नई दिल्ली: डॉ. सैयद खालिद अली की ज़िंदगी में कुछ तारीखें बहुत अहम हैं और 14 अगस्त 2024 उनमें से एक है. यही वह दिन था जब हरियाणा के रोहतक से पहले प्रतिभागी को पैनासिया बायोटेक की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक—भारत की पहली स्वदेशी डेंगू वैक्सीन—के फेज-III ट्रायल में शामिल किया गया.
भारतीय बायोटेक कंपनी पैनासिया बायोटेक के चीफ साइंटिफिक ऑफिसर के तौर पर खालिद ने पूरी ज़िंदगी वैक्सीन और रोकथाम वाली दवाओं पर काम किया है, लेकिन डेंगू वैक्सीन—DengiAll सिर्फ कंपनी के लिए ही नहीं, बल्कि देश के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि है.
खालिद ने कहा, “DengiAll को बनने में 15 साल से ज्यादा का वक्त लगा है और यह ऐसे वक्त आया है जब दुनिया की आधी आबादी डेंगू के खतरे में है. इस वैक्सीन की ज़रूरत पर कोई सवाल नहीं है. हमें इसकी ज़रूरत तो कल ही थी.”
दिल्ली स्थित पैनासिया बायोटेक के उजाले से भरे कॉन्फ्रेंस रूम में खालिद ने डेंगू की वैक्सीन बनाने की खास चुनौती के बारे में बताया. अब तक दुनिया में सिर्फ दो डेंगू वैक्सीन विकसित की गई हैं; इनमें से सिर्फ एक ही अभी इस्तेमाल में है. स्टडीज़ में पाया गया है कि इन वैक्सीन में भी दिक्कतें हैं, क्योंकि ये डेंगू के चारों टाइप को कवर नहीं करती और कुछ लोगों में साइड इफेक्ट भी देखे गए हैं. तीसरी, नई डेंगू वैक्सीन ब्राजील के ब्यूटांटन इंस्टीट्यूट की Butantan-DV वैक्सीन है, जिसे नवंबर 2025 में नियामक मंजूरी मिली, लेकिन इसका प्रोडक्शन अभी शुरू नहीं हुआ है. यही एक वैक्सीन है जो DengiAll के सबसे करीब मानी जाती है.
DengiAll पहली ऐसी वैक्सीन होगी जिसमें कमज़ोर किए गए (एटेन्यूएटेड) डेंगू वायरस का इस्तेमाल किया गया है, जो डेंगू के चारों प्रकारों पर बराबर असर करती है और सिर्फ एक ही डोज में काम करती है. यह डेंगू से बचाव का तरीका पूरी तरह बदल देगी और अब तक की किसी भी वैक्सीन से ज्यादा सुरक्षा देगी.

भारत और दुनिया की नज़रें DengiAll पर टिकी हैं और इसी के साथ उस दिल्ली स्थित दवा कंपनी पर भी, जो इसे बना रही है. 2008 से इस वैक्सीन पर काम कर रही पैनासिया बायोटेक अब सफलता के बेहद करीब है. कंपनी ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के सहयोग से भारत के 19 स्थानों पर फेज-III मानव परीक्षण पूरे कर लिए हैं.
खालिद ने कहा, “डेंगू ने दशकों से वैज्ञानिकों और इम्यूनोलॉजिस्ट को उलझा रखा है. इससे संक्रमित लोगों में हल्के फ्लू जैसे लक्षण से लेकर मौत तक हो सकती है. इसका बड़ा कारण डेंगू के अलग-अलग सीरोटाइप हैं और उनका आपस में रिएक्शन है.”
DengiAll का लक्ष्य 2027 तक बाज़ार में आना है. यह भारत की पहली स्वदेशी सिंगल-शॉट डेंगू वैक्सीन होगी और दुनिया की दूसरी ऐसी वैक्सीन होगी.
पैनासिया बायोटेक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के सदस्य हर्षित जैन ने कहा, “इनोवेशन पैनासिया बायोटेक के डीएनए में है और DengiAll उसी का उदाहरण है. डेंगू एक बड़ी समस्या है, खासकर ग्लोबल साउथ में और हमारी वैक्सीन का सामाजिक असर अब तक से कहीं ज्यादा होगा.”
डेंगू वैक्सीन क्यों अहम है?
