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Monday, 2 February, 2026
होमफीचरवेस्टर्न की फैंटेसी से बाहर निकले भारतीय वीडियो गेम्स, पौराणिक कथाओं के साथ AAA लीग में एंट्री

वेस्टर्न की फैंटेसी से बाहर निकले भारतीय वीडियो गेम्स, पौराणिक कथाओं के साथ AAA लीग में एंट्री

भारतीय डेवलपर्स EA और Tencent जैसे बड़े स्टूडियो की नौकरियां छोड़ रहे हैं और EY में कंसल्टिंग जैसी भूमिकाएं भी, ताकि इंडिपेंडेंट गेमिंग क्रांति का हिस्सा बन सकें.

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नई दिल्ली: ब्राउन स्किन वाला एक हीरो, हाथ में भाला लिए हुए, जिसकी पीठ पर त्रिशूल का टैटू बना है, एक राक्षस पर हमला कर रहा है. उस राक्षस के हाथ और आंखें आग की तरह जल रही हैं. यह लड़ाई एक पुराने मंदिर के बीच होती है, जहां दीवारों पर भगवान गणेश और भगवान शिव की मूर्तियां लगी हैं.

भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथाएं अब एक ऐसे ज़रिये से पूरी दुनिया तक पहुंच रही हैं, जिस पर अब तक ज़्यादा ध्यान नहीं गया था—वीडियो गेम्स. अमीश त्रिपाठी के मशहूर उपन्यासों और पौराणिक फिल्मों के बाद, भारतीय संस्कृति से जुड़ा यह नया कदम काफी समय से आने वाला था.

‘द एज ऑफ भारत’ का ट्रेलर, जिसमें अमिताभ बच्चन ने अपनी आवाज़ दी है, आम हार्डकोर गेम्स से बिल्कुल अलग है. आमतौर पर गेम्स में बंदूकें, तेज़ गाड़ियां और वेस्टर्न फैंटेसी या साइ-फाइ दुनिया दिखाई जाती है, लेकिन यह गेम उनसे हटकर है. गेम की रिलीज़ डेट्स अभी दूर हैं, लेकिन इसने लोगों में गर्व और उम्मीद दोनों जगाई हैं.

टारा गेमिंग के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर निकोलस ग्रैनाटिनो ने कहा, “भारतीय संस्कृति से जुड़ी कहानियां बहुत कीमती हैं, लेकिन अब तक इन्हें AAA स्तर पर नहीं दिखाया गया. हमारी विरासत वाली संस्कृतियों को न तो गेमिंग में और न ही हॉलीवुड में सबसे ऊंचे स्तर पर पेश किया गया है.”

अब तक दुनिया के सबसे ज़्यादा कमाई करने वाले ‘AAA’ गेम्स—यानी बड़े बजट और शानदार क्वालिटी वाले पीसी और कंसोल गेम्स—ज़्यादातर पश्चिमी देशों और पूर्वी एशिया के स्टूडियो ने बनाए हैं.

‘गॉड ऑफ वॉर’ ग्रीक और नॉर्स कथाओं पर आधारित है, ‘रेड डेड रिडेम्प्शन’ 1900 के दशक के अमेरिका की कहानी दिखाता है, ‘घोस्ट ऑफ त्सुशिमा’ समुराई बनने का एक्सपीरियंस देता है और ‘ब्लैक मिथ: वुकोंग’ चाइनीज़ स्टोरी ‘जर्नी टू द वेस्ट’ पर बेस्ड है.

लेकिन अब तक भारतीय पौराणिक कथाओं या संस्कृति पर आधारित कोई भी ऐसा गेम नहीं बना, जो दुनिया भर में हिट हो. कई सालों तक बड़े विदेशी स्टूडियो अपने गेम्स का कुछ काम भारत से करवाते रहे—जैसे गेम की दुनिया बनाना या किरदारों की लड़ाई के मूव्स तैयार करना, लेकिन गेम की कहानी और सोच वेस्टर्न ही रही.

