scorecardresearch
Friday, 16 January, 2026
होमफीचरगोवा से अंटार्कटिका तक: साइंटिस्ट बर्फ के जरिए कैसे सुलझा रहे हैं क्लाइमेट चेंज की समस्या

गोवा से अंटार्कटिका तक: साइंटिस्ट बर्फ के जरिए कैसे सुलझा रहे हैं क्लाइमेट चेंज की समस्या

ग्लोबल ज्वालामुखी घटनाओं से लेकर पिछले अल नीनो सर्कुलेशन तक, माइक्रोबियल जीवन की मौजूदगी तक, NCPOR के वैज्ञानिक अंटार्कटिक बर्फ के ज़रिए ग्लोबल घटनाओं को समझने में कामयाब रहे हैं.

Text Size:

वास्को दा गामा: हर दिसंबर जब भारतीय लोग समुद्र तट पर छुट्टियां मनाने के लिए गोवा का रुख करते हैं, तब ग्लेशियोलॉजिस्ट विक्रम गोयल और उनके साथी इसका उलटा करते हैं. वे तटीय राज्य को छोड़कर एक ‘समर’ डेस्टीनेशन, अंटार्कटिका, जाते हैं. भारतीय सर्दी का समय ध्रुवीय गर्मी से मेल खाता है, जब बर्फीले महाद्वीप में जाना और वहां 0 से माइनस 10 डिग्री सेल्सियस के ‘सुखद’ मौसम में काम करना संभव हो पाता है.

यह साल का सबसे व्यस्त समय होता है, न सिर्फ सांता क्लॉज के लिए, बल्कि नेशनल सेंटर फॉर पोलर एंड ओशन रिसर्च (NCPOR) के लिए भी. इसके क्लाइमेट और एनवायरनमेंट साइंटिस्ट, बायोलॉजिस्ट, जियोलॉजिस्ट, ओशनोग्राफर और ग्लेशियोलॉजिस्ट, जैसे गोयल, पिछले 25 वर्षों से अंटार्कटिका जाकर उसके बेहद ठंडे माहौल की स्टडी कर रहे हैं.

दुनिया के सबसे तेजी से गर्म हो रहे क्षेत्रों में शामिल अंटार्कटिका की स्टडी क्लाइमेट चेंज को समझने के लिए बेहद अहम है, और इस काम में भारतीय साइंटिस्ट अहम भूमिका निभा रहे हैं.

1983 में अंटार्कटिक संधि से जुड़ने से लेकर अब वहां दो स्थायी शोध केंद्र स्थापित करने और तीसरे की तैयारी तक, भारत ने अंटार्कटिका में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ाई है. साइंटिस्ट्स  ने 20,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र की मैपिंग की है, ईस्टर्न अंटार्कटिका और भारत के ईस्टर्न घाट के बीच 50 करोड़ साल पुराने जियोलॉजिकल समानताएं खोजी हैं, और महाद्वीप के अब तक अनजान इलाकों से 400 साल पुरानी बर्फ निकाली है.

इन सभी गतिविधियों के केंद्र में NCPOR है, जो भारत की पोलर और ओशीऐनिक रिसर्च की नोडल एजेंसी है.

NCPOR के निदेशक थंबन मेलोथ ने कहा, “हम एक ऐसा संगठन हैं जो चरम परिस्थितियों में काम करता है. हम अंटार्कटिका, आर्कटिक और यहां तक कि हिमालय जैसी जगहों की चरम स्थितियों में रिसर्च करते हैं. अंटार्कटिका की बर्फ, उसका इतिहास, वहां मौजूद बैक्टीरिया और जीव-जंतु जीवन में क्या हो रहा है, यह पता लगाना हमारा काम है.” उन्होंने आगे कहा, “दूसरी ओर, हम गहरे समुद्र में भी रिसर्च का काम करते हैं, जो एक और चरम वातावरण है.”

ग्लोबल ज्वालामुखी घटनाओं से लेकर पिछले अल नीनो सर्कुलेशन तक, माइक्रोबियल जीवन की मौजूदगी तक, NCPOR के वैज्ञानिक अंटार्कटिक बर्फ के ज़रिए ग्लोबल घटनाओं को समझने में कामयाब रहे हैं.

