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Friday, 23 January, 2026
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सेक्टर से सिस्टम तक: नोएडा में क्यों अटके हैं RWA चुनाव?

दिल्ली-एनसीआर की हाउसिंग सोसाइटियों में सालों तक चुनाव नहीं होते, या फिर वही चेहरे बार-बार लौट आते हैं. ‘खुद को चुना हुआ मानने वाले लोग हमारी सेवा करना छोड़ देते हैं और अपनी सेवा करने लगते हैं.’

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नोएडा: दो नवंबर को नोएडा के सेक्टर 43 के निवासी अपने पहले आधिकारिक रेज़िडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) चुनाव की तैयारी कर रहे थे. इससे पहले, साल 2013 से एक सेल्फ इलेक्टेड ग्रुप बिना किसी चुनाव के काम कर रहा था, लेकिन एक भी वोट पड़ने से पहले ही पूरी प्रक्रिया रुक गई. चुनाव में हिस्सा लेने के बजाय, पुराने गुट ने रजिस्ट्रार के दफ्तर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया, जिसकी वजह से अधिकारियों को चुनाव एक बार फिर टालना पड़ा.

40 साल के दीपक शर्मा, जो चुनाव की लगातार मांग कर रहे निवासियों के समूह का हिस्सा हैं, उन्होंने कहा, “आरडब्ल्यूए की अध्यक्षता समाज में सत्ता का एक और रूप है और कुछ लोग उस सत्ता को खोना नहीं चाहते या नए नेतृत्व को आने का मौका नहीं देना चाहते.”

आरडब्ल्यूए आम लोगों और नगर प्रशासन के बीच संपर्क का पहला ज़रिया होती हैं, लेकिन दिल्ली-एनसीआर में शहरी व्यवस्था की यह अहम कड़ी बार-बार नाकाम साबित हो रही है. पूरे इलाके में कई हाउसिंग सोसायटियां ऐसी हैं जहां आपसी झगड़ों, पुराने गुटों, प्रशासन की उदासीनता और कई बार वॉलटिंयर्स की कमी के कारण सालों तक चुनाव नहीं हो पाते. कुछ आरडब्ल्यूए तो छोटे-छोटे जागीर जैसे बन जाते हैं, जहां कुछ लोग ही सब कुछ नियंत्रित करते हैं.

नोएडा में चुनाव में देरी और नेतृत्व की कमी का असर दिल्ली की तुलना में और भी ज़्यादा गंभीर होता है, क्योंकि यहां राजधानी जैसे कई नागरिक सहायता तंत्र मौजूद नहीं हैं. दिल्ली में जहां सफाई के लिए नगर निगम और नागरिक रखरखाव के लिए पीडब्ल्यूडी जैसी अलग-अलग संस्थाएं हैं, वहीं नोएडा के निवासी लगभग पूरी तरह एक ही संस्था—नोएडा अथॉरिटी—पर निर्भर रहते हैं. इस तरह की केंद्रीकृत व्यवस्था में आरडब्ल्यूए या एओए (अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन) नागरिकों और प्रशासन के बीच एक बेहद ज़रूरी ब्रिज बन जाती है, जो सुरक्षा से लेकर कचरा उठाने और स्ट्रीट लाइट जैसी बुनियादी सुविधाओं तक के मुद्दों को जोड़ती है.

सेक्टर 43 की निवासी चांदनी माथुर ने कहा, “हमारी प्रॉब्लम और शिकायतें नोएडा अथॉरिटी की लंबित फाइलों के ढेर में दबकर रह जाती हैं. उनके पास संभालने के लिए सैकड़ों सेक्टर हैं, इसलिए जब तक हमारे अपने सोसायटी के प्रेसिडेंट अंदरूनी स्तर पर काम नहीं करेंगे, तब तक किसी भी समस्या का समाधान नहीं होगा.”

सेक्टर 43 में करोड़ों रुपये की संपत्तियां हैं, जिनमें स्वतंत्र मकान, अपार्टमेंट इमारतें और गोडरेज जैसी कंपनियों की परियोजनाएं शामिल हैं.