अब हालात बदल रहे हैं. भारतीय डेवलपर्स सिर्फ मोबाइल गेम्स जैसे लूडो किंग, रियल क्रिकेट और तीन पत्ती तक सीमित नहीं रहना चाहते, जो आम लोगों के लिए बनाए जाते हैं. वे इलेक्ट्रॉनिक आर्ट्स और टेनसेंट जैसे बड़े स्टूडियो की नौकरी छोड़ रहे हैं और EY जैसी कंपनियों में कंसल्टिंग के काम से भी बाहर आकर इंडिपेंडेंट गेमिंग का हिस्सा बन रहे हैं.

ये देसी स्टूडियो अब बड़े बजट और बड़े सपनों वाले गेम बना रहे हैं, जिनकी कहानियां भारत के इतिहास और संस्कृति से जुड़ी हैं और जो अलग तरह की गेम दुनिया तैयार कर रहे हैं.

‘असुरा’ ने 2017 में नैसकॉम गेम डेवलपर कॉन्फ्रेंस में गेम ऑफ द ईयर का अवॉर्ड जीता था | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
‘असुरा’ ने 2017 में नैसकॉम गेम डेवलपर कॉन्फ्रेंस में गेम ऑफ द ईयर का अवॉर्ड जीता था | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

‘राजी: एन एंशिएंट एपिक’ जैसे शुरुआती गेम्स की सफलता के बाद, इन्वेस्टर्स और डेवलपर्स अब इस इंडस्ट्री में जोखिम लेने को तैयार हैं. 2024 में वीडियो गेम इंडस्ट्री ने दुनिया भर में करीब 224 अरब डॉलर कमाए, जो फिल्मों और संगीत से भी ज़्यादा है.

ओगर हेड स्टूडियो का आने वाला गेम ‘योद्धा’ एक ऐसा गेम है जिसमें कार्ड्स बनाकर खेला जाता है. मुंबई की त्रेता स्टूडियोज का ‘कर्स ऑफ द मास्क: काल योद्धा’ एक एक्शन-एडवेंचर गेम है, जिसमें खिलाड़ी एक तीरंदाज की भूमिका निभाता है. पुणे का नोडिंग हेड्स गेम्स अब ‘राजी: कलियुग’ ला रहा है. वहीं, विसाई गेम्स ने 2023 में ‘वेंबा’ नाम का गेम रिलीज़ किया, जो दक्षिण भारतीय खाने से प्रेरित है.

ग्रैनाटिनो ने कहा, “द गेम अवॉर्ड्स दर्शकों के मामले में ऑस्कर से छह गुना बड़े हैं.” 2025 में गेम अवॉर्ड्स को 171 मिलियन लोगों ने लाइव देखा, जबकि ऑस्कर को 19.7 मिलियन दर्शक मिले.”

उन्होंने कहा, “लोग गेमिंग को अक्सर छोटा समझते हैं, लेकिन यह बहुत बड़ी इंडस्ट्री है.”

गिमिक से आगे बढ़ना

किसी गेम को भारतीय संस्कृति से जुड़ा बताने के लिए सिर्फ ऊपर-ऊपर बदलाव करना काफी नहीं है. सिर्फ मंदिरों की बनावट जोड़ देना या मुख्य किरदार को साड़ी पहना देना समझदार गेमर्स को बेवकूफ नहीं बना सकता, जो पीसी या Sony के PlayStation और Microsoft के XBOX जैसे कंसोल पर आलोचकों द्वारा सराहे गए गेम्स खेलते हुए बड़े हुए हैं.

द एज ऑफ भारत के ट्रेलर पर एक यूज़र ने टिप्पणी की, “थीम है. कहानी है. विज़ुअल्स हैं. वॉयस एक्टिंग है. अब बस गेमप्ले बचा है. मुझे उम्मीद है डेवलपर्स गेमप्ले भी अच्छा देंगे और इसे सिर्फ ‘वुकोंग लेकिन भारत में’ जैसा गेम नहीं बनाएंगे.”

