नोएडा: जब भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी कृष्ण करुणेश ने जनवरी में बतौर नोएडा अथॉरिटी के सीईओ का कार्यभार संभाला, तो उनकी प्राथमिकताएं बिल्कुल साफ थीं. वह अपने पूर्व अधिकारियों की उस गलती को दोहराना नहीं चाहते थे, जिसमें उन्होंने नोएडा की आरडब्ल्यूए से बातचीत नहीं की थी.
उन्होंने तय किया कि वह नोएडा के निवासियों से ज्यादा रेगुलर मिलेंगे.
लेकिन अपने पहले ही दिन उन्हें आग बुझाने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा. 16 जनवरी को 27 साल के तकनीकी कर्मी की एक खुले गड्ढे में गिरने से मौत हो गई थी. इस बेबस मौत से पूरे देश में गुस्सा था. करुणेश को लोगों के गुस्से और एनसीआर के इस सबअर्ब में फैली नागरिक अव्यवस्था दोनों को संभालना पड़ा. उन्होंने उस जगह पर क्रैश बैरियर लगाने का आदेश दिया.
नोएडा सेक्टर-6 में अथॉरिटी के ऑफिस में अपनी काली लेदर की कुर्सी पर बैठे करुणेश ने कहा, “इस मौत ने पूरे देश का ध्यान खींचा था. सबसे पहला काम यह सुनिश्चित करना था कि वह जगह सुरक्षित हो.” इससे पहले उनकी नौकरी गोरखपुर के जिलाधिकारी के रूप में राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक चुनौतियों से भरी थी, लेकिन किसी तरह नोएडा उन सब से भी आगे निकल जाता है.
यहां चुनौती सिर्फ प्रशासनिक नहीं है. यह ढांचे की भी है—ऐसे शहर में शासन को ठीक से लागू करना, जो अपनी तैयारी से ज्यादा तेज़ी से बढ़ गया. पानी से भरे निर्माण वाले गड्ढे में युवराज मेहता की मौत ने भारत के शहरी ढांचे की कमजोरियों को उजागर कर दिया.
करुणेश का इस शीर्ष पद तक पहुंचना बहुत तेज़ रहा. गोरखपुर के डीएम के रूप में तीन साल काम करने के बाद, वह नोएडा के अतिरिक्त सीईओ के रूप में मुश्किल से पांच महीने ही रहे थे, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बुलावा आ गया. वह तुरंत बैठक में पहुंचे. इसके कुछ ही समय बाद, उस समय के नोएडा सीईओ लोकेश एम को अचानक हटा दिया गया.

आदित्यनाथ, जिनका गृह क्षेत्र गोरखपुर है, उन्होंने करुणेश को दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की सबसे चुनौतीपूर्ण पोस्टिंग में से एक की जिम्मेदारी दी. मुख्यमंत्री का आदेश, जो पांच मिनट की छोटी बैठक में दिया गया, बहुत सीधा था, करुणेश ने याद करते हुए कहा: “लोग क्या कह रहे हैं, उसे सुनो.”
नोएडा अथॉरिटी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने, नाम न बताने की शर्त पर, इशारा किया कि करुणेश को शहर में आते ही इस पद के लिए तैयार किया जा रहा था—जैसे किसी तरह का ट्रायल.
अधिकारी ने कहा, “करुणेश को उस समय अतिरिक्त सीईओ बनाया गया था जब निवासी लोकेश एम के खिलाफ लगातार शिकायतें कर रहे थे. हर कोई समझ रहा था कि उन्हें क्यों भेजा गया है, लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि स्थिति इतनी जल्दी बदल जाएगी.”
नोएडा बनाम ‘ड्रीम सिटी’ गोरखपुर
नोएडा चलाना अपने साथ कई बोझ लेकर आता है. करुणेश इन्हें विरासत में मिली समस्याएं कहते हैं—एक ऐसा शब्द जिसमें रुकी हुई परियोजनाएं, खराब ड्रेनेज, अतिक्रमण, ट्रैफिक जाम और असमान विकास जैसी समस्याएं शामिल हैं.
