बेगूसराय/पटना: बिहार के एक जिले बेगूसराय में एक नया आंदोलन शुरू हुआ है. यह वही जगह है जिसे कभी ‘बिहार का लेनिनग्राद’ कहा जाता था और जो अब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का गढ़ बन चुकी है. यह लड़ाई किसी विचारधारा की नहीं है, बल्कि बिहार की एक बड़ी जाति — भूमिहारों — की पहचान की है. वे साल 2015 में हुई एक गलती को ठीक करना चाहते हैं और करीब 95 साल पहले ब्रिटिश राज के दौरान मिली अपनी ‘भूमिहार-ब्राह्मण’ पहचान वापस चाहते हैं. इसे उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन का उल्टा रूप भी कहा जा सकता है.
इस भूमिहार आंदोलन के बीच एक बड़ा सवाल है: आखिर हम हैं कौन?
बेगूसराय के बिहट गांव में, जिसे वामपंथी जोश के कारण ‘मिनी मॉस्को’ कहा जाता है, एक अनौपचारिक गांव की चौपाल में 26 साल के विक्रम सिंह ने समुदाय का नारा बुलंद किया — ब्राह्मण जाति बहाल करो.
यह नारा अब पूरे बिहार में भूमिहारों के बीच गूंज रहा है. वे 1931 की जाति जनगणना में इस्तेमाल किए गए नाम पर वापस जाना चाहते हैं, जिसमें उन्हें ‘भूमिहार ब्राह्मण’ के रूप में दर्ज किया गया था. इससे उनकी पहचान ऐसे ब्राह्मणों के रूप में बनी थी जो खेती और ज़मींदारी करते थे, लेकिन पिछले एक दशक में, बिहार के सवर्ण आयोग ने अपनी 2015 की रिपोर्ट में सिर्फ “भूमिहार” शब्द का इस्तेमाल किया, जिसके बाद सरकारी कागज़ों में वही नाम चलन में आ गया.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के समय हुए जाति सर्वे और भूमि रिकॉर्ड को डिजिटल करने की बड़ी योजना ने भूमिहारों के बीच चिंता बढ़ा दी है. यह समुदाय आने वाली राष्ट्रीय जाति जनगणना से पहले अपने आधिकारिक नाम को लेकर फैसला चाहता है. यह जनगणना ब्रिटिश शासन के लगभग सौ साल बाद पहली बार होने जा रही है. उन्हें डर है कि अगर ‘भूमिहार-ब्राह्मण’ की प्रतिष्ठित पहचान चली गई, तो उनकी ऊंची जाति की स्थिति हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है. उनका मानना है कि अब समय बहुत कम बचा है.
बरौनी-बेगूसराय औद्योगिक क्षेत्र के धुएं से भरे बिहट में सिंह ने कहा, “अब भूमिहारों की पहचान कोई और तय नहीं करेगा. नाम बदलने से हममें से कई लोगों को अपनी ही ज़मीन पर पराया महसूस होने लगा है.”
उन्होंने कहा, “यह हमारे लिए फैसला करने का समय है. हमारे पूर्वज योद्धा, विद्वान और किसान थे. अगर हमने यह मौका गंवा दिया, तो भूमिहार ब्राह्मण समुदाय की पहचान हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी.”
जाति सर्वे के बाद अपनी ऐतिहासिक पहचान मिटने का डर बढ़ गया है. इसी वजह से कई याचिकाएं, राजनीति और प्रदर्शन सामने आ रहे हैं. इनमें सरकार से मांग की जा रही है कि आधिकारिक रिकॉर्ड और जाति प्रमाण पत्रों में फिर से ‘बाभन’ (भूमिहार ब्राह्मण) शब्द जोड़ा जाए.
हम आज भी बिहार की राजनीति में असर रखते हैं. हमारी संख्या कम है, इसका मतलब यह नहीं कि हम कमज़ोर हैं
— सूर्य सिंह, बिहट निवासी
पटना में सवर्ण आयोग के दफ्तर की मेज़ों पर याचिकाओं के ढेर लगे हैं. इनमें से कई याचिकाएं दो बातों पर टिकी हैं — ब्रिटिश दौर की जाति जनगणना के रिकॉर्ड और योद्धा ऋषि परशुराम से जुड़ी वंशावली.
यह टकराव आज के बिहार में जाति को लेकर एक गहरे संकट को दिखाता है. घटती राजनीतिक ताकत, आर्थिक चिंता और संख्या की राजनीति मिलकर यह तय कर रही है कि कोई समुदाय अपने अतीत को कैसे देखता है और अपने भविष्य के लिए कैसे बातचीत करता है.
भूमिहारों की पहचान हमेशा उलझन में रही है. अंग्रेज़ों ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में भूमिहारों को ब्राह्मण का दर्जा दिया था, लेकिन बिहार में उन्हें 1800 के दशक के आखिर तक वैश्य वर्ग में रखा गया. बाद में, जब उन्होंने संगठित होकर दबाव बनाया — जैसा कि वे आज कर रहे हैं — तब औपनिवेशिक शासकों ने उन्हें ब्राह्मण का टैग दिया.

