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Thursday, 12 March, 2026
होमफीचरदिल्ली का ट्यूलिप फेस्टिवल कुछ ही दिनों में मुरझाया, 5 लाख इम्पोर्टेड बल्ब और 2 करोड़ रुपये खर्च

दिल्ली का ट्यूलिप फेस्टिवल कुछ ही दिनों में मुरझाया, 5 लाख इम्पोर्टेड बल्ब और 2 करोड़ रुपये खर्च

दिल्ली ने कई दिनों तक चले फेस्टिवल के लिए नीदरलैंड से पांच लाख से ज़्यादा ट्यूलिप बल्ब इंपोर्ट किए थे. AI समिट के डेलीगेट्स ने उन्हें देखा, लेकिन ज़्यादातर दिल्ली वालों के लिए बहुत देर हो चुकी थी.

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नई दिल्ली: राजधानी में सेल्फी का मौसम आ गया था और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने पिछले हफ्ते लोगों को याद दिलाया था कि वे कश्मीर जाने के बजाय दिल्ली के बीचों-बीच ट्यूलिप के साथ फोटो खिंचवा सकते हैं. कई लोग सज-धज कर फोटो लेने के लिए डिप्लोमैटिक बुलेवार्ड शांति पथ पहुंच गए, जहां रंग-बिरंगे फूलों की कतारें देखने की उम्मीद थी, लेकिन वहां उन्हें फूलों की कब्रगाह जैसी तस्वीर मिली. तने खड़े थे, लेकिन फूल गायब थे.

नई दिल्ली म्यूनिसिपल काउंसिल (NDMC) का चौथा एनुअल ट्यूलिप फेस्टिवल आधिकारिक रूप से 23 फरवरी को शुरू हुआ था और इसे 10 मार्च तक चलना था, लेकिन जब मुख्यमंत्री ने NDMC के एक अन्य दो दिन के फ्लावर फेस्टिवल के उद्घाटन पर ट्यूलिप का ज़िक्र किया, तब तक ज्यादातर पंखुड़ियां झड़ चुकी थीं.

शांति पथ के 2 किलोमीटर लंबे मुख्य प्रदर्शन से लेकर लोधी गार्डन, सेंट्रल पार्क और लुटियंस दिल्ली के कई गोलचक्करों तक—कई जगहों पर तेज़ बसंती धूप में खाली मिट्टी दिखाई दे रही थी.

2023 के G20 से लेकर पिछले महीने हुए एआई इम्पैक्ट समिट तक, ट्यूलिप का यह प्रदर्शन बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों के दौरान दिल्ली के कूटनीतिक स्वागत का हिस्सा बन गया है, लेकिन फूल इवेंट कैलेंडर से प्रभावित नहीं होते. इस बार मौसम लगभग शुरू होते ही खत्म हो गया और बस इतना चला कि एआई समिट में आए मेहमान इन फूलों की एक झलक देख सके.

ठंडे मौसम के लिए बने इस फूल को हर साल दिल्ली में काफी मेहनत से उगाया जाता है—विदेश से बल्ब मंगाकर, तय समय पर रोपाई करके और कई हफ्तों तक देखभाल करके, ताकि फूल मुश्किल से दो हफ्ते तक खिल सकें. यह बागवानी का प्रयोग काफी महंगा भी पड़ता है.

इस साल 5 लाख से ज्यादा बल्ब खरीदे गए, जिनमें ज्यादातर नीदरलैंड से आयात किए गए थे. करीब 37 रुपये प्रति बल्ब के हिसाब से केवल आयातित बल्बों पर ही लगभग 2 करोड़ रुपये खर्च हुए. इस बार असामान्य गर्म मौसम, रोपाई में देरी और दिल्लीवालों को देर से दी गई ‘निमंत्रण’ की वजह से फेस्टिवल और भी जल्दी खत्म हो गया.

