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Tuesday, 3 February, 2026
होमफीचरचंडीगढ़ कभी भारत के लिए एक मिसाल था—अब वह अपनी पहचान खो रहा है और एक आम भारतीय शहर बनता जा रहा है

चंडीगढ़ कभी भारत के लिए एक मिसाल था—अब वह अपनी पहचान खो रहा है और एक आम भारतीय शहर बनता जा रहा है

नेहरू के साहसिक विज़न और ले कॉर्बूसियर के डिज़ाइन ने चंडीगढ़ को खास बनाया. अब यह भी दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसी शहरी समस्याओं से जूझ रहा है.

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चंडीगढ़: दो साल पहले, अरुणा चौहान और उनके परिवार ने अपना सामान समेटा, उस घर के दरवाज़े बंद किए जिसमें वे तीन दशक से ज़्यादा समय से रह रहे थे, और चंडीगढ़ छोड़ दिया. यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन अचानक भी नहीं था. आखिरकार, चंडीगढ़ एक अलग तरह का भारतीय शहर था, जो बेहतर जीवन, चौड़ी सड़कों, फुटपाथ और सुनियोजित, व्यवस्थित इलाकों के लिए जाना जाता था. लेकिन अब यह सब बदल रहा है.

चौहान परिवार सड़क विक्रेताओं, कचरे और बढ़ती गाड़ियों की संख्या से परेशान हैं. वे अपने बच्चों के लिए और अपने लिए, उम्र बढ़ने के साथ, एक बेहतर ज़िंदगी चाहते थे. वे अकेले नहीं हैं जिन्होंने सेक्टर 41 में अपना फ्लैट छोड़ा या बेच दिया है. कभी बेहद पसंद किया जाने वाला यह इलाका अब ऐसा हो गया है कि यहां के करीब 50 प्रतिशत फ्लैट या तो बिकाऊ हैं या किराये पर दिए जा रहे हैं.

“चंडीगढ़ पहले अलग था. यहां हमें बेहतर जीवन मिलता था. अब यह किसी भी दूसरे भारतीय शहर की तरह अव्यवस्थित लगने लगा है,” 53 वर्षीय चौहान ने कहा.

जब दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जाम, अव्यवस्था और यात्रियों की परेशानियों से जूझ रहे हैं, तब भारत की शहरी कहानी में चंडीगढ़ हमेशा एक अलग उदाहरण रहा है. इसकी पैदल चलने योग्य सड़कें बाकी भारत के लिए ईर्ष्या का विषय थीं. लेकिन अब लगता है कि चंडीगढ़ अपनी ही शुरुआती बेदाग़ सफलता का शिकार हो गया है. स्विस-फ्रेंच आर्किटेक्ट ले कॉर्बूसियर ने शहर को जो पहचान दी थी, वह अब धुंधली होती जा रही है.

भारत का पहला नियोजित शहर, जवाहरलाल नेहरू की एक महत्वाकांक्षी शहरी परियोजना, चंडीगढ़ दोनों ओर पेड़ों वाले चौड़े फुटपाथों के लिए जाना जाता है, जो कई भारतीय शहरों की मुख्य सड़कों से भी चौड़े हैं. लेकिन 75 साल बाद, ये पहचान दबाव में आ गई हैं. बढ़ती आबादी, पलायन, ट्रैफिक जाम और खराब कचरा प्रबंधन व्यवस्था “चंडीगढ़वासियों” को इस शहर को रिटायरमेंट के ठिकाने के रूप में दोबारा सोचने पर मजबूर कर रही है. चंडीगढ़ अब एक आम भारतीय शहर बनता जा रहा है.

Greater Chandigarh
ग्रेटर चंडीगढ़ में ऊंची इमारतें और अस्थायी निर्माण। ले कॉर्बूसियर के ओरिजिनल ग्रिड के बाहर, इसमें मोहाली और पंचकूला जैसे सैटेलाइट शहर शामिल हैं | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

“चंडीगढ़ एक नाज़ुक मोड़ पर है. यह लगभग खाई के किनारे खड़ा है,” ले कॉर्बूसियर सेंटर की निदेशक और 2002 से चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर में फैकल्टी सदस्य दीपिका गांधी ने कहा. “एक गलत कदम और हम गहरी परेशानी में जा सकते हैं. 2020 से 2030 के बीच के साल असल में शहर को परिभाषित करेंगे. दबाव बढ़ रहा है.”

अव्यवस्था की बनावट

ले कॉर्बूसियर और नेहरू का एक सपना था. वह था 1950 के दशक की उभरती आधुनिकता में रचा-बसा एक शहर बनाना. यह साहसिक था, क्योंकि आज़ादी के बाद के दशक में भारत की पारंपरिक वास्तुकला को अपनाने का आकर्षण बहुत ज़्यादा था. भारतीय शहर अपनी प्राचीन, स्वाभाविक बनावट में डूबे हुए थे. कोई भी आधुनिक चीज़ बेरंग लग सकती थी.