19वीं सदी के औपनिवेशिक सर्वे करने वालों ने भूमिहारों को अलग-अलग तरह से बताया. फ्रांसिस बुकानन-हैमिल्टन ने उन्हें “सैन्य ब्राह्मण” कहा. विलियम एडम ने उन्हें “मगध ब्राह्मण” कहा. विलियम क्रुक ने अपनी किताब ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ द नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेस एंड अवध में उन्हें बाभन, ज़मींदार ब्राह्मण, गृहस्थ ब्राह्मण और पच्छिमा (पश्चिमी ब्राह्मण) कहा. बाद के समाजशास्त्रियों और नृवंशविज्ञान अध्ययनों में उन्हें ज़मीन रखने वाला खेती करने वाला उच्च वर्ग और ऐसे ब्राह्मण बताया गया जो भिक्षा नहीं मांगते थे. जाति सर्वे के मुताबिक, इस समय वे बिहार की कुल आबादी का 2.87 प्रतिशत हैं.
विद्वान और द कास्ट कॉन सेंसस (2025) के लेखक आनंद तेलतुम्बडे ने कहा, “वे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में बड़ी संख्या में रहने वाली खेती करने वाली जाति हैं. उनकी जड़ें ब्राह्मण परंपरा से जुड़ी हैं, लेकिन उनकी जाति पहचान तय करने का काम ब्रिटिश दौर की जाति जनगणना में हुआ था.”
उन्होंने कहा, “उस समय वे एक स्थानीय जाति थे. जाति जनगणना ने उन्हें एक प्रमुख जाति के रूप में औपचारिक पहचान दी.” तेलतुम्बडे के मुताबिक, पहचान के लिए इस संघर्ष से कई जाति आधारित संगठन बने, जिससे “जागरूकता” पैदा हुई.
उन्होंने आगे कहा, “उस दौर में, आज के उलट, जातियां ऊंचे वर्ग में शामिल होना चाहती थीं.”
एक कानूनी लड़ाई
जब बिहार सरकार ने अक्टूबर 2023 में अपनी जाति सर्वे रिपोर्ट जारी की, तो पटना के एक टीवी पत्रकार धीरेंद्र कुमार नाराज़ हो गए. उनके समुदाय को सिर्फ ‘भूमिहार’ के रूप में दर्ज किया गया था — उस पूरे नाम के बिना, जो उन्हें जाति की सीढ़ी में सबसे ऊपर रखता था. कुछ ही हफ्तों में कुमार ने नाम बदलकर ‘भूमिहार ब्राह्मण’ कराने के लिए पटना हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी.
कुमार जहानाबाद से हैं, जहां कभी रणवीर सेना का उदय हुआ था. रणवीर सेना एक उग्र भूमिहार मिलिशिया थी, जिसे 1990 के दशक में ज़ोर-ज़बरदस्ती से दबदबा बनाने के लिए खड़ा किया गया था, लेकिन अब वक्त बदल चुका है. लड़ाई अब गांवों से निकलकर अदालतों तक पहुंच गई है. उनकी याचिका से पूरे राज्य में हलचल मच गई.
पटना के किदवईपुरी स्थित News4Nation न्यूज़रूम में कुमार ने कहा, “यह पूरा मामला हमारी याचिका से शुरू हुआ. हम कोर्ट में पुराने ज़मीन के रिकॉर्ड और ब्रिटिश दौर की जनगणना रिपोर्ट लेकर गए, जिनमें हमारी जाति का सही नाम दर्ज है.”

सामाजिक सम्मान के अलावा, संपत्ति भी एक बड़ी चिंता है. बिहार जैसे राज्य में, जहां 60 प्रतिशत से ज़्यादा अपराध ज़मीन और संपत्ति विवाद से जुड़े हैं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भूमि रिकॉर्ड को डिजिटल करने की बड़ी योजना में इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर में सिर्फ ‘भूमिहार’ टैग है. इससे भविष्य में ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद होने की आशंका बढ़ गई है.
पटना हाई कोर्ट ने इस मामले की तुरंत सुनवाई की. नवंबर 2023 में जस्टिस मोहित कुमार शाह ने आदेश दिया कि कुमार के वकील राज्य के सवर्ण आयोग और संबंधित अधिकारियों से संपर्क करें.
अगर केंद्र सरकार भी जनगणना में हमारी जाति के लिए ‘भूमिहार’ शब्द ही इस्तेमाल करती है, तो हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचेगा. इसलिए उससे पहले हमने उनसे संपर्क किया
— धीरेंद्र कुमार, पत्रकार
कुमार ने बताया कि उन्होंने संबंधित राज्य विभागों को कई बार चिट्ठियां लिखीं, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. मामला शायद यहीं दब जाता, लेकिन अप्रैल 2025 में मोदी सरकार ने 2027 की जनगणना में जाति की गिनती कराने की घोषणा कर दी.
इसके बाद कुमार फिर से सक्रिय हो गए. इस बार उन्होंने गृह मंत्रालय को पत्र लिखा. कुमार ने कहा, “अगर केंद्र सरकार भी जनगणना में हमारी जाति के लिए ‘भूमिहार’ शब्द ही इस्तेमाल करती है, तो हमारे पास कोई विकल्प नहीं रहेगा. इसलिए उससे पहले हमने उनसे संपर्क किया.”
