नई दिल्ली: रिद्धान जैन इस वक्त अपने छठे उपन्यास के लिए नए आइडिया सोच रहे हैं. इसके लिए वे भारतीय पौराणिक कथाओं पर रिसर्च कर रहे हैं. इसी दौरान उनके दिमाग में एक सवाल आया—अगर रावण मरा ही न हो और अंधकार के युग कलयुग में लौटने की योजना बना रहा हो, तो क्या होगा?
रिद्धान ने उत्साह भरे अंदाज़ में कहा, “अगर उसकी मौत एक चाल थी और अब वह और ताकतवर होकर दोबारा ज़िंदा हो रहा है. मैं इसे तीन किताबों की सीरीज़ बनाने के बारे में सोच रहा हूं.”
सुधा मूर्ति की किताब Unusual Tales from Indian Mythology ने रिद्धान को प्रभावित किया है, लेकिन वह अपनी कहानी अलग तरीके से लिखना चाहते हैं. आखिरकार, वह सिर्फ 12 साल के हैं.
रिद्धान ऐसे कई बच्चों में से एक हैं, जो अब लेखक बन रहे हैं. ये बच्चे छोटी कहानियां, कविताएं, फैंटेसी और फिक्शन लिख रहे हैं. ये किताबें सिर्फ याद के लिए नहीं लिखी जा रहीं या अलमारी में रखने के लिए नहीं हैं. नोटियन प्रेस जैसे सेल्फ-पब्लिशिंग प्लेटफॉर्म की मदद से इनमें से कई किताबें देशभर के बच्चों तक पहुंच रही हैं.
इस ट्रेंड ने माता-पिता का भी ध्यान खींचा है. कई माता-पिता मानते हैं कि किताब छपवाने से उनके बच्चे कॉलेज एडमिशन की बढ़ती प्रतिस्पर्धा में दूसरों से अलग दिखेंगे.
अब किताब छपवाना सीवी में एक चमकदार लाइन बन गया है—जैसे कराटे में ब्लैक बेल्ट हासिल करना या मोबाइल ऐप बनाना. इसके इर्द-गिर्द अब एक छोटा-सा कारोबार भी खड़ा हो गया है.

इस साल चेन्नई बुक फेस्टिवल में पहली बार बच्चों के लेखकों के लिए अलग से एक स्टॉल लगाया गया. लगभग 1,200 रुपये देकर माता-पिता अपने बच्चों को ग्लोबल चाइल्ड प्रोडिजी अवॉर्ड्स जैसे पुरस्कारों में शामिल करा सकते हैं. छोटे प्रकाशक नए लेखकों के लिए खास कार्यक्रम और लेखन प्रतियोगिताएं चलाते हैं.
ब्राइबुक्स जैसे प्लेटफॉर्म बच्चों को किताब लिखने में मदद के लिए टेम्पलेट और एक “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंट हेल्पर” देते हैं. किताब छपने के बाद इन उपलब्धियों को फेसबुक और इंस्टाग्राम पर शेयर किया जाता है. इस साल ब्राइबुक्स ने नेशनल यंग ऑथर्स फेयर भी आयोजित किया.
स्कूल भी इसमें शामिल हैं. वे अपने नन्हे लेखकों की तस्वीरें पोस्ट करते हैं—कभी एक बच्चे की, तो कभी पूरी क्लास की और इन सेल्फ-पब्लिश्ड किताबों को अपनी लाइब्रेरी में भी रखते हैं.
पेंगुइन रैंडम हाउस जैसे बड़े पब्लिशिंग हाउस के इनबॉक्स भी उत्साही माता-पिता के मैसेज से भरे रहते हैं. इनमें से कई बच्चे अभी लेखक बनने के लिए तैयार नहीं होते, लेकिन यहां लिखने से ज़्यादा अहम किताब का छपना बन गया है.
पेंगुइन रैंडम हाउस में चिल्ड्रन्स मार्केटिंग की असिस्टेंट मैनेजर काव्या वाही ने कहा, “पिछले तीन सालों में हमने देखा है कि कई महत्वाकांक्षी माता-पिता अपने बच्चों को अपनी रचनाएं छपवाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. कई बार ऐसा तब भी होता है, जब बच्चों को अपनी लेखन कला निखारने या अपनी असली आवाज़ खोजने का मौका तक नहीं मिला होता.”