7 मार्च को दिल्ली के ट्यूलिप फेस्टिवल के दौरान शांति पथ पर खाली और सूखी ट्यूलिप क्यारियां | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
7 मार्च को दिल्ली के ट्यूलिप फेस्टिवल के दौरान शांति पथ पर खाली और सूखी ट्यूलिप क्यारियां | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

शनिवार दोपहर कुछ कॉलेज के छात्र शांति पथ पहुंचे थे, क्योंकि उन्हें यहां ट्यूलिप के साथ फोटो लेने का काफी प्रचार दिखा था, लेकिन खाली क्यारियां देखकर वे हैरान रह गए.

वहीं एक माली, समय सिंह चौहान, धीरे-धीरे क्यारियों के पास चलकर मिट्टी से घास और सूखे पत्ते साफ कर रहे थे. इसी दौरान रंग-बिरंगे कपड़े पहने तीन युवतियां उनके पास आईं और पूछा कि ट्यूलिप फेस्टिवल कहां है.

चौहान ने खाली क्यारियों की ओर इशारा करते हुए कहा, “अब सब सूख चुका है.” यह सुनकर वे निराश होकर वहां से चली गईं.

चौहान ने उन्हें जाते हुए देखा और कहा, “इतने लोग अच्छे कपड़े पहनकर फोटो लेने आते हैं. उन्हें लगता है कि फेस्टिवल अभी चल रहा है, लेकिन अब देखने के लिए कुछ बचा ही नहीं है.”

दिल्ली के शांति पथ पर सूखे ट्यूलिप पौधों के बीच बचा एक अकेला फूल | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
दिल्ली के शांति पथ पर सूखे ट्यूलिप पौधों के बीच बचा एक अकेला फूल | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

‘इस सब का कोई फायदा नहीं’

करीब दो हफ्ते पहले ही दिल्ली के मशहूर ट्यूलिप फूलों में कमजोरी के संकेत दिखने लगे थे. पीले, गुलाबी और सफेद रंग के चमकीले फूलों के बीच-बीच में खाली डंठल दिखाई दे रहे थे. शांति पथ पर गाड़ी खड़ी करके आए लोग कुछ जगहों पर “फूल ढूंढो” जैसा खेल खेल रहे थे और जैसे ही कहीं फोटो लेने लायक क्यारी मिलती, खुशी से आवाज़ लगा देते.

दिल्ली में तीन साल में सबसे गर्म फरवरी दर्ज होने के कारण ट्यूलिप फूलों को काफी मुश्किल हो रही थी. पिछले शनिवार को मार्च के पहले हफ्ते का पिछले 50 साल में सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया.

माली चौहान ने काम से थोड़ी देर रुकते हुए कहा, “इतनी गर्मी में ट्यूलिप कैसे बचेगा?” ट्यूलिप मिट्टी के नीचे दबे बल्ब से उगता है और फूल आने में लगभग एक महीना लगता है. “जब तापमान बढ़ता है तो बल्ब सूखकर खत्म हो जाता है.”

NDMC के माली समय सिंह चौहान ने कहा कि ट्यूलिप फूल सार्वजनिक रूप से फेस्टिवल शुरू होने से पहले ही सूखने लगे थे | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
NDMC के माली समय सिंह चौहान ने कहा कि ट्यूलिप फूल सार्वजनिक रूप से फेस्टिवल शुरू होने से पहले ही सूखने लगे थे | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

NDMC के बागवानी विभाग के सहायक निदेशक जितेंद्र सिंह डबास ने बताया कि आम तौर पर ट्यूलिप दिसंबर के बीच से आखिर तक लगाए जाते हैं, लेकिन इस साल इन्हें जनवरी के पहले हफ्ते में लगाया गया.

दिल्ली में ये फूल आम तौर पर फरवरी के बीच में सबसे ज्यादा खिलते हैं. इस साल यही समय 16 से 20 फरवरी के बीच हुए एआई इम्पैक्ट समिट के साथ पड़ गया. शांति पथ की क्यारियां तब तक पूरी तरह खिल चुकी थीं और विदेशी मेहमानों के स्वागत के लिए तैयार थीं, लेकिन उस इलाके में कड़ी सुरक्षा थी.

चौहान ने कहा, “हम भी अपना काम करने के लिए अंदर नहीं जा सकते थे. जब बाद में नीदरलैंड के प्रतिनिधि ट्यूलिप देखने आए, तब तक आधे फूल सूख चुके थे.”