NCPOR अंटार्कटिका में दो वर्ल्ड-क्लास रिसर्च स्टेशन – भारती और मैत्री – चलाता है, जिससे भारत दुनिया के उन 30 देशों में से एक बन गया है जिनकी इस महाद्वीप पर स्थायी रिसर्च मौजूदगी है. ध्रुवों के लिए नोडल सरकारी संस्था के तौर पर, NCPOR युवा भारतीय वैज्ञानिकों को भी ध्रुवीय महाद्वीप पर ले जाता है ताकि वे अंटार्कटिक जलवायु, बर्फ की मोटाई, उसके पिघलने की दर, बर्फ के अंदर के रहस्यों और मुश्किल हालात में जीवन की स्टडी कर सकें. लेकिन वे सिर्फ़ इतना ही नहीं करते – वे अंटार्कटिका को भारत भी लाते हैं.

NCPOR अंटार्कटिका में दो वर्ल्ड-क्लास रिसर्च स्टेशन – भारती और मैत्री – चलाता है, जिससे भारत दुनिया के उन 30 देशों में से एक बन गया है जिनकी इस महाद्वीप पर स्थायी रिसर्च मौजूदगी है। | आकांक्षा मिश्रा | दिप्रिंट

सालों से, NCPOR के वैज्ञानिक इस महाद्वीप से गहरे बर्फ के कोर ड्रिल कर रहे हैं, जिनमें बर्फ की परतें एक साथ जमी होती हैं. हर परत एक साल की बर्फबारी को दिखाती है, और वैज्ञानिक इसे स्टडी करने के लिए गोवा में अपने हेडक्वार्टर वापस लाते हैं. उनका सबसे नया और सबसे बड़ा कोर 150 मीटर लंबा है और इसमें 400 से ज़्यादा सालों की बर्फबारी है. अब, NCPOR के वैज्ञानिक इस कोर का एनालिसिस कर रहे हैं और एक-एक परत करके अंटार्कटिका का इतिहास जान रहे हैं.

“अंटार्कटिका के साथ समस्या यह है कि यह हमारे ग्लोबल वार्मिंग, क्लाइमेट चेंज, समुद्र के लेवल में बढ़ोतरी के सभी अनुमानों में अनिश्चितता का सबसे बड़ा सोर्स है,” गोयल ने कहा. “इस अनिश्चितता को खत्म करने का एकमात्र तरीका इसके इतिहास की स्टडी करना. जब हम इसके इतिहास को जान लेंगे, तभी हम इसका भविष्य बता पाएंगे.”

अंटार्कटिक आइस-कोर परियोजना

मध्य गोवा में स्थित हरे-भरे NCPOR परिसर में एक ऐसा कमरा है, जहां तापमान अंटार्कटिका जैसा, माइनस 20 डिग्री सेल्सियस तक रहता है. इसे आइस कोर लैब कहा जाता है. यहां अंटार्कटिका और आर्कटिक से लाए गए बर्फ के नमूनों को बड़े बक्सों में सुरक्षित रखा जाता है. ये बक्से साइंटिस्ट्स के लिए अंटार्कटिका के सबसे करीब मौजूद आर्काइव हैं.

यह प्रशांत रेडकर की प्राइमरी लैब भी है, जो अंटार्कटिक क्रायोस्फेरिक स्टडीज़ डिवीज़न में काम करने वाले एक इंजीनियर हैं.

रेडकर ने बताया, “हम इलेक्ट्रो-मैकेनिकल और अन्य मशीनों की मदद से अंटार्कटिका की सतह में ड्रिल करते हैं और बर्फ का एक लंबा, बेलनाकार टुकड़ा निकालते हैं, जिसे स्टडी के लिए वापस लाया जाता है.” उन्होंने आगे कहा, “बर्फ सबसे अच्छा आर्काइव होती है, क्योंकि इसमें सिर्फ पानी ही नहीं जमता, बल्कि हवा के बुलबुले, गैस, मेटल के ट्रेस पार्टिकल्स, और पिछले सालों के ऑक्सीजन के आइसोटोप्स को भी जमाता है.”

