Thursday, 30 June, 2022
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कोरोना के कारण गांवों में हुई पढ़ाई चौपट, सर्वे से पता चला कि 37% छात्र बिल्कुल नहीं पढ़ पा रहे

सर्वेक्षण में कहा गया है कि जैसे ही स्कूल फिर से खुलेंगे, बच्चे अपने ग्रेड के पाठ्यक्रम से खुद को 'तीन बार' दूर किया गया पाएंगे.

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नई दिल्ली: कोविड महामारी के कारण देश भर में स्कूलों के बंद रहने के बाद किए गए एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि ग्रामीण परिवारों से केवल आठ प्रतिशत बच्चे ही नियमित रूप से ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल होते हैं.

स्कूल चिल्ड्रन ऑनलाइन एंड ऑफलाइन लर्निंग (स्कूल) नामक यह सर्वेक्षण अगस्त 2021 में आयोजित किया गया था और इसे अर्थशास्त्री जीन द्रेज, रीतिका खेरा, निराली बाखला और विपुल पैकरा द्वारा कई राज्यों में मौजूद स्वयंसेवकों की एक टीम की मदद से समन्वित किया गया था.

इस टीम ने 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों – असम, बिहार, चंडीगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में वंचित समाज के परिवारों के 1,400 स्कूली बच्चों पर सर्वेक्षण किया.

इसके निष्कर्षों से पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में, केवल 8 प्रतिशत बच्चे ही नियमित रूप से ऑनलाइन पढ़ रहे हैं. उनमें से 37 प्रतिशत बिल्कुल भी नहीं पढ़ रहे हैं, और लगभग आधे थोड़े से शब्दों से अधिक कुछ भी पढ़ने में असमर्थ हैं.’

सर्वेक्षण के निष्कर्षों के अनुसार, अधिकांश माता-पिता चाहते हैं कि स्कूल जल्द से जल्द फिर से खुल जाएं.

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साक्षरता दर

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सर्वेक्षण से एक ‘बिल्कुल ही निराशाजनक’ तस्वीर उभर कर आई है.

इस सर्वेक्षण में बच्चों के सीखने के स्तर में भी कई बड़ी विसंगतियां पाई गईं . ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि वे लंबे समय तक स्कूल नहीं जा पाए हैं. उदाहरण के तौर पर कक्षा 3 से 5 के ग्रामीण परिवारों से संबंधित लगभग 42 प्रतिशत बच्चे एक भी शब्द नहीं पढ़ पा रहे थे.

कक्षा 2 के बच्चों के सैंपल में से शहरी क्षेत्रों में 65 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 77 प्रतिशत बच्चे कुछ अक्षरों से अधिक नहीं पढ़ सके. यहां यह याद रखना ज़रूरी है कि इनमें से ज्यादातर बच्चे कभी स्कूल नहीं गए. पिछले साल लगाए गये पहले लॉकडाउन के दौरान उन्होने ग्रेड 1 में दाखिला ही लिया था और अब जल्द ही वे ग्रेड 3 में होंगे.’

रिपोर्ट में कहा गया है कि उच्च प्राथमिक स्तर (कक्षा 6-8) पर भी ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में धाराप्रवाह रूप से पढ़ सकने में सक्षम बच्चों का अनुपात आधे से कुछ ही अधिक है.’

इस रिपोर्ट में 2011 की जनगणना के दौरान इसीआयु वर्ग के औसत साक्षरता दर से इन स्कूली बच्चों की साक्षरता दर की तुलना भी की गई है.

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि जनगणना के आंकड़ो के अनुसार उस समय सभी स्कूल के राज्यों में 10-14 आयु वर्ग में औसत साक्षरता दर बिहार (83 प्रतिशत) को छोड़कर 88 प्रतिशत से 98 प्रतिशत बीच थी. इसका अखिल भारतीय औसत 91 प्रतिशत था.

इस रिपोर्ट के अनुसार इस वक्त स्कूली बच्चों के 10-14 आयु वर्ग की साक्षरता दर शहरी क्षेत्रों में 75 प्रतिशत, ग्रामीण क्षेत्रों में 67 प्रतिशत और ग्रामीण दलितों एवम् आदिवासियों के बीच सिर्फ़ 61 प्रतिशत है.

रिपोर्ट में आगे कहा गया है, ‘अधिकांश माता-पिता ने यह महसूस किया कि लॉकडाउन के दौरान उनके बच्चे की पढ़ने और लिखने की क्षमता में गिरावट आई है.’


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स्कूलों को फिर से खोले जाने का मुद्दा

इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अधिकांश अभिभावकों ने स्कूलों को फिर से खोले जाने का समर्थन किया. शहरी क्षेत्रों में, लगभग 10 प्रतिशत को इस बारे में अभी भी कुछ हिचकिचाहट थी, यहां तक कि उनमे से कुछ ने स्कूलों को फिर से खोलने का विरोध भी किया, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में 97 प्रतिशत अभिभावकों ने स्कूलों को फिर से खोलने का समर्थन किया.

रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसे ही स्कूल फिर से खुलेंगे, बच्चे अपने ग्रेड के पाठ्यक्रम से खुद को ‘तीन बार दूर किया गया’ पाएंगे. इसमें कहा गया है कि ऐसा ‘लॉकडाउन के पूर्व के शैक्षणिक अंतराल, लॉकडाउन के दौरान साक्षरता और इससे संबंधित क्षमताओं में गिरावट और उस अवधि में पाठ्यक्रम के आगे बढ़ने के कारण है.

इस रिपोर्टा में यह चेतावनी भी दी गयी है कि इस तरह के अंतराल से निपटने के लिए ‘एक लंबे समय की संक्रमण अवधि में पाठ्यक्रम और शिक्षाशास्त्र (पेडगोजी) में बड़े स्तर पर बदलाव’ की आवश्यकता होगी और इसमें सालों लग सकते हैं.

रिपोर्ट कहती है, ‘स्कूल सर्वेक्षण इस लंबे समय तक चलने वाले लॉकडाउन – जो दुनिया में सबसे लंबे समय के लॉकडाउन में से एक थी – से हुई भारी क्षति का आभास कराती है. जैसा कि हमने देखा, इस नुकसान से माता-पिता एकदम अनभिज्ञ नही हैं.

इस रिपोर्ट के अनुसार ‘इस क्षति की भरपाई के लिए संयम के साथ वर्षों तक काम करना होगा. स्कूलों को फिर से खोलना इस दिशा में सिर्फ पहला कदम है, जिस पर अभी भी बहस चल रही है. वास्तव में, उस पहले कदम की तैयारी (जैसे स्कूल भवनों की मरम्मत, इससे संबंधित सुरक्षा दिशानिर्देश जारी करना, शिक्षकों को प्रशिक्षण देना, नये नामांकन अभियान) अभी भी कई राज्यों में लगभग अदृश्य सी है. उसके बाद, स्कूली शिक्षा प्रणाली को न केवल बच्चों को एक समुचित पाठ्यक्रम की बराबरी करने में सक्षम बनाने के लिए बल्कि उनके मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और पोषण संबंधी हितों को बहाल करने के लिए भी एक विस्तारित संक्रमण अवधि से गुजरने की आवश्यकता है,

अंत में यह रिपोर्ट इस निष्कर्ष के साथ ख़त्म होती है कि ‘हमेशा की तरह व्यवहार’ करने के प्रति बढ़ती हुई प्रवृति एक और आपदा का कारण बन सकती है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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