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Sunday, 26 May, 2024
होमफीचरकश्मीर में क्रिकेट की पिच हमेशा से ही परेशानी भरी रही है, लेकिन महिलाएं इसे बदल रही हैं

कश्मीर में क्रिकेट की पिच हमेशा से ही परेशानी भरी रही है, लेकिन महिलाएं इसे बदल रही हैं

खराब बुनियादी ढांचे और सुरक्षा चिंताओं ने लंबे समय से जम्मू-कश्मीर में क्रिकेट पर असर डाला है, लेकिन अब, रुबिया सैयद जैसी महिलाएं, जो गुजरात जायंट्स के लिए खेलने के लिए तैयार हैं, नियमों को फिर से लिख रही हैं.

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श्रीनगर/अनंतनाग: श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर क्रिकेट स्टेडियम में युवा महिलाओं का एक ग्रुप खुशी से उछल रहा था, कुछ ने टोपी पहन रखी थी, कुछ ने हिजाब पहना था. उन सभी ने हरे और नारंगी रंग की जर्सी पहनी थी और घोषणा की थी कि वो अनंतनाग रेबेल्स हैं.

उनकी खुशी अगस्त में जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन के सहयोग से सद्भावना परियोजना के तहत भारतीय सेना द्वारा आयोजित कश्मीर घाटी की पहली महिला क्रिकेट लीग (डब्ल्यूसीएल) टी20 टूर्नामेंट में उनकी जीत के कारण थी.

26-वर्षीय रुबिया सईद ने इस महीने की शुरुआत में दिप्रिंट से बातचीत के दौरान मुस्कुराते हुए कहा, “मैं वुमेन ऑफ द मैच थी. मेरे छक्के छतों के पार तक गए.”

डब्ल्यूसीएल फाइनल में प्रभावशाली भीड़ उमड़ी थी. यह मैच न केवल बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया था, बल्कि यह पहली बार था कि महिलाओं ने शेर-ए-कश्मीर में कोई टूर्नामेंट खेला था.

जम्मू-कश्मीर में प्रमाणित पेशेवर महिला कोच आबिदा नज़ीर खान ने कहा, “4 साल पहले तक, महिलाओं को शेर-ए-कश्मीर में खेलने की भी अनुमति नहीं थी. यह उन महिलाओं के लिए एक व्यक्तिगत उपलब्धि थी जो अक्सर पुरुषों के लिए हूटिंग करती थीं और किसी दिन शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में खेलने की इच्छा रखती थीं.”

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फिर भी, जबकि कश्मीर में महिला क्रिकेटरों की यात्रा चुनौतियों से भरी रही है, मान्यता के लिए उनका संघर्ष घाटी में क्रिकेट और सामान्य रूप से खेल की व्यापक कहानी के समान है.

1990 में आतंकवाद के चरम पर शेर-ए-कश्मीर को बंद कर दिया गया था और लगभग दो दशकों तक केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने उस पर कब्जा कर लिया.

हालांकि, कथित तौर पर क्रिकेट स्टेडियम को 1996 में खिलाड़ियों के लिए सुलभ बना दिया गया था, लेकिन 2007 तक यह स्थल क्रिकेट केंद्र के बजाय एक अर्धसैनिक कैंप की तरह रहा. आखिरी बार यहां एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैच 1980 के दशक में हुआ था और आखिरी बार 2018 में रणजी मैच खेला गया था.

उसी अवधि में जम्मू-कश्मीर खेल परिषद के सचिव वहीद परा ने कहा, “यहां तक कि शेर-ए-कश्मीर के इनडोर स्टेडियम और बख्शी स्टेडियम (मुख्य रूप से फुटबॉल के लिए इस्तेमाल किया जाता है) पर भी सीआरपीएफ ने कब्जा कर लिया था. उन्हें 2016 और 2018 के बीच मंजूरी दे दी गई थी, जब भाजपा-पीडीपी सरकार सत्ता में थी.”

समग्र खेल परिदृश्य में करने के लिए बहुत कुछ है. कश्मीर में अस्थिर सुरक्षा स्थिति का मतलब है कि खेल पिछड़ गया है, खिलाड़ी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं.

परा के अनुसार, खेल को लगातार सरकारों द्वारा “आतंकवाद-रोधी कार्यक्रम” की तरह माना गया, लेकिन कभी भी इसे गंभीरता से नहीं लिया गया.