23 फरवरी को जब आम लोगों के लिए ट्यूलिप फेस्टिवल शुरू किया गया, तब तक कई फूल मुरझाने लगे थे. तुलना करें तो पिछले साल फेस्टिवल 10 फरवरी को शुरू हुआ था और 23 फरवरी तक चला था.

NDMC के माली समय सिंह चौहान ने कहा, “इस फूल की ज़िंदगी बहुत छोटी होती है. इसमें कोई खुशबू नहीं होती, कुछ भी नहीं. अगर यहां कागज़ के फूल भी लगा दिए जाएं तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा.”

डबास के अनुसार, नीदरलैंड से खरीदे गए 5,17,500 बल्बों में से 3,25,000 NDMC के क्षेत्रों में लगाए गए, जबकि 1,92,500 दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को दिए गए. आयातित बल्बों के अलावा करीब 15,000 बल्ब लोधी गार्डन के एक इनक्यूबेशन सेंटर में स्थानीय रूप से तैयार किए गए, जबकि 20,750 बल्ब हिमाचल प्रदेश के पालमपुर स्थित CSIR–इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी से लिए गए.

डबास ने कहा, “इस साल हर आयातित बल्ब की कीमत करीब 37 रुपये थी. स्थानीय रूप से तैयार बल्ब लगभग आधी कीमत के होते हैं.”

उन्होंने यह भी बताया कि यह खर्च किसी अलग फेस्टिवल बजट से नहीं आता, बल्कि NDMC के वार्षिक बागवानी रखरखाव बजट से किया जाता है.

23 फरवरी को नई दिल्ली में NDMC ट्यूलिप फेस्टिवल के उद्घाटन के दौरान नीदरलैंड की राजदूत मारिसा जेरार्ड्स, NDMC चेयरमैन केशव चंद्र और वाइस चेयरमैन कुलजीत सिंह चहल मौजूद थे. कई फूल सिर्फ कुछ दिनों तक ही टिके | फोटो: एक्स/@tweetndmc
23 फरवरी को नई दिल्ली में NDMC ट्यूलिप फेस्टिवल के उद्घाटन के दौरान नीदरलैंड की राजदूत मारिसा जेरार्ड्स, NDMC चेयरमैन केशव चंद्र और वाइस चेयरमैन कुलजीत सिंह चहल मौजूद थे. कई फूल सिर्फ कुछ दिनों तक ही टिके | फोटो: एक्स/@tweetndmc

ट्यूलिप फेस्टिवल की शुरुआत 2017–18 में एक छोटे बागवानी प्रयोग के रूप में हुई थी, जब 17,000 बल्ब लगाए गए थे और हर बल्ब की कीमत लगभग 25 रुपये थी, लेकिन वर्षों के साथ इसका पैमाना तेज़ी से बढ़ता गया.

2021 में करीब 62,800 ट्यूलिप बल्ब आयात किए गए थे. 2022 में यह संख्या बढ़कर 1.4 लाख, 2023 में 2 लाख, 2024 में 3.25 लाख और 2025 में 5.17 लाख से ज्यादा हो गई.

इस प्रदर्शन को बनाए रखना काफी मेहनत का काम है. शांति पथ के इलाके में करीब 40 से 50 माली काम करते हैं और ट्यूलिप सीजन के दौरान लगभग छह हफ्ते का अतिरिक्त काम बढ़ जाता है. पौधों को बार-बार पानी देना पड़ता है और टूटे या चोरी हुए फूलों को बदलना पड़ता है.

चौहान ने कहा, “मेरे हिसाब से इस सब का कोई फायदा नहीं है.”

NDMC के लिए ट्यूलिप फूल गर्व का विषय बन गए हैं और परिषद के होली संदेश में भी दिखाई दिए | फोटो: एक्स/@tweetndmc
NDMC के लिए ट्यूलिप फूल गर्व का विषय बन गए हैं और परिषद के होली संदेश में भी दिखाई दिए | फोटो: एक्स/@tweetndmc

दिल्ली का ट्यूलिप हाउस

दिल्ली में ट्यूलिप को लेकर अलग-अलग राय सामने आई हैं. NDMC के उपाध्यक्ष कुलजीत सिंह चहल जैसे अधिकारी कहते हैं कि ये फूल राजधानी को “और साफ, हरा-भरा और जीवंत शहर” बनाते हैं और आम लोगों को राष्ट्रपति भवन स्तर की बागवानी देखने का मौका देते हैं.

