नई दिल्ली: संत नगर की एक पुरानी तीन मंजिला इमारत का बेसमेंट पिछले साल से आसपास के कारोबारियों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है. इस स्टोर पर कोई ग्राहक सीधे नहीं आता, लेकिन इसकी मौजूदगी नजरअंदाज नहीं की जा सकती. मोटरसाइकिल और स्कूटर की लगातार लाइन प्रवेश द्वार पर जमा रहती है और पास की पार्किंग तक फैल जाती है.
यह ब्लिंकिट का डार्क स्टोर है. इसके ऊपर की ग्राउंड फ्लोर भी खाली हो चुकी है. ICICI बैंक छह महीने पहले यहां से चला गया और अब बंद शटर के ऊपर ‘कमर्शियल स्पेस फॉर रेंट’ का बोर्ड लगा है, जो आधे साल से खाली है.
रियल एस्टेट फर्म अमित प्रॉपर्टीज चलाने वाले राजन ने कहा, “ICICI बैंक के ग्राहकों को खड़ी बाइकों और ढेर सारे डिलीवरी ड्राइवरों के बीच से होकर जाना पड़ता था. बैंक की महिला कर्मचारी भी शाम को निकलते समय सुरक्षित महसूस नहीं करती थीं. पहले पहली मंजिल का मालिक 3 लाख रुपये मांग रहा था, लेकिन अब 1.5 लाख में भी सौदा नहीं हो पा रहा.”
डार्क स्टोर यानी छोटे गोदाम, जिनसे ऑनलाइन ऑर्डर पूरे किए जाते हैं, शहरों के मोहल्लों का रूप बदल रहे हैं. ब्लिंकिट, स्विगी और जेप्टो तेज रफ्तार से स्टोर खोल रहे हैं. इनमें से करीब एक तिहाई टियर-2 शहरों और कस्बों में हैं, ताकि अलग-अलग पिन कोड में ग्राहकों तक पहुंचा जा सके. 2030 तक डार्क स्टोर्स की संख्या 7,500 तक पहुंचने का अनुमान है. यह 2025 में चल रहे लगभग 2,525 स्टोर्स से तीन गुना ज्यादा होगा.

क्विक कॉमर्स कंपनियां तय किराए के बराबर या उससे ज्यादा देकर कमर्शियल प्रॉपर्टी की कीमतें बढ़ा रही हैं. इन जगहों को साझा करने वाले निवासियों और दुकानदारों के लिए पार्किंग, सुरक्षा और आवाजाही को लेकर झगड़े अब आम हो गए हैं.
जनवरी 2026 में गुरुग्राम के हयातपुर में पार्किंग विवाद के दौरान इंस्टामार्ट के एक डिलीवरी ड्राइवर को काली स्कॉर्पियो से कई बार कुचला गया. 3 फरवरी को नई दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास तीन डिलीवरी ड्राइवरों से झगड़े के बाद एक कारोबारी की चोटों के कारण मौत हो गई.
“वे [क्विक कॉमर्स कंपनियां] ऐसी जगहों की तलाश करती हैं जहां ज़्यादा रेजिडेंशियल डेंसिटी हो, और जहां से उनके ड्राइवर आसानी से कस्टमर्स तक पहुंच सकें.” राजन ने कहा, “ट्रेडिशनल वेयरहाउस शहरों के बाहरी इलाकों में होते हैं, लेकिन यहां हम एक नया मॉडल काम करते हुए देख रहे हैं.”
कीमतों में बढ़ोतरी
दिल्ली के संत नगर के मेन रोड पर कई डार्क स्टोर हैं. बाहर कोई बड़े साइनबोर्ड नहीं है जो बताएं कि वे किस कंपनी के हैं. उनके एंट्रेंस आमतौर पर पीवीसी की पट्टियों के पीछे छिपे होते हैं. लेकिन बाहर खड़ी बाइकों की लंबी कतार और स्विगी या ब्लिंकिट के खाली बैग साफ संकेत देते हैं.
ब्लिंकिट डार्क स्टोर की दीवार से सटा भारत स्टूडियो चलाने वाले विकास ने कहा, “मैंने कई बार पुलिस में शिकायत की, लेकिन कुछ दिनों बाद फिर हमारी पार्किंग में बाइकें खड़ी मिलती हैं. डिलीवरी ड्राइवर हमेशा धूम्रपान करते रहते हैं और हमारे ग्राहकों के लिए यह अच्छा अनुभव नहीं है.”
