नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी के सरकारी स्कूलों के शिक्षक कक्षाओं को डिजिटल बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब उनके सामने टैबलेट से जुड़ी एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई है और उसका नाम है रिइम्बर्समेंट (पैसे की वापसी).
दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में गणित पढ़ाने वाली शिक्षिका मनीषा जब रोज़ शिक्षा निदेशालय (DoE) के पोर्टल पर लॉग इन कर उपस्थिति और छात्रों का रिकॉर्ड अपडेट करती हैं, तो वह यह काम उस टैबलेट पर करती हैं जिसे उन्होंने अपनी तनख्वाह से खरीदा था.
यह टैबलेट उन्होंने तीन साल पहले 15,000 रुपये में खरीदा था, जो उनकी एक महीने की कमाई के आधे से भी ज्यादा था, लेकिन अब तक उन्हें उसका रिइम्बर्समेंट नहीं मिला है.
मनीषा अकेली नहीं हैं. करीब 60,000 स्कूल शिक्षक दिल्ली सरकार से उन डिजिटल टूल्स के पैसे वापस मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं, जिन्हें उन्हें कक्षा के काम के लिए खरीदने के लिए कहा गया था—अक्सर अपनी जेब से.
मनीषा ने कहा, “मैंने टैबलेट इसलिए खरीदा क्योंकि प्रिंसिपल की तरफ से दबाव था कि निरीक्षण होगा और गेस्ट टीचर होने के कारण मैं अपनी नौकरी जोखिम में नहीं डालना चाहती थी.”
उन्होंने कहा, “मुझे एक दिन का सिर्फ 1,403 रुपये मिलता है. कई महीनों में मेरी कमाई 25,000 रुपये तक ही पहुंचती है, इसलिए यह टैबलेट मेरे लिए बड़ा खर्च था.”
मनीषा मध्य दिल्ली के एक गवर्नमेंट बॉयज़ सीनियर सेकेंडरी स्कूल में कक्षा 6 से 10 तक गणित पढ़ाती हैं.
उनका अधिकतर प्रशासनिक काम—जैसे उपस्थिति, अंक दर्ज करना, छात्रवृत्ति का रिकॉर्ड, यूनिफॉर्म वितरण का डेटा और मिड-डे मील का रिकॉर्ड—अब ऑनलाइन पोर्टल के जरिए किया जाता है, जिसमें शिक्षकों को अलग-अलग लॉग इन करना पड़ता है.
सरकारी काम पूरा करने के लिए उन्हें हर महीने कम से कम 400 रुपये मोबाइल डेटा पर खर्च करने पड़ते हैं.
मनीषा के मुताबिक, पिछले आठ सालों में स्कूलों में सैलरी नहीं बढ़ी है, जबकि इसी दौरान स्कूल जाने के लिए उनके ऑटो का किराया दोगुना हो गया है. मनीषा उन 60,000 से ज्यादा सरकारी स्कूल शिक्षकों में शामिल हैं, जिनमें नियमित और गेस्ट शिक्षक दोनों हैं—जो कहते हैं कि शिक्षा विभाग ने उन्हें शहर में डिजिटल व्यवस्था लागू करने के तहत 15,000 रुपये तक के टैबलेट खरीदने का निर्देश दिया था.
पहला सर्कुलर 2018 में जारी हुआ था. इसके बाद 2023 में एक स्पष्टीकरण जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि “सभी संबंधित शिक्षक टैबलेट खरीदें और 31.01.2024 तक उसका बिल जमा करें. ऐसा न करने पर रिइम्बर्समेंट नहीं दिया जाएगा और नियम के अनुसार कार्रवाई की जाएगी.”

शिक्षकों का कहना है कि आम आदमी पार्टी सरकार ने टैबलेट के लिए 15,000 रुपये तक का रिइम्बर्समेंट और हर महीने 200 रुपये इंटरनेट भत्ता देने का वादा किया था, लेकिन कई शिक्षकों का कहना है कि उन्हें टैबलेट का पैसा अब तक नहीं मिला, जबकि इंटरनेट भत्ता भी सिर्फ एक-दो बार दिया गया और फिर बंद हो गया.