वहीं पर्यावरण कार्यकर्ता भव्रीन कंधारी ने इस परियोजना को “फिजूलखर्ची” बताया है और कहा है कि इससे दिल्ली के कार्बन फुटप्रिंट में बढ़ोतरी होती है.

2023 में इन आलोचनाओं को कम करने के लिए NDMC ने ‘ट्यूलिप हाउस’ शुरू किया—यह एक स्टोरेज और पौध तैयार करने वाला कक्ष है, जिसका उद्देश्य नाजुक बल्बों की उम्र बढ़ाना और धीरे-धीरे नीदरलैंड से आयात पर निर्भरता कम करना है.

डबास ने कहा, “इस साल हर आयातित बल्ब की कीमत करीब 37 रुपये थी. स्थानीय बल्ब लगभग आधी कीमत के होते हैं.”

लोधी गार्डन में स्टोरकीपर संजय शर्मा इस सुविधा का दरवाजा खोलते हैं. अंदर दो तापमान नियंत्रित कमरे हैं, जहां बल्बों को दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में लगाने से पहले रखा जाता है. इन कमरों में कुछ गमलों में ट्यूलिप भी रखे हैं—यह उन करीब एक लाख पौधों के स्टॉक का हिस्सा है जिन्हें इस सीजन में आम लोगों को 200 से 350 रुपये प्रति गमला में बेचा गया.

लोधी गार्डन के ट्यूलिप हाउस के स्टोरेज रूम के अंदर | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
लोधी गार्डन के ट्यूलिप हाउस के स्टोरेज रूम के अंदर | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
दिल्ली में लगाने से पहले ट्यूलिप को तापमान नियंत्रित कमरों में रखा जाता है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
दिल्ली में लगाने से पहले ट्यूलिप को तापमान नियंत्रित कमरों में रखा जाता है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

शर्मा ने कहा, “हिमाचल और नीदरलैंड से आने वाले सभी ट्यूलिप बल्ब यहां रखे जाते हैं. यहीं से उन्हें शहर के अलग-अलग स्थानों पर भेजा जाता है. फूल यहां नहीं उगाए जाते.”

उन्होंने बताया कि बल्ब आमतौर पर नवंबर के आसपास आते हैं और लगाने के करीब एक महीने बाद फूल खिलते हैं. आदर्श स्थिति में फूल लगभग एक महीने तक रहते हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो पाया.

शर्मा ने कहा, “इस बार गर्मी की वजह से सब खराब हो गया. इन्हें देर से लगाया गया और तापमान भी जल्दी बढ़ गया. करीब 15 दिन पहले ही फूल सूख गए.”

नीदरलैंड और हिमाचल प्रदेश के पालमपुर से आए ट्यूलिप बल्ब लोधी गार्डन के ट्यूलिप हाउस में रखे जाते हैं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
नीदरलैंड और हिमाचल प्रदेश के पालमपुर से आए ट्यूलिप बल्ब लोधी गार्डन के ट्यूलिप हाउस में रखे जाते हैं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

हालांकि, इसकी क्षमता सीमित है. ट्यूलिप हाउस में कोल्ड स्टोरेज में लगभग 50,000 बल्ब ही रखे जा सकते हैं और नियंत्रित तापमान में लगभग 2,000 और तैयार किए जा सकते हैं, जो हर साल आयात किए जाने वाले 5 लाख से ज्यादा बल्बों के मुकाबले बहुत कम है.

सिद्धांत रूप में फूल खिलने के बाद बल्बों को निकालकर फिर से कोल्ड स्टोरेज में रखा जाता है ताकि उन्हें दोबारा इस्तेमाल किया जा सके, लेकिन व्यवहार में ज्यादातर बल्ब बच नहीं पाते.