पारा ने कहा, “उग्रवाद रोधी योजनाओं के हिस्से के रूप में युवाओं को शामिल करने के लिए समय-समय पर लीग और मैच आयोजित किए जाते हैं, लेकिन कोई दीर्घकालिक योजना नहीं है, कोई बुनियादी ढांचा नहीं है और प्रतिभा को पोषित करने की कोई प्रक्रिया नहीं है. इन सबके बीच, असली प्रतिभा खो जाती है.”

भले ही लंबे समय से चली आ रही प्रणालीगत समस्याएं बनी हुई हों, फिर भी महिला क्रिकेटरों के लिए डब्ल्यूसीएल टूर्नामेंट एक महत्वपूर्ण मोड़ था.


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‘पिछले 2-3 सालों में चीज़ें बदल गई हैं’

कश्मीरी क्रिकेटर जसिया अख्तर ने अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए गरीबी और आतंकवादी धमकियों को चुनौती दी, लेकिन अंततः जम्मू-कश्मीर में बुनियादी ढांचे की कमी के कारण उन्हें लगभग 10 साल पहले पंजाब में शिफ्ट होने के लिए मजबूर होना पड़ा. इस साल वो दिल्ली कैपिटल्स के लिए खेलते हुए महिला प्रीमियर लीग (डब्ल्यूपीएल) के लिए चुनी जाने वाली पहली कश्मीरी महिला बनीं.

2023 में इसी तरह की एक और प्रेरणादायक कहानी है, लेकिन एक महत्वपूर्ण अंतर के साथ. अनंतनाग की रुबिया सैयद के डब्ल्यूपीएल के आगामी सीज़न में गुजरात जायंट्स के लिए खेलने की उम्मीद है, लेकिन, अख्तर के विपरीत, उन्हें अपने क्रिकेट सपनों को पूरा करने के लिए जम्मू-कश्मीर छोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ी.

कोच खान ने कहा, “ईमानदारी से कहूं तो, अगर जसिया अख्तर पंजाब नहीं गई होती, तो वह डब्ल्यूपीएल तक नहीं पहुंच पाती, लेकिन पिछले दो या तीन वर्षों में, महिला क्रिकेट की सामान्य धारणा बदल गई है.”

Jasia Akhtar, Kashmir’s only female cricketer to be picked for the first Women’s Premier League by Delhi Capitals | YouTube
जसिया अख्तर, कश्मीर की एकमात्र महिला क्रिकेटर हैं जिन्हें दिल्ली कैपिटल्स द्वारा पहली महिला प्रीमियर लीग के लिए चुना गया | यूट्यूब

खान के अनुसार, श्रीनगर में 19-26 अगस्त तक आयोजित 10 दिवसीय डब्ल्यूसीएल कार्यक्रम, जिसमें पूरे कश्मीर से 12 टीमें शामिल थीं, ने महिला क्रिकेट में हो रहे बदलाव का संकेत दिया.

उन्होंने कहा, “महिला खिलाड़ियों को इस मौके का लंबे समय से इंतज़ार था. सबसे खास बात यह थी कि महिला लीग के दौरान राष्ट्रीय क्रिकेट मानक बनाए गए थे.” उन्होंने आगे कहा, “इससे खिलाड़ियों को पता चला कि दिल्ली में खेल कैसे खेला जाता है.”

खेलों के भविष्य के लिए कुछ अन्य आशाजनक संकेत भी हैं, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने केंद्र शासित प्रदेश में खेलों को बढ़ावा देने के लिए 145 करोड़ रुपये के बजट की घोषणा की है. उन्होंने कहा, “जम्मू और कश्मीर खेल क्षेत्र में एक पावरहाउस बन रहा है.”

क्रिकेट के मामले में भी जम्मू और कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (जेकेसीए) बुनियादी ढांचे में सुधार और महिलाओं सहित प्रतिभाओं को पोषित करने के अभियान पर है.


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टैलेंट की खोज, महिलाओं पर ध्यान

सितंबर की एक भरी दोपहर में लड़कियों का एक ग्रुप, जिनमें से कुछ 11 वर्ष की थीं, श्रीनगर में जेकेसीए स्टेडियम की ओर जाने वाले रास्ते पर भारी बैकपैक ले जा रही थीं.