ले कॉर्बूसियर शहर को इंसानी शरीर की तरह देखते थे, जिसमें अलग-अलग कामों के लिए अलग हिस्से हों. चंडीगढ़ का नक्शा ग्रिड पैटर्न पर बना, जिसमें खुद में पूरी तरह सक्षम सेक्टर थे. हर सेक्टर में मोहल्ला बाज़ार, बूथ और हरित पट्टियां थीं. दुकानों को पारंपरिक मिश्रित उपयोग के रूप में डिज़ाइन किया गया था, नीचे दुकान और ऊपर मकान.

दिल्ली के लाजपत नगर या ग्रेटर कैलाश जैसे इलाकों के उलट, जो दशकों में धीरे-धीरे बने, कॉर्बूसियर ने चंडीगढ़ को चरणों में बसाया. सरकारी इलाका शहर के बीच में रखा गया था. शहर धीरे-धीरे बाहर की तरफ फैलता गया. शिवालिक की ओर जाते-जाते आबादी कम होती गई. हर सेक्टर को इस तरह बनाया गया था कि वह व्यवस्थित हो, पैदल चलना आसान हो और आगे विकास हो सके.

Chandigarh grid map
ले कॉर्बूसियर का चंडीगढ़ के लिए ग्रिड प्लान, जिसे पंजाब की विभाजन के बाद नई राजधानी के तौर पर सोचा गया था | कॉमन्स
Chandigarh Le Corbusier with Nehru
चंडीगढ़ में ले कॉर्बूसियर सेंटर में जवाहरलाल नेहरू और ले कॉर्बूसियर की एक तस्वीर | कॉमन्स

“इस शहर को लोकतंत्र और आधुनिकता के प्रतीक के रूप में सोचा गया था, जिसे ऐतिहासिक परंपराओं की सीमाओं के बिना डिज़ाइन किया गया,” चंडीगढ़ के पूर्व चीफ आर्किटेक्ट कपिल सेतिया ने कहा.

लेकिन इस बारीकी से बनाए गए ढांचे में एक बड़ी चूक थी. भविष्य में होने वाले अनौपचारिक विकास को ध्यान में नहीं रखा गया. जैसे-जैसे लोग आते गए और कारोबार बढ़ा, फुटपाथ बाज़ार बन गए और बिना योजना की बस्तियां उभरने लगीं.

धीरे-धीरे नेहरू का चंडीगढ़ भारत की बेकाबू शहरीकरण की मार झेलने लगा. चंडीगढ़ के लोग फुटपाथों पर कब्ज़ा करने वाले ठेले वालों और झुग्गियों को लेकर नाराज़ हैं, जैसा हर दूसरे भारतीय शहर में होता है. एक तरह का वर्ग संघर्ष शुरू हो गया है.

Jawaharlal Nehru laying the foundation stone for Chandigarh in 1952
जवाहरलाल नेहरू ने 1952 में चंडीगढ़ की नींव रखी | फोटो: इंस्टाग्राम/@museumsofchandigarh

अक्टूबर 2025 में, ‘सिटी ब्यूटीफुल’ ने खुद को ‘झुग्गी-मुक्त’ घोषित किया. इसके लिए वर्षों तक तोड़फोड़ अभियान चले, जिनमें 20,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा मूल्य की 500 एकड़ से अधिक ज़मीन खाली कराई गई. पिछले साल 30 सितंबर को यूटी प्रशासन ने शहर की आखिरी 19 झुग्गी बस्तियों में से आखिरी शाहपुर को तोड़ दिया.

स्थानीय न्यूज़ चैनलों ने बुलडोज़रों की तस्वीरें दिखाईं और सुर्खियां चलीं, जैसे ‘चंडीगढ़ हुआ SLUM FREE. बुलडोज़र चले प्रवासी घरों पर, सेक्टर-38 से LIVE दृश्य’ और ‘चंडीगढ़ बना भारत का पहला झुग्गी-मुक्त शहर’. हालांकि कुछ लोग इस पर शक कर रहे थे. पंजाब केसरी की एक रिपोर्ट में कहा गया कि “शहर को झुग्गी-मुक्त बनाने के दावे खोखले हैं”, और बताया गया कि ग्वाला कॉलोनी के पास एक अवैध कॉलोनी पहले ही बस चुकी है.

डिप्टी कमिश्नर निशांत यादव ने दिप्रिंट को बताया कि प्रशासन ने पिछले एक साल में आखिरी पांच झुग्गी समूहों को हटाया, करीब 60–70 एकड़ ज़मीन खाली कराई और पात्र परिवारों को हाउसिंग बोर्ड के फ्लैटों में शिफ्ट किया.

“हम बार-बार झुग्गियां हटाते रहते हैं क्योंकि यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. चंडीगढ़ में 63 सेक्टर और 25 गांव हैं. हर सेक्टर और गांव में हमारे पास तैनात अधिकारी हैं, जो हर पखवाड़े रिपोर्ट देते हैं कि उनके इलाके में कोई नई झुग्गी नहीं बनी है,” उन्होंने कहा.

इस साल 19 जनवरी को डीसी ने कहा कि प्रशासन अब छोटे अतिक्रमणों को निशाना बना रहा है, “चाहे वे वेंडिंग ज़ोन में हों, सड़क के किनारे हों या ग्रीन बेल्ट में”.