ट्यूलिप हाउस का प्रबंधन NDMC का बागवानी विभाग करता है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
ट्यूलिप हाउस का प्रबंधन NDMC का बागवानी विभाग करता है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

चौहान ने कहा, “कहा जाता है कि बल्ब लोधी गार्डन के कोल्ड स्टोरेज में रखे जाते हैं, लेकिन ज्यादातर सड़ जाते हैं. उन्हें ठंडा रखने वाली मशीनें अक्सर खराब हो जाती हैं और बहुत कम बल्ब बच पाते हैं. इसलिए हर साल नए बल्ब मंगाने पड़ते हैं.”

डबास ने भी माना कि बल्बों का दोबारा इस्तेमाल करना आसान नहीं है.

उन्होंने कहा, “हम जितने ज्यादा हो सके उतने बल्ब दोबारा इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं, लेकिन ट्यूलिप का जीवन चक्र बहुत छोटा होता है और इन्हें जिंदा रहने के लिए ठंडे मौसम की जरूरत होती है.”

ट्यूलिप में आत्मनिर्भरता

हर साल कुछ ही दिनों की प्रदर्शनी के लिए आधा मिलियन ट्यूलिप बल्ब विदेश से मंगाने की लागत से बचने के लिए NDMC ने हिमाचल प्रदेश के पालमपुर स्थित सीएसआईआर-हिमालय जैवसंसाधन प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएचबीटी) के वैज्ञानिकों के साथ साझेदारी की है.

यह पहल अब अपने तीसरे साल में है और इसका उद्देश्य धीरे-धीरे भारत की आयातित बल्बों पर निर्भरता कम करना है.

संस्थान के फ्लोरीकल्चर डिवीजन के वैज्ञानिक डॉ. भव्य भार्गव ने कहा, “यह एक धीमी और महंगी प्रक्रिया है, लेकिन अगले 10 से 12 साल में हम आयात को लगभग 20 से 25 प्रतिशत तक कम करने की उम्मीद करते हैं.”

उन्होंने बताया कि अभी शोधकर्ता लगभग 10 से 12 किस्म के ट्यूलिप पर काम कर रहे हैं, जिन्हें मोटे तौर पर जल्दी खिलने वाले, मध्य-मौसम और देर से खिलने वाले प्रकारों में बांटा गया है.

संस्थान की भूमिका तब शुरू होती है जब दिल्ली में आयातित फूलों का खिलने का चक्र पूरा हो जाता है.

भार्गव ने कहा, “जब ट्यूलिप फूलता है तो बल्ब अपनी ऊर्जा खो देता है और उसका आकार छोटा हो जाता है. NDMC जब फूलों का सीजन खत्म कर लेता है, तो बल्बों को खोदकर हमें भेज दिया जाता है. हम उन्हें उनके आकार के हिसाब से अलग करते हैं.”

पिछले साल लगभग 85,000 बल्ब IHBT वापस पहुंचे थे.

दिल्ली में फूलों का सीजन खत्म होने के बाद कई ट्यूलिप बल्ब खोदकर हिमाचल प्रदेश के पालमपुर स्थित CSIR-Institute of Himalayan Bioresource Technology को भेजे जाते हैं | फोटो क्रेडिट: डॉ. भव्य भार्गव
दिल्ली में फूलों का सीजन खत्म होने के बाद कई ट्यूलिप बल्ब खोदकर हिमाचल प्रदेश के पालमपुर स्थित CSIR-Institute of Himalayan Bioresource Technology को भेजे जाते हैं | फोटो क्रेडिट: डॉ. भव्य भार्गव

आमतौर पर फूल देने वाले बल्ब का घेरा 12 सेंटीमीटर से ज्यादा होता है, लेकिन फूल आने के बाद कई बल्ब छोटे आकार के रह जाते हैं. इन बल्बों को फिर हिमालय के ठंडे इलाकों जैसे लाहौल और स्पीति के किसानों को भेजा जाता है, जहां का मौसम ट्यूलिप उगाने के लिए सही होता है.

भार्गव ने कहा, “छोटे बल्ब को फूल देने लायक आकार तक पहुंचने में तीन साल तक लग सकते हैं. इस दौरान कलियों को हटा दिया जाता है ताकि पौधे की ऊर्जा फूल बनाने की बजाय बल्ब के आकार को बढ़ाने में लगे.”