इसके बाद से दिल्ली का शिक्षकों का संगठन रिइम्बर्समेंट पाने के लिए लगातार आवेदन, पत्र और याचिकाएं दे रहा है, लेकिन बहुत कम सफलता मिली है. दिल्ली गवर्नमेंट स्कूल टीचर्स एसोसिएशन के महासचिव अजय वीर यादव के अनुसार संगठन ने शिक्षा विभाग को कई बार पत्र लिखे और अलग-अलग सरकारों के समय बैठक की मांग भी की, लेकिन ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं मिली.
उन्होंने कहा कि बार-बार अनुरोध करने के बावजूद संगठन को उस समय के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल या शिक्षा मंत्री से मिलने का मौका नहीं मिला. नई सरकार बनने के बाद यादव ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से मुलाकात कर बजट में रिइम्बर्समेंट शामिल करने की मांग की.
उन्होंने कहा, “उन्होंने कहा कि इसके लिए व्यवस्था की जाएगी और शिक्षा मंत्री से देखने को कहा. लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ.” यादव ने कुछ हफ्ते पहले फिर उनसे मुलाकात की, लेकिन तब भी कोई नतीजा नहीं निकला.

ये टैबलेट योजना आप सरकार के कार्यकाल में शुरू की गई थी, जो उसकी चर्चित शिक्षा सुधार योजनाओं का हिस्सा थी. 2018 में शिक्षा निदेशालय के दिशा-निर्देशों में शिक्षकों से कहा गया था कि वे टैबलेट खरीदें और उसका मूल बिल स्कूल के प्रधानाचार्य को जमा करें, जिसके बाद 15 दिनों के भीतर भुगतान किया जाएगा.
मेहरौली के गवर्नमेंट बॉयज़ सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रिंसिपल ने पुष्टि की कि यह योजना 2017-18 के आसपास शुरू हुई थी और शिक्षकों से कहा गया था कि वे टैबलेट खरीदें, यह भरोसा दिया गया था कि सरकार उसका पैसा वापस देगी. हालांकि, उन्होंने यह बताने से मना कर दिया कि भुगतान हुआ या नहीं.
डिजिटल अभियान, लेकिन बकाया भुगतान
आरटीआई के जवाब में 10 जोन के करीब 300 स्कूलों के लगभग 9,000 शिक्षकों से जुड़ी जानकारी दी गई, जिसमें दिखा कि किसी भी शिक्षक को रिइम्बर्समेंट नहीं मिला.
सरकारी काम के लिए टैबलेट खरीदने के कई साल बाद भी दिल्ली के कई सरकारी स्कूलों में भुगतान लंबित है.
दिसंबर 2025 में पीटीआई-भाषा द्वारा दायर सूचना के अधिकार (RTI) आवेदन से मिली जानकारी के अनुसार हाल के वर्षों में खरीदे गए टैबलेट का भुगतान भी अभी तक नहीं हुआ है. 7 दिसंबर 2023 को शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी एक सर्कुलर में फिर से शिक्षकों को अपने खर्च पर टैबलेट खरीदने और रिइम्बर्समेंट के लिए बिल जमा करने को कहा गया था.
इसमें कहा गया था कि जिन शिक्षकों ने 2018 के नियमों के तहत चार साल से पहले टैबलेट खरीदा था, वे 15,000 रुपये तक का नया टैबलेट खरीद सकते हैं. आरटीआई के जवाब में करीब 9,000 शिक्षकों की जानकारी दी गई, जिसमें बताया गया कि किसी को भी रिइम्बर्समेंट नहीं मिला.
दिल्ली सरकार के अतिरिक्त शिक्षा निदेशक के. ए. उपाध्याय ने कहा कि उन्हें डिजिटल सुधार या रिइम्बर्समेंट प्रक्रिया पर टिप्पणी करने की अनुमति नहीं है और इस बारे में सिर्फ निदेशक ही बयान दे सकते हैं.
दिप्रिंट ने रिइम्बर्समेंट, बजट आवंटन और यह जानने के लिए कि क्या शिक्षकों को अभी भी अपने खर्च पर टैबलेट खरीदना पड़ रहा है, शिक्षा निदेशालय से संपर्क किया है. जवाब का इंतज़ार किया जा रहा है.
दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद के कार्यालय से जुड़े जय प्रसाद ने कहा कि रिइम्बर्समेंट या अन्य समस्याओं का सामना कर रहे शिक्षक अपने-अपने उप शिक्षा निदेशकों (डीडीई) से संपर्क कर सकते हैं.