एक बड़ा टकराव मनीमाजरा में है, जो शहर के उत्तर-पूर्वी किनारे पर है और सिटी सेंटर से करीब 30 मिनट की दूरी पर है. निवासियों की मांग पर 2020 में इसे सेक्टर 13 घोषित किया गया और इसे आधिकारिक तौर पर ग्रिड का हिस्सा बनाया गया. लेकिन पोस्टकार्ड जैसे सेक्टरों के उलट, यहां अभी भी खराब सड़कें और निर्माण की धूल है. यह इलाका ऐसा है जो अपनी अमीरी से ‘बाहरी’ लोगों को डराता नहीं है.

अब यहां के विक्रेता याचिकाओं, कोर्ट केस, चालान और जल्दबाज़ी में बेदखली का सामना कर रहे हैं. एक कम-परफेक्ट चंडीगढ़ अब सामने आ चुका है.

Chandiharh Manimajra
दिसंबर 2025 में अतिक्रमण हटाओ अभियान से पहले मनीमाजरा मार्केट की एक कोलाज तस्वीर | विशेष व्यवस्था

चंडीगढ़ का फुटपाथ युद्ध

सुबह के 7 बजे हैं और मनीमाजरा बाजार पहले से ही जाग चुका है. दुकानदार मलकीत सिंह ने दिन के लिए अपनी दुकान खोल दी है. ग्राहकों के पैसे देने पर “200 रुपये मिले, 400 रुपये मिले” जैसी तेज़ पेटीएम अलर्ट की आवाज़ आ रही है. लोग उनकी मशहूर चाय, छोले और पराठे खरीद रहे हैं. लेकिन उनकी एक नाराज़ नज़र फुटपाथ पर सामान बेच रहे ठेले वालों पर भी रहती है. दिसंबर में हुई बेदखली कार्रवाई के बाद कई ठेले वाले चले गए थे, लेकिन कुछ फिर लौट आए हैं. कांच के दरवाज़ों और टाइल वाले फर्श की दुकानों के साथ-साथ अब भी तिरपाल के नीचे अस्थायी ठेले लगे हैं, जिन पर फलों की पेटियां, चाय की केतली, सस्ते सर्दियों के कपड़े और डिब्बों के ढेर रखे हैं.

“मैं ठेले वालों के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन उन्हें वहीं बैठना चाहिए, जहां उन्हें जगह दी गई है,” सिंह ने शिकायत करते हुए कहा. वह करीब 30 साल पहले पटियाला से मनीमाजरा आए थे.

उन्होंने चंडीगढ़ को सपनों के शहर से अव्यवस्था के शहर में बदलते देखा है.

“चंडीगढ़ एक योजनाबद्ध शहर है. यहां अतिरिक्त जगह नहीं है, फिर भी ठेले वालों को फुटपाथ और सड़कों पर धकेला जा रहा है,” उन्होंने कहा. “यह अब दिल्ली जैसा दिखने लगा है. चलने के लिए जगह नहीं बची है. अगर ऐसा ही चलता रहा, तो चंडीगढ़ अपनी पहचान खो देगा.”

Chandigarh Malkit Singh
मनीमाजरा व्यापार मंडल के अध्यक्ष मलकीत सिंह ने 2022 में एक केस दायर किया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि इलाके में स्ट्रीट वेंडिंग एक्ट लागू नहीं किया जा रहा है | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

चंडीगढ़ में स्ट्रीट वेंडरों का विवाद नया नहीं है. यह कई साल पहले शुरू हुआ था और धीरे-धीरे बढ़ता गया. निवासी इसके लिए प्रशासन की लापरवाही और कथित भ्रष्टाचार को जिम्मेदार मानते हैं. 2014 में स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट लागू होने के बाद, दो साल बाद हुए सर्वे में शहर में करीब 22,000 ठेले वालों की मौजूदगी पाई गई. प्रशासन ने लगभग 10,000 पात्र वेंडरों के लिए करीब 40 वेंडिंग ज़ोन तय किए, जिनमें सेक्टर 22 का व्यस्त शास्त्री मार्केट भी शामिल था. लेकिन दुकानदारों का कहना था कि समस्या और बढ़ती जा रही है. इसके बाद 2017 में दुकानदारों ने विरोध प्रदर्शन किए. उनका कहना था कि ठेले वाले नो-वेंडिंग ज़ोन में भी काम कर रहे हैं और पक्की दुकानों का रास्ता रोक रहे हैं.

कई सालों तक रेज़िडेंट वेलफेयर एसोसिएशन और दुकानदार प्रशासन से फुटपाथ खाली कराने की गुहार लगाते रहे. लेकिन 2022 में मामला एक मोड़ पर पहुंचा. अब मनीमाजरा व्यापार मंडल के अध्यक्ष मलकीत सिंह ने केस दायर किया. उन्होंने कहा कि मनीमाजरा में स्ट्रीट वेंडिंग एक्ट लागू नहीं हो रहा है और यहां एक “माफिया” हावी हो गया है.

पिछले साल मई में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि ईलीट क्लास आज भी अपने ही देश के छोटे कारोबार करने वालों को माफिया और अतिक्रमणकारी मानता है.