जब कम उम्र की प्रतिभा पब्लिशिंग से मिलती है
सात साल की उम्र में, जब ज़्यादातर बच्चे मुश्किल से एक ढंग का पैराग्राफ लिख पाते हैं, तब अभिजिता गुप्ता अपनी पांडुलिपि पब्लिशर्स को भेज रही थीं — पूरे दस पब्लिशर्स को. इनमें से नौ ने उन्हें सीधे मना कर दिया.
उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद में अपने घर से अब 12 साल की अभिजिता ने कहा, “जब मैं पांच या छह साल की थी, तब मैंने एक कार्टून देखा था, जिसमें मुख्य किरदार किताब छपवाने जा रहा था.” उसी कार्टून से प्रेरित होकर उसने अपनी मां से पूछा कि क्या वह भी किताब छपवा सकती है.
दसवां पब्लिशर, इनविंसिबल, उसी साल उनसे आमने-सामने मिलने के बाद उन पर दांव लगाने को तैयार हुआ.
उनकी पहली किताब Happiness All Around थी, जो उनके आसपास की दुनिया से प्रेरित छोटी कहानियों और कविताओं का संग्रह था और यह किताब उनके पिता को समर्पित थी.

उनकी मां अनुप्रिया गुप्ता ने याद किया, जब उनकी तेज़ समझ वाली बेटी ने लिखना शुरू किया, “वह कोविड का समय था, इसलिए हम स्क्रीन टाइम कम रखना चाहते थे क्योंकि वह बहुत छोटी थी. वे खुद ही आइडिया लेकर आती थी और बस एक डायरी और पेन मांगती थी.”
महामारी के दौरान घर में बंद रहना अभिजिता की दूसरी किताब We Will Surely Sustain की प्रेरणा भी बना. इस किताब में लॉकडाउन की परेशानियों को एक बच्चे की नज़र से दिखाया गया है — स्कूल न जाना, दोस्तों के साथ न खेल पाना और जन्मदिन की पार्टियां मिस करना.
अनुप्रिया हंसते हुए बोलीं, बेटी की उपलब्धियों पर गर्व साफ झलक रहा था, “हम सोचते थे कि क्या उसे वाक्य बनाना ठीक से आता भी है या नहीं, लेकिन उसने हमें चौंका दिया.”
मेरे लिए यह पैसे कमाने का ज़रिया नहीं है, बल्कि मेरे बच्चे के काम को पहचान देना और उसके शौक को बढ़ावा देना है
— विशाल जैन, रिद्धान के पिता
अभिजिता कहती हैं कि लिखने के मामले में वह पुरानी सोच वाली हैं. वह साफ कहती हैं कि वह अपने माता-पिता से मदद नहीं लेतीं और गूगल या चैटजीपीटी जैसे नए ज़माने के ट्यूटरों से भी दूरी रखती हैं.
उन्होंने थोड़ी नाराज़गी के साथ कहा, “मुझे अपना काम असली रखना पसंद है. मैं अपने लेखन में बाहर की चीज़ें नहीं मिलाना चाहती.” 2022 में अभिजिता ग्लोबल चाइल्ड प्रोडिजी अवॉर्ड्स में सम्मान पाने वालों में अकेली लेखिका थीं.
लेकिन हर बच्चे को पब्लिशर्स के साथ ऐसी किस्मत नहीं मिलती. कई बच्चों के लिए अपनी लिखी चीज़ें लोगों तक पहुंचाने का एकमात्र रास्ता सेल्फ-पब्लिशिंग ही होता है.
लेखन का कारोबार
पुणे में रिद्धान जैन को सिर्फ रिजेक्शन ही नहीं झेलना पड़ा, बल्कि पब्लिशर्स की तरफ से समझ और संवेदनशीलता की कमी भी देखने को मिली.
रिद्धान के पिता विशाल जैन ने कहा, “पूरा सफर मुश्किलों भरा रहा, पब्लिशर्स कभी बच्चे की भावनाओं को समझ ही नहीं पाए. मेरे लिए यह कमाई का ज़रिया नहीं है, बल्कि मेरे बच्चे के काम को मान्यता देना और उसके जुनून को बढ़ावा देना है.”
जब विशाल ने एक सेल्फ-पब्लिशिंग सर्विस के साथ काम शुरू किया, तब भी उन्हें आखिरकार पूरा काम खुद ही संभालना पड़ा — इलस्ट्रेटर और एडिटर ढूंढने तक का.
उन्होंने कहा, “उनके लिए यह बस एक और कमर्शियल प्रोजेक्ट था.”