उन्होंने कहा, “अगर मैडम (रेखा गुप्ता) ने वादा किया है तो यह ज़रूर पूरा होगा. यह मामला आने वाले बजट सत्र में आगे बढ़ सकता है. इसमें थोड़ा समय लगेगा.”
दिप्रिंट ने आम आदमी पार्टी से भी संपर्क किया, जिसकी सरकार के दौरान यह टैबलेट योजना शुरू हुई थी.
पार्टी ने अपने जवाब में कहा, “केजरीवाल सरकार ने तकनीक आधारित शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा कदम उठाया था” लेकिन शिक्षकों के टैबलेट के रिइम्बर्समेंट से जुड़े सवालों पर कोई सीधा जवाब नहीं दिया.
शिक्षकों ने उठाया खर्च
यह कोई बोनस या बकाया नहीं है. यह हमारा अपना पैसा है, जो सरकार को हमें वापस करना है
करोल बाग के गवर्नमेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल में 31 साल से शारीरिक शिक्षा पढ़ा रहे अजय वीर यादव के लिए टैबलेट योजना इस बात की याद दिलाती है कि डिजिटल सुधारों का खर्च आखिरकार खुद शिक्षकों पर ही पड़ गया.
उनके लिए टैबलेट के पैसे वापस पाने की लड़ाई 2018 में ही शुरू हो गई थी, जब पहली बार शिक्षकों को सरकारी काम के लिए टैबलेट खरीदने को कहा गया था. अब दिल्ली गवर्नमेंट स्कूल टीचर्स एसोसिएशन के महासचिव यादव ने बताया कि डिजिटलाइजेशन अभियान के तहत लगभग 50,000 नियमित शिक्षकों और 10,000 से 14,000 गेस्ट शिक्षकों को टैबलेट खरीदने के लिए कहा गया था.

शिक्षा विभाग द्वारा तय व्यवस्था के अनुसार शिक्षकों को अपने पैसे से टैबलेट खरीदना था और उसका मूल बिल स्कूल के प्रिंसिपल को देना था.
इसके बाद प्रिंसिपल इन दावों को दिल्ली सरकार के पे एंड अकाउंट्स ऑफिस को भेजते थे, जिसके बाद स्कूलों को पैसे दिए जाने थे ताकि शिक्षकों को रिइम्बर्समेंट किया जा सके. यादव के अनुसार यह प्रक्रिया बजट आवंटन के चरण पर आकर रुक गई. हर स्कूल को हर साल वेतन, मेडिकल खर्च और अन्य प्रशासनिक खर्चों के लिए बजट मिलता है. उन्होंने कहा कि टैबलेट रिइम्बर्समेंट के लिए भी ऐसी ही व्यवस्था होनी चाहिए थी, लेकिन स्कूलों को इसके लिए जरूरी पैसा कभी नहीं मिला.
इसका नतीजा यह हुआ कि 2018 से जमा किए गए कई रिइम्बर्समेंट के दावे आज तक कई स्कूलों में लंबित हैं. यादव के अनुसार हर शिक्षक के कम से कम 15,000 रुपये सिर्फ टैबलेट खरीद में फंसे हुए हैं, इसके अलावा कई सालों का इंटरनेट खर्च भी है.
उन्होंने कहा, “यह कोई बोनस या बकाया नहीं है. यह हमारा अपना पैसा है, जो सरकार को हमें वापस करना है.”
अब स्कूलों में रोज़मर्रा के प्रशासनिक काम के लिए टैबलेट बहुत ज़रूरी हो गए हैं.
शिक्षक इन उपकरणों का इस्तेमाल DoE ऐप से उपस्थिति लगाने, Edudel पोर्टल पर परीक्षा के अंक दर्ज कर पूरा रिजल्ट बनाने, मिशन बुनियाद (अब निपुण) के आकलन की जानकारी भेजने, छात्रवृत्ति रिकॉर्ड, U-DISE (यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन) रजिस्ट्रेशन और APAR (ऑटोमेटेड परमानेंट अकादमिक अकाउंट रजिस्ट्री) आईडी के लिए करते हैं.