गृह मंत्रालय ने उनकी बात पर ध्यान दिया और जवाब के लिए इसे राज्य सरकार के पास भेज दिया.
यह उसी समय की बात है, जब नीतीश कुमार सरकार ने लंबे समय से निष्क्रिय पड़े सवर्ण आयोग को दोबारा शुरू किया. बिहार सरकार ने पिछले साल इस मुद्दे पर सिफारिशें देने के लिए मामला आयोग को भेजा था.
लगभग तुरंत ही, आयोग का दफ्तर पूरे बिहार से आए भूमिहारों के आवेदनों से भर गया.
सवर्ण आयोग के अध्यक्ष, जो खुद भूमिहार समुदाय से हैं, महाचंद्र प्रसाद सिंह ने कहा, “एक महीने से ज़्यादा समय तक लोग अपने ज़मीन के रिकॉर्ड भेजते रहे, जिनमें उनकी जाति ‘भूमिहार ब्राह्मण’ लिखी थी. हमारा दफ्तर याचिकाओं, चिट्ठियों और पुराने दस्तावेज़ों से भर गया.”
उनके दफ्तर का एक कोना इन जमा किए गए कागज़ों से भरा है, जिनमें ज़िला सर्कल के रिकॉर्ड और 100 रुपये के स्टांप पेपर पर बने ज़मीन के कागज़ भी शामिल हैं.

जब आयोग के अध्यक्ष नवंबर में मुज़फ्फरपुर गए, तो अखिल भारतीय भगवान परशुराम परिषद — जो एक भूमिहार संगठन है, के प्रतिनिधिमंडल ने उन्हें एक औपचारिक ज्ञापन सौंपा. इस ज्ञापन का शीर्षक था: ‘वर्तमान सरकारी रिकॉर्ड में अधूरे जाति नाम भूमिहार के स्थान पर पूरा नाम भूमिहार ब्राह्मण शामिल करने के संबंध में.’
यहां तक कि हिंदी साहित्य के बड़े भूमिहार नामों का भी ज़िक्र किया गया. दिसंबर 2025 में किसी ने प्रसिद्ध हिंदी लेखक और संपादक रामवृक्ष बेनीपुरी के ज़मीन के रिकॉर्ड आयोग को भेजे. पटना की विधायक कॉलोनी में अपने ऑफिस में, सिंह ने उस कॉलम की ओर इशारा किया, जहां बेनीपुरी की जाति ‘भूमिहार ब्राह्मण’ लिखी है.
सिंह ने कहा, “पुराने ज़मीन के रिकॉर्ड पक्के सबूत हैं.” उन्होंने बताया कि आयोग ने अपनी राय सरकार को भेज दी है और अब जवाब का इंतज़ार कर रहा है.
हालांकि, सभी लोग ‘भूमिहार ब्राह्मण’ नाम को लेकर उतने उत्सुक नहीं हैं.
ओबीसी श्रेणी की मांग
बिहार की जटिल सामाजिक स्थिति में भूमिहार समुदाय अपनी पहचान को लेकर दोहरी उलझन में है. समाज में आगे बढ़ने की उनकी चाह एक जैसी नहीं है. समुदाय के कुछ लोग अपनी ब्राह्मण जड़ों पर ज़ोर देना चाहते हैं, जबकि कुछ लोग ओबीसी का दर्जा मांग रहे हैं. ये लोग ऐसे आंकड़े सामने रख रहे हैं, जिनसे पता चलता है कि जमींदार और अमीर होने की छवि उनकी आज की आर्थिक हालत से मेल नहीं खाती.
ज़मीन के लगातार बंटवारे के बावजूद, बिहार में भूमिहारों को अब भी आम तौर पर जमींदारी ताकत से जोड़ा जाता है. पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदाय कर्मचारी संघ (BAMCEF) का एक अनुमान अक्सर बताया जाता है. हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है. इस अनुमान में कहा गया है कि बिहार की 39 प्रतिशत ज़मीन भूमिहारों के कब्ज़े में है, लेकिन जाति के हिसाब से ज़मीन के मालिकाना हक से जुड़े कोई सरकारी आंकड़े सार्वजनिक नहीं हैं. ज़मीन सुधार पर बंद्योपाध्याय आयोग ने 2008 में एक रिपोर्ट दी थी, लेकिन नीतीश कुमार सरकार ने उसे कभी सार्वजनिक नहीं किया.
2023 की जाति सर्वे रिपोर्ट ने इन धारणाओं को सीधी चुनौती दी. रिपोर्ट के मुताबिक, 27.58 प्रतिशत भूमिहार ‘गरीब’ श्रेणी में आते हैं, यानी उनकी मासिक आय 6,000 रुपये से कम है. आर्थिक रूप से उनसे ज़्यादा कमजोर सिर्फ अति पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ही हैं.