कुछ लोग सीधे स्कूल से आ रहे थे उनके माता-पिता उनके साथ थे और वो सब प्रैक्टिस के लिए तैयार थे: वार्म-अप, घंटों बल्लेबाजी और गेंदबाजी की प्रैक्टिस.

पास के क्रिकेट बॉडी के कार्यालय की बड़ी खिड़की से जेकेसीए प्रभारी माजिद डार ने इस कार्यवाही को करीब से देखा.

कुछ मिनटों तक देखने के बाद वो नीचे आए और लड़कियों को सीधा होने और अपनी पॉजिशन ठीक करने का निर्देश दिया. डार ने क्रिकेट का बल्ला लहराया और लड़कियों के अनुसरण में सही हरकतों का प्रदर्शन किया.

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कश्मीरी क्रिकेटर बिस्मा हसन, जेकेसीए स्टेडियम के नेट्स पर प्रैक्टिस करते हुए | फोटो: सागरिका किस्सू/दिप्रिंट

फिर वो एक-एक करके गए और उनके कंधों को ठीक किया. उन्होंने कहा, “इसे ऐसे किया जाना चाहिए.”

श्रीनगर के 43-वर्षीय पूर्व रणजी खिलाड़ी और कोच डार को दो साल पहले जेकेसीए को पुनर्जीवित करने का कठिन काम सौंपा गया था.

जीर्ण-शीर्ण प्रैक्टिस नेट का नवीनीकरण किया गया, नए बल्ले, हेलमेट, गेंदें खरीदी गईं और महिला खिलाड़ियों के लिए पूरे कश्मीर में एक प्रतिभा खोज का आयोजन किया गया.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “जब मैंने जेकेसीए का कार्यभार संभाला, तो जो बात मेरे ज़ेहन में आई वो यह थी कि स्टेडियम में कोई महिला खिलाड़ी नहीं थीं. सभी पुरुष थे. तभी हमने महिला खिलाड़ियों को आकर्षित करने के लिए कश्मीर के सभी जिलों में प्रतिभा खोज के संबंध में एक अधिसूचना भेजी.”

शुरुआत में केवल दो महिलाओं ने प्रतिक्रिया दी. डार ने दावा किया, “फिर मैं आगे बढ़ा और इन खिलाड़ियों के माता-पिता से बात करने की कोशिश की. मैंने उन्हें विश्वास में लिया और प्रक्रिया समझाई. आज, दूर-दूर से लगभग 30 महिला खिलाड़ी हर दिन यहां प्रैक्टिस करने के लिए स्टेडियम में आती हैं.”

इन महिलाओं में बडगाम की 22-वर्षीय सबा जान हैं. “क्या बॉल है! क्या बॉल है!” वो चिल्लाई और उन्होंने चमड़े की कॉर्क गेंद को आसानी से पकड़ लिया.

सबा प्रैक्टिस के लिए हर दिन अपनी स्कूटी पर दो घंटे की यात्रा करती हैं. जब वो स्टेडियम पहुंचती है, तो अपने अबाया को खेल की वर्दी से बदल लेती है और मैदान में उतर जाती हैं.

सबा बडगाम जिले की एकमात्र खिलाड़ी हैं. उन्हें पिछले साल जेकेसीए ट्रायल के बारे में पता चला और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. डब्ल्यूसीएल टूर्नामेंट में वो बडगाम स्ट्राइकर्स टीम का हिस्सा थीं, जो उपविजेता रही.

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सबा जान, बडगाम स्ट्राइकर्स की क्रिकेटर | फोटो: सागरिका किस्सू/दिप्रिंट

घर जाने के लिए तैयार होते समय अपना अबाया ठीक करते हुए हंसते हुए सबा ने कहा, “मुझे अपने पैरेंट्स को समझाने में कुछ समय लगा, लेकिन अब वो मुझे क्रिकेट की प्रैक्टिस करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं. बडगाम में बहुत से लोग नहीं जानते थे कि मैं क्रिकेट खेलती हूं, जब तक कि उन्होंने मुझे श्रीनगर में महिला लीग खेलते हुए नहीं देखा. अब वो मेरी गेंदबाजी के प्रशंसक हैं.”