लेकिन वह सुरक्षित खेल नहीं रहे हैं. करुणेश महत्वाकांक्षी हैं और पूरे भरोसे के साथ दावा करते हैं कि मार्च के अंत तक नोएडा गड्ढों से निजात पा लेगा. वे ऐसे अधिकारी बनना चाहते हैं जो शहर की लंबे समय से चली आ रही नागरिक समस्याओं को आखिरकार खत्म करे और नोएडा को एक ऐसा आधुनिक शहर बनाए, जिसे पड़ोसी शहर भी देख कर ईर्ष्या करें.
एक शिकायत और (योगी आदित्यनाथ) अपने करीबियों को भी नहीं छोड़ते. मुख्यमंत्री काम और जवाबदेही को लेकर बहुत सख्त हैं.
—कृष्ण करुणेश, सीईओ, नोएडा अथॉरिटी
इन सभी समस्याओं को ठीक करने की शुरुआत नोएडा की बहुत सक्रिय लेकिन उपेक्षित आरडब्ल्यूए से होती है.
करुणेश जानते हैं कि उन्हें आरडब्ल्यूए को अपने साथ रखना होगा और इसके लिए उनके पास पहले से योजना है. उनकी रणनीति ग्राउंड पर काम करने की है: हर महीने अधिकारी किसी अलग सोसाइटी में जाकर आरडब्ल्यूए सदस्यों के साथ बैठते हैं और उनकी समस्याएं समझते हैं.
करुणेश ने कहा, “हम शिकायतों की एक फाइल बनाते हैं और कोशिश करते हैं कि उन्हें जितनी जल्दी हो सके हल किया जाए.”

यह ज़रूरी कदम है. आरडब्ल्यूए, नोएडा अथॉरिटी और निवासियों के बीच पहला संपर्क बिंदु हैं, लेकिन इतिहास में यह रिश्ता अक्सर टकराव भरा रहा है. चूंकि, नोएडा अथॉरिटी ही एक ताकतवर संस्था है जो शहर के नागरिक मामलों को देखती है, इसलिए आरडब्ल्यूए अक्सर शिकायत करते रहे हैं कि उनकी बातें नौकरशाही में कहीं खो जाती हैं.
वे नियमित रूप से ट्रैफिक जाम, अवैध निर्माण, सीवर ओवरफ्लो, अनियमित पानी सप्लाई और सार्वजनिक जगहों की खराब देखभाल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हैं. यह रिश्ता लगातार बातचीत और टकराव से भरा रहता है.
लेकिन यह समस्या का सिर्फ एक हिस्सा है.
नोएडा को लगभग आधी सदी पहले एक औद्योगिक टाउनशिप के रूप में बसाया गया था. समय के साथ यह एक बड़े आवासीय उपनगर में बदल गया, लेकिन बुनियादी ढांचा इतनी तेज़ी से नहीं बढ़ पाया.
आज निवासी रोज़ाना ट्रैफिक जाम, कम होते हरित क्षेत्र और बढ़ती कचरा प्रबंधन की समस्याओं से जूझते हैं.

जब करुणेश अपने वर्तमान कार्यकाल की तुलना गोरखपुर से करते हैं, तो वह पुराने शहर और नए शहर का साफ अंतर बताते हैं. उनका कहना है कि गोरखपुर एक ऐसा शहर था जो धीरे-धीरे विकसित हो रहा था, लेकिन नोएडा इसके उलट है—यह पहले से बना हुआ शहर है. सेक्टर तय हैं, कंक्रीट जम चुका है. फिर भी हर जगह दरारें दिखाई देती हैं.