इन्हीं नतीजों के आधार पर पटना के भूमिहार कार्यकर्ता आलोक कुमार सिंह ने जनवरी 2024 में एक बैठक बुलाई और ‘भूमिहार ओबीसी संघर्ष मोर्चा’ की घोषणा की. यह संगठन भूमिहारों को ओबीसी श्रेणी में शामिल करने की मांग को लेकर अभियान चला रहा है. इसके सदस्यों का कहना है कि अगर उन्हें ओबीसी माना गया, तो उन्हें नौकरियों में आरक्षण और राजनीतिक फायदे मिलेंगे. सोशल मीडिया पर वे #BhumiharWantsOBCStatus हैशटैग का इस्तेमाल कर रहे हैं.
भूमिहार ओबीसी संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा, “यह सच है कि भूमिहार कभी दबंग जाति थी, लेकिन आज के समय में यह सच नहीं है. हमने सरकारी आंकड़ों के आधार पर ओबीसी दर्जे की मांग की है.”
मीटिंग्स में लोग कहते हैं कि अगर हम ब्राह्मण सूची से ओबीसी सूची में जाते हैं, तो इससे हमारी सामाजिक इज़्ज़त पर असर पड़ेगा
— आलोक कुमार, अध्यक्ष, भूमिहार ओबीसी संघर्ष मोर्चा
पिछले दो साल से आलोक कुमार बिहार और बिहार के बाहर भूमिहार समुदाय को एकजुट करने में लगे हुए हैं. उन्होंने उन सभी ज़िलों में दर्जनों बैठकें की हैं, जहां भूमिहारों की अच्छी आबादी है. इनमें बेगूसराय, गया, अरवल, जहानाबाद, पटना, भागलपुर, मुज़फ्फरपुर और लखीसराय शामिल हैं.

हालांकि, उनके संगठन का मकसद सभी के लिए स्वीकार करना आसान नहीं है. असल में वे सामाजिक रूप से नीचे की श्रेणी में शामिल होने की मांग कर रहे हैं.
आलोक कुमार ने कहा, “मीटिंग्स में लोग कहते हैं कि अगर हम ब्राह्मण सूची छोड़कर ओबीसी सूची में जाते हैं, तो हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा घट जाएगी.”
आलोक कुमार यह भी बताते हैं कि महाराष्ट्र में कई ब्राह्मण समुदाय और पुजारी समूह ओबीसी सूची में शामिल हैं. मराठवाड़ा के तुलजापुर इलाके में, मराठा और ब्राह्मण परिवारों को निज़ाम काल के रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेज़ों के आधार पर ओबीसी प्रमाण पत्र मिल रहे हैं.
उनके मुताबिक, भूमिहारों की अमीर ज़मींदार वाली छवि ने समुदाय को नुकसान पहुंचाया है. वे कहते हैं कि भले ही समुदाय आज भी रौब और ज़मींदार होने के खिताब से जुड़ा रहना चाहता हो, लेकिन वे दिन अब नहीं रहे. हर पीढ़ी में ज़मीन भाइयों के बीच बंटती चली गई और खेती अब पहले जैसी कमाई नहीं देती.
उन्होंने कहा, “एक समय था जब हमारी जाति सबसे आगे थी, लेकिन अब उन्हें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सुरक्षा की ज़रूरत है.”
फिर भी, बहुत से भूमिहारों के लिए पुश्तैनी गौरव, आरक्षण से ज़्यादा अहम है.
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सम्मेलन, सभाएं और सोशल मीडिया
बेगूसराय से लेकर उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर तक, भूमिहार समूह अपनी अहमियत दिखाने के लिए सम्मेलन, संगठन और सोशल मीडिया को आज के समय के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.
18 जनवरी को, भूमिहार ब्राह्मण परिवार ट्रस्ट ने गाजियाबाद में मकर संक्रांति के मौके पर एक बड़े ‘स्नेह मिलन समारोह’ का आयोजन किया. इसमें सांसदों और पूर्व मंत्रियों समेत 700 से ज़्यादा लोग शामिल हुए.
इससे कुछ दिन पहले, एक और संगठन ‘ब्रह्मर्षि सम्मेलन’ ने दिल्ली के द्वारका में ऐसी ही एक सभा की, जिसमें सवर्ण आयोग के अध्यक्ष महाचंद्र प्रसाद सिंह मुख्य अतिथि थे.
भूमिहार ब्राह्मण परिवार ट्रस्ट के चेयरमैन रतन शर्मा ने कहा, “हमारी सामाजिक एकता आने वाले समय में हमारी सबसे बड़ी ताकत बनेगी.”
बेगूसराय के बिहट में, 20 साल के कुछ युवाओं के बीच बातचीत का मुख्य विषय भूमिहार उद्योगपति राम कृपाल सिंह की पुण्यतिथि पर आयोजित 10 दिन तक चला भव्य महाभोज था. कहा जाता है कि यह भारत की सबसे बड़ी दावत थी, जिसमें करीब दस लाख लोगों को खाना खिलाया गया था.

इन युवाओं में सोच काफी हद तक खुद को ऊंचा मानने वाली थी. दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़े सत्यम सिंह विकास, जो बिज़नेस शुरू करने के लिए गांव लौटे थे, ने भूमिहारों के ‘पिछड़े’ होने की बात का मज़ाक उड़ाया.
अपने आईफोन पर स्क्रॉल करते हुए विकास ने कहा, “मैं किसी की लीडरशिप में काम नहीं कर सकता. भूमिहार किसी के नीचे दबकर नहीं रह सकता.”
