वाराणसी: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों समेत चार लोग एक पुराने लकड़ी के दरवाजे को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे. वे बार-बार कंधे से धक्का दे रहे थे. दरवाजा अंदर से बंद था. मशहूर कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ तपन कुमार लाहिरी अंदर थे, लेकिन कोई जवाब नहीं दे रहे थे.
चिंता तब हुई जब 86 वर्षीय लाहिरी चार दिनों तक रोज की तरह मोहल्ले की दुकान से दूध लेने नहीं पहुंचे. आखिरकार एक जोरदार धक्का लगा और कुंडी टूट गई. पीली दीवारों वाले फ्लैट के अंदर, लाहिरी बिस्तर पर पड़े थे—बिल्कुल निश्चल. पद्म श्री से सम्मानित लाहिरी, जिन्हें “डॉ गॉड”, “BHU के संत” और “लोगों के डॉक्टर” कहा जाता था, बेहद धीमी सांस ले रहे थे.
उस दिन, उनके सारे सम्मान जैसे मायने खो बैठे थे. वे किसी भी अकेले बुजुर्ग की तरह थे, जो उम्र से जूझ रहा हो.
लाहिरी के करीबी रिश्तेदार सिद्धार्थ चक्रवर्ती ने कहा, “वे बिस्तर पर बेहोश पड़े थे. उन्होंने खुद को गंदा कर लिया था और कई दिनों से उसी हालत में थे. पास रखा खाना सड़ चुका था, उस पर फफूंदी लग गई थी. कई दिनों से ठीक से खाना नहीं मिला, इसलिए शरीर बहुत कमजोर हो गया था.”

दो महीने से ज्यादा समय बीत चुका है. लाहिरी अभी भी सर सुंदरलाल अस्पताल की सुपर-स्पेशियलिटी बिल्डिंग की पांचवीं मंजिल पर एक कमरे में भर्ती हैं. उनकी हालत पर लगातार नजर रखी जा रही है. अब वे थोड़ा चल-फिर पा रहे हैं, लेकिन किसी से मिलते नहीं हैं. दो सीनियर नर्स और एक अटेंडेंट चौबीसों घंटे उनकी देखभाल कर रहे हैं. वे जानते हैं कि वे सिर्फ एक मरीज नहीं, बल्कि एक ऐसी विरासत की देखभाल कर रहे हैं जिसने कई पीढ़ियों के डॉक्टरों को प्रभावित किया है.
इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, BHU के डायरेक्टर प्रोफेसर एस एन संखवार ने कहा, “हम उनकी अच्छी देखभाल कर रहे हैं. वे आराम में हैं. उनकी सेहत पर लगातार नजर रखी जा रही है. उनका काम हम सबके लिए प्रेरणा है.”
दवा का देवता
तपन कुमार लाहिरी ने बेहद सादा जीवन जिया. उनके पास न फोन था, न कोई गाड़ी. वे अकेले रहते थे और खाना बनाने से लेकर कपड़े धोने तक घर के सारे काम खुद करते थे. 80 साल की उम्र के बाद भी वे रोज करीब 2 किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल जाते थे. उनके पुराने कपड़े, टखनों तक की पैंट और काला छाता उनकी पहचान बन चुके थे.
चक्रवर्ती ने बताया कि चार फ्लैट वाले एक साधारण से 2-BHK घर में, जिसमें छत और बगीचा साझा था, लाहिरी अपने हिस्से की जगह का भी बहुत कम इस्तेमाल करते थे.
सिद्धार्थ चक्रवर्ती ने कहा, “घर में सिर्फ दो बेड थे, एक पुराना टीवी जो बहुत पहले खराब हो चुका था, और एक अलमारी. घर का ज्यादातर हिस्सा खाली रहता था. पहले जब उनकी मां जिंदा थीं, तो वे उनकी देखभाल करते थे, लेकिन उनके गुजरने के बाद वे पूरी तरह अकेले रहने लगे.”