अब 12 साल के रिद्धान लेखन के बारे में ऐसी समझ के साथ बात करते हैं, जो उनकी उम्र से कहीं ज़्यादा लगती है. कहानी कहने का शौक उन्हें चार साल की उम्र में लगा, जब उनका पसंदीदा काम अपने माता-पिता और दादा-दादी के लिए कहानियां गढ़ना था.
अभिजिता की तरह, रिद्धान को भी महामारी के दौरान लिखने में सुकून मिला. बोरियत ने उन्हें करीब 90 कहानियां लिखने के लिए प्रेरित किया. उनके माता-पिता ने उन्हें उन्हें टाइप करने के लिए कहा.
रिद्धान ने कहा, “टाइप करते वक्त मैंने अपनी कहानियां दोबारा पढ़ीं और उन्हें और दिलचस्प बनाया. मैंने सेटिंग, किरदारों और प्लॉट के साथ खूब प्रयोग किया.”
इसका नतीजा उनकी पहली किताब Once Upon in My Mind के रूप में निकला, जो तब प्रकाशित हुई, जब वे आठ साल के थे.
मुझे लगता है कि मुझसे भी ज़्यादा प्रतिभाशाली कई बच्चे हैं. बस उन्हें मंच नहीं मिल पाया
— रिद्धान जैन, बाल लेखक
इसके थोड़े टाइम के बाद ही दूसरे बच्चे अपनी कहानियां छपवाने में मदद के लिए रिद्धान के पास आने लगे. स्कूलों और साहित्यिक कार्यक्रमों में एक युवा लेखक के रूप में बुलाए जाने पर वे अपने साथियों को पब्लिशिंग की दुनिया समझाने लगे. परिवार ने इसे एक प्लेटफॉर्म में बदलने का फैसला किया.
2022 में उन्होंने RidhzWorld Publishing की शुरुआत की, ताकि दूसरे बच्चों को भी अपनी किताबें छपवाने में मदद मिल सके. यह Once Upon In Our Mind नाम से एक कहानी लेखन प्रतियोगिता भी कराता है, जिसमें 24 देशों से 4,000 से ज़्यादा प्रविष्टियां आई हैं और अब तक 28 युवा लेखकों की किताबें बिना किसी शुल्क के प्रकाशित की गई हैं.
पिछले तीन सालों से यह प्रतियोगिता विजेता लघु कहानियों की एक एंथोलॉजी के साथ खत्म होती है, जो RidhzWorld Publishing के नाम से जारी होती है. इसका सीज़न फोर जल्द शुरू होने वाला है.

जैन परिवार धीरे-धीरे बच्चों के लेखन के इर्द-गिर्द एक पूरा इकोसिस्टम खड़ा कर रहा है, जिसमें मेंटरशिप प्रोग्राम और रिद्धान के साथ B’coz I Can नाम का पॉडकास्ट भी शामिल है.
इस शो में रिद्धान कलाकारों और युवा लेखकों से बातचीत करते हैं, जिनमें गुजरात के वलसाड की 10 साल की कहानीकार भी शामिल हैं, जिनका काम Once Upon In Our Minds — Volume 3 में छपा है.
जब रिद्धान ने उनसे प्रेरणा के बारे में पूछा, तो The Golden Butterfly की लेखिका वीवा मेहता ने कहा, “मैं वही लिखती हूं, जो देखती हूं. अगर मैं किसी लड़की को तितली के पीछे भागते देखती हूं, तो उसी पर लिखती हूं.” बातचीत फिर उनके दूसरे शौक (फैशन डिज़ाइन), दूसरे युवा लेखकों के लिए सलाह और एक रैपिड फायर राउंड तक पहुंच गई.
रिद्धान ने कहा, “मुझे लगता है कि मुझसे भी ज़्यादा प्रतिभाशाली बहुत से बच्चे हैं. बस उन्हें प्लेटफॉर्म नहीं मिल पाया.”
नई करियर सीढ़ी
कुछ माता-पिता के लिए बच्चों को किताब छपवाने के लिए प्रेरित करना सिर्फ सीवी में एक बॉक्स टिक करने जैसा नहीं है, बल्कि बहुत जल्दी एक करियर की दिशा तय करने जैसा है. उनका कहना है कि मेडिकल और इंजीनियरिंग ही अकेले विकल्प नहीं हैं. विशाल जैन कराटे और एलोक्यूशन जैसी एक्स्ट्रा करिकुलर गतिविधियों को ऐसे तरीके मानते हैं, जिनसे बच्चे वे कौशल सीखते हैं, जो कॉलेज या प्रोफेशनल डिग्रियां नहीं सिखा पातीं.