उन्होंने अपनी पार्किंग की ओर इशारा किया, जहां बाइकें इधर-उधर खड़ी थीं. कुछ ड्राइवर मोबाइल पर झुके बैठे थे. विकास ने कहा, “स्टोर के मालिक के पास 300 बाइकों की पार्किंग की जगह नहीं थी, लेकिन उसे पहले ही इसका अंदाजा लगा लेना चाहिए था.”

भारत स्टूडियो वाली पूरी इमारत उनके कब्जे में है और सामने की पार्किंग भी उनकी ही है. सीमा साफ है, लेकिन डिलीवरी ड्राइवर उसका पालन नहीं करते.
जिस इमारत में डार्क स्टोर है, उसमें हर मंजिल का मालिक अलग है. इलाके के प्रॉपर्टी डेवलपर्स का कहना है कि यही वजह है कि ICICI बैंक के जाने के बाद कोई और किराएदार नहीं आया.
राजन ने कहा, “अगर बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर दोनों का मालिक एक ही होता, तो वह सिर्फ ब्लिंकिट की वजह से पूरी मंजिल का नुकसान नहीं उठाता. बेसमेंट का मालिक किराए से खुश है और पार्किंग की समस्या ठीक करने की उसे कोई जरूरत नहीं लगती. नुकसान ग्राउंड फ्लोर वाले को हो रहा है.”
कमर्शियल प्रॉपर्टी मालिक क्विक कॉमर्स कंपनियों को जगह किराए पर देने में खुश हैं. इन कंपनियों के पास पैसा है और वे एक ही इलाके में एक-दूसरे के पास स्टोर खोलती हैं, ताकि एक ही क्षेत्र के ग्राहकों तक तेजी से पहुंच सकें.
संत नगर में ब्लिंकिट के कई डार्क स्टोर हैं. कुछ में सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक सामान रखा जाता है, जबकि कुछ में किराना और पर्सनल केयर का सामान भी है. पास ही स्विगी इंस्टामार्ट का एक डार्क स्टोर है, जिसके छोटे से प्रवेश द्वार पर ऑर्डर लेने वाले ड्राइवरों की भीड़ रहती है.
राज्जी प्रॉपर्टीज के मालिक ने कहा, “बड़ी कमर्शियल प्रॉपर्टी का किराया बढ़ा है, जबकि साइड की छोटी दुकानों का किराया थोड़ा घटा है. छोटी दुकानों को ही अव्यवस्था और पार्किंग की समस्या झेलनी पड़ती है, इसलिए उन्हें किराएदार ढूंढना मुश्किल हो रहा है.”
फाइनेंशियल एक्सप्रेस के अनुसार बेंगलुरु, नई दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों के प्रमुख रिहायशी इलाकों में डार्क स्टोर्स की वजह से कमर्शियल किराया 35 प्रतिशत तक बढ़ रहा है. बेंगलुरु के डोमलूर जैसे इलाकों में किराया 50 रुपये से बढ़कर 75 रुपये प्रति वर्ग फुट हो गया है. कुछ सौदे बाजार दर से 40 प्रतिशत ज्यादा पर हुए हैं.
राजजी प्रॉपर्टीज़ के मालिक अपनी दुकान के बाहर निकले और पड़ोस के सबसे नए डार्क स्टोर की ओर इशारा किया, जो ब्लिंकिट की एक ब्रांच है. यह उस बिल्डिंग के बेसमेंट में खुला है जिसमें कपड़ों के रिटेलर ज़ुडियो का स्टोर है, जो टाटा ट्रेंट का ब्रांड है.
उन्होंने कहा, “कोई एक तय दर नहीं है. प्रॉपर्टी मालिक देखते हैं कि आसपास की प्रॉपर्टी कितने में किराए पर गई है और उसी हिसाब से अपनी कीमत तय कर लेते हैं.” अमित प्रॉपर्टीज के राजन ने 300 गज यानी 2,700 वर्ग फुट के ग्राउंड फ्लोर के लिए लगभग 2 से 3 लाख रुपये का अनुमान बताया. दोनों का मानना है कि डार्क स्टोर्स का आना ग्राहक-आधारित कारोबार के लिए अच्छा संकेत नहीं है.
