नई दिल्ली: चौबीस साल के अयान, जो एक ट्रांसमैन हैं, उनके पास जाने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं है. उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में उनका घर ऐसी जगह नहीं है जहां वे वापस जा सकें. पिछले तीन महीनों से दिल्ली का एकमात्र गरिमा गृह—ट्रांसजेंडर लोगों के लिए सरकार द्वारा समर्थित शेल्टर, ही वह जगह है जहां कई सालों तक अपनी पहचान छिपाने के बाद वे खुद के रूप में रह पा रहे हैं.
अब यह सुरक्षा का एहसास कमजोर पड़ गया है.
ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन बिल, 2026 आने के बाद शेल्टर के रहने वाले और स्टाफ का कहना है कि जिस सिस्टम पर वे निर्भर हैं, वही अब चिंता का कारण बन गया है. सुरक्षा, दस्तावेज़ और सरकार के समर्थन के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. छह साल पहले आए ऐतिहासिक NALSA फैसले ने खुद की महसूस की गई जेंडर पहचान के अधिकार को मान्यता दी थी, लेकिन ट्रांस समुदाय इस बिल को अपने अधिकारों में कमी के रूप में देख रहा है. बिल में यह बात साफ नहीं है कि किसी व्यक्ति को ‘मजबूर’ करके ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने या दिखाने को अपराध माना जाएगा, जिससे डर है कि शेल्टर होम और समुदाय संगठनों के खिलाफ इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है. सरकार की तरफ से स्पष्ट जानकारी न मिलने के कारण देशभर के गरिमा गृह भ्रम की स्थिति में काम कर रहे हैं.
दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सीतापुरी की शांत गलियों में स्थित गरिमा गृह, जिसे सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के तहत मित्र ट्रस्ट चलाता है, खुद को छिपाने की कोशिश नहीं करता. अंदर रहने वाले लोग दोपहर के खाने के लिए इकट्ठा होते हैं, रंग-बिरंगे पर्दे और दीवारों पर लगी कलाकृतियां माहौल को उजला बनाती हैं, लेकिन इसके बावजूद अंदर एक बेचैनी है.
अयान ने कहा, “अब बहुत भ्रम है. इसका सीधा असर मेरे ट्रांजिशन पर पड़ेगा. मैं कौन हूं, यह सिर्फ मैं बता सकता हूं—कोई और मेरी पहचान तय नहीं कर सकता.”
गरिमा गृह शेल्टर नवंबर 2020 में SMILE (Support for Marginalised Individuals for Livelihood and Enterprise) योजना के तहत शुरू किए गए थे और इन्हें समुदाय आधारित संगठन सरकार के सहयोग से चलाते हैं. ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट, 2019 के तहत लोग एक केंद्रीकृत पोर्टल के जरिए पहचान प्रमाणपत्र के लिए आवेदन कर सकते थे, जो सरकारी योजनाओं और आधिकारिक दस्तावेज अपडेट करने का आधार बनता है.
नया संशोधन बिल, जिसे सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने पेश किया और पिछले हफ्ते संसद में विपक्ष के विरोध के बीच पास किया गया, इस व्यवस्था के कुछ हिस्सों को बदलने की कोशिश करता है. आलोचकों का कहना है कि 30 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिलने के बाद यह बिल खुद की पहचान के अधिकार से दूर जाता है और ट्रांसजेंडर पहचान को मान्यता देने के तरीके में ज्यादा अस्पष्टता लाता है.
परिवार पहले भी पुलिस के साथ आकर हम पर आरोप लगाते थे कि हमने उनके बच्चे को यहां रखा हुआ है. वे कहते हैं कि हम उन्हें मजबूर कर रहे हैं, कि हम उनका ‘कन्वर्जन’ कर रहे हैं. इस कानून के बाद वे आसानी से कह सकते हैं कि हम उन्हें मजबूर कर रहे हैं और हमारे खिलाफ केस कर सकते हैं.