RWA अक्सर निवासियों और सिविक एजेंसियों के बीच पहले पुल का काम करते हैं | एक्स/@rwasector61
RWA अक्सर निवासियों और सिविक एजेंसियों के बीच पहले पुल का काम करते हैं | एक्स/@rwasector61

यहां तक कि उन सोसायटियों में भी जहां तकनीकी रूप से चुनाव होते हैं, नेतृत्व अक्सर कुछ ही लोगों के दायरे में सिमटा रहता है. कुछ ही लोग हर साल अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष जैसे पदों पर आपस में पद बदल-बदल कर बने रहते हैं, लेकिन इसके पीछे कुछ कानूनी खामियां भी हैं. आरडब्ल्यूए स्वैच्छिक संस्थाएं होती हैं, जो 1860 के सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट और राज्य के अपार्टमेंट या सहकारी कानूनों के तहत पंजीकृत होती हैं. इन कानूनों में सदस्यता, चुनाव, नियमावली और कार्यकाल से जुड़े नियम तो तय हैं, लेकिन ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो पदाधिकारियों को हर दो या तीन साल में होने वाले चुनावों में किसी दूसरे पद के लिए खड़े होने से रोके. अधिकतर मामलों में युवा और कामकाजी निवासी आरडब्ल्यूए चुनावों या उससे जुड़े मामलों में सक्रिय रूप से हिस्सा नहीं लेते. इसी वजह से मौजूदा नेतृत्व को कोई वास्तविक चुनौती नहीं मिल पाती.

नोएडा के सेक्टर 43 के निवासी जगदीश ने कहा, “यह किसी एक समूह के खिलाफ लड़ाई नहीं है, बल्कि इस बात की है कि निवासियों का हक क्या है. चुनी हुई संस्था को वैधता मिलती है, जबकि खुद बनाई गई संस्था की कोई वैधता नहीं होती.”

लेकिन सेक्टर 43 में लोग बदलाव के लिए लड़ रहे थे. कई सालों से यह सोसायटी पांच सदस्यों वाली एक खुद को चुनी हुई समिति और पारदर्शी व आधिकारिक चुनाव की मांग कर रहे निवासियों के एक गुट के बीच खींचतान में फंसी हुई है. सेल्फ इलेक्टेड समिति का कहना है कि बिना चुनाव के भी सोसायटी ठीक से चल रही है, लेकिन दूसरे निवासी इससे सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि नागरिक सुविधाओं से जुड़ी कई समस्याएं अब तक हल नहीं हुई हैं और सुरक्षा में भी चूक रही है, जिन्हें केवल एक जवाबदेह और चुनी हुई संस्था ही प्रभावी ढंग से सुलझा सकती है.

इन निवासियों ने कई बार नोएडा अथॉरिटी और डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय का रुख किया, जो आरडब्ल्यूए के पंजीकरण और चुनाव की निगरानी करने वाली संस्थाएं हैं, लेकिन ज़्यादातर मामलों में ये कोशिशें इसलिए नाकाम रहीं क्योंकि विरोधी गुट ने प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार कर दिया.

आखिरकार, इस साल अप्रैल में गौतम बुद्ध नगर के ज़िलाधिकारी मनीष कुमार वर्मा ने डिप्टी रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि जिन सोसायटियों में वर्षों से चुनाव नहीं हुए हैं, उनकी पहचान की जाए और वहां जल्द से जल्द लंबित चुनाव कराए जाएं.

सेक्टर 43 में यह प्रयास भी तब डगमगाता दिखा, जब 2 नवंबर को चुनाव रद्द कर दिए गए. हालांकि, निवासियों ने दबाव बनाए रखा, जिसके बाद रजिस्ट्रार कार्यालय ने सीधे हस्तक्षेप किया और अपनी मौजूदगी में चुनाव कराया. किसी भी उम्मीदवार के उनके खिलाफ न खड़े होने के कारण, 21 नवंबर 2025 को दीपक शर्मा सेक्टर 43 आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष निर्विरोध चुने गए.

नोएडा के सेक्टर 74 के निवासी रमेश शाह ने कहा, “खुद को चुने हुए लोग धीरे-धीरे हमारी सेवा करना बंद कर देते हैं और अपनी सेवा करने लगते हैं. जो लोग हमारे लिए काम करें, उन्हें हमारे द्वारा चुना जाना चाहिए.”