मथुरा रोड पर स्थित पैनासिया बायोटेक के ऑफिस में DengiAll को लेकर बातचीत में खास उत्साह दिखता है. 10,000 से ज्यादा लोगों पर फेज-III मानव परीक्षण पूरे होने के बाद, कंपनी अब मंजूरी के लंबे और मुश्किल इंतज़ार के दौर में है. यह अब तक का DengiAll का सबसे बड़ा और सबसे मजबूत ट्रायल है, जिसमें न तो प्रतिभागियों को और न ही ट्रायल कराने वालों को पता था कि कौन-सी डोज वैक्सीन है और कौन-सी प्लेसीबो.
1984 से कारोबार में मौजूद पैनासिया के वैज्ञानिक वैक्सीन के क्षेत्र में नए काम करने से अनजान नहीं हैं. कंपनी ने दुनिया की पहली पूरी तरह तरल पेंटावैलेंट वैक्सीन विकसित की थी, जो एक ही इंजेक्शन में पांच बीमारियों (टिटनेस, डिप्थीरिया, हेपेटाइटिस-बी, HiB, काली खांसी) से बचाव करती है. पैनासिया भारत की पहली प्राइवेट कंपनी भी थी जिसने पोलियो वैक्सीन बनाई. DengiAll के साथ कंपनी दुनिया के नक्शे पर अपनी जगह बनाना चाहती है.
क्लिनिकल भाषा में, DengiAll एक लाइव-एटेन्यूएटेड, टेट्रावैलेंट, सिंगल-शॉट डेंगू वैक्सीन है. आसान शब्दों में कहें तो यह वैक्सीन डेंगू वायरस के बदले हुए (कमज़ोर) रूप से बनी है, डेंगू के चारों टाइप को कवर करती है और मजबूत व बैलेंस्ड इम्यूनिटी के लिए सिर्फ एक ही इंजेक्शन की ज़रूरत होगी.
डेंगू के चार सबटाइप हैं—DEN1, DEN2, DEN3 और DEN4—जो एक ही डेंगू (DENV) वायरस के अलग-अलग रूप हैं. इन्हें सीरोटाइप कहा जाता है. इनके लक्षण लगभग एक जैसे होते हैं और ये सभी मादा एडीज एजिप्टी मच्छर के ज़रिए फैलते हैं.
दिलचस्प बात यह है कि ब्राजील की ब्यूटांटन और भारत की DengiAll वैक्सीन की शुरुआत एक ही जगह से हुई—अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआईएच) में विकसित डेंगू वायरस के बदले हुए स्ट्रेन से. इस स्ट्रेन में डेंगू वायरस का कमजोर रूप होता है, जो चारों सीरोटाइप से सुरक्षा देता है. 2008 में पैनासिया बायोटेक और ब्यूटांटन इंस्टीट्यूट पहली कंपनियां थीं, जिन्होंने अमेरिका में विकसित इस स्ट्रेन का लाइसेंस लिया और अपने-अपने देशों में इसे वैक्सीन के रूप में बनाने का काम शुरू किया. अब दोनों कंपनियां मंजिल के बेहद करीब हैं.
डेंगू जिस तरह से प्राकृतिक रूप से फैलता और असर करता है, उसे देखते हुए DengiAll की ये सभी खूबियां वैक्सीन के लिए एक-एक बड़ा पड़ाव हैं और इसकी क्षमता पर भरोसा बढ़ाती हैं.
मच्छरों से फैलने वाला यह वायरस आम तौर पर बुखार, मतली और फ्लू जैसे लक्षण पैदा करता है, लेकिन गंभीर डेंगू में खून बहना भी हो सकता है और यह जानलेवा बीमारी बन सकती है.
खालिद ने कहा, “असल बात यह है कि अगर आप डेंगू के किसी एक सीरोटाइप से संक्रमित हो जाते हैं, तो आपको सिर्फ उसी टाइप से सुरक्षा मिलती है. बहुत संभावना है कि आप दोबारा डेंगू से संक्रमित हो जाएं, लेकिन किसी दूसरे सीरोटाइप से. दरअसल, दूसरी बार होने वाला संक्रमण ज्यादा गंभीर, यहां तक कि जानलेवा भी हो सकता है.”