फिर भी क्षेत्र में क्रिकेट को फिर से जगाने के उनकी कोशिशों के बावजूद, चाहे वो पुरुषों के लिए हो या महिलाओं के लिए, जेकेसीए अभी भी अपने परेशान अतीत के लंबे समय तक बने रहने वाले प्रभावों से निपट रहा है, जिसमें एक बड़े भ्रष्टाचार के मामले की गूंज भी शामिल है. इसने कश्मीर में कमजोर सुरक्षा स्थिति के साथ मिलकर, इस क्षेत्र में एक संपन्न क्रिकेट परिदृश्य बनाना चुनौतीपूर्ण बना दिया है.


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‘क्रिकेट परिदृश्य अभी सुलझा नहीं है’

दशकों से आतंकवाद और सुरक्षा चिंताओं ने जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर क्रिकेट और खेलों के विकास को बाधित किया है. सुरक्षा स्थिति अप्रत्याशित है, छिटपुट कर्फ्यू और शटडाउन जैसे कारकों के कारण बड़े मैचों का आयोजन करना और खिलाड़ियों के लिए नियमित अभ्यास में भाग लेना मुश्किल हो जाता है.

भारत के लिए खेलने पर खिलाड़ियों को धमकियां मिलने की खबरें आई हैं और बुनियादी ढांचे की कमी के साथ पुरानी समस्याएं भी हैं. दशकों के दौरान, कई होनहार क्रिकेटर जम्मू-कश्मीर में बहुत कम उम्मीद देखकर देश के अन्य हिस्सों में चले गए हैं. उदाहरणों में जसिया अख्तर और मिथुन मन्हास शामिल हैं, जो आईपीएल में खेलने वाले जम्मू-कश्मीर के पहले खिलाड़ी बने.

जेकेसीए भी लंबे समय से विभिन्न विवादों के केंद्र में रहा है. इनमें से सबसे गंभीर मामला 2012 में था, जब भ्रष्टाचार के आरोपों की आंधी ने क्रिकेट संस्था को हिलाकर रख दिया था, जिसमें “खेल को बढ़ावा देने” की आड़ में 40 करोड़ रुपये से अधिक की कथित हेराफेरी शामिल थी. उस समय तत्कालीन राज्य के मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला थे और वो क्रिकेट संस्था के अध्यक्ष पद पर 2001 से कार्यरत थे.

आरोपों के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के साथ-साथ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की बड़े पैमाने पर जांच शुरू हुई.

आरोप लगाया गया था कि 2005 और 2011 के बीच जेकेसीए के कोषाध्यक्ष अहसान अहमद मिर्जा और तत्कालीन महासचिव सलीम खान ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) से जेकेसीए के नाम के तहत फर्जी खातों में धन भेजा था.

2020 में ईडी ने कथित घोटाले के सिलसिले में 21 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क की थी. इनमें से 11.86 करोड़ रुपये की संपत्ति पूर्व सीएम अब्दुल्ला की थी. इस मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच अभी भी जारी है, लेकिन अब्दुल्ला को पिछले साल अगस्त में ज़मानत दे दी गई थी.

जम्मू और कश्मीर की खेल परिषद से जुड़े एक सूत्र ने आरोप लगाया, “जेकेसीए राजनीति से ग्रस्त है. सबसे लंबे समय तक पैसे को व्यक्तिगत लाभ और राजनीतिक दलों को चलाने के लिए इस्तेमाल किया गया था. नतीजतन खिलाड़ियों को नुकसान हुआ. कौन आईपीएल के लिए जाता है और कौन नहीं, यह भी राजनीति से तय किया जाता है.”

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जेकेसीए कार्यालय में क्रिकेटर शेराज़ा बानो, जेकेसीए कैंप में भाग लेने वाली महिलाओं में से एक, क्रिकेट संस्था के कार्यालय में माजिद डार के साथ अपने खेल पर चर्चा करती हुई | फोटो: सागरिका किस्सू/दिप्रिंट

पुरुष क्रिकेट टीम के कोच आबिद नबी को चार-पांच साल पहले की निराशाजनक स्थिति अच्छी तरह याद आती है – कोई टर्फ विकेट नहीं, कोई उचित नेट नहीं और कोचों की भारी कमी.