RWA चुनाव का लंबा इंतज़ार

जब 60 साल की चांदनी माथुर साल 2022 में अपने पति और बेटे के साथ सेक्टर 43 में रहने आईं, तो उन्हें लगा कि अब अपना घर होने की वजह से ज़िंदगी आरामदायक और सिक्योर रहेगी, लेकिन बहुत जल्दी उन्हें एहसास हो गया कि हालात उनकी उम्मीदों जैसे नहीं हैं. घर में शिफ्ट होने के कुछ ही दिनों के भीतर उन्हें आसपास कई चोरियों की खबरें मिलने लगीं. सेक्टर में न तो सुरक्षा गार्ड थे, न निगरानी कैमरे, और न ही कोई व्यवस्थित सुरक्षा व्यवस्था.

इस स्थिति से नाराज़ होकर माथुर ने आरडब्ल्यूए समिति से शिकायत की और दूसरे निवासियों को भी अपनी आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित किया, पर ज़्यादातर मामलों में समिति का रवैया उदासीन ही रहा.

माथुर ने कहा, “सेल्फ इलेक्टेड समिति के पास सत्ता तो थी, लेकिन ज़िम्मेदारी नहीं थी और यही सेक्टर की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सबसे बड़ी रुकावट बन गई.”

सुरक्षा तो इस पूरी अव्यवस्था का सिर्फ एक हिस्सा थी. कई जगह स्ट्रीट लाइटें काम नहीं कर रही थीं, जिससे पार्क और सड़कें पूरी तरह अंधेरे में डूबी रहती थीं. सीवेज की समस्या लगातार बनी रहती थी और पानी की आपूर्ति में बार-बार रुकावट आती थी, जिससे पूरे के पूरे ब्लॉक घंटों तक सूखे पड़े रहते थे. इसके बावजूद, जब भी कोई निवासी आरडब्ल्यूए में शिकायत दर्ज कराता, तो जवाब या तो औपचारिक ढंग से टाल दिया जाता—“हम इस पर काम करेंगे” या फिर बिल्कुल कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती थी.

गौतम बुद्ध नगर के डिप्टी रजिस्ट्रार (फर्म्स, सोसायटीज़ और चिट्स) वैभव कुमार ने कहा, “आरडब्ल्यूए और एओए के चुनाव आंतरिक मामला होते हैं, लेकिन जब हमारे पास कई शिकायतें और आपसी विवाद आते हैं, तो हम उस पर काम करते है लेकिन हर मामले को देखने और उसका समाधान करने में समय लगता है.”

एक अन्य निवासी ने यह सवाल भी उठाया कि रखरखाव के लिए इकट्ठा किया गया पैसा आखिर कैसे खर्च किया गया उसका हिसाब किसी के पास नहीं हैं.

नाम न छापने की शर्त पर निवासी ने कहा “कागज़ों में सदस्यता शुल्क और नागरिक समस्याओं को सुलझाने में दिखाया गया खर्च कभी आपस में मेल नहीं खाता था. जब लोग लंबे समय तक एक ही पद पर बने रहते हैं और उनसे कोई सवाल नहीं करता, तो ऐसा ही होता है.”

नोएडा के रेसिडेंशियल फैलाव का एक नज़ारा. अधिकारियों ने कहा कि 50 सोसाइटियों को देरी से होने वाले RWA चुनावों के लिए फ्लैग किया गया है, जिनमें से 20 में नवंबर तक तीन महीनों में चुनाव हो चुके हैं | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
नोएडा के रेसिडेंशियल फैलाव का एक नज़ारा. अधिकारियों ने कहा कि 50 सोसाइटियों को देरी से होने वाले RWA चुनावों के लिए फ्लैग किया गया है, जिनमें से 20 में नवंबर तक तीन महीनों में चुनाव हो चुके हैं | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

दिप्रिंट ने सेक्टर 43 की पिछली आरडब्ल्यूए के पूर्व कोषाध्यक्ष सुमित छाबड़ा से भी बात की, लेकिन उन्होंने चुनाव के मुद्दे पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

आखिरकार, निष्क्रियता ने कुछ निवासियों को जनवरी में डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय के पास जाने के लिए मजबूर कर दिया और उन्होंने वही मांग की जिस पर वे सहमत थे कि यह गड़बड़ी ठीक कर सकती है: चुनाव.

