Saturday, 2 July, 2022
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नंबरों की असमानता के चलते पसंदीदा कॉलेज, सरकारी नौकरी नहीं खोएंगे राज्य बोर्ड के छात्र, जल्द आएगी SOP

विभिन्न राज्य बोर्डों के पास मूल्यांकन की अलग-अलग प्रणालियां हैं, जो छात्रों द्वारा विश्वविद्यालयों में आवेदन करने पर समस्याएं पैदा करती हैं; एआईयू भारत के विभिन्न बोर्ड्स के लिए एसओपी जारी करेगा.

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नई दिल्ली: प्रदेश बोर्ड्स के छात्र जो नंबरों और मूल्यांकन की अलग-अलग व्यवस्थाओं की वजह से, विश्वविद्यालयों में दाख़िला लेने और सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन देते समय अकसर घाटे में रहते हैं, उन्हें जल्द ही अपने 10वीं और 12वीं के सर्टिफिकेट्स के लिए योग्यता की समानता मिल जाएगी.

दिप्रिंट को पता चला है कि अलग-अलग स्कूल बोर्ड्स के बीच असमानता को ख़त्म करने के लिए, शिक्षा मंत्रालय ने भारतीय विश्वविद्यालय संघ (एआईयू) को, भारत के विभिन्न बोर्ड्स के माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक प्रमाण पत्रों को, समानता प्रदान करने का ज़िम्मा सौंपा है.

विभिन्न बोर्ड्स के अलग-अलग तरीक़े होते हैं, जिनसे वो नंबर आवंटित करते हैं और छात्रों का मूल्यांकन करते हैं, और ये कभी कभी विश्वविद्यालयों के लिए समस्या बन जाता है. इसकी ताज़ा मिसाल केरल बोर्ड के छात्रों की है, जिन्होंने पिछले दो महीनों में दिल्ली यूनिवर्सिटी के सर्वाधिक मांग वाले कॉलेजों में, सबसे ज़्यादा सीटें भर ली हैं.

नवंबर में, शिक्षा मंत्रालय ने एआईयू को पत्र लिखकर मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपीज़) पर काम शुरू करने के लिए कहा था, जो विभिन्न बोर्ड्स द्वारा जारी किए गए माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक बोर्ड्स को, समानत प्रदान करने में सहायता करेगा.

मंत्रालय के पत्र में, जिसकी एक प्रति दिप्रिंट के पास है, कहा गया, ‘सरकार के संज्ञान में आया है कि छात्रों को भारत के विभिन्न बोर्ड्स द्वारा जारी किए गए सर्टिफिकेट्स की समानता को लेकर, उच्च माध्यमिक संस्थानों में दाख़िले और केंद्र तथा राज्य सरकार में नौकरियां हासिल करने में मुश्किलें पेश आ रही हैं’.

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उसमें आगे कहा गया, ‘शिक्षा मंत्रालय भारत में परीक्षा बोर्ड्स द्वारा दिए गए ग्रेड 10 और 12 की परीक्षा योग्यता के, माध्यमिक/वरिष्ठ माध्यमिक प्रमाण पत्रों को समानता प्रदान करने का ज़िम्मा (एआईयू को) सौंप रही है.

एआईयू फिलहाल प्रमाण पत्र समानता के लिए एसओपी तैयार करने की प्रक्रिया में है. अधिकारियों के अनुसार, एसओपीज़ सुनिश्चित करेंगे कि स्कूल बोर्ड्स, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीपी), नई शिक्षा नीति (एनईपी), और शिक्षा का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, परीक्षा उपनियमों का पालन करें.

एआईयू को लिखे मंत्रालय के पत्र में कहा गया, ‘ये समानता क़ानूनों के अनुसार ही प्रदान की जाएगी’.


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विदेशी डिग्रियों को समानता

एआईयू भारत के अंदर उच्च शिक्षा की विदेशी डिग्रियों को समानता देती रही है. अगर कोई छात्र किसी पीएचडी कार्यक्रम में पंजीकरण कराना चाहता है, या किसी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करना चाहता है, तो उसे अपनी विदेशी डिग्रियों, ख़ासकर एक-वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएट डिग्रियों के लिए, एआईयू से समानता प्रमाणपत्र लेना होता है.