यह वही बड़ी शिकायत है, जो हैदराबाद स्थित ओगर हेड स्टूडियो के फाउंडर ज़ैन फहद को भारत-थीम वाले नए गेम्स की इस लहर से है.

उन्होंने कहा, “इनमें सुपरहीरो बस हमारे किसी भगवान से बदल दिया जाता है, बाकी कुछ नहीं बदलता. बस छाती पीटने के लिए इसे भारतीय पौराणिक कथा कह दिया जाता है.”

फहद ने 2014 में ओगर हेड की शुरुआत की थी, उस समय जब ‘मेक इन इंडिया’ पहलें सुर्खियों में नहीं थीं. केरल में मुस्लिम के तौर पर बड़े होते हुए, वह भारतीय संस्कृति पर आधारित गेम बनाना चाहते थे और उन्होंने इसे धर्म से अलग रखना ज़रूरी समझा.

स्टूडियो का पहला गेम असुरा 2017 में रिलीज़ होने पर दुनिया भर में उपलब्ध होने वाले शुरुआती भारतीय पीसी गेम्स में से एक था और फहद नहीं चाहते थे कि यह बस डायब्लो की नकल हो, जो एक बेहद लोकप्रिय, तेज़-तर्रार एक्शन गेम है.

अमेरिका में एक इंडी गेम्स प्रदर्शनी में एक खिलाड़ी असुरा खेलते हुए | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
अमेरिका में एक इंडी गेम्स प्रदर्शनी में एक खिलाड़ी असुरा खेलते हुए | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

गेम में सांस्कृतिक तत्वों में पारंपरिक स्किल ट्री की जगह जन्म कुंडली शामिल है, जिसमें खिलाड़ी पॉइंट्स खर्च कर अपने किरदार की क्षमताएं और फायदे अनलॉक कर सकते हैं.

फहद ने कहा, “हमारे गेम में, मरने के बाद आप फिर से ज़िंदा हो जाते हैं और हर बार ऐसा होने पर जन्म कुंडली बदल जाती है.”

अनलॉक होने वाली क्षमताओं में शामिल हैं—हत्यारा (“आप इतनी ज़ोरदार चोट करते हैं कि दुश्मन तुरंत नष्ट हो जाता है”), अग्नि कवच (“एक सुरक्षा ढाल बनाता है”) और विद्युत (“बिजली की एक चिंगारी बुलाता है”).

पुनर्जन्म की थीम के अलावा, कहानी भी पूरी तरह भारतीय है. एक सम्राट कुरुक्षेत्र से अपने राज्य पर शासन करता है, तभी एक योगी उसे आने वाले विनाश की चेतावनी देता है. राजा बलि के लिए एक इंसान की तलाश में सैनिकों को भेजता है.

गेम के ट्रेलर में नैरेटर कहता है, “किसी निर्दोष को मारना कानून के खिलाफ था! इसी वजह से सैनिकों को सख्त आदेश दिए गए कि वे निचली जाति के गांवों को लूटें.”

जिस बच्चे की बलि दी जाती है, वही आगे चलकर असुरा (दानव) के रूप में पुनर्जन्म लेता है—यही वह किरदार है जिसे खिलाड़ी कंट्रोल करता है.

फहद ने कहा, “यह गेम ‘अछूत’ की स्थिति को छूता है, जो हमारे आसपास मौजूद जातिवाद से प्रेरित है और इस तरह एक अनोखी दुनिया बनाता है”

उन्होंने कहा कि उनके गेम में ‘लूट’ सिस्टम में भी एक मोड़ है—यानी किरदारों को मारने या इलाक़े खोजने पर मिलने वाले इनाम.

असुरा में, खिलाड़ी या तो दुश्मन की आत्मा को कर उसे नर्क भेज सकता है, या उसके शरीर को चीरकर लूट इकट्ठा कर सकता है. ये छोटे, लेकिन सोच-समझकर बनाए गए मैकेनिक्स दिखाते हैं कि फहद और उनकी टीम का मकसद सिर्फ परिचित गेमप्ले पर भारतीय रंग चढ़ाना नहीं था, बल्कि उसे नए सिरे से सोचना और ढालना था.