संत नगर में जहां पहले क्लीनिक, ट्यूशन सेंटर और किराना दुकानें थीं, वहां अब अस्थायी गोदाम बन गए हैं. यहां टूथब्रश और बागवानी के सामान से लेकर गहने और बोर्ड गेम तक रखा जा रहा है.
अच्छी चलती मशीनें
ज़ूडियो के नीचे वाले डार्क स्टोर के बाहर, हरीश कुमार (नाम बदला हुआ) अपनी बाइक पर आराम से बैठा है, उसके मुंह में धीरे-धीरे बीड़ी सुलग रही है. कुमार समय काट रहे हैं, जब तक उनके फोन पर ऑर्डर की घंटी नहीं बजती. उनका ब्लिंकिट आईडी सिर्फ इसी स्टोर से जुड़ा है.
“हम किसी भी स्टोर से डिलीवरी नहीं उठा सकते. हर राइडर का एक स्टोर आईडी होता है, और इस स्टोर में सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक सामान है—चार्जर, वायर, ईयरफोन,” कुमार ने ऊब भरे चेहरे के साथ कहा. “लेकिन जैसे ही ऑर्डर आता है, हमें तुरंत डिलीवरी के लिए भागना पड़ता है.”
कुमार पहले लखनऊ एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी में काम करते थे, लेकिन पार्किंग चार्ज को लेकर यात्रियों की रोज की बहस और गुस्से से परेशान होकर उसने नौकरी छोड़ दी. क्विक कॉमर्स में काम करने वाले दोस्तों के कहने पर वह दिल्ली आया और छह महीने पहले ब्लिंकिट जॉइन किया.
“हमें तेजी से काम करना पड़ता है. हां, डिलीवरी का समय बढ़ा दिया गया है (30 मिनट), लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ऑर्डर आने पर हम आराम करें,” कुमार ने कहा, और बताया कि वह स्टोर से नौ किलोमीटर के दायरे में डिलीवरी करता है.
जेब से फोन निकालकर उसने ड्राइवर ऐप खोला, जो ब्लिंकिट ने अपने डिलीवरी स्टाफ के लिए बनाया है, और झिझकते हुए अपनी सफल डिलीवरी दिखाईं. कुमार ने आराम से हिसाब समझाया—हर एक किलोमीटर पर 15 से 20 रुपये, और हर सफल डिलीवरी पर 10 रुपये का इंसेंटिव.
रोज 13 से 14 घंटे काम करने पर—जो एक ड्राइवर के लिए आम है—कमाई 1200 से 1300 रुपये तक पहुंच सकती है, यानी लगभग 100 रुपये प्रति घंटा. लेकिन खर्च भी काफी होते हैं.

“हर दिन 250-300 रुपये पेट्रोल में चले जाते हैं, और ऊपर से खाने का खर्च भी,” कुमार ने कहा, बगल में बैठे उसके साथी ने सिर हिलाकर हामी भरी. “दिन के आखिर में हमारे पास करीब 500 से 600 रुपये बचते हैं.”
26 साल का कुमार ब्लिंकिट की नौकरी को लंबी अवधि के लिए नहीं देखता. लखनऊ के पास एक छोटे गांव से आने वाला कुमार दिल्ली में पैर जमाना चाहता था और कोई स्थिर और कम तनाव वाली नौकरी मिलने तक कुछ कमाई करना चाहता था. “मेरे चाचा पटेल नगर में छोटी इलेक्ट्रॉनिक रिपेयर की दुकान चलाते हैं, लेकिन वे भी मुझे यहां जितना मिल रहा है उतना नहीं दे सकते थे,” उसने कहा.
तभी उसके फोन पर ऑर्डर आता है. वह जल्दी से बीड़ी बुझाता है और बेसमेंट में बने डार्क स्टोर की ओर चला जाता है. गोदाम में डिलीवरी स्टाफ को अंदर जाने की अनुमति नहीं है. वे रिसेप्शन डेस्क पर पैकेट लेने का इंतिजार करते हैं.
स्टोर के अंदर दीवारों पर लगे बोर्ड स्टाफ को चेतावनी देते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक सामान सुरक्षा के पास जमा करना होगा. एक चमकदार पीला बोर्ड सेफ्टी रिपोर्टिंग सिस्टम की जानकारी देता है, जबकि एक और बोर्ड नकली सामान के खतरे के बारे में बताता है.