DengiAll ने कैसे बदली गेम
वैक्सीन बनाना एक डेलिकेट साइंस है, लेकिन इसके कुछ बुनियादी सिद्धांत होते हैं. ज़्यादातर वैक्सीन असली बीमारी पैदा करने वाले वायरस का कमज़ोर या बदला हुआ रूप होती हैं. वायरस को इतना कमज़ोर किया जाता है कि वह बीमारी न फैलाए, लेकिन शरीर में सुरक्षा देने वाली इम्यून प्रतिक्रिया पैदा करे. इस वायरस को शरीर में डालकर, वैक्सीन शरीर को बीमारी से परिचित करा देती है, जिससे एंटीबॉडी बनती हैं और इम्यूनिटी विकसित होती है.
लेकिन डेंगू के मामले में कहानी बदल जाती है.
अगर कोई व्यक्ति DENV1 (डेंगू का पहला सीरोटाइप) वायरस से संक्रमित होता है, तो उसकी इम्यून सिस्टम उसके खिलाफ एंटीबॉडी बना लेती है. ये एंटीबॉडी उसे दोबारा DENV1 से संक्रमित होने से बचाती हैं, क्योंकि वे वायरस से लड़ती हैं और उसे खून में जाने नहीं देतीं, लेकिन अगर वही व्यक्ति बाद में DENV2, DENV3 या DENV4 वायरस से संक्रमित हो जाता है, तो वही एंटीबॉडी उस वायरस को और मजबूत बना देती हैं और बीमारी की गंभीरता बढ़ा देती हैं. इस प्रक्रिया को ‘एंटीबॉडी-डिपेंडेंट एन्हांसमेंट’ कहा जाता है.
पैनासिया बायोटेक के वाइस प्रेसिडेंट (क्लिनिकल रिसर्च एंड स्ट्रैटेजिक मेडिकल अफेयर्स) डॉ. ललितेंदु मोहंती ने कहा, “कभी-कभी वायरस से बचाने के बजाय, एंटीबॉडी वायरस के साथ मिलकर शरीर पर और ज़्यादा ज़ोर से हमला करने लगती हैं और ये एंटीबॉडी पहले हुए संक्रमण से भी आ सकती हैं या वैक्सीन से भी.”
लेकिन जिस बीमारी का कोई इलाज नहीं है, उसके लिए वैक्सीन के ज़रिये रोकथाम के अलावा कोई ऑप्शन नहीं है.
मोहंती ने कहा, “अगर आपकी वैक्सीन आपको डेंगू के सिर्फ एक प्रकार से बचाती है, तो वह आपको बाकी टाइप से होने वाले गंभीर संक्रमण के खतरे में डाल देती है. इसलिए डेंगू के मामले में आंशिक इम्यूनिटी भी जानलेवा हो सकती है.”
कोविड-19, टिटनेस और खसरा जैसी बीमारियों में, दो-डोज वाली वैक्सीन की एक डोज लेने से भी आंशिक सुरक्षा मिल जाती है और बीमारी से बचाव हो जाता है, लेकिन डेंगू में ऐसा हमेशा नहीं होता. आंशिक इम्यूनिटी शरीर की बीमारी सहने की क्षमता को और खराब कर सकती है. इसी वजह से DengiAll को इस तरह तैयार किया गया है कि वह डेंगू के चारों प्रकारों का मुकाबला करे और पैनासिया बायोटेक ने इसे सिर्फ एक ही डोज वाली वैक्सीन के रूप में डिजाइन किया है.

इससे पहले डेंगू की दो प्रमुख वैक्सीन थीं—फ्रांस की कंपनी सनोफी पाश्चर की Dengvaxia, जो 2015 में आई, और जापान की कंपनी टाकेडा की Qdenga, जो 2022 में लॉन्च हुई.
Dengvaxia दुनिया की पहली डेंगू वैक्सीन थी, लेकिन इसके कुछ साल बाद यह पाया गया कि जिन लोगों को पहले कभी डेंगू नहीं हुआ था, उनमें इस वैक्सीन से गंभीर डेंगू का खतरा बढ़ गया. यह वैक्सीन सिर्फ उन्हीं लोगों में असरदार थी, जिन्हें पहले डेंगू हो चुका था. फिलीपींस जैसे देशों में इसको लेकर बड़े विवाद हुए, जहां वैक्सीन के इस्तेमाल और बाद में सामने आई समस्याओं ने लोगों में वैक्सीन को लेकर डर पैदा कर दिया. कम मांग के चलते सनोफी ने घोषणा की कि वह 2025 तक Dengvaxia का निर्माण बंद कर देगी.