कोर्ट ने कहा, “किसी भी शहर का विकास गांवों से कस्बों और कस्बों से शहरों की ओर लोगों के आने से होता है.”

हालांकि दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया और नगर निगम को 48 घंटे में अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया.

Sector 22 Chandigarh
सेक्टर 22 की प्लान की गई दुकानों को अब पार्किंग की बढ़ती दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. इसी सेक्टर में शास्त्री मार्केट चंडीगढ़ में स्ट्रीट वेंडर विवाद के मुख्य जगहों में से एक है | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

16 दिसंबर को नगर निगम ने पूरे शहर में अवैध ठेले हटाने की कार्रवाई की. मनीमाजरा पर खास ध्यान दिया गया. शाम तक 310 चालान काटे गए. कई ठेले वालों को वहां से हटा दिया गया और उन्हें चंडीगढ़ के आईटी पार्क के पास नए वेंडिंग ज़ोन में, करीब तीन किलोमीटर दूर, जगह दी गई.

लेकिन, जैसा कि पहले की बेदखली कार्रवाइयों में देखा गया है, ठेले वाले आसानी से गायब नहीं हुए.

शास्त्री मार्केट में वापस आएं तो यहां मुकेश गोयल हैं, जो 30 साल से कपड़ों की दुकान चला रहे हैं और लंबे समय से ठेले वालों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं. वे प्रशासन को अवैध ठेले वालों की जानकारी देते हैं. जब वे हाथ पीछे बांधकर बाजार में चलते हैं, तो ठेले वाले इधर-उधर छिपने लगते हैं. सभी उन्हें नमस्ते करते हैं. कई ठेले वाले आदर से “नमस्ते सर” कहते हैं.

इस शालीनता के नीचे आपसी नाराज़गी सुलग रही है.

यहां एक ठेले वाला खान मोहम्मद है. उसे और उसके दो भाइयों को 2016 के सर्वे के बाद जगह मिली थी. उत्तर प्रदेश से आए ये भाई लुधियाना की फैक्ट्रियों से सर्दियों के नए कपड़े लाते हैं. वे एच एंड एम से लेकर ज़ारा तक के ब्रांड जैसे दिखने वाले कपड़े बेचते हैं. ब्रांड स्टोर में हजारों के जैकेट यहां 600 रुपये में मिल जाते हैं, बिना मोलभाव के.

Shastri market chandigarh
शास्त्री मार्केट में कपड़े बेचने वाले, जिनमें से कई प्रवासी हैं, दुकानदारों के लिए नाराज़गी का कारण बन गए हैं। उनका कहना है कि सड़क पर होने वाली बिक्री पक्की दुकानों के व्यापार से आगे निकल रही है | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

“तीन जैकेट 1000 रुपये, एक स्वेटर 200 रुपये,” खान ऊंची आवाज़ में चिल्ला रहे थे. मंगलवार होने के बावजूद अच्छा कारोबार चल रहा था.

ये भाई सालों से मौजूद दुकानों के लिए बड़े प्रतिस्पर्धी बन गए हैं.

“जो हम मिट्टी लगाकर बेच रहे हैं, वो ये लोग क्रीम लगाकर भी नहीं बेच पा रहे हैं,” खान ने कहा.

गोयल के लिए यह सब बिल्कुल गलत है.

“हम जीएसटी देते हैं, इनकम टैक्स देते हैं, कूड़ा शुल्क देते हैं, सरकार ने जो भी टैक्स मांगा है हम देते हैं. हमारे सामने बैठे ठेले वाले कुछ नहीं देते, फिर भी उनकी बिक्री हमसे ज़्यादा है,” उन्होंने कड़वाहट से कहा.

प्रवासी का सवाल

ठेले वालों के खिलाफ भावना, दरअसल, प्रवासियों को लेकर गहरी चिंताओं का भी रूप है. चंडीगढ़ को कभी बंटवारे के बाद पंजाब की वादा की गई ज़मीन के रूप में देखा गया था.

सिंह और गोयल दोनों का आरोप है कि ज़्यादातर ठेले वाले उत्तर प्रदेश, बिहार या नेपाल से आते हैं और राजनीतिक-प्रशासनिक गठजोड़ उन्हें यहां टिकाए हुए है.

“ये यूपी, बिहार वालों ने सारा काम खराब कर दिया है,” सिंह ने कहा.

अब ‘अतिक्रमण’ के खिलाफ कार्रवाई में फंसे प्रवासी ठेले वालों के लिए कारोबार हर महीने मुश्किल होता जा रहा है.

दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद, उत्तर प्रदेश से आए वर्मा परिवार ने मनीमाजरा से अपना पराठा ठेला ‘वर्मा भोजनालय’ हटाकर आईटी पार्क के पास नए वेंडिंग ज़ोन में लगा दिया. दस साल में बना ग्राहक आधार खत्म हो गया.

“यहां आने के बाद हमारी आमदनी 10,000 रुपये रोज़ से घटकर 2,000 रुपये रह गई है,” नीरज वर्मा ने गर्म तवे पर करछी पटकते हुए कहा. उनके छोटे भाई दशरथ भी चार साल पहले चंडीगढ़ आए थे. अब वे मनीमाजरा लौटने का जोखिम नहीं लेना चाहते.