फिर, 2021 में जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने जेकेसीए की बागडोर बीसीसीआई को सौंप दी, जिसने केंद्र शासित प्रदेश में क्रिकेट की देखरेख के लिए तीन सदस्यीय उपसमिति नियुक्त की. इस समिति में पूर्व क्रिकेटर मिथुन मन्हास, ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) अनिल गुप्ता और वकील सुनील सेठी शामिल हैं. गौरतलब है कि सभी मूल रूप से जम्मू के रहने वाले हैं और सेठी और गुप्ता दोनों भाजपा के प्रवक्ता हैं. जम्मू-कश्मीर के क्रिकेटर माजिद डार इस उप-समिति के तहत प्रभारी के रूप में काम करते हैं.

नबी ने कहा, तब से क्रिकेट सुविधाओं में सुधार हुआ है, लेकिन कुछ बुनियादी समस्याएं बनी हुई हैं.

उन्होंने कहा, “अब 80 प्रतिशत सुविधाएं हैं, लेकिन क्रिकेट परिदृश्य अभी तक सुलझाया नहीं जा सका है. जेकेसीए में अभी भी विवाद देखने को मिलते रहते हैं. इसका कार्यभार बीसीसीआई द्वारा नियुक्त एक उप-समिति ने ले लिया है, जो राजनीति से प्रेरित प्रतीत होता है और जेकेसीए क्लबों के लिए कोई चुनाव नहीं हैं.”


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महिलाओं के लिए बदलाव धीमा

अनंतनाग के मेहंदी कदल स्टेडियम में प्रतिबद्ध महिला क्रिकेट खिलाड़ियों का एक ग्रुप जम्मू-कश्मीर स्पोर्ट्स काउंसिल के सचिव नुज़हत गुल के आगमन का इंतज़ार कर रहा है. उन्होंने कहा कि स्टेडियम में एक बुनियादी आवश्यकता, चेंजिंग रूम के लिए उनका लंबे समय का अनुरोध अनसुना कर दिया गया है.

अनंतनाग रेबेल्स की 22-वर्षीय ऑलराउंडर क्रिकेटर सपना इकबाल ने कहा, “जब भी हम यहां आते हैं, हम स्टेडियम प्रबंधक से बाहर जाने का अनुरोध करते हैं ताकि हम उनके कार्यालय में बदलाव कर सकें. ऐसी स्थिति है.”

महिलाओं का मानना है कि सुविधाओं की कमी एक बाधा है, लेकिन उनकी अन्य शिकायतें भी हैं.

इकबाल ने बताया कि महिलाओं के टूर्नामेंट की पुरस्कार राशि पुरुषों की तुलना में काफी कम है. उन्होंने दावा किया कि अगर पुरुष 2 से 3 लाख रुपये जीतते हैं तो महिला टीम को 50,000 रुपये मिलते हैं. फिर पैसे को 12 खिलाड़ियों के बीच बांटना होता है.

प्रैक्टिस के दौरान अनंतनाग रेबेल्स की गेंदबाज तसीना निसार | फोटो: सागरिका किस्सू/दिप्रिंट
प्रैक्टिस के दौरान अनंतनाग रेबेल्स की गेंदबाज तसीना निसार | फोटो: सागरिका किस्सू/दिप्रिंट

वित्तीय बाधाएं कई महिला खिलाड़ियों को अपने माता-पिता पर निर्भर रहने के लिए मजबूर करती हैं और यात्रा खर्च को कवर करना मुश्किल होता है. परिणामस्वरूप, कई प्रतिभाशाली खिलाड़ियों ने खेलना छोड़ दिया.

इसके अलावा उस क्षेत्र में जहां भारी बर्फबारी के कारण छह महीने तक सड़कें और राजमार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं, वहां एक भी इनडोर क्रिकेट स्टेडियम नहीं है. खिलाड़ियों को सर्दी के दौरान खेलना जारी रखने के लिए जम्मू जाना पड़ता है, जो हर किसी के लिए संभव नहीं है.

इकबाल ने कहा, “हमें इनडोर स्टेडियमों की ज़रूरत है क्योंकि सर्दियों में जम्मू जाना मुश्किल है. कुछ लोग इसका इंतज़ाम कर सकते हैं, लेकिन सब नहीं कर सकते. जम्मू-कश्मीर जैसी प्रतिभा से भरपूर जगह में एक इनडोर क्रिकेट स्टेडियम एक आवश्यकता है.”