अपनी मेज पर रखी फाइलों के बड़े ढेर में से एक और फाइल पर साइन करते हुए करुणेश ने कहा, “नोएडा पहले से ही एक विकसित शहर है—यह मेरे आने से बहुत पहले डेवलप हो चुका था. अब चुनौती रोज़मर्रा के काम संभालने और शहर से जुड़ी उन समस्याओं को हल करने की है जो बिना चेतावनी के सामने आ जाती हैं.”
लोगों की उम्मीदें ज्यादा हैं क्योंकि कृष्ण करुणेश वही अधिकारी हैं जिन्हें गोरखपुर को बदलकर योगी आदित्यनाथ की “ड्रीम सिटी” बनाने का श्रेय दिया जाता है.
उन्होंने रामगढ़ ताल झील को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई, जिसे कभी अपराधियों द्वारा लाशें फेंकने की वजह से “खूनी नाला” कहा जाता था—अब यह एक पर्यटन स्थल बन चुका है, जहां आज कपल टहलते हैं और परिवार नौका विहार करते हैं.
यूपी ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट 2023 में 1.71 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव घोषित किए गए थे. रेडिसन ब्लू और मैरियट जैसे होटल चेन भी गोरखपुर पहुंच चुके हैं.
करुणेश ने कहा, “फ्लोटिंग रेस्टोरेंट, मैरियट और क्रूज मेरे समय में आए, लेकिन यह एक सामूहिक प्रयास था.” वे मूल रूप से बिहार के हैं और उनके पास भूगोल में बीए, एलएलबी और पब्लिक पॉलिसी में एमए की डिग्री है.
2011 बैच के यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी करुणेश गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं. उनका स्वभाव शांत है और चेहरे पर बड़ी मुस्कान रहती है. वह धैर्य से सुनते हैं, लेकिन उनके सहकर्मी कहते हैं कि काम के मामले में वह बहुत सख्त अधिकारी हैं.
बिल्डर–खरीदार की परेशानी
करुणेश को विरासत में मिली सबसे समस्याओं में से एक बिल्डर और खरीदार के बीच का टकराव है. यह समस्या लगभग नोएडा की शुरुआत से ही बनी हुई है और कई सीईओ इसे हल करने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन सफल नहीं हो पाए.
हर कुछ महीनों में होमबायर्स नोएडा अथॉरिटी के ऑफिस के बाहर प्रदर्शन करते हैं और उन फ्लैटों का कब्ज़ा मांगते हैं जिनके लिए उन्होंने सालों पहले पैसा दे दिया था. कई लोग अभी भी अपने फ्लैट की रजिस्ट्री का इंतज़ार कर रहे हैं क्योंकि बिल्डरों ने अथॉरिटी को अपना बकाया नहीं चुकाया है. दूसरे दिनों में किसान इकट्ठा होते हैं और कहते हैं कि शहर बनाने के लिए अधिग्रहित की गई जमीन के बदले उन्हें सही मुआवजा नहीं मिला.
2019 से 2023 के बीच जब रितु माहेश्वरी नोएडा अथॉरिटी की सीईओ थीं, तब भी वह इसी मुश्किल समस्या से जूझ रही थीं. खरीदार फंसे हुए थे. कई हाउसिंग प्रोजेक्ट्स की रजिस्ट्रियां अटकी हुई थीं. कई प्रोजेक्ट दिवालिया प्रक्रिया में चले गए.

माहेश्वरी ने कहा, “यह अथॉरिटी से ज्यादा पैसे से जुड़ी समस्या थी. मेरे कार्यकाल में हमने जितनी रजिस्ट्रियां हो सकती थीं, कराईं. हमने कुछ बकाया भी माफ किए, लेकिन हम ऐसा कब तक करते रहेंगे?”
चूंकि करुणेश को योगी आदित्यनाथ के करीब माना जाता है, इसलिए अब सबकी नज़र इस बात पर है कि क्या वह इस मामले में कुछ बदलाव ला पाएंगे.