2011 की जनगणना में चंडीगढ़ की आबादी 10.55 लाख थी. इनमें से 6.86 लाख प्रवासी थे. सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश से आए, फिर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और बिहार से.

Chandigarh vendors
चंडीगढ़ के IT पार्क के पास नए वेंडिंग ज़ोन में वर्मा भोजनालय. इसके मालिक अतिक्रमण हटाने की मुहिम के बाद मनीमाजरा से यहां आए हैं, और उनका कहना है कि उनकी रोज़ की कमाई 8,000 रुपये कम हो गई है | फोटो: मनीषा मोंडल /दिप्रिंट

इन प्रवासियों ने शहर बनाने में मदद की, लेकिन वे हमेशा अनौपचारिक बस्तियों में रहे. पिछले दो दशकों में प्रशासन ने एक के बाद एक बस्तियां गिरा दीं और लोगों को चंडीगढ़ के बाहर जगतपुरा और मोहाली जैसे इलाकों में भेज दिया.

डीसी निशांत यादव ने कहा कि झुग्गी बस्तियां उस सरकारी ज़मीन पर बनी थीं, जिसे 1950 के दशक में चंडीगढ़ के विस्तार के दौरान अधिग्रहित किया गया था. उन्होंने हालिया सख्त कार्रवाई को कानून-व्यवस्था से जोड़ा.

Chandigarh vendors
इंदिरा कॉलोनी में एक वेंडिंग कार्ट, जो घनी आबादी वाली इमारतों वाला एक कम आय वाला हाउसिंग कॉम्प्लेक्स है | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

“जहां झुग्गियां होती हैं, वहां आसपास चोरी के मामले बढ़ते हैं. अपराध बढ़ता है. इनमें से कई प्रवासी होते हैं,” उन्होंने कहा.

हाल के महीनों में पंजाब में पंजाबी बनाम प्रवासी भावना तेज़ हुई है. होशियारपुर में पांच साल के बच्चे की हत्या के बाद, जो कथित तौर पर एक प्रवासी दुकान सहायक ने की, कई ग्राम पंचायतों ने प्रवासियों के जमीन खरीदने या ठेला लगाने पर रोक लगाने के प्रस्ताव पारित किए. बिहार फाउंडेशन और पूर्वांचल एसोसिएशन जैसे संगठनों ने “डर के माहौल” की बात कही.

पंजाब के बीजेपी नेता और चंडीगढ़ के पूर्व अध्यक्ष संजय टंडन ने कहा कि प्रवासियों को दोष देना गलत है.

उन्होंने कहा, “स्ट्रीट वेंडिंग सिर्फ एक मुद्दा है. यह क्षमता, योजना में देरी और बदलती शहरी हकीकत की गहरी समस्याओं को दिखाता है. प्रवासी शहर का हिस्सा हैं.”

Shastri market Chandigarh
शास्त्री मार्केट स्टॉल्स, खरीदारों और बाइकों का एक अस्त-व्यस्त जमावड़ा है | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

‘हालात अब भी झुग्गी जैसे हैं’

वर्मा परिवार आईटी पार्क के पास इंदिरा कॉलोनी में रहता है. यह कम आय वाला आवासीय परिसर है. इमारतें एक-दूसरे से सटी हुई हैं. 40 इमारतों के लिए एक छोटा पार्क है. वे दो कमरों के फ्लैट के लिए 9,000 रुपये किराया देते हैं.

इसी कॉलोनी में ओम पाल रहते हैं. उन्होंने अपने पांच लोगों के परिवार के लिए माचिस के डिब्बे जैसा दो मंज़िला घर बनाया है. वे और उनके बेटे प्रवीण हरिद्वार से आए थे. उनका एक छोटा फल ठेला है.

पाल के पास लाइसेंस है, एक साधारण सफेद कागज, जिसे वे ठेले पर गलीचों के नीचे रखते हैं.

“मुझे इसे साथ रखना पड़ता है. प्रशासन कभी भी मांग सकता है,” पाल ने कहा. “हम जैसे-तैसे गुज़ारा कर रहे हैं. पहले चंडीगढ़ में रहना हमारे लिए फायदेमंद था. अब हरिद्वार, लखनऊ या यहां, सब एक जैसा है.”

Indira Colony Chandigarh
आईटी पार्क के पास इंदिरा कॉलोनी, जहां वर्मा परिवार दो कमरों के फ्लैट के लिए हर महीने 9,000 रुपये देता है | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

चंडीगढ़ के ‘स्लम-फ्री’ होने के दावे पर केबीएस सिद्धू, चंडीगढ़ के पूर्व आईएएस अधिकारी, सवाल उठाते हैं.

उन्होंने कहा, “झुग्गियों को खत्म नहीं किया गया, बल्कि उन्हें पुनर्वास कॉलोनियों में बदला गया है. शहर को स्लम-फ्री कहना इस इतिहास और मौजूदा हालात को मिटा देता है.” उन्होंने कहा, “कागज़ों में बिजली-पानी है, लेकिन ज़मीनी हालात अब भी झुग्गी जैसे हैं.”