सामाजिक लैंगिक पूर्वाग्रह एक पूरी अन्य समस्या है. सोशल मीडिया पर महिलाओं के क्रिकेट खेलने के वीडियो पर अक्सर नकारात्मक टिप्पणियां आती हैं, जिससे उनके मनोबल पर असर पड़ता है.

इकबाल ने कहा, “श्रीनगर में क्रिकेट खेलने वाली एक महिला का जश्न खुशी से मनाया जा सकता है, लेकिन गांवों में इस तरह की उपलब्धि अभी भी भौंहें चढ़ा देगी.”

लेकिन कोच आबिदा नज़ीर का कहना है कि बदलाव हो रहा है, भले ही धीरे-धीरे. वो उस समय को याद करती हैं जब महिलाओं को बिना किसी ट्रेनिंग या तैयारी के केवल कुछ दिन पहले ही मैचों की सूचना दी जाती थी.

उन्होंने बताया, “महिला क्रिकेट पर समय और ध्यान नहीं दिया गया. कोई फिटनेस या कौशल कैंप नहीं था. मैच से पांच दिन पहले आपको कॉल आएगा. महिलाओं के पास कोई किट नहीं थी, कोई प्रैक्टिस नहीं थी. इसकी वजह से कई अच्छे खिलाड़ी बाहर हो जाएंगे.”

इकबाल बताती हैं, “लेकिन अब, जेकेसीए आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए किट की व्यवस्था कर रहा है. ये बदलाव ज़मीनी स्तर पर हुए हैं. अब लोग यहां की महिला खिलाड़ियों को जानने लगे हैं.”

सेना की ओर से प्रोत्साहन

श्रीनगर में महिला क्रिकेट लीग के दौरान खिलाड़ियों को अनोखा आवास दिया गया था: बादामी बाग छावनी के अंदर कैंप.

यह व्यवस्था सेना अधिकारी कर्नल मनोज डोबरियाल के दिमाग की उपज थी, जिन्होंने रुबिया सैयद और अन्य खिलाड़ियों के इस विचार के साथ उनसे संपर्क करने के बाद महिलाओं के लिए एक विशेष खेल कार्यक्रम आयोजित करने पर जोर दिया था, लेकिन योजना के सफल होने के बाद भी, कुछ खिलाड़ियों में घबराहट थी.

डोबरियाल ने उत्साह से कहा, “लड़कियां शुरू में झिझक रही थीं, लेकिन समय के साथ मैंने उन्हें खुलते हुए देखा. पहले दिन मैच की शुरुआत में कोई भी मुझसे हाथ नहीं मिलाता था. तीसरे दिन, यह एक अलग दृश्य था. ये महिलाएं थीं दूर-दराज के गांवों से थी, उनमें से कई पहली बार श्रीनगर आई थीं.”

सुदूर कश्मीरी गांवों के इन खिलाड़ियों के लिए श्रीनगर दिल्ली की तरह है, जहां मॉल, हाल ही में खुला थिएटर, बड़े रेस्तरां, खेल के मैदान और स्टेडियम उपलब्ध हैं.

टूर्नामेंट से एक दिन पहले खिलाड़ियों को महिला क्रिकेट खिलाड़ी के जीवन पर केंद्रित फिल्म घूमर दिखाई गई.

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कश्मीर डब्ल्यूसीएल के सैनिक कश्मीर डब्ल्यूसीएल में तिरंगा दिखाते हुए | एक्स/@diprjk

डोबरियाल ने कहा, “इनमें से 90 प्रतिशत लड़कियों के लिए यह पहली बार था जब वे बड़े पर्दे पर कोई फिल्म देख रही थीं. फिल्म के बाद, वे रोने लगीं.”

विशेष रूप से सेना ने इस कार्यक्रम का आयोजन “ऑपरेशन सद्भावना” के तहत किया था, जिसकी कल्पना 90 के दशक में उग्रवाद के चरम के दौरान की गई थी. सद्भावना के तहत, सेना कार्यक्रम, टूर्नामेंट और अन्य युवा-केंद्रित पहल आयोजित करके जनता से जुड़ती है.

महिला क्रिकेट लीग के लिए सेना के विज्ञापनों में से एक में टूर्नामेंट को युवा महिला खिलाड़ियों को “सशक्त” करने का एक कार्य बताया गया. खिलाड़ियों के लिए, यह खेल के प्रति अपने कौशल और जुनून को प्रदर्शित करने का एक मंच था.

कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण बिंदु पूर्व राष्ट्रीय महिला क्रिकेट कप्तान मिताली राज की उपस्थिति थी, जिन्होंने विजेता टीम को ट्रॉफी प्रदान की और एलजी मनोज सिन्हा के साथ चाय पर उनके साथ बातचीत की.

हालांकि, वहीद परा सशंकित थे. उन्होंने दावा किया, “वे (सरकारें/प्रशासन) एक खास आयोजन के लिए युवाओं का इस्तेमाल करते हैं और फिर उन्हें फेंक देते हैं.”

लेकिन ऑलराउंडर रुबिया सैयद के लिए टूर्नामेंट अभी खत्म होने से बहुत दूर है. रणजी ट्रॉफी जैसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में अपने कौशल का प्रदर्शन करने के बाद अब कथित तौर पर उन्होंने आगामी डब्ल्यूपीएल सीज़न के लिए गुजरात जायंट्स में जगह बना ली है.


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छिप-छिप कर खेलने से WPL तक का सफर

एक किसान की बेटी रुबिया सैयद कश्मीर के अनंतनाग शहर से 13 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव बदसगाम में रहती हैं.

कुछ साल पहले तक वे जिले की एकमात्र खिलाड़ी थीं, लेकिन अब उनके जैसे 20 अन्य खिलाड़ी हैं. सैयद ने घर-घर जाकर माता-पिता को अपनी बेटियों को लीग में भाग लेने देने के लिए मनाया.

बदासगाम में लड़कियां उन्हें गर्व से “क्रिकेट दीदी” कहती हैं, लेकिन उनकी यात्रा कठिन थी. उनकी मां याद करती हैं कि कैसे बचपन में सैयद खिलौनों या चिप्स के बजाय क्रिकेट गेंदों को चुनती थीं और फिर एक बड़ी लकड़ी की छड़ी का उपयोग करके क्रिकेट खेलती थीं.

Rubia Syed
अनंतनाग के बदसगाम गांव में अपने घर पर रुबिया सैयद | फोटो: सागरिका किस्सू/दिप्रिंट

उस समय क्रिकेट खेलने वाली महिलाओं को सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता था, जिससे सैयद को अपने घर के आंगन में अपने कौशल को निखारने के लिए प्रेरित होना पड़ा. वो प्लास्टिक की गेंद को दीवार पर मारती थीं, लड़कों को गली क्रिकेट खेलते देखकर गुप्त रूप से सीखी गई चालों की नकल करती थी.

अब, सैयद को एक दिन भारतीय महिला क्रिकेट टीम के लिए खेलने की उम्मीद है.

सैयद ने अपने आंगन में सेब के पेड़ के नीचे खड़े होकर कहा, “पिछले 20 साल में मैं बस इतना करना चाहती थी कि समाज की धारणाएं बदलूं और उन्हें दिखाऊं कि महिलाएं भी क्रिकेट खेल सकती हैं. अनंतनाग से अन्य महिलाओं को क्रिकेट खेलने के लिए आते देखकर मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं किसी तरह सफल हो गई हूं.”

डार को उनके ऊपर गर्व है. उन्होंने कहा, वो मैदान में किसी भी पुरुष क्रिकेटर से तेज़ दौड़ती हैं.

सैयद ने कहा, पिछले साल जम्मू-कश्मीर बनाम पुडुचेरी मैच में महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज ने अपनी पूरी टीम को रुबिया सैयद की बल्लेबाजी देखने के लिए मजबूर किया. “यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी. इससे मुझे बेहतर करने का आत्मविश्वास मिला.”

वो अकेली महिला क्रिकेटर नहीं हैं जो बड़े सपने देखती हैं. तमाम चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, विराट कोहली की कट्टर प्रशंसक सपना इकबाल भी अपने लिए नाम कमाने की उम्मीद रखती है.

वे कहती हैं, “मैंने इंस्टाग्राम पर विराट कोहली को सैकड़ों संदेश लिखे हैं. मैं मिताली राज से मिली.”, “अब, मैं एक बार विराट कोहली से मिलना चाहती हूं. मैं कोहली के लिए भारत बनाम पाकिस्तान के सभी मैच देखती हूं.”

(संपादन: फाल्गुनी शर्मा)

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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