आइस कोर लेबोरेटरी अंटार्कटिका और आर्कटिक से इकट्ठा किए गए बर्फ के सैंपल को बड़े कस्टम-मेड आइस बॉक्स में स्टोर करती है। | आकांक्षा मिश्रा | दिप्रिंट

चमकीले लाल, फूले हुए सूट में—बिल्कुल वैसे ही जैसे वह अंटार्कटिका की अपनी यात्राओं पर पहनते हैं—रेडकर एक मेटल के दरवाज़े से होते हुए ठंडी लेबोरेटरी में जाते हैं. यहां बर्फ को बिना प्रदूषित किए प्रोसेस करने के लिए आरी और मशीनें लगी हैं. 2005 में आइस कोर लैब की स्थापना के बाद से अब तक अंटार्कटिका के अलग-अलग हिस्सों से बर्फ के कोर लाने के लिए 11 अभियान चलाए जा चुके हैं.

आसान शब्दों में कहें तो अंटार्कटिक बर्फ पृथ्वी के पुराने जलवायु और वातावरण का एकमात्र रिकॉर्ड है. बर्फ में हवा के बुलबुले और माइक्रोब्स सदियों और यहां तक कि हजारों वर्षों तक जमे रहते हैं. जब बर्फ निकाली जाती है और पिघलाई जाती है, तो उस समय की सभी जमी हुई चीजों का अध्ययन किया जा सकता है.

भारत के दोनों रिसर्च केंद्र पूर्वी अंटार्कटिका में स्थित हैं, जो 15 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले ड्रोन्निंग मौड लैंड क्षेत्र में आते हैं. आमतौर पर NCPOR यहीं से बर्फ के कोर निकालता है. अंटार्कटिक तट के पास स्थित होने के कारण, यहां से मिले बर्फ के कोर अंटार्कटिका के साथ-साथ उसके चारों ओर फैले साउदर्न ओशन के बारे में भी खास जानकारी देते हैं.

स्टडी के दौरान, बर्फ के कोर को 5 सेंटीमीटर की परतों में काटा जाता है. हर गोल परत अंटार्कटिका के इतिहास के कुछ महीनों से लेकर कई वर्षों तक का प्रतिनिधित्व करती है. प्रयोगशाला में प्रोसेस होने के बाद, इस परत को बीच से दो हिस्सों में काटा जाता है. एक हिस्सा बर्फ के रूप में सुरक्षित रखा जाता है और NCPOR के आर्काइव का हिस्सा बनता है. दूसरा हिस्सा पानी में पिघलाकर उसके गुणों की स्टडी की जाती है.

आइस कोर लैब के अंदर प्रशांत रेडकर। | आकांक्षा मिश्रा | दिप्रिंट

2006 में, डॉ. मेलोथ सहित NCPOR के वैज्ञानिकों की एक स्टडी में पाया गया कि पिछले लगभग 500 सालों की बर्फ में कुछ सालों में ज्वालामुखी टेफ्रा और सल्फर के कण थे, जो दुनिया में हुए बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों से मेल खाते थे. 2009 में एक और स्टडी में, NCPOR के बायोलॉजिस्ट सैकड़ों साल पहले बर्फ की गहरी परतों में दबे जीवित माइक्रोब्स को ढूंढने में कामयाब रहे. इससे पता चला कि सदियों पहले की बर्फ ‘मरी हुई’ नहीं थी, बल्कि उसमें उस समय के जीवित कण मौजूद थे.

इसलिए, आइस कोर रिकॉर्ड एटमॉस्फेरिक साइंटिस्ट, केमिस्ट, माइक्रोबायोलॉजिस्ट और यहां तक कि ग्लेशियोलॉजिस्ट को भी एक साथ लाते हैं. साथ मिलकर, वे इतिहास के जासूसों की तरह काम करते हैं और यह पता लगाते हैं कि प्राकृतिक और इंसानी घटनाओं ने अंटार्कटिका और बाकी दुनिया के क्लाइमेट पर कैसे असर डाला है.

-20 डिग्री सेल्सियस वाली आइस कोर फैसिलिटी दूसरी लैब से घिरी हुई है, जैसे कि क्लास 100 क्लीन रूम फैसिलिटी, जिसमें बर्फ की केमिकल स्टडी के लिए हर कुछ घंटों में साफ हवा सर्कुलेट की जाती है. एक कमरा ऐसा भी है जहां अंटार्कटिक बर्फ में पाए जाने वाले ऑक्सीजन और दूसरे गैस पार्टिकल्स पर मास स्पेक्ट्रोमेट्री स्टडी की जाती है, ताकि इतिहास में तापमान के अंतर को समझा जा सके.