Qdenga फिलहाल बाज़ार में उपलब्ध एकमात्र वैक्सीन है, लेकिन इसके लिए दो डोज की जरूरत होती है और यह DengiAll की तरह डेंगू के चारों सीरोटाइप से सुरक्षा नहीं देती.
मोहंती ने कहा, “हालांकि, बाज़ार में पहले से दो डेंगू वैक्सीन मौजूद थीं, फिर भी ऐसी सिंगल-डोज वैक्सीन की ज़रूरत बनी हुई थी, जो सभी सीरोटाइप के खिलाफ संतुलित इम्यून प्रतिक्रिया दे सके. यहीं पर DengiAll की एंट्री होती है.”
DengiAll की मेंकिंग
पैनासिया बायोटेक साल 2002 से डेंगू वैक्सीन बनाने पर काम कर रही है.
जैन ने समझाया, “वैक्सीन कई तरह की होती हैं—लाइव, लाइव-एटेनुएटेड, इनएक्टिवेटेड, वायरस-जैसी पार्टिकल, mRNA, होल सेल—यह इस पर निर्भर करता है कि बीमारी फैलाने वाले जर्म (पैथोजन) को सबसे असरदार नतीजे के लिए कैसे तैयार किया गया है. 2002 से 2008 के बीच, हमने डेंगू वैक्सीन के कई तरह के रूप बनाने की कोशिश की.”
जब पैनासिया बायोटेक की रिसर्च टीम को अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ के NIAID द्वारा डेंगू वायरस का एक नया कमजोर किया हुआ स्ट्रेन बनाने की खबर मिली, तो उन्होंने तुरंत इसमें दिलचस्पी दिखाई. पैनासिया बायोटेक उन शुरुआती कंपनियों में से एक थी जिन्होंने इस स्ट्रेन के लिए बोली लगाई और दुनिया में इसे पाने वाली दूसरी कंपनी बनी. वायरस स्ट्रेन किसी भी वैक्सीन की बुनियाद होता है, जिसे आगे विकसित और तैयार करके इंसानों को दिया जाता है.
खालिद ने बताया, “एनआईएच का वैक्सीन स्ट्रेन नया था, लेकिन उसमें कुछ कमियां थीं. इसे -60 से -70 डिग्री तापमान पर रखना पड़ता था, जो भारत जैसे देश में संभव नहीं है. हमारा काम था इस स्ट्रेन को एक काम की वैक्सीन में बदलना, यह सुनिश्चित करते हुए कि इसके हिस्से वही रहें और यह इंसानी शरीर पर कोई बुरा असर न डाले.”
कई लैब टेस्ट, जानवरों पर परीक्षण और 17 साल तक चले इंसानों पर ट्रायल के बाद, पैनासिया बायोटेक के वैज्ञानिकों ने DengiAll को आम लोगों के लिए तैयार किया. अब इसे दूसरी वैक्सीन की तरह सामान्य 2-8 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखा जा सकता है, और कंपनी ने इसे बड़े पैमाने पर बनाने का फॉर्मूला भी विकसित कर पेटेंट कराया है. इसके शुरुआती फेज-1 और फेज-2 ट्रायल में चारों तरह के डेंगू के खिलाफ 77-82 प्रतिशत तक सुरक्षा दिखी.
फेज-III के लिए, उन्होंने सरकार के समर्थन और भरोसे के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च से संपर्क करने का फैसला किया.
खालिद ने कहा, “डेंगू वैक्सीन जैसी राष्ट्रीय महत्व की चीज़ के लिए आईसीएमआर के पास ज़रूरी ताकत और नेटवर्क है. हम चाहते थे कि वे हमारे प्रोडक्ट की जांच करें और हम पर भरोसा करें. और हमें पूरा भरोसा था कि हमारी वैक्सीन उनके मानकों पर खरी उतरेगी.”