—कांता सिंह, मित्र ट्रस्ट
अनिश्चितता के बीच दोबारा शुरुआत की कोशिश
20 साल की हिमांशी अपनी ज़िंदगी को फिर से संभालने की कोशिश कर रही हैं. करीब एक साल शेल्टर में रहने के बाद वह नौकरी करते हुए किराए के घर में रहने लगी थीं, लेकिन छह महीने की इंटर्नशिप खत्म होने के बाद उन्हें फुल-टाइम नौकरी नहीं मिली, इसलिए वह वापस आ गईं.
उन्होंने कहा, “मैं फिर से नौकरी ढूंढ रही हूं. साथ ही 12वीं की पढ़ाई पूरी कर रही हूं ताकि मुझे बेहतर मौके मिल सकें.”

आगरा की रहने वाली हिमांशी ने अपना घर तब छोड़ दिया जब परिवार ने उनकी पहचान स्वीकार नहीं की और उनकी पढ़ाई रुकवा दी. वह दिसंबर 2024 में, 18 साल की उम्र में शेल्टर पहुंची थीं.
हिमांशी ने कहा, “यह मेरी शुरुआत की जगह थी. यहां मैंने खुद को समझना शुरू किया—ट्रांजिशन के बारे में और मैं वास्तव में क्या महसूस करती हूं.”
कई अन्य लोगों की तरह वह भी दस्तावेज़ मिलने में देरी की समस्या से जूझ रही हैं. उन्होंने करीब एक साल पहले ट्रांसजेंडर (TG) पहचान कार्ड के लिए आवेदन किया था, लेकिन अभी तक नहीं मिला है. बिल आने के बाद यह अनिश्चितता और बढ़ गई है.
गरिमा गृह में रहने वाले ज्यादातर लोग किन्नर या हिजड़ा समुदाय से नहीं हैं, बल्कि खुद को ट्रांसजेंडर, ट्रांसफेमिनिन या ट्रांसमास्कुलिन मानते हैं. ज्यादातर 18 से 30 साल के युवा हैं जो खुद को समझने और सुरक्षित जीवन की तलाश में हैं. कई लोगों के लिए यह आखिरी विकल्प होता है—घर में हिंसा या दबाव से बचकर यहां आने के बाद वे खुद के रूप में जी पाते हैं.
वे कहते हैं कि इससे जरूरतमंद लोगों तक सरकारी योजनाएं पहुंचेंगी, लेकिन हमारी स्थिति देखिए—हमने कई बार पत्र लिखे, फिर भी पिछले तीन साल से हमें उनसे फंड नहीं मिला.
—कोलकाता रिस्ता के प्रतिनिधि
गरिमा गृह में रहने वालों को टीजी कार्ड के लिए आवेदन करने में मदद दी जाती है, काउंसलिंग होती है और हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) तक पहुंच में सहयोग मिलता है. यहां स्किल डेवलपमेंट कोर्स भी चलते हैं, जिससे लोग खुद अपने पैरों पर खड़े हो सकें और जटिल सिस्टम को समझ सकें. सबसे बढ़कर, यहां उन्हें अपनापन महसूस होता है.
लेकिन संशोधन के बाद भविष्य अनिश्चित लग रहा है—खासकर उन लोगों के लिए जो ट्रांजिशन के बीच में हैं, जिनके पास दस्तावेज़ नहीं हैं, या जिनके पास खुद की पहचान के आधार पर बने टीजी कार्ड पहले से हैं.
हिमांशी ने कहा, “पहले खुद की पहचान मान्य थी. अगर मुझे लगता है कि मैं महिला हूं, तो मैं कह सकती हूं. अब मेडिकल जांच की बात हो रही है. कोई रिपोर्ट कैसे तय कर सकती है कि मैं क्या महसूस करती हूं?”
वह इस बदलाव को मुश्किल से हासिल अधिकारों को वापस लेने जैसा मानती हैं. “यह ऐसा है जैसे किसी को तोहफा देना और फिर वापस ले लेना. अभी भविष्य बहुत साफ नहीं दिख रहा.”