2003 में औपचारिक रूप से रिटायर होने के बाद भी, लाहिरी ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की विशेष अनुमति से दो दशकों से ज्यादा समय तक मरीजों का इलाज जारी रखा. कोलकाता में जन्मे और AIIMS-नई दिल्ली में प्रशिक्षित लाहिरी, रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स के फेलो (FRCS) थे. 1974 में विश्वविद्यालय से जुड़ने के बाद उन्होंने कई अहम पद संभाले, जिनमें कार्डियोथोरेसिक सर्जरी विभाग के प्रमुख का पद भी शामिल है. सहकर्मियों के अनुसार, उन्होंने अमेरिका में प्रसिद्ध सर्जन डेंटन कूली के साथ भी प्रशिक्षण लिया था.
अपने साथियों और छात्रों के लिए वे एक शानदार विद्वान और सख्त शिक्षक थे. उनके नाम कम से कम 39 रिसर्च पेपर हैं, जिनमें आखिरी 2021 में प्रकाशित हुआ.
डॉ इंद्रनील बसु, जो उनके पूर्व छात्र और पड़ोसी हैं, ने कहा, “वे सिर्फ डॉक्टर नहीं, एक संस्था हैं, जिन्होंने कई लोगों को प्रेरित किया. वे बेहतरीन शिक्षक थे और मरीजों के बीच बेहद लोकप्रिय थे. उन्होंने शादी नहीं की क्योंकि वे लोगों की सेवा करना चाहते थे. छात्र और मरीज ही उनकी दुनिया थे.”
लगभग 15-20 साल पहले, एक पड़ोसी ज़िले के ज़िलाधिकारी सीधे OPD में घुस आए और लाइन तोड़ दी. डॉ. लाहिरी उन पर चिल्लाए, ‘अरे बनारसी बफून, तुम्हें हर जगह स्पेशल ट्रीटमेंट चाहिए?’
—डॉ. इंद्रनील बसु, पूर्व छात्र और पड़ोसी
हालांकि, कुछ सहकर्मी मानते हैं कि प्रशासनिक भूमिका में वे सख्त और कभी-कभी मुश्किल भी हो सकते थे. वे न तो नासमझी बर्दाश्त करते थे, न ही सत्ता के आगे झुकते थे. राजनीतिक नेताओं और अधिकारियों के प्रति उनका अविश्वास मशहूर था. उन्हें प्रचार पसंद नहीं था और जो लोग उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना चाहते थे, उन्हें अक्सर मना कर देते थे.
बसु ने याद करते हुए कहा, “हिंदुस्तान टाइम्स ने एक बार उन्हें सम्मानित करने के लिए कॉन्क्लेव में बुलाया था. उन्होंने पहले हां कर दी, लेकिन बाद में जाने से मना कर दिया. वे कहते थे कि मीडिया पर भरोसा नहीं किया जा सकता.”
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में लगभग हर किसी के पास ‘डॉ लाहिरी की कहानी’ है, लेकिन पद्म श्री मिलने के बाद वे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए. जब लोग उन्हें जानने लगे, तो उनकी सादगी और भौतिक चीजों से दूरी की कहानियां लगभग किंवदंती बन गईं. आज इंटरनेट पर उनकी जिंदगी के कई किस्से हैं—कुछ सच, कुछ ख्याली पुलाव. लाहिरी ने खुद कभी मीडिया से बात कर इन बातों की पुष्टि या खंडन नहीं किया. एक तरह से, वे आज भी एक रहस्य बने हुए हैं.

किस्सों के चहेते
लाहिरी के आसपास बनी कहानियां अब उनके व्यक्तित्व से भी बड़ी हो चुकी हैं—और लगातार बढ़ती जा रही हैं. जनवरी से अस्पताल में भर्ती होने के बावजूद, अफवाहें उनका पीछा नहीं छोड़ रही हैं. BHU के बाहर उनके प्रशंसक यह तक कह रहे हैं कि वे अस्पताल के कमरे से ही मरीज देख रहे हैं.
एक वरिष्ठ डॉक्टर, जो पहले उनके साथ काम कर चुके हैं और कभी-कभी उनसे मिलने जाते हैं, ने कहा, “मैं लोगों से लगातार कह रहा हूं कि यह गलत जानकारी फैलाना बंद करें. डॉ लाहिरी गंभीर रूप से बीमार हैं और आप कह रहे हैं कि वे मरीज देख रहे हैं. यह गलत भी है और अपमानजनक भी.”