सेक्टर 43 के निवासी जगदीश ने कहा, “यह किसी समूह के खिलाफ लड़ाई नहीं है, बल्कि यह इस बारे में है कि निवासियों को क्या मिलना चाहिए.”

एक और चुनौती थी अपने पड़ोसियों को चुनाव को गंभीरता से लेने के लिए मनाना. RWAs रोज़मर्रा के नागरिक कामों के लिए पहला कदम होते हैं, फिर भी कई निवासी चुनाव को केवल छोटी-मोटी सोसाइटी राजनीति समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं. अधिकारी भी अक्सर इसे केवल आंतरिक झगड़ा समझते हैं, न कि महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया.

उन्होंने कहा, “केवल चुनाव से ही हम सही लोगों को सही पदों पर रख सकते हैं—ऐसे लोग जो काम करेंगे, केवल सत्ता में बैठे नहीं रहेंगे.”

सेक्टर 43 के नए चुने गए RWA प्रेसिडेंट दीपक शर्मा सेक्टर के मेन गेट पर कंस्ट्रक्शन का काम देख रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘कुछ लोग नई लीडरशिप को आने नहीं देना चाहते’ | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
सेक्टर 43 के नए चुने गए RWA प्रेसिडेंट दीपक शर्मा सेक्टर के मेन गेट पर कंस्ट्रक्शन का काम देख रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘कुछ लोग नई लीडरशिप को आने नहीं देना चाहते’ | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

कई बार रजिस्ट्रार कार्यालय का दौरा करना पड़ा, शिकायतें बार-बार करनी पड़ीं और लगभग ग्यारह महीने लगे, आखिरकार एक चुनाव अधिकारी की नियुक्ति होने तक.

उस दौरान, निवासियों की स्थिति बहुत उलझी हुई थी. जबकि कागज़ी कार्रवाई लंबित थी, सेक्टर 43 में रोज़मर्रा की ज़िंदगी बिगड़ती गई. स्ट्रीटलाइटें टूटी रहीं, मानसून के दौरान सीवेज ब्लॉकेज बढ़ गए और कचरा इकट्ठा होता रहा. बिना किसी चुनी हुई संस्था के, निवासियों ने खुद संबंधित विभागों से संपर्क करना शुरू किया और लिखित शिकायतें जमा कीं. केवल स्ट्रीटलाइटें ही नोएडा अथॉरिटी कार्यालय में शिकायत करने के बाद ठीक हुईं.

लंबी प्रक्रिया पर बोलते हुए, गौतम बुद्ध नगर के डिप्टी रजिस्ट्रार (फर्म, सोसाइटीज़ और चिट) वैभव कुमार ने कहा कि प्रशासन अक्सर संघर्षरत गुटों के बीच फंस जाता है.

उन्होंने कहा, “RWAs और AOAs में चुनाव आंतरिक मामले हैं, लेकिन जब हमें कई शिकायतें और विवाद मिलते हैं, तो हर मामले की जांच और समाधान में समय लगता है.”

जहां कुछ नोएडा की सोसाइटीज़ RWA चुनावों में आंतरिक विरोध का सामना कर रही हैं, वहीं अन्य प्रशासनिक ठहराव की वजह से फंसी हुई हैं.

नोएडा सोसायटीयों से गायब चुनाव

नोएडा के सेक्टर 108 के RWA सचिव प्रमोद गुप्ता इंतजार की स्थिति में फंसे हैं. उनकी समिति का कार्यकाल पिछले साल दिसंबर में समाप्त हो गया, लेकिन अब तक चुनाव नहीं हुए हैं. इस बार कारण यह है कि चुनाव अधिकारी को चुनाव प्रक्रिया की देखरेख के लिए निर्धारित नहीं किया जा सका.

गुप्ता ने कहा, “चुनाव अधिकारी या तो चुनाव की तारीख बढ़ाते रहते हैं, या उनकी अनुपलब्धता के कारण चुनाव नहीं हो पाते.”

सोशल मीडिया मंच जैसे एक्स पर भी चुनावों में देरी को लेकर इसी तरह की कई शिकायतें देखने को मिलती हैं.