उनके मुताबिक, पहले झुग्गियों को अनुमति दी गई, फिर सेवाएं दी गईं और बाद में उन्हें नया नाम दे दिया गया.

उन्होंने कहा, “इस सच्चाई को माने बिना नीति पर चर्चा ईमानदार नहीं हो सकती.”

सफलता का खतरा

आधुनिक भारत के शहरी भविष्य के मॉडल के रूप में जन्मा चंडीगढ़ ताज़ी हवा, हरियाली और सुंदर डिज़ाइन का शहर बताया गया. लेकिन इसे कभी इतना भीड़भाड़ वाला बनाने की योजना नहीं थी. यह करीब पांच लाख लोगों के लिए बना था, लेकिन अब यहां उससे दोगुने से ज्यादा लोग रहते हैं.

जो शहर एक सुसंगठित राजधानी के रूप में सोचा गया था, वह शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरियों और रिटायरमेंट के लिए बड़ा आकर्षण बन गया.

चंडीगढ़ स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर के पूर्व प्रिंसिपल रजनीश वाटास ने कहा, “चंडीगढ़ की त्रासदी उसकी अपनी सफलता है.”

विकास से समृद्धि आई, लेकिन बुनियादी ढांचे पर दबाव भी बढ़ा. पिछले पांच साल में मकानों की कीमतें दोगुनी हो गईं. रहने लायक स्थिति पहले जैसी नहीं रही. लोग इसके लिए ‘बाहरी लोगों’ को दोष देते हैं.

दिल्ली से आए किसी वीकेंड सैलानी के लिए चंडीगढ़ साफ हवा, ब्रुअरीज की ताज़ी बीयर और सेक्टर 17 की खरीदारी का गेटवे है. कपिल सेठिया ने कहा, “यह आसपास के इलाकों की शिक्षा और स्वास्थ्य का बोझ भी उठाता है.”

लेकिन यहां रहने वालों के लिए यह बोझ बढ़ता जा रहा है.

चंडीगढ़ के नगर आयुक्त अमित कुमार ने कहा, “आने वाले समय में चंडीगढ़ को ट्रैफिक की समस्या झेलनी पड़ेगी. बाहर से भी गाड़ियां आ रही हैं और शहर में खुद बहुत गाड़ियां हैं. पार्किंग की समस्या पहले से है.”

सेक्टर 35ए के निवासी विनायक ने कहा, “पहले सिग्नल पर फंसना दुर्लभ था. अब अक्सर दूसरी बारी में निकलना पड़ता है.”

पंद्रह लाख से ज्यादा पंजीकृत वाहनों और पिछले पांच साल में दो लाख नई गाड़ियों के साथ, मजबूत सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के बिना चंडीगढ़ का ग्रिड सिस्टम दबाव में है.

टंडन ने कहा, “हम अक्सर कहते हैं कि मेट्रो की योजना 20 साल पहले बन जानी चाहिए थी. उसी देरी की वजह से आज ये समस्याएं बेकाबू लगती हैं.”

Chandigarh traffic
चंडीगढ़ में 15 लाख से ज़्यादा रजिस्टर्ड गाड़ियां हैं, जो यहां की आबादी से ज़्यादा हैं | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

ग्रिड सिटी में बंटवारे

चंडीगढ़ में सभी सेक्टर एक जैसे नहीं हैं. यहां समाज के हिसाब से फर्क दिखता है.

अरुणा चौहान का कहना है कि शहर के उत्तरी हिस्सों में रहने वाले लोग अब भी एक सुरक्षित और अच्छी तरह संभाले गए इलाके में रहते हैं, जबकि दक्षिणी हिस्सों के लोगों को हर समय ठेले वालों से बचते हुए चलना पड़ता है और पार्किंग की जगह ढूंढनी पड़ती है. यह धारणा आम है.

सिद्धू ने कहा, “उत्तरी सेक्टरों में, प्लॉट का साइज़ छह से आठ कनाल तक होता है. जिन सेक्टरों में प्लॉट थोड़े छोटे हैं, वहां भी एलीट प्लानिंग दिखती है. इससे तुरंत एक ऐसी हायरार्की बनती है जो जगह के हिसाब से भी है और सामाजिक भी.”

ग्रेटर चंडीगढ़ में यह अंतर और भी ज्यादा है. डड्डू माजरा कॉलोनी के निवासी कूड़े के बढ़ते ढेर की शिकायत करते हैं.

यह इलाका चंडीगढ़ का गाजीपुर लैंडफिल है, हालांकि आकार में छोटा. शहर का सारा कचरा यहीं डाला जाता है. इसे चार साल पहले बनाई गई 25 फुट ऊंची दीवार के पीछे छिपा दिया गया, जो निवासियों के विरोध के बाद बनाई गई थी.

महेंद्र पाल, जो डड्डू माजरा कॉलोनी में पले-बढ़े हैं, सालों से कचरे के इस पहाड़ को बढ़ते हुए देख रहे हैं.

उन्होंने कहा, “पिछले 10 साल में कई लोग मोहाली के गांवों में चले गए हैं. यहां इतनी बदबू आती है, हम कैसे रहें.”