लाहिरी की सोशल मीडिया पर कोई मौजूदगी नहीं है, लेकिन उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद X से लेकर लिंक्डइन तक हर प्लेटफॉर्म पर उनके बारे में कहानियों की बाढ़ आ गई है. इन किस्सों में अक्सर सच्चाई और कल्पना का मेल होता है, हालांकि ये उनकी छवि को जरूर दिखाते हैं.
यह जानकारी गलत है [कि वह अपनी मासिक पेंशन दान कर देते हैं]. उन्हें पेंशन नहीं मिलती, क्योंकि उन्होंने CPF योजना को चुना था.
– डॉ. एएन गंगोपाध्याय, सेवानिवृत्त वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ
एक मशहूर किस्सा उनके 2016 के पद्म श्री से जुड़ा है. इसमें कहा जाता है कि वे सम्मान लेने दिल्ली जाने को लेकर हिचकिचा रहे थे, क्योंकि उन्हें वाराणसी में अपने मरीजों की चिंता थी.
2 मार्च को X पर किए गए एक पोस्ट में, जिसे 4,000 से ज्यादा रीट्वीट मिले, लिखा गया: “उनकी सोच सीधी थी—‘अगर मैं दिल्ली चला गया, तो OPD में मेरे मरीजों को कौन देखेगा?’ उनके लिए अस्पताल से एक दिन दूर रहना छुट्टी नहीं था, बल्कि एक ऐसा दिन था जब उनके मरीज—जो बिहार और ग्रामीण यूपी से आते थे—इलाज से वंचित रह जाते.”
When the Government of India announced the Padma Shri for Dr. Tapan Kumar Lahiri,
the protocol required him to travel to Rashtrapati Bhavan in New Delhi to receive the honor from the President.However, Dr. Lahiri was hesitant to go. His reasoning was simple: "If I go to… pic.twitter.com/QOleAyyhVN
— D Prasanth Nair (@DPrasanthNair) March 2, 2026
हालांकि, यह तय है कि लाहिरी सम्मान लेने गए थे.
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, 2016 में उन्होंने कहा था, “भगवान विश्वनाथ और मां अन्नपूर्णा की कृपा से मैं आखिरी सांस तक मरीजों की सेवा करता रहूंगा. पद्म श्री देने के लिए मैं सरकार का आभारी हूं.”
जो लोग उन्हें जानते हैं, वे कहते हैं कि इस सम्मान से उनकी जिंदगी में ज्यादा बदलाव नहीं आया. वे वाराणसी लौटे और तुरंत OPD में अपना काम फिर से शुरू कर दिया, जैसे यह सम्मान उनके काम के सामने गौण हो.
लेकिन डिजिटल दुनिया में फैली उनकी छवि और असलियत के बीच फर्क करना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है. कई रील्स, लेख और पोस्ट यह दावा करते हैं कि वे अपनी पेंशन का ज्यादातर हिस्सा गरीब मरीजों को दान कर देते थे और खुद के लिए सिर्फ दो वक्त के खाने जितना रखते थे.
असलियत थोड़ी अलग है. सहकर्मी बताते हैं कि नौकरी के दौरान उन्होंने अपनी सैलरी का एक हिस्सा मरीजों और विश्वविद्यालय को जरूर दिया, लेकिन यह दावा कि वे अपनी पेंशन दान करते थे, सही नहीं है. लाहिरी ने ‘कंट्रीब्यूटरी प्रोविडेंट फंड’ (CPF) योजना चुनी थी, जिसमें रिटायरमेंट के बाद एकमुश्त राशि मिलती है.

2014 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखे एक पत्र में, जिसे दिप्रिंट ने देखा, लाहिरी ने लिखा था: “मुझे कोई पेंशन नहीं मिलती.”
BHU के पूर्व वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ एएन गंगोपाध्याय ने कहा, “यह गलत जानकारी है कि वे अपनी मासिक पेंशन दान करते हैं. उन्हें पेंशन मिलती ही नहीं, क्योंकि उन्होंने CPF योजना चुनी थी.”