सिक्योरिटी और रिसेप्शन डेस्क के पीछे फर्श से छत तक रैक में इलेक्ट्रॉनिक सामान भरा है—हीटर, प्रिंटर, हेडफोन, इलेक्ट्रिक शेवर—हर गलियारे पर साफ नाम लिखा है.
कुमार का पैकेट अपने आप उसके हाथ में नहीं आता. कुछ कर्मचारी गलियारों में भागते रहते हैं, रिसेप्शन संभालते हैं और फोन पर बात करते हुए ड्राइवरों के लिए ऑर्डर तैयार करते हैं.
“सुबह जल्दी और रात के खाने के समय सबसे ज्यादा काम होता है. मुझे तो मैसेज देखने का भी समय नहीं मिलता,” एक ब्लिंकिट स्टोर मैनेजर ने कहा, इससे पहले कि उसे एक ग्राहक की शिकायत पर पीछे बुला लिया गया.
सालों के अनुभव ने इन डार्क स्टोरों को अच्छी तरह से चलने वाली मशीन बना दिया है, जो दिन भर एक के बाद एक पैकेट तैयार करते रहते हैं. कुमार फ्रंट डेस्क पर कोड बताकर अपना पैकेट ले लेता है.
यह स्टोर गली के अंदर छिपा हुआ है, लेकिन इसकी वजह से इलाके में ज्यादा अफरा-तफरी हो गई है. ड्राइवर लगातार आते-जाते रहते हैं, जल्दी में पैदल चलने वालों से बचते हुए निकलते हैं. कुमार को कोई और रास्ता नहीं दिखता.
“समस्या यह है कि हमारे लिए पार्किंग नहीं है, इसलिए मैं जहां जगह मिलती है वहीं बाइक खड़ी कर देता हूं,” उन्होंने कहा, और तुरंत साफ किया कि वह लापरवाही से गाड़ी नहीं चलाता. “लेकिन हां, हम ऑर्डर जल्दी पहुंचाने की कोशिश करते हैं. ज्यादा ऑर्डर मतलब ज्यादा इंसेंटिव.”
डिलीवरी ही नया मॉडल है
लाजपत नगर में एक डार्क स्टोर के बाहर बैंगनी यूनिफॉर्म पहने कुछ ड्राइवर खड़े हैं, और ट्रैफिक व पैदल लोग उनके पास से गुजर रहे हैं. जब जेप्टो ने यहां स्टोर खोला, तो आसपास की किराना दुकानों पर इसका असर सबसे पहले पड़ा.
“वे असली सामान नहीं बेचते,” भगत राम ओम प्रकाश डिपार्टमेंट स्टोर में कैश काउंटर पर बैठे मनोहर ने कहा, जो जेप्टो डार्क स्टोर के पास है. “हमारे कई ग्राहकों ने बताया कि उन्हें नकली मक्खन और कॉफी मिली.”

किराना स्टोर के बाहर एक बड़ा पीला बैनर लगा है, जिसमें कई सामान की तस्वीरें हैं और बड़े अक्षरों में लिखा है: All Products Available (सभी उत्पाद उपलब्ध हैं). यह दुकान 1957 से चल रही है, लेकिन इतनी पुरानी होने के बावजूद यह क्विक कॉमर्स के असर से बच नहीं पाई.
“हमें स्टाफ कम करना पड़ा—पहले यहां करीब 18 लोग काम करते थे, अब सिर्फ 10 हैं,” मनोहर ने झुंझलाहट भरे चेहरे और आवाज में कहा. “लेकिन हमारे पुराने ग्राहक हमारे साथ हैं. वे टमाटर को छूकर देखना चाहते हैं, चावल को हाथ से महसूस करना चाहते हैं.”
लेकिन अब इतना काफी नहीं है. ग्राहकों को बनाए रखने के लिए जोर देकर होम डिलीवरी का प्रचार करना जरूरी हो गया है.
भगत राम स्टोर आसपास के इलाके में डिलीवरी देता है और ग्राहकों से वादा करता है कि सामान 30 मिनट में पहुंच जाएगा. ठीक सामने बॉबी सब्जीवाला ने ‘फ्री होम डिलीवरी’ का बड़ा बैनर लगाया है, साथ में अपना व्हाट्सऐप नंबर भी लिखा है.
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