भारत में लेखन में सच्ची रुचि को बढ़ावा देना मुश्किल है. क्रिकेट के उलट, जहां पांच–छह साल के बच्चे के लिए कोचिंग सेंटर, लोकल मैच, राज्य टीम और राष्ट्रीय चयन जैसे साफ रास्ते होते हैं, साहित्य में ऐसी कोई साफ-सुथरी व्यवस्था नहीं है.
विशाल जैन ने कहा, “आखिर सचिन तेंदुलकर ने भी जब पहली बार बल्ला पकड़ा था, उसी दिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट नहीं खेला था.”

अभिजिता और रिद्धान जैसे बच्चे अपनी राह खुद बना रहे हैं, लेकिन इस खाली जगह में नए स्टार्टअप भी आ गए हैं, जिनमें ब्राइबुक्स शामिल है, जिसने 2022 में प्री-सीड फंडिंग में 15 लाख डॉलर जुटाए.
इज़राइली बिज़नेसमैन एमी ड्रोर और एडटेक उद्यमी राहुल रंजन द्वारा सह-स्थापित यह प्लेटफॉर्म बच्चों के लिए AI की मदद से लेखन और ज़रूरत के मुताबिक पब्लिशिंग की सुविधा देता है. नेशनल यंग ऑथर्स फेयर जैसी प्रतियोगिताओं के ज़रिये यह आगे बढ़ने की एक साफ सीढ़ी दिखाता है—किताब लिखना, उसे छापना, और फिर सिंगापुर के एशियन फेस्टिवल ऑफ चिल्ड्रन्स कंटेंट, शारजाह चिल्ड्रन्स रीडिंग फेस्टिवल और ब्रुकलिन बुक फेस्टिवल जैसे अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग लेना. स्कूल भी अपने छात्रों की लेखक के तौर पर उपलब्धियों को सोशल मीडिया पर साझा करते हैं, ताकि अकादमिक ताकत दिखा सकें.
National Young Authors’ Fair (NYAF) 2025–26! 📷📷
📷 Young Authors from St. Xavier’s Public School, Bagnan
📷 Selected entries will receive Certificates, Awards & International Recognition!#YoungAuthors #NYAF2025 #Xavierians #ProudMoment #GlobalRecognition #StudentSuccess pic.twitter.com/FckuMibSlg— St. Xavier's Public School, Bagnan (@xaviersbagnan) November 10, 2025
2024 में, 14 साल की केया हाटकर, जिन्हें स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी है, को इसी प्लेटफॉर्म के ज़रिये छपी किताबों के लिए प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार मिला.
लेकिन जैसे-जैसे पब्लिशिंग आसान और सबकी पहुंच में होती जा रही है, वैसे-वैसे गुणवत्ता और नियंत्रण को लेकर सवाल भी सामने आ रहे हैं.
‘बहुत ज़्यादा FOMO’
सेल्फ-पब्लिशिंग ने 18 साल की प्रिशा अग्रवाल को अपनी आवाज़ खोजने में मदद की, लेकिन वह लेखन में चैटजीपीटी के बढ़ते इस्तेमाल और किताबों के हुनर से ज़्यादा सर्टिफिकेट बनते जाने को लेकर खुलकर बोलती हैं.
मुंबई के एक इंटरनेशनल बैकलॉरिएट (आईबी) स्कूल में पढ़ाई के बाद प्रिशा को कविता और लेखन से लगाव हुआ.
प्रिशा ने कहा, “मैं हमेशा से बहुत पढ़ती आई हूं. और हैरानी की बात यह है कि लेखन, साहित्य का वह हिस्सा था जिससे मैं कभी जुड़ नहीं पाई थी. (आईबी में) हमने रट्टा सीखने के बजाय विषय को गहराई से समझा.”
ChatGPT के साथ, 21 ऐसे प्रॉम्प्ट होते हैं जिन्हें कॉपी-पेस्ट करके आप अपने नाम से एक प्रकाशित किताब हासिल कर सकते हैं
— प्रिशा अग्रवाल, लेखिका
प्रिशा का पहला कविता संग्रह लगभग तीन साल पहले यूं ही बन गया. उन्होंने बुकलीफ पब्लिशिंग के 21-दिन के कविता चैलेंज में हिस्सा लिया था, जो एक सेल्फ-पब्लिशिंग प्लेटफॉर्म है.