ट्रांजिशन बीच में रुक गया
एचआरटी शुरू किए सिर्फ 10 दिन हुए हैं, और साहिल पहले से ही सोच रहे हैं कि क्या गलत हो सकता है.
22 साल के साहिल, जो बेबो नाम से भी जाने जाते हैं, लगभग एक साल से इस शेल्टर से जुड़े हुए हैं और सोशल वर्क में मास्टर्स की पढ़ाई कर रहे हैं. कम उम्र से ही LGBTQIA+ कम्युनिटी के सक्रिय सदस्य रहे साहिल के लिए NGOs के साथ काम—HIV जागरूकता से लेकर मानव अधिकार तक, अपनी जेंडर पहचान को समझने का भी एक जरिया बना.

साहिल को हमेशा पता था कि वे समाज की heteronormative उम्मीदों में फिट नहीं बैठते. उन्होंने अपनी पहचान में कई बदलाव देखे—गे से नॉन-बाइनरी और आखिर में खुद को ट्रांसवुमन के रूप में पहचाना.
उन्हें जनवरी 2026 में टीजी कार्ड मिला और हाल ही में उन्होंने एचआरटी शुरू किया, जो जेंडर अफर्मिंग सर्जरी से पहले ज़रूरी होता है. ज्यादातर ट्रांसजेंडर लोगों के लिए यही प्रक्रिया होती है, जिसकी शुरुआत सेल्फ आईडेंटिफिकेशन से होती है. भारत में जेंडर डिस्फोरिया सर्टिफिकेट मिलने के बाद ही ट्रांजिशन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है. 2024 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी एसओपी के अनुसार, एचआरटी और जेंडर अफर्मिंग प्रक्रियाओं तक पहुंच के लिए मानसिक स्वास्थ्य का सर्टिफिकेट ज़रूरी होता है.
लेकिन नया ट्रांसजेंडर संशोधन बिल इस प्रक्रिया को बदल देता है, क्योंकि इसमें ट्रांसजेंडर के रूप में पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड का सर्टिफिकेट ज़रूरी बताया गया है, जबकि ज्यादातर लोगों के लिए जेंडर अफर्मिंग सर्जरी ट्रांजिशन के सफर के बिलकुल अंत में होती है. यह बिल उन ट्रांसजेंडर लोगों को भी बाहर कर देता है जो जेंडर अफर्मिंग सर्जरी नहीं करवाना चाहते.
साहिल और उनके जैसे दूसरे लोग अब यह सोचकर परेशान हैं कि क्या उनके टीजी कार्ड मान्य रहेंगे. उन्होंने कहा, “अब वे मेडिकल बोर्ड की बात कर रहे हैं. ये लोग कौन हैं? वे कैसे तय करेंगे कि मैं कौन हूं?”
वे कहते हैं कि जिन लोगों का ट्रांजिशन अभी शुरू हुआ है, उनके लिए अनिश्चितता और बढ़ गई है. “मेरा ट्रांजिशन अभी शुरू ही हुआ है, लेकिन मुझे नहीं पता कि मुझे इसे जारी रखने दिया जाएगा या नहीं. हमारे जैसे लोगों के लिए सब कुछ अनिश्चित लगता है.”
‘कोई स्पष्टता नहीं है’
दिल्ली के गरिमा गृह के अंदर, इस बिल का असर फैसलों पर पहले से दिखने लगा है. जो लोग हाल ही में अपनी पहचान सामने ला रहे हैं, जो टीजी कार्ड के लिए आवेदन करना चाहते हैं, और जो अपना ट्रांजिशन शुरू कर रहे हैं, उनके लिए आगे का रास्ता और मुश्किल हो गया है.
गरिमा गृह की प्रोग्राम ऑफिसर और 2005 से मि6 ट्रस्ट के साथ काम करने वालीं कांता सिंह ने कहा, “हम लोगों से इंतज़ार करने को कह रहे हैं. कोई स्पष्टता नहीं है.”