यह तेवर भोजपुरी गानों में भी दिखता है, जिनके लोकप्रिय टाइटल हैं — भूमिहार के तलवार, मरद भूमिहार, भूमिहार के धमाका, और प्रखंड हो या ज़िला, भूमिहार से हिला.
“मैं किसी की लीडरशिप में काम नहीं कर सकता. भूमिहार किसी के नीचे दबकर नहीं रह सकता.”
— सत्यम सिंह विकास, बिहट निवासी
फेसबुक और इंस्टाग्राम इस अकड़ को दिखाने के नए ज़रिये बन गए हैं. कन्हैया सिंह, जो एक मैकेनिकल इंजीनियर हैं, ने इंस्टाग्राम पर एक रील डाली, जिसमें वह अपनी सफेद थार चला रहे हैं. कैप्शन में लिखा था, “भूमिहार मतलब रॉयल्टी. हर कोई इसे अफोर्ड नहीं कर सकता.”

“बाते पे गोली की बौछार हो जाई,
बोली कोई भाभन से तो मार हो जाई.”
पहला भूमिहार आंदोलन
यह पहली बार नहीं है जब जनगणना से पहले भूमिहार पहचान को लेकर एकजुटता दिख रही हो. करीब एक सदी पहले भी, ब्रिटिश दौर की जनगणना के वक्त, भूमिहारों की अपनी आकांक्षाएं सामने आई थीं. तब ब्रिटिश जनगणना करने वालों को इसका सामना करना पड़ा था. आज, यह भूमिहारों की निराशा है, जिससे भारत में होने वाली जाति जनगणना के सर्वे करने वालों को जूझना पड़ेगा.
कायस्थों के साथ-साथ, भूमिहार भी उन जातियों में शामिल थे, जिन्होंने 19वीं सदी के आखिर में जाति आधारित राजनीति और गौरव की राजनीति की अगुवाई की थी.
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड एजुकेशन रिसर्च (IISER), भोपाल में समाजशास्त्र और सामाजिक मानवविज्ञान के प्रोफेसर अनिकेत नंदन ने कहा, “भूमिहारों ने योजनाबद्ध तरीके से राज्य की व्यवस्था का इस्तेमाल कर एक अभियान चलाया, और उस समय यह व्यवस्था जनगणना थी. उनकी कहानी धुंधली, अस्पष्ट और काफी जटिल है.”

नंदन ने औपनिवेशिक जनगणना को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक मैदान बताया. उन्होंने कहा कि उस समय समुदाय अपनी वर्ण की रैंक ऊपर ले जाने के लिए बड़ी संख्या में याचिकाएं देने लगे थे. जाति संघों ने खुद को क्षत्रिय या ब्राह्मण साबित करने के लिए वंशावली, इतिहास और पौराणिक कथाएं गढ़नी शुरू कर दी थीं.
भूमिहार अभियान से जमींदारों और अभिजात वर्ग द्वारा बनाए गए दो बड़े संगठन सामने आए. पहला था प्रधान भूमिहार ब्राह्मण सभा, जिसकी स्थापना 1889 में हुई. इसके बाद 1896 में भूमिहार ब्राह्मण महासभा बनाई गई.
स्वामीजी ने भूमिहार समुदाय को सम्मान दिलाया. अगर उन्होंने हमारे समुदाय के लोगों को पुरोहित बनने के लिए प्रेरित नहीं किया होता, तो हमारे लिए खुद को ब्राह्मण साबित करना और भी मुश्किल हो जाता
— पिनेश कुमार सिंह, सीताराम आश्रम के कार्यवाहक
तेलतुम्बडे ने अपनी किताब द कास्ट कॉन सेंसस में लिखा है कि उस समय ज़िला स्तर पर भी कई संगठन बने थे. इन समूहों ने शास्त्रों के उद्धरणों और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर लगातार याचिकाएं दीं. उन्होंने लिखा कि औपनिवेशिक जनगणना ने जाति को एक स्थानीय और रिश्तों पर आधारित पहचान से बदलकर एक राजनीतिक और तयशुदा पहचान बना दिया.
इस नए आंदोलन के लिए एक बड़ा मोड़ तब आया, जब तपस्वी और किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती भूमिहार ब्राह्मण महासभा से जुड़े. वही नेता थे, जिन्होंने भूमिहारों को पारंपरिक रूप से ब्राह्मणों से जुड़े कामों में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया.
नंदन ने जर्नल ऑफ हिस्टोरिकल सोशियोलॉजी में छपे एक शोध लेख में लिखा, “स्वामी सहजानंद सरस्वती का मानना था कि भूमिहारों को परिवार के धार्मिक कामों — जैसे श्राद्ध और विवाह में ब्राह्मणों की तरह पुजारी की भूमिका निभानी चाहिए.”

हालांकि, इस सोच से समुदाय के भीतर मतभेद भी पैदा हुए. अपनी आत्मकथा मेरा जीवन संघर्ष में सहजानंद सरस्वती ने लिखा कि पुरोहिती के सवाल पर महासभा बंट गई थी. सर गणेश दत्त जैसे अमीर और बड़े ज़मींदार नेताओं ने इसका विरोध किया था.