फेज-III क्लिनिकल ट्रायल आम तौर पर छह महीने से लेकर तीन साल तक चल सकते हैं, लेकिन पैनासिया बायोटेक ने DengiAll के मामले में ज्यादा सावधानी बरतने का फैसला किया. हर प्रतिभागी को वैक्सीन देने के बाद दो साल तक फॉलो किया जाएगा, ताकि देखा जा सके कि वैक्सीन कितनी असरदार है.
पैनासिया को यह जानने के लिए 2027 तक इंतज़ार भी नहीं करना पड़ सकता कि उसका प्रोडक्ट सफल है या नहीं. ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) के नियमों के अनुसार, जब ट्रायल में डेंगू के 124 पक्के मामले सामने आ जाते हैं, तो पैनासिया बायोटेक एक अंतरिम विश्लेषण कर सकती है, ताकि वैक्सीन की प्रभावशीलता जांचकर क्लिनिकल मंजूरी मांगी जा सके.
हालांकि, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी के डॉ. निमेश गुप्ता जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि यह साबित करने में ज्यादा समय लग सकता है कि DengiAll चारों सेरोटाइप के खिलाफ बराबर असरदार है.
असल ज़िंदगी में यह सही तरीके से जांचने के लिए कि DengiAll वैक्सीन चारों सेरोटाइप से बचाव करती है, ट्रायल में शामिल लोगों का चारों सेरोटाइप से सामना होना ज़रूरी है, लेकिन यह प्राकृतिक डेंगू फैलने, किसी इलाके और पूरे देश में मौजूद सेरोटाइप की संख्या पर निर्भर करेगा.
उन्होंने दिप्रिंट से फोन पर बातचीत में कहा, “कोई भी यह अंदाज़ा नहीं लगा सकता कि डेंगू का कौन सा सेरोटाइप कब और कहां प्राकृतिक रूप से फैलेगा. यह दो-तीन साल में होना मुश्किल है, क्योंकि यह पूरी तरह प्रकृति, मौसम और बीमारी के फैलाव पर निर्भर करता है.”
DengiAll के फेज-I और फेज-II ट्रायल के अच्छे नतीजों को मानते हुए भी, गुप्ता ने चेतावनी दी कि फेज-III ही प्रभावशीलता और इम्यूनिटी दोनों की असली इम्तिहान की घड़ी होगी. चारों सेरोटाइप के डेंगू के फैलने का इंतजार करना और उन सब पर जांच करना समय और धैर्य मांगेगा.
डेंगू का वैश्विक असर
अक्टूबर 2025 में जारी 9वीं लैंसेट काउंटडाउन रिपोर्ट ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज में डेंगू को उन बीमारियों में शामिल किया गया है, जिनका फैलाव जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ा है. दुनिया भर के मौसम में बदलाव के कारण एडीज मच्छरों का इलाका बढ़ गया है और डेंगू अब ग्लोबल नॉर्थ में भी तेज़ी से समस्या बनता जा रहा है. साल 2024 में दुनिया भर में डेंगू के 1.4 करोड़ मामले सामने आए. यह संख्या आगे और बढ़ने वाली है.
पैनासिया बायोटेक जानती है कि उसकी वैक्सीन डेंगू से निपटने की दुनिया की क्षमता को पूरी तरह बदल सकती है. पहले की डेंगू वैक्सीन के अनुभव को देखते हुए, इसे जल्दी और सही तरीके से बनाने का दबाव साफ है.
मोहंती ने कहा, “हमने इस वैक्सीन को बनाने में अपने कई साल लगाए हैं. अब ट्रायल में जो भी हो और मंजूरी मिलने में जितना भी वक्त लगे, हमें पता है कि यह हमारे हाथ में नहीं है.”
ट्रायल के अपने तय रास्ते पर चलने के दौरान भी, पैनासिया की टीम पूरी तरह तैयार है कि जैसे ही डेंगू के पर्याप्त मामले सामने आएं और अंतरिम विश्लेषण शुरू हो सके, वे तुरंत आगे बढ़ें.
खालिद ने कहा, “हमें पता है कि चीजों में वक्त लगता है, लेकिन हमें यह भी पता है कि इस वैक्सीन को लोगों तक पहुंचाने में हम एक भी सेकंड बर्बाद नहीं करेंगे. हर साल 10,000 से ज्यादा लोग डेंगू से मरते हैं और हर दिन की देरी उनके जीवन से उन्हें दूर करने जैसा है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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