फहद ने कहा, “ज़्यादातर सांस्कृतिक रूप से जुड़े गेम्स में, अगर गेमप्ले मैकेनिक्स के साथ ठीक से मेल नहीं खाता, तो आपको लगता है कि आपके साथ धोखा हुआ है. गेम वही ईमानदारी से दिखाना चाहिए, जो स्टूडियो देना चाहता है. वरना वह सिर्फ एक गिमिक लगता है.”

गेम बनाने की लागत

द एज ऑफ भारत एक बड़ा और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है—चाहे वह गेम की दुनिया का आकार हो, डेवलपमेंट टीम की संख्या हो या फिर आर्थिक निवेश. इसे लेकर काफी उत्साह है, खासकर इसलिए क्योंकि शिवा ट्रिलॉजी और राम चंद्र सीरीज़ के लेखक अमीश त्रिपाठी इसकी कहानी के मुख्य लेखक हैं.

ग्रैनाटिनो ने रामायण और महाभारत का ज़िक्र करते हुए कहा, “इतिहास असल में सभी महाकाव्यों की जननी हैं.” उन्होंने कहा कि इन कहानियों को अब तक गेमिंग में AAA स्तर पर नहीं दिखाया गया है.

“गॉड ऑफ वॉर ग्रीक और नॉर्स पौराणिक कथाओं पर आधारित है, लेकिन ये इतिहास जीवित परंपराएं हैं.”

ग्रैनाटिनो ने आगे समझाया कि ये ‘जीवित परंपराएं’ आज भी प्रासंगिक हैं, समय की कसौटी पर खरी उतरती हैं और लोग आज भी इनसे जुड़े हुए हैं. इसलिए टीम के लिए इन्हें बहुत सावधानी से दिखाना ज़रूरी था, न कि उन ‘मरी हुई पौराणिक कथाओं’ की तरह, जहां क्रिएटिव डायरेक्टर्स को कहानी में ज़्यादा आज़ादी मिलती है.

द एज ऑफ भारत का मुख्य किरदार भाला थामे हुए है और उसकी पीठ पर त्रिशूल का टैटू बना है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
द एज ऑफ भारत का मुख्य किरदार भाला थामे हुए है और उसकी पीठ पर त्रिशूल का टैटू बना है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

ग्रैनाटिनो ने कहा, “अमीश (त्रिपाठी) ने इन जीवित परंपराओं को बिना किसी विरोध के और बहुत सफल तरीके से काल्पनिक रूप दिया है.” उन्होंने ज़ोर देकर बताया कि भारतीय जड़ों के बावजूद यह गेम ग्लोबल दर्शकों के लिए बनाया जा रहा है. “भारत अभी भी मोबाइल मार्केट है, लेकिन अगर आप पीसी और कंसोल मार्केट की बढ़त देखें, तो यह सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला सेक्टर है.”

भारत में मोबाइल गेमिंग अब भी सबसे आगे है. स्मार्टफोन सस्ते हैं और करीब 85 प्रतिशत घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन है. गेम्स भी या तो सस्ते होते हैं या मुफ्त और एक्स्ट्रा लाइफ या खास कपड़ों जैसे इन-ऐप खरीद के लिए मामूली पैसे लेते हैं.

इसके मुकाबले, कंसोल की कीमत 550 से 700 डॉलर के बीच होती है और गेम्स की कीमत 50 डॉलर से ऊपर होती है.

यह फर्क ऐसे गेम बनाने में लगने वाले भारी इन्वेस्टमेंट की वजह से है. एक अच्छा कंसोल गेम बनाने के लिए बड़ी टीम चाहिए. स्टूडियो में कर्मचारियों की संख्या कुछ सौ से लेकर एक हज़ार से भी ज़्यादा हो सकती है. आने वाले ग्रैंड थेफ्ट ऑटो 6 की डेवलपमेंट लागत का अनुमान 1 अरब डॉलर से भी ज़्यादा है.