NCPOR अंटार्कटिका और आर्कटिक में क्यों है

अंटार्कटिका सालों से ग्लोबल क्लाइमेट चेंज के बारे में सुराग देने वाली जगह रही है—ओजोन लेयर में छेद सबसे पहले अंटार्कटिका के ऊपर ही खोजा गया था, इस महाद्वीप में धरती का 70 परसेंट से ज़्यादा मीठा पानी बर्फ के रूप में जमा है, और 400,000 साल पहले की आइस कोर ड्रिलिंग से पता चला है कि ग्लोबल तापमान और कार्बन डाइऑक्साइड का लेवल हमेशा से एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं.

लेकिन इसके अलावा, अंटार्कटिका का एक रणनीतिक महत्व भी है, और इसीलिए NCPOR भी कई मायनों में एक रणनीतिक संगठन है. हालांकि आधिकारिक तौर पर यह पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत आता है, लेकिन NCPOR किसी दूसरे सामान्य रिसर्च संस्थान जैसा नहीं है.

मेलोथ ने कहा, “हम आर्कटिक और अंटार्कटिक में भारत सरकार की प्राथमिकताओं पर काम करते हैं, और ये सिर्फ विज्ञान तक सीमित नहीं हैं. इसका भू-राजनीतिक महत्व है.”

मेलोथ, जो पांच बार अंटार्कटिका जा चुके हैं और NCPOR के एकमात्र वैज्ञानिक हैं जिन्होंने अंटार्कटिका, साउदर्न ओशन, हिमालय और आर्कटिक दोनों, स्वालबार्ड और ग्रीनलैंड, का दौरा किया है, ने ध्रुवीय क्षेत्रों में भारत की मौजूदगी के रणनीतिक कारणों को समझाया.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा हाल में ग्रीनलैंड को लेकर दिखाई गई दिलचस्पी का जिक्र करते हुए मेलोथ ने कहा कि यह इस बात का सबसे अच्छी मिसाल है कि जैसे-जैसे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है, पोलर क्षेत्रों का महत्व भी बढ़ रहा है.

मेलोथ ने कहा, “आर्कटिक में समुद्री बर्फ के पिघलने से नए रणनीतिक शिपिंग रूट खुल रहे हैं, हाइड्रोकार्बन जैसे नए संसाधन और ग्रीनलैंड में नए खनिज भंडार सामने आ रहे हैं. अब हर कोई इस पर कब्जा चाहता है.” उन्होंने आगे कहा, “अंटार्कटिका और आर्कटिक दोनों ही रिसोर्स, मछली पालन के मामले में बहुत अमीर हैं, और ये ज़रूरी ट्रांसपोर्ट रूट भी हैं – भविष्य के लिए यही एकमात्र इलाके बचे हैं. बेशक, अंटार्कटिक संधि और मैड्रिड प्रोटोकॉल किसी भी मिनरल रिसोर्सिंग की इजाज़त नहीं देते, लेकिन कौन जानता है कि भविष्य में क्या होगा?”

NCPOR का इतिहास

भारत के अंटार्कटिका अभियान 1981 में शुरू हुए थे, लेकिन 2000 में जाकर ध्रुवीय और समुद्री अनुसंधान के लिए एक समर्पित संस्था की स्थापना हुई. 100 से ज्यादा साइंटिस्ट्स, रिसर्चर्स और प्रोफेसरों के साथ, जो पोलर और ओशीऐनिक रिसर्च के अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं, यह संगठन एक ‘’मल्टीडिसिप्लिनरी’ फैकल्टी होने का दावा करता है. यह गोवा यूनिवर्सिटी और मैंगलोर यूनिवर्सिटी के PhD स्कॉलर्स को भी NCPOR की मदद से, वहां के वैज्ञानिकों की देखरेख में अपना रिसर्च करने का मौका देता है

जहां तक ​​रिसर्च की बात है, NCPOR उन्हीं थीम्स को फॉलो करता है जो अंटार्कटिका में बेस वाले ज़्यादातर दूसरे देश करते हैं: जियोलॉजी, क्लाइमेट स्टडीज़, आइस कोर ड्रिलिंग और समुद्र-ज़मीन के बीच इंटरेक्शन. फर्क स्टडी के एरिया में है.