‘बनारसी बफून’ से सावधान
लाहिरी लोगों के डॉक्टर थे, लेकिन उन्हें मिलनसार व्यक्ति कहना शायद ठीक नहीं होगा.
घर पर या अस्पताल जाते वक्त उन्हें औपचारिक बातचीत या अभिवादन पसंद नहीं था. धीरे-धीरे लोगों ने उन्हें नमस्ते करना भी बंद कर दिया, इस डर से कि वे डांट न दें. लेकिन इस सख्त व्यवहार के पीछे, अपने मरीजों और स्टाफ के लिए उनका लगाव साफ दिखता था.
डॉ इंद्रनील बसु ने कहा, “काफी समय पहले कुछ नर्सों ने कहा था कि लॉबी में टीवी होना चाहिए, तो डॉ लाहिरी ने उनके लिए टीवी खरीद दिया.”

जनवरी में, उनके एक पूर्व छात्र ने X पर लिखा कि अगर कोई मरीज गरीब होता था, तो लाहिरी उसके इलाज और दवाओं का इंतजाम करते थे—“अक्सर अपनी जेब से. उनके लिए किसी का अकेले दुख झेलना ही काफी था कि वे उसकी मदद करें.”
When I joined Banaras Hindu University as an undergraduate student in the mid-1980s, Dr T. K. Lahiri was already a legend. His name carried weight across the campus, among students, teachers, hospital staff, and most importantly, among patients at Sir Sundarlal Hospital.
Long… https://t.co/07Vw68ay7Q
— Anand Pradhan (@apradhan1968) January 15, 2026
लेकिन सरकारी अफसरों और नेताओं के मामले में वे बिल्कुल अलग थे. लाहिरी किसी को भी खास सुविधा देने के पक्ष में नहीं थे और बिना हिचक ऊंचे पद वालों को भी टोक देते थे.
बसु ने बताया, “करीब 15-20 साल पहले, एक पड़ोसी जिले के जिलाधिकारी सीधे OPD में घुस गए और लाइन तोड़ दी. डॉ लाहिरी ने उन्हें डांटते हुए कहा, ‘तुम बनारसी बफून हो क्या, हर जगह स्पेशल ट्रीटमेंट चाहिए?’ अधिकारी चुपचाप वापस गए और लाइन में खड़े हो गए. जब उनकी बारी आई, तो डॉ लाहिरी ने उनसे सामान्य तरीके से बात की.”
ऐसे कई लोग थे जिन्हें सर्जरी की ज़रूरत थी, लेकिन डॉ. लाहिरी हमेशा उन्हें दवाएं लेने के लिए मजबूर करते थे. वे सही दवाएं तो देते थे, लेकिन कई दिल के मरीज़ सर्जरी के ज़रिए बेहतर ज़िंदगी पा सकते थे.
– एक डॉक्टर जिन्होंने लाहिड़ी के साथ कई सालों तक काम किया
‘बनारसी बफून’ उनका पसंदीदा तंज था, जो वे बड़े IAS अधिकारियों से लेकर अपने छात्रों तक, सबके लिए इस्तेमाल करते थे.
बसु हंसते हुए कहते हैं, “वे पढ़ाते समय भी अपने छात्रों से यही कहते थे.”
लाहिरी जितना दूसरों को विशेष सुविधा देने से बचते थे, उतना ही खुद भी किसी से कोई एहसान लेना पसंद नहीं करते थे—यहां तक कि घर तक लिफ्ट भी नहीं.
बसु ने कहा, “वे कभी किसी से कोई एहसान या खास व्यवहार नहीं लेते थे. मैंने उन्हें कई बार कहा कि मेरा घर उनके घर के पास है, तब जाकर वे मेरी गाड़ी में बैठे—वह भी इस शर्त पर कि यह कोई खास सुविधा नहीं है.”
2018 में स्थानीय खबरों में आया था कि योगी आदित्यनाथ जब वाराणसी में भाजपा के एक कार्यक्रम के दौरान उनसे मिलने पहुंचे, तो लाहिरी ने मिलने से इनकार कर दिया.