टारा गेमिंग ने इसे समझते हुए अपने विज़न के लिए 20 मिलियन डॉलर जुटाए. इसके सह-संस्थापकों में यूबीसॉफ्ट के पूर्व प्रोड्यूसर नूरुद्दीन अबूद, अमिताभ बच्चन और अमीश त्रिपाठी शामिल हैं. 140 लोगों की अंतरराष्ट्रीय टीम, जिसमें पुणे में काम करने वाले 40 लोग भी हैं, के साथ स्टूडियो ने ऊंचे लक्ष्य तय किए हैं.

लेकिन ग्रैनाटिनो जानते हैं कि ‘AAA’ शब्द का इस्तेमाल अक्सर हल्के में किया जाता है, ताकि रिलीज़ से पहले गेम का प्रचार किया जा सके.

गेमर्स ने ऐसे कई तथाकथित AAA गेम्स देखे हैं, जो रिलीज़ के समय उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे. ग्राफिक्स, लड़ाई और परफॉर्मेंस ट्रेलर में दिखाए गए वादों जैसे नहीं होते. बेथेस्डा का स्टारफील्ड, बायोवेयर का मास इफेक्ट: एंड्रोमेडा और इलेक्ट्रॉनिक आर्ट्स का बैटलफील्ड 2042—ये सभी गेम बहुत चर्चा में थे, लेकिन रिलीज़ के बाद खिलाड़ियों की नाराज़गी झेलनी पड़ी.

ग्रैनाटिनो ने कहा, “सबसे पहले आगे निकलना ज़रूरी है, क्योंकि वही एक मिसाल बनाता है.” उन्होंने बताया कि उनके ट्रेलर में सिर्फ सिनेमैटिक्स ही नहीं, असली गेमप्ले भी दिखाया गया था. “डेमो में हमारे पास दो घंटे का गेमप्ले है. अब अगला कदम अल्फा स्टेज देना है और हम समय पर हैं (2026 के अंत तक उम्मीद है).”

ग्रैनाटिनो भले ही भारत को भारत का पहला AAA एक्सपोर्ट बनाना चाहते हों, लेकिन हर स्टूडियो की अपनी अलग सोच है. हर गेम के लिए भारी बजट और जटिल गेमप्ले ज़रूरी नहीं होता.

लेकिन सभी में एक बात समान है—भारतीय थीम क्योंकि यह डेवलपर्स के अपने एक्सपीरियंस से जुड़ी होती है. जब आप अपनी संस्कृति पर आधारित गेम बना सकते हैं, तो फिर विदेशी देवताओं को बुलाने वाले, बर्गर खाने वाले और सूट पहनने वाले किरदार के साथ गेम क्यों खेलें?

बिग टैलेंट पूल

फहद को लगता है कि भारतीय पौराणिक कथाओं पर आधारित गेम्स का बढ़ना देश में चल रही राष्ट्रवाद की लहर से जुड़ा है. उनके मुताबिक, कुछ टाइटल और स्टूडियो सिर्फ ट्रेंड के पीछे चल रहे हैं, या शायद सरकार से शाबाशी पाना चाहते हैं.

2009 में एक कैरेक्टर आर्टिस्ट के तौर पर करियर शुरू करने के बाद, फहद ने कई ट्रेंड आते-जाते देखे हैं—पहले मोबाइल गेम्स की दौड़, फिर कैज़ुअल गेम्स (जैसे एंग्री बर्ड्स या कैंडी क्रश), और अब नया सपना: एक AAA, भारतीय संस्कृति पर आधारित गेम.

ओगर हेड स्टूडियो के आने वाले गेम योद्धा में दिखने वाले यमराज की पत्थर की मूर्ति के गेम मॉडल पर काम करता एक डेवलपर | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
ओगर हेड स्टूडियो के आने वाले गेम योद्धा में दिखने वाले यमराज की पत्थर की मूर्ति के गेम मॉडल पर काम करता एक डेवलपर | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

लेकिन आज के डेवलपर्स और स्टूडियो के पास दो बेहद अहम चीज़ें हैं, जो पहले आसानी से उपलब्ध नहीं थीं—तकनीक और टैलेंट. कुछ लोग तो कंसल्टिंग फर्मों की आरामदायक नौकरियां छोड़कर गेमिंग इंडस्ट्री में आ रहे हैं.