वो कैम्ब्रिज और अंतर्राष्ट्रीय स्नातक (आईबी) जैसे विदेशी शिक्षा बोर्ड्स के लिए भी ऐसा करते आ रहे हैं. लेकिन, अभी तक देश के 60 से अधिक राज्य बोर्ड्स (सरकारी व निजी) के लिए, इस काम को करने की कोई व्यवस्था नहीं थी.

एआईयू महासचिव पंकज मित्तल ने दिप्रिंट से कहा, ‘हम काफी समय से विदेशी उच्च शिक्षा डिग्रियों को समानता प्रदान करते आ रहे हैं, इसलिए हमारे पास इस काम को करने की विशेषज्ञता है. हम इस प्रक्रिया के लिए एसओपी को अंतिम रूप देने का काम कर रहे हैं, और अगले तीन महीने में ये लेकर सामने आ जाएंगे’.

उन्होंने आगे कहा, ‘भारत में ऐसे बहुत सारे बोर्ड हैं जिनसे विश्वविद्यालय और सरकारी प्रतिष्ठान वाक़िफ नहीं हैं, दाख़िला लेने या सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन देते समय, छात्रों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है. इसलिए ज़रूरत महसूस की गई कि समानता की व्यवस्था लाई जाए, ताकि प्रतिष्ठानों को समझ आ जाए कि अपने छात्रों का मूल्यांकन करने के मामले में बोर्ड कहां खड़ा है’.

DU की एक मिसाल

दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया, ‘जब हम किसी राज्य, मान लीजिए बंगाल, बिहार या किसी अन्य बोर्ड के छात्र को दाख़िला दे रहे होते हैं, तो हम निश्चित नहीं होते कि उन्हें नंबर कैसे मिले हैं, क्योंकि कुछ बोर्ड्स अपने नंबरों को लेकर बहुत रूढ़िवादी होते हैं, जबकि सीबीएसई जैसे अन्य बोर्ड बहुत उदार होते हैं. इसलिए हमारे पास छात्र के वास्तविक ज्ञान को परखने का कोई रास्ता नहीं होता’.

इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (आईसीएसई) और केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई), भारतीय स्कूलों के दो बोर्ड हैं जो केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं.

दिल्ली विश्वविद्यालय ने हाल ही में एक पैनल का गठन किया, जिसने विभिन्न बोर्ड्स के छात्रों की प्रवेश दरों तथा औसत प्रवेश प्रतिशत का अध्ययन किया. इन बोर्ड्स में राज्य बोर्ड्स, सीबीएसई, और काउन्सिल ऑफ इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्ज़ामिनेशंस (सीआईएससीई) शामिल हैं. पिछले हफ्ते यूनिवर्सिटी की शैक्षणिक परिषद को सौंपी अपनी रिपोर्ट में, पैनल ने पाया कि दाख़िला पाने वालों में सबसे अधिक संख्या, केरल बोर्ड, राजस्थान बोर्ड, और हरियाणा बोर्ड के छात्रों की थी.

इन बोर्ड्स के लिए स्वीकृति दर ऊंची थी- सीबीएसई (16.47 प्रतिशत), केरल (39.18 प्रतिशत), राजस्थान (27.75 प्रतिशत), और हरियाणा (18.39 प्रतिशत). स्वीकृति दर दाख़िलों की संख्या होती है, जो आवेदन करने वाले कुल छात्रों में से किए जाते हैं.

ये भी पाया गया कि दाख़िलों का सबसे अधिक औसत प्रतिशत केरल बोर्ड का था (98.43 प्रतिशत), जिसके बाद 95.41 प्रतिशत पर तेलंगाना स्टेट बोर्ड ऑफ इंटरमीडिएट एजुकेशन था और 94.68 प्रतिशत के साथ राजस्थान बोर्ड था.

सीबीएसई बोर्ड के लिए ये 91.3 प्रतिशत था और सीआईएससीई के लिए 92.33 प्रतिशत था. औसत प्रवेश प्रतिशत वो औसत कट-ऑफ प्रतिशत है जिसपर छात्रों को दाख़िला दिया गया.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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