इस शेल्टर में फिलहाल 19 लोग रह रहे हैं, जबकि इसकी क्षमता 25 लोगों की है. ज्यादातर लोग असुरक्षित घर छोड़कर दिल्ली के बाहर से यहां आते हैं.

सिंह ने कहा, “यहां आने के लिए अब तक सिर्फ सेल्फ आईडेंटिफिकेशन और 18 साल से ज्यादा उम्र होना ज़रूरी था, लेकिन अब, नए बिल के साथ, मुझे नहीं पता क्या बदलेगा.”
यहां आने वाले ज्यादातर लोगों को आवेदन प्रक्रिया की ज्यादा जानकारी नहीं होती, इसलिए गरिमा गृह दस्तावेज़ बनाने में मदद करता है और लोगों को उनके अधिकारों और उनके लिए उपलब्ध वेलफेयर योजनाओं के बारे में जानकारी देता है. सिंह के अनुसार, शेल्टर ने 300 से ज्यादा टीजी कार्ड के लिए आवेदन किया है, लेकिन अब तक सिर्फ 9 या 10 ही जारी हुए हैं.
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए SMILE नेशनल पोर्टल के अनुसार, दिल्ली में 668 टीजी सर्टिफिकेट और आईडी कार्ड जारी किए गए हैं, जबकि 504 अभी भी लंबित हैं. हालांकि, जिला अधिकारियों को 30 दिनों के अंदर कार्ड जारी करना ज़रूरी होता है, फिर भी हज़ारों आवेदन देरी से चल रहे हैं, जिनमें कुछ को एक साल से ज्यादा हो गया है.
कागज़ों से आगे का डर
शेल्टर में संघर्ष सिर्फ दस्तावेजों तक सीमित नहीं है. यहां रहने वालों के परिवारों के साथ विवाद लगातार होते रहते हैं, जिनमें अक्सर पुलिस की दखल भी होती है. कई बार ऐसा हुआ है कि शेल्टर के कर्मचारियों को परिवार वालों ने पीटा, गाली दी और उन पर उनके बच्चों को फुसलाने या “कन्वर्ट” करने का आरोप लगाया.
इस बिल में एक नया आपराधिक प्रावधान है, जिसमें किसी को “जबरन” ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर करने पर कम से कम दस साल की सख्त कैद से लेकर उम्रकैद तक की सज़ा हो सकती है क्योंकि इसमें “जबरन” ट्रांजिशन को लेकर भाषा स्पष्ट नहीं है, इसलिए डर है कि इसका गलत इस्तेमाल NGOs और उन परिवारों के खिलाफ किया जा सकता है जो किसी व्यक्ति के ट्रांजिशन में समर्थन करते हैं.
सिंह ने कहा, “परिवार पहले भी पुलिस के साथ यहां आते हैं और हम पर आरोप लगाते हैं कि हम उनके बच्चे को यहां रखे हुए हैं. वे कहते हैं कि हम उन्हें मजबूर कर रहे हैं, कि हम उन्हें ‘कन्वर्ट’ कर रहे हैं. इस कानून के बाद वे आसानी से कह सकते हैं कि हम उन्हें मजबूर कर रहे हैं और हमारे खिलाफ केस कर सकते हैं.”
उन्हें यह विरोधाभास साफ दिखाई देता है.
उन्होंने कहा, “यह शेल्टर सरकार के समर्थन से चल रहा है, इसलिए भरोसा था, लेकिन इस बिल के बाद वह भरोसा हिल गया है. हमें 10 साल पीछे धकेल दिया गया है.”

दिल्ली का गरिमा गृह बाहर से इलाके के किसी आम घर जैसा ही दिखता है. आसपास के लोग या तो कहते हैं कि उन्हें ठीक से नहीं पता NGO क्या काम करता है, या फिर वे इसके अस्तित्व से ज्यादा मतलब नहीं रखते. एक स्थानीय निवासी ने कहा, “हम लोगों को आते-जाते देखते हैं. यह एक NGO है, लेकिन हमें इसके बारे में ज्यादा पता नहीं है.”