बताया जाता है कि उन्होंने कहा था, “अगर उन्हें मुझसे मिलना है, तो मरीज की तरह OPD में आएं, घर पर नहीं.” दोनों की मुलाकात नहीं हुई.

सोशल मीडिया पर ऐसी कहानियों ने उनकी छवि को और बढ़ा दिया—कई लोग उन्हें “भगवान” जैसा मानने लगे. कुछ पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और चंद्रशेखर के साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया था, हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकी.
एक कमेंट में लिखा था, “इनको सिर्फ डॉक्टर मत कहो, ये लाखों लोगों के भगवान हैं.”
चाकू से दूरी रखने वाला सर्जन?
बेहद प्रशिक्षित सर्जन होने के बावजूद, डॉ तपन कुमार लाहिरी अक्सर ऑपरेशन करने से बचते थे और जटिल हृदय व छाती से जुड़ी बीमारियों का इलाज दवाओं से करना पसंद करते थे—ऐसा उनके साथ काम कर चुके कई डॉक्टर बताते हैं. इससे कई बार मतभेद भी पैदा हुए.
एक डॉक्टर, जिन्होंने कई वर्षों तक उनके साथ काम किया, ने कहा, “कई मरीज ऐसे थे जिन्हें सर्जरी की जरूरत थी, लेकिन डॉ लाहिरी उन्हें दवाओं तक ही सीमित रखते थे. दवाएं सही होती थीं, लेकिन कई हार्ट मरीजों को सर्जरी से बेहतर जीवन मिल सकता था.”

कई लोगों के लिए वे ऐसे ‘चमत्कारी डॉक्टर’ थे जो बच्चों के दिल के छेद जैसी जन्मजात बीमारी को भी सिर्फ दवाओं से ठीक कर देते थे. लेकिन उसी डॉक्टर का कहना था कि इस मामले में वे कभी-कभी अपनी राय पर अड़े रहते थे. उन्होंने एक बच्चे का उदाहरण दिया, जिसकी हालत सिर्फ दवाओं से पूरी तरह नहीं सुधर रही थी.
उन्होंने कहा, “वह बच्चा 10 साल का था. जब उसे मुफ्त सर्जरी का विकल्प मिला, तो उसने करवाया और अब पूरी तरह ठीक है. लेकिन डॉ लाहिरी ने कभी उसे सर्जरी की सलाह नहीं दी. दवाएं मदद कर रही थीं, लेकिन नई जिंदगी उसे सर्जरी से मिली.”
डॉ. लाहिरी शायद ही कभी सर्जरी की सलाह देते थे, और वे रात में काम न करने के मामले में बहुत पक्के थे. लेकिन वे एक बहुत ही कुशल डॉक्टर थे, और बेहद समय के पाबंद व ईमानदार भी.
– डॉ. टी.के. लाहिरी के साथ काम कर चुके एक सहकर्मी
हालांकि, लाहिरी की छवि सिर्फ एक ऐसे डॉक्टर की नहीं है जो ऑपरेशन से बचते थे. उनके छात्र रहे डॉ अरविंद कुमार पांडेय ने कहा कि वे एक कुशल सर्जन थे.
डॉ अरविंद कुमार पांडेय ने कहा, “सर सुबह 6:30 बजे अस्पताल आ जाते थे और रात 8 बजे तक रहते थे—राउंड और ऑपरेशन थिएटर का काम पूरा करने के बाद ही जाते थे. वे फेफड़ों और छाती की सर्जरी में बेहद माहिर थे. 2020 तक वे एंजियोस्कोपी भी करते थे, लेकिन उसके बाद थोड़े सीमित हो गए.”
दिलचस्प बात यह है कि एक बार सर्जरी की सलाह देना ही उनके खिलाफ लंबी जांच का कारण बना. 2001 में, जब वे विभागाध्यक्ष थे, एक 74 वर्षीय महिला की डायफ्रामेटिक हर्निया के ऑपरेशन के बाद मौत हो गई. उसके बेटे एसके गांगुली ने भारतीय चिकित्सा परिषद में शिकायत दर्ज कराई और लापरवाही का आरोप लगाया.