इन अंदरूनी मतभेदों के बावजूद, पुजारी बनने के आह्वान ने सरस्वती को एक मशहूर नेता बना दिया. आज भी, दशनामी संप्रदाय के दंडी संन्यासी के रूप में उनकी तस्वीर भूमिहारों की सभाओं और पोस्टरों में आम तौर पर दिखती है.
पटना से करीब 30 किलोमीटर दूर बिहटा में सरस्वती द्वारा स्थापित सीताराम आश्रम कभी भूमिहार और किसान सभाओं से भरा रहता था, लेकिन अब वह ज़्यादातर सुनसान दिखाई देता है.
आश्रम के देखभाल करने वाले पिनेश कुमार सिंह ने स्वामी सहजानंद सरस्वती की आत्मकथा के पन्ने पलटते हुए कहा, “स्वामीजी ने भूमिहार समुदाय को इज़्ज़त दिलाई. अगर उन्होंने हमारे समाज के लोगों को पुरोहित बनने का रास्ता नहीं दिखाया होता, तो हमारे लिए खुद को ब्राह्मण साबित करना और भी कठिन हो जाता.”

मंडल और मिलिशिया
अगर आज़ादी से पहले का भूमिहार आंदोलन धर्म और पुरोहिती की भाषा में था, तो बाद के समय में यह ज़मीन, सत्ता और अंत में ताकत से जुड़ गया.
आज़ादी के बाद के वर्षों में, बिहार कांग्रेस में भूमिहारों की मज़बूत पकड़ थी. उस समय श्रीकृष्ण सिंह, महेश प्रसाद सिन्हा, कृष्णकांत सिंह और एल.पी. शाही जैसे कई ताकतवर नेता सामने आए.
नंदन ने कहा, “1930 के दशक के बाद भूमिहार कांग्रेस के क़रीब आ गए और पार्टी में उन्होंने मज़बूत जगह बना ली. यह वही दौर था, जब उनके पास बहुत ज़्यादा ज़मीन थी.”
लेकिन 1980 और 1990 के दशक में राजनीति में बड़े बदलाव आए. खास तौर पर मंडल आयोग के बाद एक नया सत्ता वर्ग उभरा, जिसने पुरानी व्यवस्था को हिला दिया.
नंदन ने कहा, “बिहार में सामाजिक न्याय आंदोलन के उभार ने भूमिहारों को काफी नुकसान पहुंचाया.”
पुरानी व्यवस्था के कमज़ोर पड़ने के साथ-साथ, मध्य बिहार में नक्सलवाद के रूप में एक और संकट पैदा हुआ. वामपंथी हथियारबंद समूहों ने भूमिहीन मज़दूरों को संगठित किया, जबकि ऊंची जाति के ज़मींदारों ने निजी सेनाएं बनाकर जवाब दिया. इसकी शुरुआत 1979 में राजपूतों की कुंवर सेना से हुई, लेकिन भूमिहारों की सेनाएं सबसे ज़्यादा ख़तरनाक साबित हुईं — सनलाइट सेना से लेकर ब्रह्मर्षि सेना और सवर्ण लिबरेशन फ्रंट तक.
1930 के दशक के बाद भूमिहार कांग्रेस के करीब आ गए थे और पार्टी में उनकी मज़बूत पकड़ बन गई थी, लेकिन सामाजिक न्याय आंदोलन के उभार ने उन्हें बुरी तरह प्रभावित किया
— अनिकेत नंदन, समाजशास्त्र के प्रोफेसर
यह टकराव 1992 में बेहद हिंसक हो गया, जब माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) ने गया ज़िले के बर्रा गांव पर हमला किया. इस हमले में 35 भूमिहार मारे गए. इसके बाद सवर्ण लिबरेशन फ्रंट के प्रमुख रामाधार सिंह ने एक कड़ा बयान दिया: “मेरा इतिहास मज़दूरों की चिता पर लिखा जाएगा.”
लेकिन सबसे कुख्यात भूमिहार मिलिशिया रणवीर सेना थी, जिसका गठन 1994 में हुआ था और जिसका नेतृत्व ब्रह्मेश्वर मुखिया कर रहे थे.
अपने चरम दौर में, इस सेना के पास समुदाय के करीब 17,000 लाइसेंसी हथियारों तक पहुंच थी. उनके विचार, उनके समय में छपे पर्चों से झलकते हैं, जिनमें साम्यवाद-विरोध और पौराणिक कथाओं का मिश्रण था. रणवीर सेना के एक पर्चे में लिखा था, “रूस और पूर्वी यूरोप में कम्युनिस्ट हार चुके हैं; अब उन्हें भारत से भी उखाड़ फेंकना होगा.” वहीं मुखिया ने योद्धा-ऋषि परशुराम का हवाला देते हुए कहा था, “मैंने वही किया जो परशुराम ने किया था. हिंसा ज़रूरी है…वरना अन्याय हावी हो जाएगा.”

2012 में अज्ञात बंदूकधारियों ने मुखिया की हत्या कर दी. इसके बाद पूरे बिहार में विरोध प्रदर्शन हुए. आज भी कई भूमिहारों के लिए मुखिया एक प्रतीक बने हुए हैं.
