मनजीत सिंह, गांव की अपनी किराना दुकान पर थे, तभी मोटरसाइकिल पर आए दो लोगों ने गोली चला दी और मौके पर ही उनकी मौत हो गई. इसके बाद भी कॉल आती रहीं.

उन्होंने कहा, “मैंने उनसे पूछा कि अब क्यों फोन कर रहे हो. उन्होंने कहा कि अगला नंबर मेरा है.”

फिलहाल परिवार को सुरक्षा दी गई है, लेकिन लखविंदर और परिवार के अन्य सदस्य, बच्चों सहित, इतने डरे हुए हैं कि घर से बाहर निकलने से भी डरते हैं—यहां तक कि स्कूल जाने से भी.

परिवार के पैतृक घर में मनजीत सिंह की पत्नी | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
परिवार के पैतृक घर में मनजीत सिंह की पत्नी | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी इकबाल सिंह ललपुरा, जो भारत के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रह चुके हैं और पंजाब में विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से जुड़े हैं, उन्होंने कहा कि पुलिस और जनता के बीच एक बड़ी दूरी बन गई है.

ललपुरा ने कहा, “पुलिस से उम्मीद होती है कि वह निष्पक्ष, सुलभ और लोगों के अनुकूल होगी, लेकिन उसने आम नागरिक का भरोसा और रोज़मर्रा का संपर्क खो दिया है. लोग शिकायत करने से भी डरते हैं. उन्हें लगता है कि पुलिस गैंग और ड्रग नेटवर्क की साझेदार है.”

‘युवाओं को फुकराबाज़ी पसंद’

कई ज़िलों के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने माना कि राज्य में गोलीबारी की घटनाएं बढ़ रही हैं, लेकिन उन्होंने इसके लिए पंजाब में अलगाववादी आंदोलन के समय से चले आ रहे एक “खतरनाक चक्र” को ज़िम्मेदार ठहराया.

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने समझाया, “यहां के युवा मेहनत नहीं करना चाहते. वे या तो विदेश जाना चाहते हैं या फिर गैंग से जुड़ना चाहते हैं. उन्हें फुकरा बाज़ी पसंद है. उनके पास देखने के लिए अच्छे रोल मॉडल नहीं हैं. स्थानीय पुलिस पर लोगों का भरोसा भी कम है. यहां के युवाओं ने सिर्फ बंदूक की संस्कृति देखी है. यह ट्रिगर-हैप्पी रिपब्लिक है.”

उन्होंने आगे कहा, “कबड्डी सर्किट में जुए से लेकर म्यूज़िक इंडस्ट्री तक, ये गैंग और इनके गुर्गे हर जगह हैं. जो भी इनके लिए परेशानी बनता है, उसे मार दिया जाता है. लोग इसलिए भी मारे जाते हैं क्योंकि वो मशहूर हैं. यह दबदबा बनाने और डर बढ़ाने का तरीका है.”

कई गैंगस्टर, जिन्होंने अपने अपराधी नेटवर्क फैलाए और राज्यों व देशों में मामलों की लंबी सूची छोड़ दी, या तो जेल से काम कर रहे हैं या विदेशों में सुरक्षित ठिकानों से. इस सूची में अंडरवर्ल्ड के बड़े नाम शामिल हैं—लॉरेंस बिश्नोई गैंग से लेकर अर्श दल्ला, बंबीहा और जग्गू भगवानपुरिया गैंग तक. इनके कई सदस्य यूके, अमेरिका, कनाडा, आर्मेनिया, पुर्तगाल और यूएई जैसे देशों में फैले हुए हैं.

गठबंधन बदलते रहते हैं, टूटते रहते हैं और नए छोटे-छोटे समूह बनते रहते हैं. गैंगों की आपसी दुश्मनी इस खतरे को और बढ़ाती है.

ग्राफिक: मनाली घोष/दिप्रिंट
ग्राफिक: मनाली घोष/दिप्रिंट

पुलिस ने कहा कि 18 नवंबर को अमृतसर बस स्टैंड के पास एक बीजेपी नेता की ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करने वाले माखन सिंह की हत्या गैंगस्टर डॉनी बल और कौशल चौधरी ने की थी. दोनों ने सोशल मीडिया पर इस हत्या की ज़िम्मेदारी ली और कहा कि माखन को इसलिए मारा गया क्योंकि वह प्रतिद्वंद्वी गैंगस्टर जग्गू भगवानपुरिया का करीबी था, जो फिलहाल असम की जेल में बंद है.