उन्होंने कहा, “कभी-कभी नीतियां गलत होती हैं जो बाद में विरासत में मिली समस्या बन जाती हैं, लेकिन आखिरकार इसका शिकार होमबायर ही होता है. वही अंतिम नागरिक है जो इस समस्या के आखिरी छोर पर खड़ा है.”
हालांकि, वे मानते हैं कि अभी उनके पास पूरी तरह साफ रोडमैप नहीं है, लेकिन उन्होंने इस संकट को हल करने के लिए समय सीमा तय कर दी है.
करुणेश ने कहा, “हमारा लक्ष्य इन सभी समस्याओं को सुलझाना है. हर मामले को देखने के लिए हमारे पास एक बोर्ड है. हम उन्हें उठाएंगे, उनके फायदे और नुकसान देखेंगे और जहां जरूरत होगी वहां सर्वे भी कराएंगे. अगले छह महीनों में हम जितने ज्यादा प्रोजेक्ट हो सकें, उन्हें क्लियर करेंगे.”
नई ओपन-डोर पॉलिसी
करुणेश के ऑफिस की दीवार पर लगा बड़ा मॉनिटर सीसीटीवी फुटेज दिखाता है, जिसमें उनसे मिलने के लिए बाहर लाइन में खड़े लोग दिखाई देते हैं. निवासियों का कहना है कि अब ऑफिस तक पहुंचना पहले से आसान हो गया है. अधिकारी हर सुबह दो घंटे की जनसुनवाई भी करते हैं.
सोमवार की सुबह 35 साल के के अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे ताकि वह अपनी नागरिक समस्याएं बता सकें. जौनपुर के रहने वाले इस सॉफ्टवेयर डेवलपर ने 15 साल से नोएडा को अपना घर बना रखा है और आखिरकार सेक्टर-25 में एक अपार्टमेंट भी खरीदा. उनके अनुसार, यह शहर कभी सपनों और आगे बढ़ने का प्रतीक था, लेकिन धीरे-धीरे इसकी चमक कम होने लगी.
(नोएडा अथॉरिटी) एक तरह से नगर निगम की तरह है. देखभाल और रखरखाव सबसे बड़ी चुनौतियां हैं. यह सुनिश्चित करना कि सड़कें ठीक रहें, स्ट्रीट लाइट काम करें और शहर साफ रहे. अच्छी गुणवत्ता का बुनियादी ढांचा देना इसकी मुख्य जिम्मेदारी है.
—रितु माहेश्वरी, पूर्व सीईओ, नोएडा अथॉरिटी
चौड़ी सड़कों में दरारें पड़ने लगीं. जिस शहर को योजनाबद्ध टाउनशिप के रूप में बनाया गया था, वहां ट्रैफिक जाम होने लगा. सीवर ओवरफ्लो होने लगा. कचरा पड़ा रहता था. मरम्मत केवल दिखावे की लगती थी—एक हफ्ते ठीक, अगले हफ्ते फिर खराब.
उन्होंने कहा कि हर बार शिकायत दर्ज कराने के लिए उन्हें काम से छुट्टी लेकर नोएडा अथॉरिटी के ऑफिस जाना पड़ता था, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी जाती थी.
अथॉरिटी के ऑफिस में प्रवेश करना भी अपने आप में मुश्किल था. ऑफिस बिल्डिंग के बाहर लाइनें दीवार के किनारे तक लगी रहती थीं. लोग अपना नाम और आने का कारण लिखते थे और इंतज़ार करते थे कि उन्हें अंदर जाने की अनुमति मिलेगी या नहीं.

जिन लोगों को मिलने का समय मिल जाता था, उन्हें पहचान पत्र जमा करना पड़ता था, फोटो खिंचवानी पड़ती थी और फिर एक प्रिंटेड स्लिप लेनी होती थी जिस पर उनका नाम, फोटो और आने का कारण लिखा होता था. इसके बाद ही उन्हें अंदर जाने की अनुमति मिलती थी.