34-वर्षीय मेघा गुप्ता, जिन्होंने 2015 में EY की नौकरी छोड़ दी थी, बिना किसी औपचारिक गेम डेवलपमेंट एजुकेशन के, बताती हैं, “जब मैंने शुरुआत की थी, तब मुझे गेम आर्टिस्ट और गेम डिज़ाइनर में फर्क भी नहीं पता था.”

2017 से 2020 के बीच, गुप्ता ने कॉन्ट्रैक्ट पर काम किया—ज़्यादातर दूसरे गेम्स के लिए आर्ट प्रोजेक्ट्स. करियर बदलने से इनकम में आई कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने श्रीलंकन एयरलाइंस जैसी कंपनियों के लिए सोशल मीडिया भी संभाला.

गेम डेवलपर्स के साथ जुड़ने के बाद, उनकी कंपनी वाला इंटरएक्टिव ने पहले हाइपर-कैज़ुअल गेम्स बनाए, फिर अपने असली जुनून पर काम शुरू किया—को-ऑप (साथ मिलकर खेले जाने वाले), पज़ल गेम्स, जिन्हें दोस्त सोफे पर बैठकर साथ खेल सकें.

तकनीक भी अब आगे बढ़ चुकी है, जिससे नए लोगों को गेम ‘इंजन’—यानी गेम बनाने की प्रक्रिया को आसान करने वाला सॉफ्टवेयर—तक पहुंच मिल रही है.

फहद ने कहा, “2009 में अपना गेम बनाना नामुमकिन था. आपको खुद का इंजन बनाना पड़ता था और तकनीकी रूप से बहुत मज़बूत होना पड़ता था, लेकिन जब अनरियल और यूनिटी जैसे गेम इंजन मुफ़्त हुए, तो सब कुछ आसान हो गया.”

उन्होंने बताया कि 2014 में अपना स्टूडियो शुरू करने का फ़ैसला भी उन्होंने इसी बदलाव के आसपास लिया था.

सही वक्त

पीसी या कंसोल के लिए एक वैश्विक हिट गेम बनाना सिर्फ गेम इंजन पर निर्भर नहीं करता. रॉकस्टार (जीटीए), बेथेस्डा (Fallout) और फ्रॉमसॉफ्टवेयर (Elden Ring) जैसे सफल स्टूडियो के पास कई AAA गेम्स का एक्सपीरियंस है.

यानी यहां ‘मुर्गी और अंडा’ जैसी स्थिति बन जाती है. एक सफल AAA गेम बनाने के लिए स्टूडियो के पास पहले से कम से कम एक AAA गेम पब्लिश करने का एक्सपीरियंस होना चाहिए. इसके लिए अनुभवी डेवलपर्स की बड़ी टीम, मज़बूत मार्केटिंग बजट, अच्छी कहानी और दमदार गेमप्ले मैकेनिक्स चाहिए.

फहद ने कहा, “भारत अभी भी अपने प्रोडक्ट्स से ज़्यादा अपनी सर्विसेज़ के लिए जाना जाता है.”

उन्होंने बताया कि मुख्य समस्या दो तरह की है. कई भारतीय डेवलपर्स खुद गेम खेलना पसंद नहीं करते और विदेशी, थर्ड-पार्टी स्टूडियो के लिए डेवलपमेंट का काम करने के आदी हैं.

लेकिन टारा गेमिंग के स्टूडियो हेड सिद्धार्थ सिंह आशावादी हैं. इलेक्ट्रॉनिक आर्ट्स और टेनसेंट गेम्स जैसी कंपनियों में काम करने सहित, दस साल से ज़्यादा के एक्सपीरियंस के साथ उन्होंने देश में टैलेंट का रुख बदलते देखा है और उससे भी ज़्यादा अहम—लोगों की पसंद.