2007 में MCI की एथिक्स कमेटी के दस्तावेजों में लाहिरी का लिखित जवाब दर्ज है. उन्होंने कहा, “8 मार्च 2001 को मरीज की मृत्यु हो गई, जबकि हमने उसे बचाने की पूरी कोशिश की थी. मौत सेप्सिस, किडनी फेल्योर और अंतिम अवस्था के पल्मोनरी ओडिमा की वजह से हुई.”
उन्होंने अपनी योग्यता का भी जिक्र किया और कहा कि वे FRCS (C) और एम.च. (थोरेसिक सर्जरी) हैं, और विभाग में लेक्चरर से लेकर प्रोफेसर व विभागाध्यक्ष तक के पदों पर रह चुके हैं.
आखिरकार एथिक्स कमेटी ने “कुछ हद तक लापरवाही और ढीले रवैये” की बात कही, खासकर मरीज के परिवार से सही संवाद न होने को लेकर. उन्हें चेतावनी दी गई.

कमेटी ने कहा, “डॉ लाहिरी द्वारा दिए गए इलाज की समीक्षा में पाया गया कि मरीज के परिवार से पर्याप्त संवाद न होने के कारण ऐसी शिकायतें सामने आईं, जैसे गलत स्थिति में या गलत मात्रा में दवाओं का इस्तेमाल. इन परिस्थितियों को देखते हुए, एथिक्स कमेटी ने सर्वसम्मति से डॉ टी.के. लाहिरी को भविष्य में अधिक सावधानी और संवेदनशीलता बरतने की चेतावनी दी.”
इसके बावजूद, जो लोग उनके तरीकों से असहमत थे, वे भी उनकी ईमानदारी और चिकित्सकीय क्षमता का सम्मान करते थे.
एक अन्य डॉक्टर ने कहा, “डॉ लाहिरी बहुत कम सर्जरी की सलाह देते थे और रात में काम नहीं करते थे. लेकिन वे बहुत अच्छे क्लिनिशियन थे—समय के पाबंद और बेहद ईमानदार.”
बहुत छोटा दायरा
अब अपने 50 के दशक में, डॉ इंद्रनील बसु वाराणसी में निजी प्रैक्टिस करते हैं. हर शाम उनकी क्लिनिक मरीजों से भरी रहती है—बुखार, डायबिटीज, टायफाइड और सिरदर्द के मरीज इलाज के इंतजार में होते हैं. बसु उनसे नरमी और धैर्य के साथ बात करते हैं, ध्यान से सुनते हैं. वे कहते हैं, यह उन्होंने डॉ लाहिरी से सीखा.
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और पड़ोसी होने के कारण, बसु उन गिने-चुने लोगों में थे जिनसे लाहिरी नियमित रूप से मिलते थे. इसके अलावा एक और व्यक्ति थे—अहमद अली, मोहल्ले की किराने की दुकान चलाने वाले. इसके आगे उनका दायरा बेहद सीमित था.

एक घटना ने उन्हें और करीब ला दिया—जब बसु खुद छात्र रहते हुए बीमार पड़ गए.
डॉ इंद्रनील बसु ने कहा, “मुझे एक हफ्ते से बुखार था. कोई डॉक्टर समझ नहीं पा रहा था कि समस्या क्या है. दवाएं ले रहा था, लेकिन असर नहीं हो रहा था. मैं डॉ लाहिरी को दिखाना चाहता था, लेकिन उनके घर जाने से डरता था क्योंकि वे घर पर मरीज नहीं देखते थे.”
उन्होंने लाहिरी के रिश्तेदार सिद्धार्थ चक्रवर्ती को फोन किया, ताकि मुलाकात तय हो सके. जब बसु पहुंचे, तो उनका स्वागत किया गया और चाय भी दी गई, लेकिन जो बात उन्हें सबसे ज्यादा चौंकाने वाली लगी, वह था उस मशहूर डॉक्टर का रहन-सहन.
वहां दो बिस्तर थे, एक पुराना टीवी जो बहुत पहले ही खराब हो चुका था, और एक अलमारी. घर का ज़्यादातर हिस्सा खाली था. पहले, जब उनकी मां जीवित थीं, तो वह उनकी देखभाल करते थे; लेकिन उनकी मृत्यु के बाद, वह पूरी तरह से अकेले रहने लगे.