उनके मुताबिक, इस कचरे के पहाड़ ने कॉलोनी को बदनाम कर दिया है. उन्होंने कहा, “कोई भी अपनी बेटी की शादी यहां नहीं करना चाहता. लोगों को यह जगह घिनौनी लगती है.”

कुछ साल पहले तक बारिश का पानी जहरीले बहाव के साथ मिलकर रिहायशी इलाके में बह जाता था.

Chandigarh garbage mountain
डीएम कॉलोनी के पास कचरे का ढेर | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

एक अन्य निवासी ब्रजेश कुमार ने कहा, “हालात इतने खराब थे कि अगर उस पानी में पैर रखते, तो शरीर पर छाले पड़ जाते थे.”

सेक्टर 41 में शहरी दबाव ने वर्ग संघर्ष का रूप ले लिया है. घरों, बाजारों और बगीचों के संतुलन के साथ इसे दशकों पहले चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड की लॉटरी से फ्लैट पाने वाले परिवारों के लिए अनुशासित जीवन का आदर्श माना गया था. अब पास के बाजार के ठेले वाले उस वादे के खत्म होने का प्रतीक बन गए हैं.

हर शाम आरडब्ल्यूए अध्यक्ष धर्म पाल और 80 वर्षीय निवासी टीएस भंडारी एक जाना-पहचाना दृश्य देखते हैं. नगर निगम की गाड़ी अवैध ठेले वालों को हटा देती है. यह विवाद 2017 से चला आ रहा है, जब प्रशासन ने घर नंबर 2015 से 2032 के सामने अस्थायी वेंडिंग प्लॉट दिया. पहले यह जगह पार्किंग के लिए इस्तेमाल होती थी. तब से यह एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है.

पाल ने कहा, “हमसे वादा किया गया था कि इन ठेले वालों को तय जगहों पर भेज दिया जाएगा, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ है. जब नगर निगम की गाड़ियां आती हैं, तो ठेले हटा दिए जाते हैं, लेकिन कुछ घंटों बाद वे फिर उसी जगह लौट आते हैं.”

भंडारी के लिए, जिनका घर सीधे वेंडिंग ज़ोन के सामने है, शांत मोहल्ले की यादें बाजार की अव्यवस्था में डूबती जा रही हैं. उन्होंने प्रशासन को लिखे अपने सभी पत्रों की मोटी फाइल दिखाते हुए कहा कि वे इन्हें हटाने की लगातार मांग करते रहे हैं.

Sector 41
सेक्टर 41 का प्लान किया हुआ मार्केट व्यवस्थित और साफ़-सुथरा है, लेकिन पास का वेंडिंग ज़ोन कई निवासियों के लिए परेशानी का सबब है | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

उन्होंने कहा, “हमारा मोहल्ला पहले बहुत शांत था. ये लोग शराब पीते हैं, गाली-गलौज करते हैं और हंगामा करते हैं. यह जगह हमारे बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं है. यहां अब हम जैसे कुछ ही लोग बचे हैं. अगर ऐसा ही चलता रहा, तो हमें भी यहां से जाना पड़ेगा.”

भंडारी अभी अपना दो कमरों का घर छोड़ने का मन नहीं बना पा रहे हैं, लेकिन पलायन शुरू हो चुका है. उनका बेटा भी मोहाली, पंचकूला और ज़ीरकपुर जैसे सैटेलाइट शहरों में जगह, शांति और सस्ते घर की तलाश में जा चुका है.

Chandigarh
सेक्टर 41 मार्केट के बाहर वेंडर। निवासियों का दावा है कि नगर निगम विभाग इस इलाके को स्थायी रूप से साफ करने में नाकाम रहा है | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

ट्राई-सिटी का अस्थायी समाधान

जहां भंडारी का बेटा ज़ीरकपुर गया, वहीं अरुणा चौहान ने मोहाली को चुना. चंडीगढ़ के फ्लैट तंग थे और बढ़ती कीमतों ने बंगले को उनकी पहुंच से बाहर कर दिया था. मोहाली में उन्हें वह घर और बगीचा मिल गया, जो चंडीगढ़ में उनके बजट में कभी नहीं आ सकता था. उनके नए पॉश सेक्टर में 251 वर्ग मीटर का प्लॉट 5 करोड़ रुपये से ज्यादा का है. यहां वह आखिरकार खुश हैं. उनका बेटा “उपद्रवियों” के बिना सुरक्षित साइकिल चला सकता है.

फिर भी, 1995 में चंडीगढ़ में बसने वाली चौहान उस शहर के बारे में गहराई से सोचती हैं, जिसे उन्होंने छोड़ दिया. उनके लिए मध्यवर्गीय परिवारों का “ट्राई-सिटी” की ओर जाना एक बड़ी नीतिगत विफलता का संकेत है.

हकीकत यह है कि चंडीगढ़, मोहाली, पंचकूला और ज़ीरकपुर अब एक-दूसरे पर निर्भर एक ही इकाई बन चुके हैं.

Chandigarh locality
सेंटर में मौजूद सेक्टर 22 की एक रिहायशी लेन, जिसमें पार्क और वॉकिंग पाथ हैं | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

वाटास ने कहा, “इस केंद्र शासित प्रदेश को सेंट्रल लंदन या मैनहैटन जैसे सिटी कॉम्प्लेक्स के रूप में देखा जाना चाहिए.”