लेकिन पुलिस सूत्रों ने कहा कि माखन की हत्या इसलिए की गई क्योंकि गैंग उसके मालिक तक नहीं पहुंच पा रहा था. वह बीजेपी नेता सुरक्षा घेरे में था, क्योंकि उसे कुछ समय से जबरन वसूली की धमकियां मिल रही थीं.

संगठित अपराध के कारण पूरे पंजाब में छोटे-छोटे गैंग भी उभर आए हैं. इनमें नाबालिग और पहली बार गोली चलाने वाले युवक भी शामिल हैं, जिनमें से कई सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से प्रभावित हैं. इन्हें ऐशो-आराम, विदेश जाने की संभावना, गाड़ियां खरीदने और ताकत मिलने के वादों से अपराध की दुनिया में खींच लिया जाता है.

तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि पिछले कुछ महीनों में पूरे राज्य में की गई जबरन वसूली की कॉल में से ज़्यादातर—करीब 70 प्रतिशत—बड़े गैंगों से निकले छोटे समूहों की ओर से थीं.

पंजाब एंटी-गैंगस्टर टास्क फोर्स के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (डीआईजी) गुरमीत सिंह चौहान ने कहा कि ये समूह किसी विचारधारा को नहीं मानते. उन्होंने कहा, “यह सिर्फ पैसे और कारोबार का मामला है.”

डीआईजी ने कहा कि गैंगस्टरों पर कार्रवाई का कोई एक तरीका नहीं है, लेकिन पुलिस अपना काम कर रही है. उन्होंने बताया कि 2022 से अब तक 37 संदिग्ध गैंगस्टर और अपराधी मुठभेड़ों में मारे गए हैं और 232 घायल हुए हैं.

राज्य एक विशेष टास्क फोर्स (एसटीएफ) भी बना रहा है, जो मुख्य अपराधियों और विदेश में बैठे उनके हैंडलरों पर ध्यान देगी.

चौहान ने कहा, “इन लोगों को देश से बाहर भेजने की प्रक्रिया प्रत्यर्पण की तुलना में आसान है. इसके अलावा, अगर हम मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों से गैंगस्टर गोल्डी बराड़ जैसे लोगों की धमकी भरी कॉल को जोड़ने वाले ‘नोड्स’ तक पहुंच पाते हैं, तो इससे गैंगों की ताकत कमज़ोर होगी. हालात बहुत चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन यह भी नहीं है कि हमारे प्रयासों के नतीजे नहीं दिखे हैं.”

वह गोल्डी बराड़ की बात कर रहे थे, जो लॉरेंस बिश्नोई का पूर्व सहयोगी है और माना जाता है कि उसने कनाडा से सिद्धू मूसेवाला की हत्या की साजिश रची थी.

माखन सिंह की मां | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
माखन सिंह की मां | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

बेरोज़गारी और पुलिसिंग की चुनौतियां

विशेषज्ञों का कहना है कि गैंग और सिंडिकेट के बढ़ने के पीछे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों का मेल है—बेरोज़गारी, युवाओं के लिए अवसरों की कमी और हिंसा का सामान्य हो जाना.

समस्या को और बढ़ाने वाली बात यह है कि करीब 80,000 जवानों वाला पुलिस बल रोज़मर्रा की कानून-व्यवस्था, सुरक्षा की ज़िम्मेदारियों और सीमा-पार अपराधों के बीच बुरी तरह दबा हुआ है.

एक अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि पुलिस बल पर काम का बहुत ज़्यादा बोझ है.

उन्होंने कहा, “काम के बोझ के कारण थानों में स्टाफ की कमी है. थाना स्टाफ सुरक्षा देता है, अदालतों में पेशी करता है, वीआईपी ड्यूटी निभाता है और साथ ही जांच भी करता है. इससे जांच की गुणवत्ता प्रभावित होती है. अपराध रोकना भी चुनौती बन जाता है. कई बार धमकी मिलने के तुरंत बाद सुरक्षा देनी पड़ती है. यह कागज़ों में दर्ज भी नहीं होता. हथियारों की तस्करी और डरे हुए समाज के साथ यह सब सोचिए.”

पंजाब यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्र के सेवानिवृत्त प्रोफेसर मनजीत सिंह ने कहा कि पिछले कुछ दशकों में राज्य पुलिस ने अपना अनुशासन और स्वतंत्रता काफी हद तक खो दी है.