उन्होंने कहा, “मैं उन कुछ विजेताओं में से थी, जिन्हें एंथोलॉजी में छपने के लिए चुना गया.” वह शुरुआती काम एक नए लेखक की कोशिश थी, जिसमें वह “इधर-उधर तुकबंदी कर रही थीं”, लेकिन असली सीख उनकी दूसरी एंथोलॉजी Eldest Daughter Sitting on a Pyre के साथ मिली, जहां उन्होंने सिर्फ लेखन ही नहीं, बल्कि किताब की बनावट और कवर डिज़ाइन भी खुद किया.
प्रिशा ने कहा, “मैंने यह (सेल्फ-पब्लिशिंग प्लेटफॉर्म) Notion प्रेस के साथ किया.” उन्होंने कहा कि कविता लिखने वाली एक दोस्त ने किताब को एडिट किया. “इससे मुझे पब्लिशिंग की पूरी प्रक्रिया को कहीं बेहतर तरीके से समझने का मौका मिला, क्योंकि यह सब मुझे खुद ही करना पड़ा.”
लेकिन बच्चों की पब्लिशिंग में एआई के उछाल को लेकर प्रिशा को शक है. उन्होंने कहा कि यह “हैरान करने वाला” है कि 21-दिन के कविता चैलेंज में हिस्सा लेने वाला और जीतने वाला हर व्यक्ति प्रकाशित हो जाता है.
उन्होंने कहा, “और ChatGPT के साथ, 21 प्रॉम्प्ट कॉपी-पेस्ट करके आप अपने नाम से एक प्रकाशित किताब बना सकते हैं.”
प्रिशा का अनुमान है कि जिन युवा लेखकों से वह मिली हैं, उनमें से 99 प्रतिशत ने किताबें किसी कला के मकसद से नहीं, बल्कि सिर्फ ‘वाह-वाह’ के लिए छपवाई हैं.

भारत में सेल्फ-पब्लिशिंग प्लेटफॉर्म की कोई कमी नहीं है—Notion प्रेस, बुकलीफ पब्लिशिंग, प्रतिलिपि, I Am An Author और यहां तक कि अमेज़न भी, Kindle Direct Publishing के ज़रिये, लेकिन प्रिशा का कहना है कि अब वह पहचान सकती हैं कि कौन-से प्लेटफॉर्म सिर्फ दिखावे वाली किताबों के लिए हैं.
कॉलेज एडमिशन कंसल्टिंग फर्म ऑनकोर्स ग्लोबल के सह-संस्थापक अखिल दासवानी के मुताबिक, बच्चों में लेखक बनने की बढ़ती होड़ असल में बेहद प्रतिस्पर्धी एडमिशन सिस्टम का नतीजा है. आज के छात्रों पर बहुत जल्दी किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञ बनने का दबाव है. ऐसे माहौल में प्रकाशित लेखक बनना अब “पूरी पहेली का सिर्फ एक हिस्सा” रह गया है.
उन्होंने कहा, “अगर आप साहित्य में जाना चाहते हैं, तो किताब छपना ज़रूर मदद करता है. लेकिन हर छपी किताब की गुणवत्ता एक जैसी नहीं होती, मुद्दा यह है कि कंटेंट कितना अच्छा है, उसके पीछे आपकी कितनी विश्वसनीयता है और क्या किसी ने आपके बारे में लिखा है.”
कई बार माता-पिता या दूसरे रिश्तेदार सारा मुश्किल काम खुद कर लेते हैं. बच्चे भले न लिखें, लेकिन उन्हें ‘प्रकाशित लेखक’ बना दिया जाता है.
प्रिशा ने कहा, “मेरे एक दोस्त की मां ने उसकी एक पुरानी किताब अपनी बहन के नाम से छपवा दी, जबकि उसने वह किताब लिखी ही नहीं थी.”
दासवानी ने कहा कि यह चलन वैसा ही है, जैसा रिसर्च के क्षेत्र में हो रहा है. जिस तरह साइंस और इकोनॉमिक्स के छात्र अब अकादमिक जर्नल्स में, कई बार संदिग्ध, पेपर छपवाने की होड़ में लगे हैं, उसी तरह दूसरे क्षेत्रों के छात्र भी अपना रिज़्यूमे मजबूत करने के लिए कॉफी-टेबल बुक्स और एंथोलॉजी में नाम जुड़वाने लगे हैं.
दासवानी ने कहा, “इसमें बहुत ज़्यादा FOMO काम कर रहा है. माता-पिता देखते हैं कि पड़ोसी का बच्चा किताब छपवा रहा है, और फिर सोचते हैं कि क्या उन्हें भी अपने बच्चे के लिए ऐसा करना चाहिए.”
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