RWA चुनाव रजिस्ट्रार कार्यालय द्वारा नियुक्त चुनाव अधिकारी की देखरेख में होते हैं, जो अक्सर जिला प्रशासन के साथ समन्वय करते हैं. नोएडा में, लगभग 30 सरकारी अधिकारियों का एक समूह इस भूमिका के लिए पैनल में शामिल है और जब चुनाव होने होते हैं, तो उन्हें सोसाइटीज़ में भेजा जाता है. कुछ मामलों में, एक निवासी जो RWA समिति का हिस्सा नहीं है, उसे भी प्रक्रिया की निगरानी करने के लिए पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त किया जाता है.

पुरानी समिति अपने कार्यों को जारी रख रही है. गुप्ता ने कहा कि निवासियों ने इसके प्रदर्शन पर शिकायत नहीं उठाई है, लेकिन वे फिर भी चाहते हैं कि चुनाव RWA के नियमों और दिशानिर्देशों के अनुसार आयोजित हों.

सेक्टर 108 की निवासी अमिता गुप्ता ने कहा, “भले ही वही अध्यक्ष या समूह फिर से चुना जाए, चुनाव करवाना महत्वपूर्ण है ताकि कोई अपनी शक्ति को सहजता से न ले.”

नोएडा सेक्टर 108 के RWA सचिव प्रमोद गुप्ता ने कहा, लोग कहते हैं कि RWA का काम समाज सेवा है और इसके लिए उन्हें पैसे नहीं मिलते, लेकिन कई लोगों के लिए यह शक्ति और प्रभाव बनाए रखने का एक तरीका है.

सेक्टर 108 केवल उन कई नोएडा सोसाइटीज़ में से एक है, जहां चुनाव लंबित हैं. डिप्टी रजिस्ट्रार कुमार ने कहा कि विभाग ने उन सोसाइटीज़ और सेक्टरों की सूची तैयार करना शुरू कर दिया है, जिन्होंने समय पर चुनाव नहीं करवाए या जिनके खिलाफ निवासियों की शिकायतें मिली हैं. उन सोसाइटीज़ को नोटिस भेजा गया है, जिसमें लंबे विलंब के कारण पूछे गए हैं.

कुमार ने कहा, “हमने 50 सोसाइटीज़ को शॉर्टलिस्ट किया है और पिछले तीन महीनों में हमारी निगरानी में 20 में चुनाव करवाए हैं. बाकी सोसाइटीज़ में समय पर चुनाव करवाने के लिए चुनाव अधिकारियों को भी नियुक्त किया गया है.”

सेक्टर 74, 45 और 105 के निवासियों ने कहा कि देरी और जवाबदेह नेतृत्व की कमी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करती है. पानी, बिजली, स्ट्रीटलाइट, पार्क मेंटेनेंस और सुरक्षा गार्ड जैसी शिकायतें अक्सर अनसुलझी रह जाती हैं.

RWA के बाई-लॉज़ आमतौर पर हर दो साल में चुनाव करने का प्रावधान करते हैं. हालांकि, कुछ सोसाइटीज़ के कार्यकाल उनके पंजीकृत नियमों के अनुसार लंबा हो सकता है. उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट एक्ट, 2010 के तहत, अपार्टमेंट मालिकों की एसोसिएशन को हर साल चुनाव करवाना अनिवार्य है. ऐसे कई मामलों में, चाहे ग्रेटर नोएडा हो, गाजियाबाद हो या फरीदाबाद, चुनाव न होने का कारण अक्सर पदाधिकारियों का मजबूत कब्जा होता है.

नोएडा RWAs संघ (FORWA) के महासचिव केके जैन ने कहा, “लोग अपने पद छोड़ना नहीं चाहते.”

क्यों ज़रूरी हैं RWA

यह एक विरोधाभास है. जबकि अधिकांश निवासी समाज प्रबंधन को एक कष्टदायक काम मानते हैं, जो लोग पद पा लेते हैं, वे उससे मिलने वाली शक्ति छोड़ना नहीं चाहते.