उन्होंने कहा, “सिख उग्रवाद के समय अधिकारियों को बहुत ज़्यादा ताकत दी गई, लेकिन जवाबदेही कम थी. तब से ईमानदारी और कर्तव्य को अक्सर पीछे कर दिया गया और तरक्की व फायदे राजनीति से जुड़ते चले गए. सरकारें बार-बार तबादले करती हैं, जिससे पुलिसिंग योग्यता के बजाय राजनीतिक ताकत के भरोसे रह जाती है.”

पंजाब के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) गौरव यादव ने इस बात से इनकार किया. उन्होंने कहा कि पुलिस बल पूरी तरह पेशेवर है और “अपने काम में पूरी तरह सक्षम” है.

यादव ने कहा कि युवा सोशल मीडिया में अपराध के महिमामंडन और बेरोज़गारी के कारण संगठित अपराध की ओर खिंच रहे हैं.

उन्होंने कहा, “वे अपराध को आसान पैसा समझते हैं. इससे निपटने के लिए पेशेवर पुलिसिंग ज़रूरी है, ताकि सरगनाओं को पकड़ा जा सके और युवाओं को मुख्यधारा में वापस लाया जा सके. सरकार के सहयोग से हालात जल्द सुधरेंगे.” उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी भ्रष्ट या मिलीभगत करने वाले पुलिसकर्मी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाती है.

पंजाब के ग्रामीण इलाकों में, खासकर युवाओं के लिए, नौकरियां बहुत कम हैं | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
पंजाब के ग्रामीण इलाकों में, खासकर युवाओं के लिए, नौकरियां बहुत कम हैं | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

अर्थशास्त्री रंजीत सिंह घुमान ने भी कहा कि पंजाब का संकट आर्थिक परेशानी से जुड़ा है.

उन्होंने कहा, “पिछले 35 साल में राज्य की आर्थिक वृद्धि तेज़ी से धीमी हुई है, जिससे प्रति व्यक्ति आय और रोज़गार सृजन पर असर पड़ा है. बेरोज़गारी भारत में सबसे ज़्यादा रहने वालों में है. युवाओं में बेरोज़गारी 20 प्रतिशत से भी ज़्यादा आंकी गई है. खेती में कामगार कम हो रहे हैं, गैर-कृषि क्षेत्र उन्हें समाहित नहीं कर पा रहे हैं और पलायन के रास्ते भी सीमित हो गए हैं. कम निवेश, जो निवेश-से-जीडीपी अनुपात में दिखता है, इस सुस्ती को और बढ़ा रहा है.”

उन्होंने आगे कहा, “इसी दौरान बंदूक कल्चर, गैंग नेटवर्क और राजनीतिक संरक्षण फले-फूले हैं. पंजाब पर कर्ज़ बहुत ज़्यादा है और उधार पर निर्भरता के साथ बिना लक्ष्य वाले मुफ्त वादों ने राज्य की निवेश करने की क्षमता को सीमित कर दिया है.”

आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं. जुलाई-सितंबर 2025 की पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे के अनुसार, पंजाब के लगभग पांच में से एक युवा (18.5 प्रतिशत) बेरोज़गार था. ग्रामीण इलाकों में बेरोज़गारी (20.5 प्रतिशत) शहरी इलाकों (17 प्रतिशत) से ज़्यादा थी.

युवाओं में पंजाब की बेरोज़गारी दर राष्ट्रीय औसत 14.8 प्रतिशत से भी अधिक है. आँकड़ों के मुताबिक, केवल पांच राज्यों में युवाओं की बेरोज़गारी पंजाब से ज़्यादा है.

अन्य आर्थिक संकेतक भी अच्छे नहीं हैं.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य को 34,201 करोड़ रुपये का कर्ज़ लेना पड़ सकता है, जिससे 31 मार्च 2026 तक कुल कर्ज़ 4 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा हो जाएगा.

घुमान ने कहा कि इस “गिरावट को पलटने” के लिए पंजाब को सुधार लाने होंगे, सरकारी और निजी निवेश बढ़ाना होगा और रोज़गार पैदा करने होंगे.

बहुत ज़्यादा हथियार

आधिकारिक अनुमान के मुताबिक, पंजाब की आबादी 3 करोड़ है और यहां करीब 4.5 लाख लाइसेंसी हथियार हैं.

दिप्रिंट से बात करने वाले वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने कहा कि देश में प्रति व्यक्ति के हिसाब से पंजाब उन राज्यों में है, जहां बंदूक लाइसेंस सबसे ज़्यादा हैं.