ऑटो रिक्शा चालक भूपेंद्र यादव कहते हैं कि उन्हें इस इलाके में किसी सामाजिक संस्था के काम करने की जानकारी नहीं है.
एक अन्य निवासी ने कहा, “कभी-कभी यहां पुलिस आती दिखती है, लेकिन इसके अलावा कुछ नहीं. जब तक इससे हमें परेशानी नहीं है, हमें फर्क नहीं पड़ता.”
नए बिल को लेकर हमने अभी गरिमा गृह को कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया है. बिल वास्तव में पास होने के बाद ही उच्च अधिकारी इस पर फैसला करेंगे. अभी तक कुछ भी नहीं किया गया है.
—बृजेश कुमार, जॉइंट डायरेक्टर, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय
पूरे सिस्टम में अनिश्चितता
मित्र ट्रस्ट की संस्थापक और मैनेजिंग डायरेक्टर रुद्राणी छेत्री के लिए मौजूदा समय बिल्कुल निराशाजनक है. एक दशक से ज्यादा समय से ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए काम कर रहीं छेत्री इस बिल को बड़ा झटका मानती हैं.
उन्होंने कहा, “हमें बहुत भ्रम है कि अब हमें आगे कैसे काम करना है. हमें सरकार से कोई जानकारी नहीं मिली है कि इसका हमारे काम पर क्या असर पड़ेगा…यह बिल हमारी पहचान पर बड़ा असर है, और ऐसा नहीं है कि हमें पहले से कम मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं.”
उनके लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि ट्रांसजेंडर के रूप में किसे मान्यता दी जाएगी, उसकी परिभाषा सीमित हो रही है.
उन्होंने कहा, “अगर हमारे शेल्टर में 100 लोग आते हैं, तो उनमें से 99 ट्रांसजेंडर, ट्रांसफेमिनिन होते हैं. किन्नर और हिजड़ा समुदाय आमतौर पर गरिमा गृह नहीं आते क्योंकि उनके अपने अलग समुदाय और काम करने के तरीके होते हैं. अगर यह कानून लागू होता है, तो शायद हम उन ज्यादातर लोगों की मदद नहीं कर पाएंगे जो हमारे पास आते हैं.”

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के जॉइंट डायरेक्टर बृजेश कुमार के अनुसार, पूरे भारत में 20 गरिमा गृह में काम कर रहे हैं और 2025-26 में तीन और को मंजूरी दी गई है.
कुमार ने दिप्रिंट से से कहा, “नए बिल को लेकर हमने अभी गरिमा गृह को कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया है. बिल वास्तव में पास होने के बाद ही उच्च अधिकारी इस पर फैसला करेंगे. अभी तक कुछ भी नहीं किया गया है.”
पूरे देश में गरिमा गृह असमंजस और डर की स्थिति में हैं.
गुजरात के वडोदरा में भारत के पहले गरिमा गृह में “उदासी का माहौल” है. लक्ष्य ट्रस्ट के संस्थापक सिल्वेस्टर मर्चेंट, जो इस शेल्टर होम को चलाते हैं, कहते हैं कि उनके यहां लगभग सभी जगह भर चुकी हैं, लेकिन अभी तक उन्हें सरकार से कोई जानकारी नहीं मिली है.
मर्चेंट ने कहा, “यह बिल बहुत चिंता बढ़ाने वाला है. हम पहले से ही फंड की बड़ी समस्या झेल रहे हैं, और अब यह दिखाता है कि सरकार की प्राथमिकता क्या है.”
कोलकाता गरिमा गृह चलाने वाली गैर-लाभकारी संस्था कोलकाता रिस्ता के एक प्रतिनिधि ने कहा कि यह बिल NALSA फैसले के खिलाफ है और इससे लगता है कि सरकार खुद को सुप्रीम कोर्ट से ऊपर मानती है.