मेलोथ ने कहा, “आपको समझना होगा कि अंटार्कटिका एक बहुत बड़ा महाद्वीप है, और ऐसा महाद्वीप जिसे कभी पूरी तरह खोजा ही नहीं गया है. इसलिए पूर्वी अंटार्कटिका में हमें जो आइस कोर या ग्लेशियर की मोटाई मिलती है, वह मध्य अंटार्कटिका से बिल्कुल अलग होगी, और इसी तरह स्टडी और रिसर्च भी अलग होंगे.”

हालांकि भारत के दोनों स्टेशन—हिमाद्री और मैत्री—एक-दूसरे से 2,500 किलोमीटर दूर हैं, जो कश्मीर से कन्याकुमारी जितनी दूरी है. हर स्टेशन पर, कुछ वैज्ञानिक रिमोट सेंसिंग में काम करते हैं, कुछ समुद्री स्टडीज़ पर ध्यान देते हैं, और कुछ अंटार्कटिक सतह के अंदर गहराई में माइक्रोबियल जीवन का अध्ययन करते हैं. NCPOR के कई वैज्ञानिक समय-समय पर दूसरे देशों के रिसर्चर्स के साथ भी मिलकर काम करते हैं, और एक-एक आइस कोर की मदद से इस महाद्वीप के इतिहास का पता लगाते हैं.

“बर्फ सबसे अच्छा आर्काइव है, क्योंकि यह सिर्फ पानी को ही नहीं जमाती, बल्कि इसमें गैसों वाले हवा के बुलबुले, धूल और धातुओं के छोटे-छोटे कण, और पिछले सालों के ऑक्सीजन के आइसोटोप भी जम जाते हैं,” रेडकर | आकांक्षा मिश्रा | दिप्रिंट

जबकि अंटार्कटिका वैज्ञानिकों के लिए पहली मंज़िल थी, वहीं अब भारत की आर्कटिक में भी मजबूत शोध मौजूदगी है. स्वालबार्ड में भारत का शोध केंद्र हिमाद्री स्थित है. हाल ही में, NCPOR ने हिमालय की निगरानी के लिए स्पीति घाटी के दूरदराज पहाड़ों में हिमांश नामक एक स्टेशन भी स्थापित किया है.

एक ग्लेशियोलॉजिस्ट के तौर पर, गोयल का काम अंटार्कटिक क्रायोस्फीयर और एनवायरनमेंट सेक्शन में है, और उनका रिसर्च फील्ड लगभग पूरे महाद्वीप में फैला हुआ है, यानी ऐसी कोई भी जगह जहां बर्फ है. वह पहले ही पांच बार वहां जा चुके हैं, जिसमें वेस्ट अंटार्कटिका में एक अनोखे इंटरनेशनल मिशन का हिस्सा बनना भी शामिल है.

अंटार्कटिका जाना

उबड़-खाबड़ हेलिकॉप्टर यात्राएं, बर्फीले तूफान और अंतहीन धूप भरे बर्फीले दिन. सात वर्षों में अंटार्कटिका की पांच यात्राओं के दौरान गोयल ने उन तमाम चरम परिस्थितियों का सामना किया है, ताकि ऐसा ज्ञान जुटाया जा सके जो दुनिया के कुछ सबसे अहम सवालों के जवाब दे सके. उन्होंने होवरक्राफ्ट में रातें बिताई हैं, अचानक आए समर तूफानों में टेंट गिरते देखे हैं, और अंटार्कटिका के उन हिस्सों में रास्ते चिन्हित किए हैं, जहां इससे पहले कोई इंसान कभी नहीं पहुंचा था.

अपने ऑफिस में, अंटार्कटिक तट और आइस शीट के विस्तृत नक्शों के साथ-साथ, वे हर उस अभियान से जुड़े बैज भी सहेज कर रखते हैं, जिसे उन्होंने पूरा किया है. इनमें नॉर्वे के वैज्ञानिकों के साथ निव्ल आइस शेल्फ की खोज करने वाला SENS, अंटार्कटिक आइस शीट की बेड टोपोग्राफी मैप करने वाला RINGS, और कोरियाई और अमेरिकी वैज्ञानिकों के साथ पश्चिमी अंटार्कटिका में रॉस-अमुंडसेन आइस शेल्फ की खोज करने वाला RAICA शामिल है.