इसी ‘गन कल्चर’ को देखते हुए राज्य सरकार ने 2022 में सार्वजनिक जगहों पर, गानों और फिल्मों में और सोशल मीडिया पर हथियारों के इस्तेमाल और प्रदर्शन पर औपचारिक तौर पर रोक लगा दी थी. पिछले साल यह मामला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट तक पहुंचा, जिसने राज्य सरकार से इस प्रतिबंध को लागू करने और इसके उल्लंघन पर दी गई सज़ाओं की रिपोर्ट मांगी.

राज्य भर में सिख अलगाववादी नेता जरनैल सिंह भिंडरांवाले के पोस्टर लगे हुए हैं | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
राज्य भर में सिख अलगाववादी नेता जरनैल सिंह भिंडरांवाले के पोस्टर लगे हुए हैं | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

फिर भी, परिवारों में पुरुषों के पास बंदूक होना कोई असामान्य बात नहीं है. कुछ लोग आत्मरक्षा के नाम पर हथियार साथ भी रखते हैं.

कबड्डी प्रमोटर राणा बलाचौरिया (31) के पिता कोंवर राजीव सिंह ने कहा कि उनके बेटे के पास हमले के दिन उनकी लाइसेंसी पिस्तौल थी. राणा को 15 दिसंबर को मोहाली में कथित तौर पर बंबीहा गैंग से जुड़े लोगों ने गोली मार दी थी.

लेकिन हमलावरों ने राणा को चौंका दिया. आरोप है कि उन्होंने पहले सेल्फी मांगी और जब उन्होंने हामी भरी, तो उनके चेहरे पर काला कवर डाल दिया और फिर बेहद नज़दीक से उनकी गर्दन में गोली मार दी.

बलाचौर गांव में अपने पैतृक घर पर राजीव सिंह ने कहा कि अगर हमलावरों ने उनके चेहरे को न ढका होता, तो राणा खुद को बचा सकता था.

राणा के चाचा कोंवर संजीव सिंह ने कहा, “वे हमारा शेर बच्चा था. वो उन्हें ही मार देता.”

परिवार के पास गन हाउस भी है. जब पूछा गया कि क्यों, तो चाचा ने कहा, “शौक है जी हमारा. मेरे पास भी है. उसके (राणा के) दादा के पास भी थी. हमारे परिवार में सबके पास हथियार हैं.” उन्होंने पुलिस के इस आरोप को भी खारिज किया कि राणा का गैंगस्टरों से संपर्क था.

बीच में एक सीमा

चुनौती को और बढ़ाता है पाकिस्तान के साथ पंजाब की 500 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा, जिसका लंबे समय से बंदूकें, हथियार और प्रतिबंधित सामान की तस्करी के लिए इस्तेमाल होता रहा है. कई स्तर की बाड़, एंटी-ड्रोन सिस्टम और निगरानी के बावजूद पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सीमा का करीब 50 किलोमीटर इलाका नदी वाला है, जिसे सुरक्षित करना बहुत मुश्किल है.

सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि सीमा पर 700–800 सुरक्षाकर्मी तैनात होने के बावजूद निगरानी अभी भी पर्याप्त नहीं है.

सूत्रों के मुताबिक, गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं को अक्सर इन गैंगों में भर्ती किया जाता है, जिनमें से कुछ के पाकिस्तान के आतंकी संगठनों से भी संबंध हैं. गैंग इन युवाओं को सिर्फ 2,500 से 5,000 रुपये तक देते हैं.

एक सूत्र ने कहा कि सीमा पार बैठे हैंडलरों और भारत की तरफ के स्थानीय दलालों के बीच “बेहद आसान तालमेल” है.

पुलिस ने कहा कि हथियार देश के अंदर से भी पंजाब पहुंचते हैं, खासकर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से. इसे रोकना मुश्किल है, क्योंकि इस नेटवर्क में जुड़े कई लोगों को एक-दूसरे की पहचान तक नहीं पता होती.

तीसरे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, “हथियारों की डिलीवरी दलालों के बीच होती है. ‘एक्स’ को ‘वाई’ की असली पहचान पता नहीं होती, ठीक वैसे ही जैसे ड्रग तस्करी में होता है. कई सहयोगी यूपी, हरियाणा और राजस्थान से भी होते हैं.”

पंजाब पुलिस प्रमुख यादव ने कहा कि खुफिया एजेंसियों और केंद्रीय एजेंसियों के साथ मिलकर पुलिस सीमा पार से आने वाले हथियारों पर काबू पाने में सफल रही है.