डेटा दर्ज करने के लिए शिक्षकों को अलग-अलग लॉग इन करना पड़ता है, चाहे वे यह काम टैबलेट पर करें या अपने फोन पर. स्कूलों को यह भी रिपोर्ट देनी होती थी कि शिक्षकों ने टैबलेट खरीद लिए हैं, जिससे समय सीमा पूरी करने का दबाव बन गया, भले ही कई शिक्षक यह खर्च उठाने में सक्षम न हों.
यादव ने कहा, “एक तय तारीख थी और प्रिंसिपलों को अनुपालन रिपोर्ट देनी थी. उसी दबाव में शिक्षकों ने टैबलेट खरीद लिए, जबकि कई इसे खरीदने की स्थिति में नहीं थे.”
कई शिक्षकों का कहना है कि ये टैबलेट सिर्फ कुछ साल ही ठीक से चले और अब ठीक से काम नहीं करते, इसलिए उन्हें सरकारी काम के लिए अपने निजी फोन या लैपटॉप का इस्तेमाल करना पड़ रहा है. यादव ने कहा, “ज्यादातर टैबलेट करीब तीन साल तक ही ठीक से चले. उसके बाद खराब होने लगे और शिक्षकों को अपने निजी फोन और लैपटॉप का सहारा लेना पड़ा, लेकिन रिइम्बर्समेंट अब भी लंबित है.”
यादव ने कहा कि 2024 में फिर से शिक्षकों से टैबलेट खरीदने के लिए कहा गया था, लेकिन एसोसिएशन ने सदस्यों को सलाह दी कि जब तक पुराने भुगतान नहीं होते, तब तक नया टैबलेट न खरीदें.
उन्होंने कहा, “मैंने शिक्षकों से कहा कि नया टैबलेट मत खरीदिए, क्योंकि पहले के पैसे ही नहीं मिले हैं. कोई भी शिक्षक को मजबूर नहीं कर सकता कि वह सरकारी काम के लिए अपनी तनख्वाह खर्च करे.”
यादव ने कहा कि सरकार चाहती तो टैबलेट खुद खरीदकर स्कूलों को दे सकती थी, बजाय इसके कि शिक्षकों से अलग-अलग खरीदने को कहा जाए.
उन्होंने कहा, “अगर सरकार खुद टैबलेट खरीदती तो उनकी गुणवत्ता और रखरखाव की जिम्मेदारी भी तय होती. लेकिन इसके बजाय शिक्षकों से कहा गया कि वे कोई भी डिवाइस खरीदें और बाद में रिइम्बर्समेंट का दावा करें.”
दूसरे शिक्षकों के संगठन भी इस मुद्दे को उठा रहे हैं.
दिल्ली के डेमोक्रेटिक टीचर्स फोरम के अध्यक्ष कृष्ण कुमार फोगाट ने कहा कि उन्होंने लंबित रिइम्बर्समेंट को लेकर मौजूदा और पिछली दोनों सरकारों के अधिकारियों से मुलाकात की है. सबसे हाल की बैठक करीब एक महीने पहले हुई थी.
फोगाट ने कहा, “जहां पिछली सरकार कहती थी कि फिलहाल बजट नहीं है, वहीं मौजूदा सरकार कहती है कि यह पिछली सरकार की योजना थी और वे इसमें ज्यादा मदद नहीं कर सकते.”
शिक्षकों का कहना—सहयोग नहीं मिला
शिक्षकों का कहना है कि डिजिटल सिस्टम लागू तो कर दिया गया, लेकिन इसके लिए न तो सही प्रशिक्षण दिया गया और न ही संस्थागत सहयोग मिला.
यादव ने कहा कि शिक्षक डिजिटलाइजेशन के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उनका मानना है कि इस बदलाव के साथ प्रशिक्षण और सरकारी उपकरण भी दिए जाने चाहिए थे.
इसके बजाय, उन्होंने कहा कि यह सुधार पूरी तरह से शिक्षकों के निजी संसाधनों पर ही निर्भर हो गया.
एक समय शिक्षकों के संगठन ने “टैब-डाउन स्ट्राइक” का भी विचार किया था, जिसमें शिक्षक सरकारी काम के लिए अपने निजी उपकरणों का इस्तेमाल करने से मना कर देते. लेकिन यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया.
यादव ने कहा, “शिक्षक डरते हैं क्योंकि वे अपनी नौकरी जोखिम में नहीं डालना चाहते, लेकिन अब समय आ गया है कि इस मुद्दे पर आवाज उठाई जाए.”
(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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