ट्यूलिप बल्बों को हिमालय के ठंडे इलाकों जैसे लाहौल और स्पीति के किसानों को भेजा जाता है, जहां उनकी बढ़त के लिए जरूरी ठंडा मौसम मिलता है | फोटो क्रेडिट: डॉ. भव्य भार्गव
ट्यूलिप बल्बों को हिमालय के ठंडे इलाकों जैसे लाहौल और स्पीति के किसानों को भेजा जाता है, जहां उनकी बढ़त के लिए जरूरी ठंडा मौसम मिलता है | फोटो क्रेडिट: डॉ. भव्य भार्गव

जब बल्ब पूरी तरह तैयार हो जाते हैं, तो उन्हें फिर दिल्ली में लगाने के लिए NDMC को भेज दिया जाता है. पिछले साल संस्थान ने करीब 20,000 बल्ब NDMC को दिए थे, जबकि इस साल यह संख्या बढ़कर लगभग 22,000 हो गई.

ट्यूलिप स्वाभाविक रूप से ठंडे मौसम के पौधे हैं, जहां बल्ब जमी हुई मिट्टी में निष्क्रिय रहते हैं और वसंत में अंकुरित होते हैं. इन पौधों को निष्क्रिय अवस्था से बाहर आने के लिए लंबे समय तक ठंड की जरूरत होती है.

भार्गव ने कहा, “लाहौल और स्पीति जैसे ठंडे इलाकों में यह प्रक्रिया बर्फ के नीचे अपने-आप हो जाती है.” “लेकिन दिल्ली जैसे गर्म शहरों में ये परिस्थितियां कृत्रिम तरीके से बनानी पड़ती हैं.”

इसी वजह से बल्बों को लगाने से पहले अक्सर तापमान नियंत्रित जगहों में रखा जाता है. इसके बावजूद दिल्ली में इनके फूलने का समय बहुत छोटा रहता है. फरवरी के अंत और मार्च की ओर तापमान बढ़ते ही फूल जल्दी मुरझा जाते हैं.

दिल्ली के ट्यूलिप फेस्टिवल की आखिरी झलक उसके आधिकारिक समापन से कुछ दिन पहले ही खत्म हो गई थी | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
दिल्ली के ट्यूलिप फेस्टिवल की आखिरी झलक उसके आधिकारिक समापन से कुछ दिन पहले ही खत्म हो गई थी | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

दिल्ली के प्रदर्शन के लिए बल्ब देने के अलावा, संस्थान ठंडे हिमालयी इलाकों में ट्यूलिप की व्यावसायिक खेती के तरीके भी तलाश रहा है. भार्गव ने कहा कि शोधकर्ता लाहौल और स्पीति के किसानों के साथ काम कर रहे हैं और लेह जैसे अन्य ऊंचाई वाले इलाकों में खेती की परिस्थितियों का परीक्षण कर रहे हैं. संस्थान नियंत्रित वातावरण में बिना मिट्टी के ट्यूलिप उगाने के लिए हाइड्रोपोनिक तकनीक पर भी प्रयोग कर रहा है. खास ट्रे और तापमान नियंत्रित चैंबर का इस्तेमाल करके शोधकर्ता 35 दिनों से भी कम समय में ट्यूलिप फूल पैदा करने में सफल हुए हैं.

लेकिन ट्यूलिप का लंबा और महंगा सफर—नीदरलैंड से दिल्ली, फिर हिमाचल और वापस—दिल्ली वालों को वह “डच जैसा नजारा” नहीं दे पाया जिसका वादा किया गया था.

शांति पथ पर अब ट्यूलिप कूटनीति खत्म हो चुकी है और चौहान सफाई के मुश्किल काम में लगे हुए हैं. NDMC के साथ 35 साल से काम कर रहे यह माली अगले साल रिटायर होने वाले हैं. उनका कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया बेकार लगती है.

उन्होंने कहा, “इस फूल की उम्र बहुत छोटी होती है. इसमें कोई खुशबू भी नहीं होती. अगर कागज़ के फूल रख दो तो भी ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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