निवासियों का कहना है कि इस जटिल प्रक्रिया ने प्रशासन और लोगों के बीच दूरी पैदा कर दी थी. गुरुग्राम या ग्रेटर नोएडा के विपरीत, जहां प्रशासनिक दफ्तरों में प्रवेश खुला और आसान है, यहां अक्सर अंदर जाने के लिए लगातार कोशिश करनी पड़ती थी—या अधिकारी के मूड पर निर्भर करता था.
नोएडा के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि पूर्व सीईओ लोकेश एम से मिलना “निवासियों के लिए एक बड़ा काम” हुआ करता था और लोग इसकी शिकायत करते थे. अधिकारी का दावा है कि 2024 में किसानों के एक प्रदर्शन के दौरान जब प्रदर्शनकारी सीईओ से मिलने की कोशिश कर रहे थे, तब वह पीछे के गेट से बाहर निकल गए थे. कई निवासी लोकेश एम को हटाए जाने को उनकी उदासीनता और सार्वजनिक जीवन से दूरी से जोड़ते हैं.
हर मामले को देखने के लिए हमारे पास एक बोर्ड है. हम उन्हें उठाएंगे, उनके फायदे और नुकसान देखेंगे और जहां ज़रूरत होगी वहां सर्वे कराएंगे. अगले छह महीनों में हम जितने ज्यादा प्रोजेक्ट हो सकें, उन्हें क्लियर करेंगे
—कृष्ण करुणेश
पूर्व अधिकारी ने कहा, “टेकी की मौत के बाद जो गुस्सा था, वह सिर्फ उसी घटना को लेकर नहीं था. लोग पहले से ही परेशान थे. उन्हें लगता था कि सीईओ उनसे मिलते ही नहीं हैं. फैसले बंद कमरों में लिए जाते थे.”
लगता है कृष्ण करुणेश ने इससे सबक लिया है. उनकी दो घंटे की जनसुनवाई के दौरान बोर्डरूम में राजस्व, पानी, सफाई और अन्य विभागों के अधिकारी एक साथ बैठते हैं, जबकि निवासी अपनी शिकायतें बताते हैं.
करुणेश ने कहा, “जब सभी एक जगह होते हैं, तो जिन समस्याओं को तुरंत हल किया जा सकता है, उन्हें उसी दो घंटे में निपटा दिया जाता है, जहां कानूनी दिक्कतें होती हैं, वहां हम लोगों को सीमाएं बताते हैं और उसी स्तर पर उन्हें संभालने की कोशिश करते हैं. ये दो घंटे हमारा सबसे अहम समय होता है.”
नए सीईओ ने नोएडा की सभी सड़कों को दोबारा बनाने पर सहमति दी है. ये सड़कें मानसून में डूब जाती थीं और बार-बार समस्या पैदा करती थीं. उन्होंने टेंडर प्रक्रिया भी शुरू कर दी है. इसमें सिर्फ दो बैठकें लगीं. पहले फाइलें लंबे समय तक लंबित रहती थीं.
—केके जैन, महासचिव, फेडरेशन ऑफ नोएडा रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशंस
बैठक से बाहर निकलते समय कागजों का एक बंडल हाथ में लिए के ने कहा कि इस अनुभव से उन्हें नए सीईओ से उम्मीद जगी है.
उन्होंने कहा, “जब शहर चलाने वाला कोई ताकतवर व्यक्ति आपकी बात सुनता है, तो आपको लगता है कि आपकी अहमियत है. लगता है कि शायद अब चीजें सच में आगे बढ़ेंगी.”
हालांकि, कई निवासी अभी भी इंतज़ार और नज़र रखने की स्थिति में हैं. बड़े वादे उन्हें आसानी से भरोसा नहीं दिलाते.