सहजानंद सरस्वती आश्रम में पिनेश कुमार सिंह ने कहा, “लालू के शासन में, भूमिहार ही ऐसा समुदाय था जिसने हार नहीं मानी. मुखियाजी ने हमें आत्म-सम्मान के साथ जीना सिखाया. हमारे समाज के लिए वे देवता जैसे थे.”
हालांकि, पिनेश कुमार ने यह भी कहा कि समुदाय की इज़्ज़त अब घट रही है और ज़मींदारी का रास्ता धीरे-धीरे रंगदारी की ओर मुड़ गया है.
‘शासक वर्ग’ से ‘लड़ने वाले वर्ग’ में यह बदलाव आज भी भूमिहारों की सोच का बड़ा हिस्सा है.
मृत्युंजय शर्मा ने अपनी किताब ब्रोकन प्रॉमिसेज़: कास्ट, क्राइम एंड पॉलिटिक्स इन बिहार में लिखा है, “जैसे-जैसे अब तक दबे-कुचले वर्गों में जागरूकता बढ़ी, भूमिहारों का दबदबा कम होता गया. इसके बावजूद, उन्होंने बिहार की किसी भी दूसरी ऊंची जाति की तुलना में अपनी सामाजिक और जातिगत स्थिति की ज़्यादा मज़बूती से रक्षा की.”
उन्होंने लिखा, “जाति सेनाएं इसी सोच का नतीजा थीं और उन्हें अपने विशेषाधिकार बचाने और राजनीति में वापसी की आख़िरी उम्मीद माना गया.”
बिहट में सर्दियों की धूप में बैठे दोस्तों का एक समूह उन पुराने दिनों की बातें जोश से कर रहा था, जो उनके जन्म से बहुत पहले गुजर चुके थे.
विकास ने कहा, “हम वही लोग हैं, जो 1990 के दशक में लालू यादव के शासन के खिलाफ खड़े हुए थे.”
1990 के दशक को याद करते हुए उनके दोस्त सूर्य सिंह ने बताया, जो जीतन राम मांझी की हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के साथ काम कर चुके हैं, कि उस दौर में कई भूमिहारों ने ‘सवर्णों में फैले डर’ की वजह से राज या आनंद जैसे आम उपनाम अपना लिए थे. हालांकि, उन्होंने कहा कि भूमिहारों की राजनीतिक ताकत आज भी उनकी आबादी से कहीं ज़्यादा है.
उन्होंने कहा, “हम आज भी बिहार की राजनीति पर हावी हैं. हमारी संख्या कम है, इसका मतलब यह नहीं कि हम कमज़ोर हैं.”
इस समुदाय में जोशीले नारे आम हैं. एक नारा है: नदी नाला सरकार के, बाकी सब भूमिहार के. एक और नारा, जो नीतीश कुमार की 2005 की जीत के बाद लोकप्रिय हुआ था, आज भी सुनाई देता है: कुर्मी को राज, भूमिहार को ताज.
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 32 भूमिहार उम्मीदवार उतारे. इनमें से दो अब नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में हैं — उनके करीबी सहयोगी और जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी और उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा.
योद्धा, ऋषि, ज़मींदार
सभी याचिकाओं और सर्वे के बावजूद, भूमिहारों की कहानी की कोई एक साफ और तय शुरुआत नहीं मिलती. इसमें ज़मीन, परंपराएं, कहानियां, मिथक और राजनीति—सब कुछ जुड़ा हुआ है.
मोकामा में, जो पटना–कोलकाता की व्यस्त रेल लाइन पर पड़ता है, भूमिहारों का एक मंदिर है जो परशुराम को समर्पित है. परशुराम को कुल्हाड़ी धारण करने वाला योद्धा-ऋषि माना जाता है. शाम की आरती के समय पुजारी कहते हैं, “परशुराम भगवान की जय.”
मंदिर परिसर में खड़े एक भक्त और नियमित रूप से आने वाले राकेश सिंह ने कहा, “परशुराम हमारे लिए गर्व का विषय हैं. हम अपनी वंशावली उनसे जोड़ते हैं.”

भूमिहार-ब्राह्मण पहचान अक्सर एक खास सोच पर आधारित होती है—ऐसे ब्राह्मण जो सिर्फ पुजारी नहीं थे, बल्कि जिन्होंने शासन भी किया और खेती भी की. सिंह ने टेकारी के महाराजा, हथुआ राज और बेतिया राज का ज़िक्र किया. इन उदाहरणों को समुदाय अपने शासक होने के दावे को मज़बूत करने के लिए याद करता है.
कुछ विद्वानों ने ब्राह्मणों को दो बड़ी श्रेणियों में बांटा है—याचक (जो पूजा-पाठ करते हैं और दान लेते हैं) और अयाचक (जो यह काम नहीं करते).
अनुराग शर्मा ने अपनी किताब ‘ब्राह्मण जिन्होंने भीख मांगने से इनकार किया: पूर्वी भारत के भूमिहार, अयाचक ब्राह्मणों का संक्षिप्त इतिहास’ में लिखा है, “भूमिहार पूर्वी भारत का एक प्रमुख अयाचक ब्राह्मण समुदाय है. अयाचक ब्राह्मणों ने पुजारी का काम छोड़ दिया, खेती को अपना साधन बनाया और अपनी भूमि की रक्षा के लिए हथियार उठाए.”