गोयल अपने हर पूरे किए गए अभियान से बैज इकट्ठा करते हैं — SENS जिसमें उन्होंने नॉर्वेजियन वैज्ञानिकों के साथ निवल आइस शेल्फ की खोज की, RINGS जिसमें अंटार्कटिक आइस शीट की सतह की टोपोग्राफी का मैप बनाया, और RAICA, जिसमें उन्होंने कोरियाई और अमेरिकी वैज्ञानिकों के साथ पश्चिमी अंटार्कटिका में रॉस-अमुंडसेन आइस शेल्फ की खोज की | आकांक्षा मिश्रा | दिप्रिंट

हालांकि बर्फ उनका मुख्य विषय है, लेकिन गोयल का काम भू-भौतिकीय उपकरणों के इस्तेमाल पर आधारित है, जैसे आइस-पेनेट्रेटिंग रडार, सिस्मिक सर्वे और ग्रैविमेट्री, जिनकी मदद से सतह से ही बर्फ का अध्ययन किया जाता है. वे इसे बर्फ या ग्लेशियर के ऊपर ‘अल्ट्रासाउंड’ करने जैसा बताते हैं, ताकि बिना खुदाई किए यह समझा जा सके कि नीचे क्या है.

गोयल ने समझाया, “आइस रडार और आइस कोर ड्रिलिंग साथ-साथ चलते हैं. जहां रडार माप आपको क्षेत्र का एक व्यापक और स्थानिक चित्र देता है, बर्फ की मोटाई और उसमें कितनी परतें हैं, यह बताता है, वहीं आइस कोर ड्रिलिंग इन विशेषताओं की उम्र बताती है और बर्फ का विस्तृत इतिहास सामने लाती है.”

RAICA अभियान में उनकी भागीदारी, जिसमें पहली बार पश्चिमी अंटार्कटिका के दूरदराज कैनिस्टीयो प्रायद्वीप में आइस कोर ड्रिल किए गए, इस बात का उदाहरण है कि रडार और ड्रिलिंग कैसे एक साथ काम करते हैं. वे इस अभियान में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जिसमें कोरिया, अमेरिका, नॉर्वे और ब्रिटेन शामिल थे. इसका उद्देश्य पश्चिमी अंटार्कटिका से आइस कोर नमूनों का एक संग्रह तैयार करना था, जो सबसे तेजी से पिघलने वाला क्षेत्र है, लेकिन अब तक सबसे कम अध्ययन किया गया है.

रडार वैज्ञानिकों के लिए यह तय करने का भी बेहतरीन तरीका है कि बर्फ की ड्रिलिंग कहां की जाए. यह नीचे मौजूद परतों की एक झलक देता है और उन क्षेत्रों की ओर इशारा करता है जहां बर्फ ज्यादा है, परतें मजबूत हैं, और आदर्श रूप से जहां रेमंड आर्च मौजूद हो. यह बर्फ के भीतर यू-आकार का एक उभार होता है, जो आमतौर पर आइस कोर ड्रिलिंग के लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना जाता है.

गोयल ने कहा, “रेमंड आर्च में परतें ऊपर की ओर धकी होती हैं और आसपास के क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा सघन होती हैं. इसलिए अगर मैं रेमंड आर्च में 100 मीटर ड्रिल करता हूं, तो मुझे 200 साल की बर्फबारी की परतें मिल सकती हैं, लेकिन कुछ मीटर दूर किसी और जगह पर उतनी ही गहराई में शायद सिर्फ 100 साल का रिकॉर्ड मिले.”

यही प्रक्रिया उन्होंने NCPOR की अगली परियोजना के लिए अपनाई है, जो आइस कोर डेटा जुटाने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास है.

आगे क्या?

NCPOR के वैज्ञानिकों में थोड़ा इतिहासकार भी है. वे कन्फ्यूशियस की मशहूर कहावत पर विश्वास करते हैं कि भविष्य को तय करने के लिए अतीत का अध्ययन करना चाहिए. अपने अगले प्रोजेक्ट के लिए, NCPOR पिछले 20,000 वर्षों तक जाने वाला एक आइस कोर निकालना चाहता है.

20,000 साल पहले का समय जियोलॉजिकली भले ही नया हो, लेकिन यह बेहद अहम था. यह आखिरी हिमयुग यानी लास्ट ग्लेशियल मैक्सिमम का दौर था, जब पृथ्वी ने अंतिम बार हिमयुग का अनुभव किया था. इतने पुराने समय का डेटा मिलने से NCPOR यह समझ पाएगा कि उस समय से अब तक बर्फबारी, तापमान और जैविक गतिविधियों में क्या-क्या बदलाव आए हैं, और खासतौर पर उनकी तुलना मौजूदा जलवायु परिवर्तन के स्तर से की जा सकेगी.