— सिद्धार्थ चक्रवर्ती, डॉ. लाहिरी के रिश्तेदार
उन्होंने कहा, “उनका पूरा घर किसी हॉस्टल के कमरे जैसा लगता था—एक बिस्तर, कुछ बर्तन, एक भी सजावटी चीज नहीं. वे दशकों से वही कपड़े पहन रहे थे. यहां तक कि उनका छाता भी 30 साल से ज्यादा पुराना था.”
जहां तक उनकी बीमारी का सवाल था, लाहिरी ने उन्हें कुछ भी न करने की सलाह दी.
बसु ने कहा, “उन्होंने कहा कि कुछ मत करो. यह वायरल है, चार दिन में ठीक हो जाएगा. और सच में, बिना कुछ किए मैं ठीक हो गया.”
लेकिन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में लाहिरी का कार्यकाल हमेशा सहज नहीं रहा.
हर किसी के संत नहीं
इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के संस्थापक निदेशक प्रोफेसर केएन उडुपा उन्हें विश्वविद्यालय लेकर आए थे, लेकिन शुरू से ही उनका प्रशासन से टकराव रहा—ऐसा बसु बताते हैं. विभाग को मजबूत करने के लिए लाहिरी ने एक हार्ट-लंग मशीन मंगवाई थी, लेकिन राजनीतिक खींचतान के कारण उसका इस्तेमाल कभी हो ही नहीं पाया.
डॉ इंद्रनील बसु ने कहा, “मशीन को स्टोर में रख दिया गया और 1970 के दशक के अंत में जब बाढ़ आई, तो वह खराब हो गई. उस समय यह सबसे महंगी मशीन थी.”
पद और जिम्मेदारियां बढ़ने के बाद भी हालात ज्यादा नहीं बदले.
कार्डियोथोरेसिक विभाग में उनके साथ काम कर चुके लोगों का कहना है कि विभागाध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल चुनौतीपूर्ण रहा.

एक डॉक्टर, जिन्होंने उनके साथ काम किया और नाम न छापने की शर्त पर बात की, ने कहा, “वे बेहतरीन डॉक्टर और शानदार शिक्षक थे, लेकिन कमजोर प्रशासक. विभाग को नुकसान हुआ क्योंकि वे काफी अहंकारी थे और दूसरों की राय आसानी से स्वीकार नहीं करते थे.”
BHU के बाहर जिस सादगी के लिए उनकी खूब सराहना होती थी, वही अंदर कई लोगों के लिए असहजता का कारण बनती थी. ऊपर उद्धृत डॉक्टर का कहना था कि उनके सहकर्मी खुद को उनकी तरह सादा जीवन न जीने के लिए आंका हुआ महसूस करते थे.
उन्होंने कहा, “एक डॉक्टर को सलीके से रहना चाहिए. फटे कपड़े पहनने में क्या गर्व है? अगर मैं कार चला रहा हूं और समय बचा रहा हूं, तो वही समय मैं मरीज को दे सकता हूं. लेकिन उनके लिए यही चीज उनकी लोकप्रियता का कारण बन गई.”
उन्होंने यह भी कहा कि साफ-सफाई को लेकर भी दिक्कतें थीं.
उन्होंने कहा, “कई बार अस्पताल में डॉक्टरों ने उन्हें जबरदस्ती एप्रन उतारकर धोने को कहा, क्योंकि वह बहुत गंदा हो जाता था.”

अब यह कहना मुश्किल है कि लाहिरी अस्पताल से घर कब, या लौट भी पाएंगे या नहीं. लेकिन उनके पूर्व सहकर्मियों के मुताबिक एक बात तय है—यह उनके मरीजों से आखिरी विदाई है.
एक डॉक्टर, जिन्होंने उनके साथ काम किया, ने कहा, “पिछले 10 सालों से उनकी याददाश्त कमजोर हो रही थी, लेकिन वे दूसरे डॉक्टरों की मौजूदगी में काम करते रहे. अब उनके आराम करने का समय है और अपने जीवन को देखने का. उनके OPD में वापस आने की कोई संभावना नहीं है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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