लेकिन भूमिहारों के ब्राह्मण पूर्वजों को लेकर दूसरे विचार भी हैं. ब्रिटिश दौर के इतिहासकार और संस्कृत के विद्वान हरप्रसाद शास्त्री का मानना था कि कुछ ब्राह्मण समूह बौद्ध धर्म में चले गए थे और बाद में कम धार्मिक दर्जे के साथ हिंदू समाज में वापस आए. उन्होंने छोड़े गए मठों और मंदिरों से जुड़ी ज़मीनों पर भी कब्ज़ा कर लिया. शास्त्री ने ‘भूमिहार’ शब्द को ‘भूमि-हारक’ से जोड़ा.
इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल ने भी अपनी किताब ‘एज ऑफ काली: इंडियन ट्रैवल्स एंड एनकाउंटर्स’ में भूमिहारों के बौद्ध संबंध का ज़िक्र किया है.

हालांकि, इस समुदाय की सबसे स्थायी पहचान ज़मीन ही रही है. अर्थशास्त्री और एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर का कहना है कि यह पहचान औपनिवेशिक दौर की ज़मीन व्यवस्था से जुड़ी है. उन्होंने बताया कि अंग्रेज़ों ने 1793 के स्थायी बंदोबस्त कानून के ज़रिये ज़मींदारी व्यवस्था को औपचारिक रूप दिया और ज़मीन को एक संपत्ति बना दिया.
दिवाकर ने कहा, “जो लोग अंग्रेजों के क़रीब थे, वे उस समय ज़मींदार बन गए. चूंकि भूमिहार उत्तर भारत के कुछ इलाकों में ज़्यादा थे, इसलिए उन्होंने वहां ज़मीन पर मालिकाना हक हासिल कर लिया और बड़े इलाकों के मालिक बन गए.”
भूमिहारों की ज़मींदारी विरासत को साहित्य और सिनेमा में भी दिखाया गया है. प्रशांत राय की 2021 की शॉर्ट फिल्म ‘भूमिहार’ एक ऐसे समुदाय को दिखाती है, जो भले ही उसके नाम पर ज़्यादा ज़मीन न हो, लेकिन ज़मीन के मालिक होने को अपनी पहचान मानता है. साहित्य में, भुवनेश्वर मिश्रा का 1902 में प्रकाशित उपन्यास ‘बलवंत भूमिहार’ ज़मींदारों के अत्याचारों को इतनी साफगोई से दिखाता है कि छपते ही उसकी ज़्यादातर प्रतियां वाराणसी में गंगा में बहा दी गई थीं. इस किताब को हाल ही में दोबारा छापा गया है.
फिर भी, भूमिहार पहचान हर जगह एक जैसी नहीं है. यह बिहार के अलग-अलग इलाकों में अलग रूप लेती है. जैसे मिथिला क्षेत्र में, भूमिहार अक्सर मिश्रा उपनाम इस्तेमाल करते हैं और पारंपरिक ब्राह्मणों के साथ रोटी-बेटी यानी खाने-पीने और शादी-ब्याह का रिश्ता रखते हैं.
मुजफ्फरपुर के पुजारी सुभाष मिश्रा ने कहा, “यह हर जगह आम नहीं है. बिहार के बाकी हिस्सों में भूमिहार आमतौर पर अपनी ही जाति में शादी करते हैं.”
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि “असली ब्राह्मण वही हैं जो पुजारी का काम करते हैं.”
उपनाम भी भूमिहारों के बीच क्षेत्रीय फर्क को दिखाते हैं. गया, जहानाबाद और पटना के आस-पास के इलाकों में भूमिहार चौधरी, उपाध्याय और सिंह जैसे उपनाम रखते हैं. मुंगेर, बेगूसराय और लखीसराय में सिंह ज़्यादा प्रचलित है. पटना के पास के जिलों में इस समुदाय को कम ‘सख्त’ माना जाता है, जबकि बेगूसराय, मुंगेर और लखीसराय में, जहां मगही बोली जाती है—भूमिहारों को ज़्यादा मुखर समझा जाता है.
जाति गौरव को लेकर समुदाय के अंदर लंबे समय से विरोधाभास भी रहे हैं. समुदाय की एक बड़ी साहित्यिक शख्सियत, ‘राष्ट्रकवि’ रामधारी सिंह दिनकर ने जातिवाद को नकारा था और 1961 के एक पत्र में इसे जन्म से जुड़ा एक संयोग बताया था.
उन्होंने लिखा था, “बिहार की खराब हालत को सुधारने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि लोग जातियों को भूल जाएं और काबिल लोगों को सम्मान देने के लिए एकजुट हों.”
लेकिन बिहट के विकास के लिए, भूमिहार ही राज करने वाली जाति हैं और कोई दूसरी जाति उनके बराबर नहीं है.
उन्होंने कहा, “भूमिहारों के पास चाणक्य जैसा दिमाग और परशुराम जैसी ताकत है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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