इस तरह की बड़ी आइस ड्रिलिंग के लिए NCPOR के वैज्ञानिकों को कई बातों पर विचार करना पड़ा. उन्हें यह सुनिश्चित करना था कि इलाका उनकी शक्तिशाली मशीनों के लिए पर्याप्त रूप से स्थिर हो. साथ ही, रिसर्च स्टेशनों तक पहुंच आसान हो, और सबसे अहम बात यह थी कि एक ही ड्रिलिंग से अधिकतम जानकारी मिल सके.

आदर्श स्थान की तलाश की जिम्मेदारी गोयल पर थी. उन्होंने अपने स्नोमोबाइल उपकरण पर कई दिन बिताए और कैमलरिगेन आइस शेल्फ (केएएम) पर अकेली पगडंडी बनाते हुए आगे बढ़ते रहे. वे रडार सिग्नल के जरिए बर्फ की मोटाई और परतों का आकलन करते रहे. कई दिनों की कोशिशों और असफलताओं के बाद, उन्हें एक बेहद खास जगह मिली. कैमलरिगेन आइस शेल्फ (केएएम) में एक आइस माउंड, यानी रेमंड आर्च, ऐसा था जिसमें सतह के पहले 80 मीटर के भीतर ही 20,000 साल पुरानी बर्फ की परतें मौजूद थीं.

NCPOR में एक इन्फॉर्मेशन बोर्ड | आकांक्षा मिश्रा | दिप्रिंट

इसका मतलब यह था कि NCPOR के वैज्ञानिकों को अपनी अब तक की सबसे बड़ी 150 मीटर की ड्रिलिंग से भी कम गहराई तक ड्रिल करना होगा, और फिर भी संगठन के इतिहास का सबसे लंबा आइस रिकॉर्ड मिल जाएगा. यह जगह शिरमाकर ओएसिस में स्थित मैत्री रिसर्च स्टेशन के भी पास थी, जिससे वास्तविक ड्रिलिंग शुरू होने पर यह स्थान और भी उपयुक्त हो गया.

इस बीच, जांच की एक और लाइन NCPOR के रिसर्चर्स को उनके साइंटिस्ट-हिस्टोरियन रोल पर वापस ले जाती है—भारत और अंटार्कटिका के बीच जियोलॉजिकल कनेक्शन की तलाश करना.

मेलोथ ने कहा, “भारत और अंटार्कटिका का एक गहरा जियोलॉजिकल अतीत साझा है, और हम प्रीकैम्ब्रियन युग से उनके संयुक्त इतिहास का अध्ययन करने की कोशिश कर रहे हैं, उस समय से पहले का, जब भारत यूरेशियन प्लेट की ओर उत्तर दिशा में बढ़ा था.”

करीब एक अरब साल पहले, जब पृथ्वी की सारी ज़मीन एक विशाल सुपरकॉन्टिनेंट गोंडवाना का हिस्सा थी, NCPOR के वैज्ञानिकों का मानना है कि पूर्वी अंटार्कटिका और भारत के ईस्टर्न घाट वास्तव में पड़ोसी थे. वे दोनों क्षेत्रों की चट्टानों के प्रकार और उनकी संरचना का अध्ययन कर रहे हैं, ताकि समानताओं के संकेत मिल सकें.

उन्हें जल्द ही सफलता मिल सकती है. वैज्ञानिकों को पता चला है कि भारत के ईस्टर्न घाट और अंटार्कटिका के बीच भूवैज्ञानिक सेतु पूर्वी अंटार्कटिका का लार्सेमैन हिल्स क्षेत्र है.

साझा इतिहास के इसी हिस्से में NCPOR ने 2012 में अपना भारती रिसर्च स्टेशन बनाने का फैसला किया, महाद्वीपों के अलग होने के लगभग 130 मिलियन साल बाद—यह इस बात का एक शांत इशारा था कि भारत और अंटार्कटिका हजारों सालों तक अगल-बगल रहे थे.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: ₹10 के खाने से लेकर घुसपैठियों की पहचान तक: BMC चुनाव में मुंबई के लिए पार्टियों ने क्या वादे किए


 

share & View comments