उन्होंने कहा, “वे कह रहे हैं कि इससे जरूरतमंद लोगों तक वेलफेयर योजनाएं पहुंचेंगी. लेकिन हमें देखिए—हमने कई बार लिखने के बावजूद पिछले तीन साल से उनसे फंड नहीं मिला है.”
गरिमा गृह को फंड मिलने में देरी या भुगतान न होने की समस्या पूरे देश में है, जिससे उनका काम करना बहुत मुश्किल हो जाता है. कोलकाता गरिमा गृह के कर्मचारियों की एक और चिंता है: राज्य में जल्द चुनाव होने वाले हैं, और किसी भी राजनीतिक पार्टी ने इस बिल का विरोध नहीं किया है.
प्रतिनिधि ने कहा, “पश्चिम बंगाल में ट्रांसजेंडर लोगों की बड़ी आबादी है, और उनकी प्रतिक्रिया हमें हमारे अधिकारों को लेकर चिंतित करती है.”
झारखंड के धनबाद में एक गरिमा गृह सिर्फ एक महीने पहले शुरू किया गया था. लेकिन अब उसका भविष्य अनिश्चित है.
मंथन संस्था के सचिव बिप्लब महतो ने एक साल पहले गरिमा गृह के लिए आवेदन किया था, लेकिन फंड मिलने में समय लगा. शेल्टर ने अभी तक लोगों को रखना शुरू नहीं किया है, और अब बिल के बाद यह कैसे काम करेगा, इसे लेकर भ्रम है.
उन्होंने कहा, “धनबाद में ट्रांस कम्युनिटी के लोग अपने अधिकारों या वेलफेयर योजनाओं के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं रखते. हालांकि एक बड़ा नेटवर्क है, लेकिन वे कानूनी भाषा या लंबी प्रक्रिया में उलझना पसंद नहीं करते. हमें उन तक पहुंचने के लिए खास कोशिश करनी होगी.”
लेकिन अगर सेवाएं सिर्फ टीजी कार्ड या सर्टिफिकेट वाले लोगों तक सीमित रह जाएंगी, तो इसका फायदा बहुत कम लोगों तक ही पहुंच पाएगा.
‘भविष्य डरावना लगता है’
अयान जैसे लोगों के लिए सुरक्षा, एक सुरक्षित जगह और अपनी पहचान के साथ जीने का मौका छिन सकता है.
शेल्टर तक पहुंचने का उनका सफर पहले ही लंबा रहा है. उन्हें 15 साल की उम्र में पता चल गया था कि वे कौन हैं, लेकिन घर पर इस बारे में बात करने पर उन्हें गाली और हिंसा का सामना करना पड़ा. बायोलॉजी में डिग्री पूरी करने के बाद उन्होंने दिसंबर 2025 में फोन बंद किया और अकेले दिल्ली आ गए.
उनके परिवार ने उनका फोन ट्रैक किया, पुलिस के साथ आए और उन्हें वापस ले जाने की कोशिश की, लेकिन शेल्टर के स्टाफ ने उनका साथ दिया.
गरिमा गृह में उन्होंने काउंसलिंग शुरू की और अब एचआरटी की तीसरी डोज का इंतज़ार कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, “यह पहली जगह है जहां मुझे अपनापन महसूस होता है. जब मैं दूसरों को अपनी पहचान के साथ जीते देखता हूं, तो मुझे उम्मीद मिलती है.”
अब वह भरोसा कमजोर पड़ गया है.
उन्होंने जनवरी में टीजी कार्ड के लिए आवेदन किया था और अभी भी उसका इंतजार कर रहे हैं. अपने ट्रांजिशन के बीच में, बिल से हुए बदलाव उन पर भारी पड़ रहे हैं.
अभी के लिए, शेल्टर ही एकमात्र जगह है जहां उन्हें घर जैसा महसूस होता है. “लेकिन भविष्य,” वे धीरे से कहते हैं, “डरावना लगता है.”
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