सिंह ने कहा, “हमारे पास ऐसे लोग हैं जिन्होंने यूके में AAA टाइटल्स पर काम किया है, भारतीय मूल के लोग, जो अब लौटकर हमारे साथ काम कर रहे हैं.”

ग्रैनाटिनो ने तुरंत उन स्टूडियो का उदाहरण दिया, जिन्होंने बिना पहले AAA एक्सपीरियंस के भी सफलता पाई. साउथ कोरिया के Shift Up का स्टेलर ब्लेड और चीन के Game Science का ब्लैक मिथ: वुकोंग—दोनों ही वैश्विक हिट बने, जबकि इन स्टूडियो की कोई स्थापित AAA पहचान नहीं थी.

ग्रैनाटिनो ने कहा, “जो पहले आता है, उसे बड़ा फायदा मिलता है. दुनिया की बड़ी कंपनियां, जैसे सोनी, आगे आईं और प्रोडक्शन प्रक्रिया संभालने में मदद की (स्टेलर ब्लेड को Sony Interactive Entertainment ने पब्लिश किया).”

उन्होंने टारा गेमिंग के सह-संस्थापक नूरुद्दीन अबूद के Ubisoft में AAA अनुभव का भी ज़िक्र किया. अबूद ने फ्रेंच गेमिंग कंपनी के लिए घोस्ट रिकॉन वाइल्डलैंड्स और घोस्ट रिकॉन ब्रेकपॉइंट बनाए थे.

पिछले पांच सालों में, महामारी के बाद वेंचर कैपिटल तक आसान पहुंच के चलते, दर्जनों नए स्टूडियो खुले हैं और इनमें से कई भारतीय संस्कृति या पौराणिक कथाओं पर आधारित गेम भी नहीं बना रहे हैं. बेंगलुरु स्थित, पूरी तरह बूटस्ट्रैप्ड वाला इंटरएक्टिव ने फिज़िक्स-आधारित भूत पकड़ने वाला गेम स्पूक-ए-बू बनाया है.

वाला इंटरएक्टिव का स्पूक-ए-बू, जो मेघा गुप्ता के को-ऑप और पज़ल गेम्स के प्यार से बना है, जिन्हें दोस्त सोफे पर बैठकर साथ खेल सकते हैं | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
वाला इंटरएक्टिव का स्पूक-ए-बू, जो मेघा गुप्ता के को-ऑप और पज़ल गेम्स के प्यार से बना है, जिन्हें दोस्त सोफे पर बैठकर साथ खेल सकते हैं | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

फिर भी, कई स्टूडियो भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथाओं पर दांव लगा रहे हैं. ये गेम्स दुनिया भर के खिलाड़ियों को पसंद आएंगे या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि शानदार ट्रेलर और वादों को कितना मज़ेदार गेमिंग अनुभव बनाया जा पाता है.

फहद ने कहा, “आज बहुत कम एक्सपीरियंस के साथ भी एक अच्छा दिखने वाला ट्रेलर और ठीक-ठाक डेमो बनाना आसान है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप पूरा गेमिंग अनुभव बना सकते हैं. मैं भरोसे से कह सकता हूं कि 99 प्रतिशत गेम्स कभी रिलीज़ ही नहीं हो पाएंगे.”

टारा गेमिंग जैसे वैश्विक महत्वाकांक्षा रखने वाले स्टूडियो के लिए, भारत के लिए आगे आने का समय इससे बेहतर नहीं हो सकता. भारत प्रोजेक्ट की अगुवाई कर रहे सिद्धार्थ सिंह इसे एक साझा संकल्प मानते हैं.

सिंह ने कहा, “अब तक जो चीज़ गायब थी, वह था सामूहिक इरादा. सब कुछ एक साथ लाकर, एक मज़बूत यूनिट बनाना—जो भारत में शुरू से एक AAA गेम बना सके.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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