बैठक में शामिल हुए नोएडा में 40 साल से रहने वाले एक निवासी ने कहा, “हर बार जब नया सीईओ आता है, तो बहुत उत्साह दिखाता है, लेकिन वह बहुत जल्दी खत्म हो जाता है.”
न्यू नोएडा के सपने
नोएडा अब एक अहम मोड़ पर पहुंच चुका है. इसे एक औद्योगिक टाउनशिप के रूप में बनाया गया था, लेकिन अब यह मुख्य रूप से एक आवासीय शहर बन चुका है, लेकिन यह विकास अब एक सीमा पर पहुंच गया है. ज़मीन का भंडार लगभग खत्म हो चुका है और शहर अपनी क्षमता से ज्यादा भरा हुआ है.
पूर्व सीईओ रितु माहेश्वरी के कार्यकाल में ही न्यू नोएडा की घोषणा की गई थी. इसका उद्देश्य यह था कि पिछली गलतियों को दोहराने से बचा जाए और इसे एक औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित किया जाए, जिसमें योजनाबद्ध आवासीय क्षेत्र भी हों.
माहेश्वरी ने कहा, “मेरे कार्यकाल में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा ज़मीन का भंडार था. नोएडा में यह लगभग भर चुका था. नए प्रोजेक्ट तभी आ सकते हैं जब ज़मीन उपलब्ध हो. मेरे कार्यकाल में ही न्यू नोएडा की घोषणा हुई. यह क्षेत्र काफी हद तक इस्तेमाल नहीं हुआ था—इसलिए यह सभी के लिए फायदेमंद था. उद्योग आना चाहते थे, लेकिन विकास जमीन पर निर्भर करता है. यही सबसे बड़ी चुनौती थी. हमने न्यू नोएडा के मास्टर प्लान को आगे बढ़ाया.”

अब यह परियोजना करुणेश की मेज पर है. उन्होंने अधिग्रहण प्रक्रिया की योजना बनाने के लिए मार्च के अंत तक का लक्ष्य रखा है. न्यू नोएडा, जिसे दादरी-नोएडा-गाजियाबाद निवेश क्षेत्र (DNGIR) भी कहा जाता है, लगभग 209 वर्ग किलोमीटर में फैला है और इसमें 80 से ज्यादा गांव आते हैं. यह दादरी के पास और ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के करीब स्थित है और इसे एनसीआर के अगले औद्योगिक केंद्र के रूप में देखा जा रहा है.
करुणेश ने कहा, “न्यू नोएडा का आकार नोएडा जितना ही है. हमारे पास पहले से ही इस क्षेत्र का मास्टर प्लान है. हम इस नए क्षेत्र में 30 प्रतिशत से ज्यादा उद्योग लाने का लक्ष्य रख रहे हैं. फिलहाल हम किसानों के साथ बातचीत कर रहे हैं ताकि जमीन के लिए एक दर तय की जा सके.”
हालांकि, रिटायर्ड डीन (रिसर्च) अनिल देवान, स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर, ने चेतावनी दी कि कोई भी मास्टर प्लान उतना ही अच्छा होता है जितना उसका क्रियान्वयन और “व्यवहारिक और लागू किए जा सकने वाले समाधान.”
उन्होंने कहा, “कागजों पर कई मास्टर प्लान होते हैं, लेकिन उन्हें उस तरह लागू नहीं किया जाता जैसा होना चाहिए. जब तक काम, आवास, परिवहन और सार्वजनिक सेवाएं साथ-साथ नहीं बढ़ेंगी, तब तक शहर अपने ही विस्तार के बोझ से जूझता रहेगा.”
‘सीएम अपने करीबियों को भी नहीं छोड़ेंगे’
केके जैन ने कई सीईओ को आते-जाते देखा है. फेडरेशन ऑफ नोएडा रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशंस के महासचिव के रूप में उन्हें अक्सर निराशा ही मिली है, लेकिन करुणेश से अपनी पहली कुछ बैठकों के बाद वह उम्मीद से भरे हुए हैं.