उन्होंने कहा, “हां, ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की तरफ से बड़ा दबाव था. हमने 2025 में 400 छोटे हथियार जब्त किए, जो 2024 से पांच गुना ज़्यादा हैं. पाकिस्तान भारत को ‘हज़ार घाव देकर’ नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है.” वे कश्मीर के पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर किए गए भारतीय सैन्य ऑपरेशन का ज़िक्र कर रहे थे.

यादव ने कहा कि संगठित अपराध अब आतंक का एक ज़रिया बन गया है. उन्होंने कहा, “कथित शिकायतें, तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना, गलत नैरेटिव, वैचारिक और पैसों का लालच—इन सबका मिला-जुला असर युवाओं को इन नेटवर्क्स की ओर खींचता है.”

फिर बंगा की ओर

पंजाब पुलिस के सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि बंगा हमले का मुख्य शूटर अजय राल्ह ने पिछले साल जालंधर से एक लाइसेंसी बंदूक हासिल की थी.

नवांशहर के एक पुलिस अधिकारी ने कहा, “फायरिंग से पहले हमें उस बंदूक के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.”

जब पूछा गया कि क्या लाइसेंसी हथियार का इस्तेमाल फायरिंग में हुआ, तो अधिकारी ने कहा, “शायद…आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद ही सब साफ होगा.”

प्रक्रिया के तहत, हथियार का लाइसेंस देने से पहले सही तरीके से सुरक्षा जांच और आपराधिक रिकॉर्ड की जांच होनी चाहिए.

जांचकर्ताओं के मुताबिक, दो अन्य संदिग्ध शूटर—मन्नू और मैनी हत्या के आरोप और एनडीपीएस एक्ट से जुड़े एक मामले में ज़मानत पर बाहर थे.

हमले का निशाना बने हनी पर भी मारपीट के छह मामले दर्ज हैं.

हनी के भाई पवनदीप ने कहा कि गोलीबारी की योजना तब बनी, जब हनी के दोस्त रिंपल (जो हमले में मारा गया) और साहिल (जो घायल हुआ) की दो दिन पहले स्कूटर टक्कर को लेकर राल्ह से कहासुनी हुई थी.

टैटू शॉप और एनआरआई-कार रेंटल सर्विस चलाने वाले पवनदीप ने कहा, “उन्होंने आपस में मामला सुलझा लिया था. हमें समझ नहीं आता कि वे वापस आकर उन्हें मारने क्यों आए.”

लेकिन पुलिस को शक है कि पंजाब के होशियारपुर का ‘काला फ्लाई’ गैंग—जो स्थानीय अपराध जगत से बाहर ज़्यादा जाना-पहचाना नहीं है, उसने आरोपियों को हमले की योजना बनाने और उसे अंजाम देने में मदद की.

अब तक नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें रेकी करने और लॉजिस्टिक मदद देने वाले लोग भी शामिल हैं, लेकिन तीन मुख्य शूटर अभी फरार हैं.

परिवार का कहना है कि जब तक वे पकड़े नहीं जाते, डर हमेशा बना रहेगा.

ग्राफिक: मनाली घोष/दिप्रिंट
ग्राफिक: मनाली घोष/दिप्रिंट

आगे कोई एक रास्ता नहीं

खुफिया इनपुट के मुताबिक, लॉरेंस बिश्नोई और गोल्डी बराड़ के बीच विभाजन से गैंगस्टरों के बीच खींचतान बढ़ सकती है.

इस संभावित खतरे के बीच, संगठित अपराध पर काबू पाने का कोई एक तरीका नहीं है. पुलिस अधिकारी भी इस पर बंटे हुए नज़र आए.

फोर्स के कुछ लोगों का मानना है कि गैंग्स को सिर्फ उनके सरगनाओं को खत्म करके ही रोका जा सकता है.

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, “इस अराजकता को तभी रोका जा सकता है, जब बड़े गैंग्स की ‘ब्रांड वैल्यू’ खत्म की जाए.”

लेकिन उनके एक सहयोगी को नहीं लगता कि यह तरीका काम करेगा. उनके मुताबिक, यह सिर्फ “अस्थायी इलाज” होगा, जो लंबे समय तक टिकेगा नहीं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: पंजाब में आपराधिक हिंसा का नया और खतरनाक दौर — ‘गैंग और आतंकवाद का मेल’


 

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