करनजीत कौर ने दिप्रिंट से कहा, “भारत में RWAs मूल रूप से ‘अर्ध-सरकारी अधिकारों से लैस’ हैं.” जबकि सांसद और विधायक बड़े स्तर पर काम करते हैं, RWAs रोज़मर्रा की ज़िंदगी के छोटे-छोटे मामलों पर नियंत्रण रखते हैं: कौन अपार्टमेंट किराए पर ले सकता है, कौन सर्विस लिफ्ट यूज़ कर सकता है, या अगर कोई कुत्ता पौधे पर पेशाब कर दे तो दंड क्या होगा.

यह अधिकार कोविड-19 महामारी के दौरान भी दिखा, जब RWAs राज्य के निर्देशों के डिफेक्टो लागूकर्ता बन गए थे.

गुरुग्राम की एक सोसायटी के लोग अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठान से पहले अक्षत कलश यात्रा में हिस्सा लेते हुए | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
गुरुग्राम की एक सोसायटी के लोग अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठान से पहले अक्षत कलश यात्रा में हिस्सा लेते हुए | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

राजनीतिक वर्ग इस प्रभाव को सक्रिय रूप से आकर्षित करते हैं. कई RWA प्रेसिडेंट शहरी मध्यवर्ग के ‘फुट सोल्जर’ के रूप में राजनीतिक दलों के लिए काम करने लगे हैं. उदाहरण के लिए पिछले साल राम मंदिर प्रचार कार्यक्रमों के दौरान, दिल्ली-एनसीआर की हाउसिंग सोसाइटीज़ वीएचपी और आरएसएस के प्रचार में मुख्य प्रतिनिधि बन गईं, चाहे वह जुलूस आयोजित करना हो या प्राण प्रतिष्ठा समारोह दिखाना. दिल्ली चुनावों से पहले, बीजेपी के घोषणापत्र पैनल ने RWA नेताओं के साथ बैठकें कीं. गुरुग्राम और नोएडा में जिला प्रशासन ने ऐसी हाउसिंग सोसाइटीज़ के लिए प्रोत्साहन घोषित किया, जो लोकसभा चुनावों में उच्च मतदाता उपस्थिति सुनिश्चित कर सकें. हरियाणा विधानसभा चुनावों में, एक गुरुग्राम RWA ने तो एक उम्मीदवार भी मैदान में उतारा.

प्रमोद गुप्ता ने कहा, “इस राजनीतिक पहुंच का होना चुनाव आयोजित करने में अनिच्छा का बड़ा कारण है. वे अपने विधायकों के साथ बनाए गए संबंध खोना नहीं चाहते, जो उन्हें अपनी सोसाइटी में और अधिक प्रभाव देता है.”

एक्टिविस्ट राजीव काकड़िया ने कहा, “एक बार RWA राजनीतिक दलों में विभाजित हो जाता है, यह समुदाय की सेवा करना बंद कर देता है और अन्य हितों की सेवा करने लगता है.”

उन्होंने कहा, “लोग कहते हैं कि RWA का काम समाज सेवा है और इसके लिए पैसे नहीं मिलते, लेकिन कई लोगों के लिए यह शक्ति और प्रभाव बनाए रखने का तरीका है.”

सामाजिक प्रभाव के अलावा, बड़ी सोसाइटीज़ में RWAs करोड़ों रुपये के फंड का प्रबंधन भी करते हैं—रखरखाव, सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड के लिए जमा किए गए फंड. हाउसकीपिंग, सुरक्षा एजेंसियों और मरम्मत कार्यों के लिए ठेके देने की शक्ति के साथ, निवासी कहते हैं कि ये संस्थाएं वित्तीय गड़बड़ियों से अछूती नहीं हैं.

गुप्ता ने कहा, “जब चुनाव नहीं होते, तो एक समूह फंड, टेंडर और फैसलों पर नियंत्रण करता है. वे इसे क्यों छोड़ेंगे?”

स्थायी समितियों के लिए, नया चुनाव एक खतरा है. इसका मतलब है कि पद को सौंपना और पिछले खर्चों का ऑडिट कराना.

सेक्टर 45 के एक निवासी ने कहा, “यही जवाबदेही है, जिसका सामना कई लोग करना नहीं चाहते.”

और सिस्टम में मौजूद खामियां इसे टालना काफी आसान बना देती हैं.