हालांकि, ये सैटेलाइट शहर सिर्फ उन्हीं लोगों को नहीं समेट रहे जो चंडीगढ़ से बाहर हो रहे हैं या परेशान हैं, बल्कि वे भी धीरे-धीरे वही दबाव झेलने लगे हैं. क्योंकि “ट्राई-सिटी” एक इकाई की तरह काम करती है, इसलिए केंद्र की समस्याएं अनिवार्य रूप से बाहरी इलाकों तक पहुंचती हैं.

सेटिया ने कहा, “ट्राई-सिटी चंडीगढ़ से कुछ आवासीय दबाव तो कम करती है, लेकिन बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव बढ़ा देती है.” उन्होंने चंडीगढ़ सिटिज़न्स फाउंडेशन के दफ्तर में बैठते हुए संगठन के प्रतीक, खुले हाथ की ओर इशारा किया, जो चंडीगढ़ को एक समावेशी शहर के रूप में देखने की सोच का प्रतीक है.

लेकिन खुद सेटिया पंचकूला चले गए हैं और काम के लिए चंडीगढ़ आते-जाते हैं.

उन्होंने हंसते हुए कहा, “चंडीगढ़ में आरामदायक जीवन जीना नामुमकिन हो गया था.”

एक नया मास्टर प्लान

एक नई योजना आ रही है. शहर ऐसे भविष्य में निवेश कर रहा है जो ले कॉर्बूसियर की सोच के अनुरूप हो, भले ही वर्तमान तनावपूर्ण हो.

एक नया रोडमैप, चंडीगढ़ मास्टर प्लान 2031, आर्किटेक्ट के विज़न को और मज़बूत करने की एक कोशिश है, साथ ही पिछले सात दशकों में छूटी हुई कमियों को भी पूरा करना है.

यह प्लान बहुत बड़ा है, जिसे 16 लाख की आबादी को संभालने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिसमें तीन सबसे बड़ी समस्याओं पर ध्यान दिया गया है: इंफ्रास्ट्रक्चर, आबादी मैनेजमेंट और कचरा.

चंडीगढ़ शहरी नियोजन विभाग की पूर्व चीफ आर्किटेक्ट सुमीत कौर ने कहा, “पहली बार शहर को साफ तौर पर हेरिटेज ज़ोन, प्रिसिंक्ट और इमारतों में मैप किया गया. इससे यह तय करने को कानूनी आधार मिला कि क्या संरक्षित किया जाना चाहिए.”

हालांकि, इसे लागू करने की रफ्तार बेहद धीमी रही है. 2008 में व्यापक मास्टर प्लान बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी, लेकिन गृह मंत्रालय द्वारा इसे अधिसूचित करने में 2015 तक छह साल से ज्यादा का समय लग गया.

विकास मार्ग को एक बड़े व्यावसायिक कॉरिडोर में बदलने और ट्रैफिक कम करने के लिए 13 अंडरपास बनाने जैसे प्रोजेक्ट अब जाकर शुरू हुए हैं. लेकिन इनमें भी टकराव सामने आ चुका है.

अगस्त 2025 में शहर का पहला “ग्रीन कॉरिडोर” प्रोजेक्ट, जो कैपिटल कॉम्प्लेक्स को सेक्टर 56 से जोड़ने वाला 8 किलोमीटर लंबा नॉन-मोटराइज्ड ट्रांसपोर्ट रूट था, अचानक रद्द कर दिया गया. यह 2031 प्लान का प्रमुख प्रोजेक्ट था और इसके लिए 200 पेड़ काटे गए थे. लेकिन हेरिटेज कमेटी ने अंततः सेक्टर 10 के निवासियों के पक्ष में फैसला दिया. उनका कहना था कि यह कॉरिडोर गैर-जरूरी है. कमेटी ने कहा कि ग्रीन बेल्ट में साइकिल ट्रैक बनाने से “शांत माहौल” प्रभावित होगा.

हालांकि यह योजना शहर की प्राकृतिक और वास्तु विरासत को ध्यान में रखती है, लेकिन “ट्राई-सिटी” व्यवस्था की कमजोरियों को दूर करने में यह ज्यादा कुछ नहीं करती. वास्तुकारों का कहना है कि शहर का डिज़ाइन दुनिया के बेहतरीन डिज़ाइनों में से एक है, लेकिन मोहाली और पंचकूला के साथ बुनियादी ढांचे की बेहतर योजना और तालमेल जरूरी है.

एक बात पर सब सहमत हैं. नीति ने ले कॉर्बूसियर के सपने को निराश किया है.

गांधी ने कहा, “शहर के चरित्र को दोष नहीं दिया जाना चाहिए. चंडीगढ़ जैसे शहर को संभालने के लिए सही नीतियां नहीं हैं.”

कौर के लिए सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि चंडीगढ़ मॉडल को कभी दोहराया ही नहीं गया.

उन्होंने कहा, “हमें और चंडीगढ़ बनाने चाहिए थे.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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