उन्होंने कहा कि हर बार प्रोजेक्ट तुरंत मंजूर किए गए. सड़कों की मरम्मत से लेकर ट्यूबवेल लगाने और पार्कों के नवीनीकरण तक, टेंडर प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है. अब आरडब्ल्यूए का सामूहिक संगठन इससे भी बड़ा कदम चाहता है—शहर की सड़कों का पूरी तरह से पुनर्निर्माण. जैन का दावा है कि इस पर काम शुरू भी हो चुका है.
जैन ने कहा, “नए सीईओ ने नोएडा की सभी सड़कों को दोबारा बनाने पर सहमति दे दी है. मानसून के दौरान ये सड़कें पानी में डूब जाती थीं और बार-बार समस्या पैदा करती थीं. उन्होंने टेंडर प्रक्रिया भी शुरू कर दी है. इसमें सिर्फ दो बैठकें लगीं. पहले फाइलें लंबित रह जाती थीं और चक्कर काटती रहती थीं.”

नोएडा अथॉरिटी के पास शहर के विकास और रखरखाव को लेकर काफी व्यापक अधिकार हैं. यह 1976 के यूपी इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट एक्ट के तहत काम करती है और योजना बनाना, जमीन आवंटित करना और प्रोजेक्ट लागू करना इसके जिम्मे है.
पूर्व सीईओ रितु माहेश्वरी ने कहा, “यह काफी हद तक नगर निगम की तरह है. रखरखाव और देखभाल सबसे बड़ी चुनौतियां हैं. यह सुनिश्चित करना कि सड़कें ठीक रहें, स्ट्रीट लाइट काम करें और शहर साफ रहे. नोएडा जैसे शहर में अच्छी गुणवत्ता का बुनियादी ढांचा देना इसकी मुख्य जिम्मेदारी है.”
काफी समय से यह बहस चल रही है कि क्या नोएडा में अलग से नगर निगम बनाया जाना चाहिए. इस पर करुणेश ने स्पष्ट राय नहीं दी और कहा कि यह फैसला सरकार को करना है. हालांकि, उक्त पूर्व वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि अलग नगर निगम बनने से जरूरी नहीं कि निवासियों को फायदा ही हो.
अधिकारी ने कहा, “अथॉरिटी के लिए यह एक बोझ कम होने जैसा होगा. उन्हें राहत मिल जाएगी, लेकिन निवासियों के लिए स्थिति अलग हो सकती है. नगर निगम के पास उतना बड़ा बजट नहीं होता जितना अथॉरिटी के पास है. विकास की गति धीमी हो सकती है और प्रोजेक्ट लालफीताशाही में फंस सकते हैं.”
चूंकि कहा जाता है कि करुणेश को “बाबा” (योगी आदित्यनाथ) का समर्थन है और वह पहले उनके साथ काम भी कर चुके हैं, इसलिए आरडब्ल्यूए, उद्योग संगठन और साथी आईएएस अधिकारी यह देखने के लिए नजर रखे हुए हैं कि क्या वह वह काम कर पाएंगे जो बाकी सीईओ नहीं कर पाए, लेकिन करुणेश इशारा करते हैं कि मुख्यमंत्री तक पहुंच होना भी एक सीमा तक ही मदद कर सकता है.
करुणेश ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “एक शिकायत भी हुई तो वह अपने करीबियों को भी नहीं छोड़ते. मुख्यमंत्री काम और जवाबदेही को लेकर बहुत सख्त हैं.”
उन्होंने अपनी मेज पर रखी घंटी बजाई. एक स्टाफ सदस्य अंदर आया तो सीईओ ने उसे अगली लाइन में खड़े व्यक्ति को अंदर बुलाने के लिए कहा.
उन्होंने सीधे-सीधे कहा, “आज लंच ब्रेक नहीं है.”
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