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वही चेहरे

नेहा पुरी, 49, एक शाम काम से अपने ग्रीन पार्क घर लौटीं और देखा कि कुछ RWA सदस्य उनके लिविंग रूम में थे और उनकी बुज़ुर्ग सास पर सोसायटी के कुछ काम के लिए पैसे देने का दबाव बना रहे थे. पुरी ने बीच-बचाव किया और कहा कि वह तभी पैसे देंग जब उन्हें पूरी जानकारी दी जाएगी कि पैसे का यूज़ कैसे किया जाएगा. उन्होंने यह भी बताया कि रेगुलर मेंटेनेंस और सदस्यता फीस के बावजूद निवासियों की शिकायतें अनसुलझी रहती हैं.

उनके सवाल जल्दी ही गरमागरम बहस में बदल गए. RWA सदस्यों ने चुनौती दी: अगर वह बदलाव चाहती हैं, तो उन्हें खुद पद के लिए चुनाव लड़ना चाहिए.

पुरी ने इस चुनौती को स्वीकार किया और 2023 के चुनाव में भाग लिया. वह घर-घर जाकर प्रचार करती रहीं, पुराने गार्ड की तानाशाही को तोड़ने की कोशिश की और पड़ोसियों से कहा कि उन्हें मौका दें.

पुरी ने कहा, “भले ही चुनाव हों, वही पांच लोग लौटकर आते हैं और अपने बीच पद बदलते रहते हैं.” उसी साल, उन्हें ग्रीन पार्क सोसाइटी का जनरल सेक्रेटरी चुना गया और 2024 के चुनाव में वह उसकी अध्यक्ष बनीं.

जब नई समिति जिम्मेदारी में आई, तो पुरी ने कहा, “इसने मेंबर्स फंड का यूज़ उद्देश्य के अनुसार करना शुरू किया, अलग-अलग खाते बनाए और लिखित रिकॉर्ड रखा. नागरिक मामलों के लिए, समिति पहले संबंधित विभाग से संपर्क करती है और शिकायत दर्ज करती है; अगर देरी होती है, तो समाज के फंड से मदद ली जाती है.”

उन्होंने आगे कहा, “समिति रेगुलर रूप से एमसीडी और पीडब्ल्यूडी जैसी नागरिक संस्थाओं से संपर्क में रहती है और समस्याओं को लंबे समय तक अनदेखा करने के बजाय उन्हें हल करने के लिए लगातार कोशिश करती है.”

दिल्ली के ‘सेव अवर सिटी’ अभियान के संयोजक, 61-वर्षीय राजीव काकड़िया ने कहा, “चुनाव समय पर होने के बावजूद ‘पुराने चेहरे’ की शिकायत बहुत आम है, क्योंकि पारदर्शिता की कमी रहती है.”
दिल्ली के ‘सेव अवर सिटी’ अभियान के संयोजक, 61-वर्षीय राजीव काकड़िया ने कहा, “चुनाव समय पर होने के बावजूद ‘पुराने चेहरे’ की शिकायत बहुत आम है, क्योंकि पारदर्शिता की कमी रहती है.”

काकड़िया ने कहा कि RWAs एक समान और आधुनिक ढांचे के तहत काम नहीं करते. कई समितियां सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत काम करती हैं, जो जवाबदेही को उप-नियमों पर छोड़ देता है और लागू करने में असमानता रहती है. इससे अध्यक्षों के लिए ऑडिट से बचना और फंड व निर्णयों को एक सीमित समूह में रखना आसान हो जाता है.

काकड़िया के अनुसार, इससे भी बड़ी समस्या राजनीतिक तटस्थता का नुकसान है. RWAs मूल रूप से पूरी तरह से गैर-राजनीतिक संस्थाएं होनी चाहिए थीं, लेकिन राजनीतिक पार्टियों के हस्तक्षेप ने आंतरिक विभाजन बढ़ा दिया और फोकस निवासियों की भलाई से हटा दिया.

उन्होंने कहा, “जब राजनीति RWA में प्रवेश करती है, तो पारदर्शिता चली जाती है. एक बार RWA राजनीतिक पार्टियों में बंट जाती है, तो यह समुदाय की सेवा करना बंद कर देती है और अन्य हितों की सेवा करने लगती है.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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