नई दिल्ली: अगर सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत तक भारत और फ्रांस मेक इन इंडिया के तहत 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए आखिरकार सरकार-से-सरकार का समझौता साइन करेंगे.
सोशल मीडिया पर इस प्रोजेक्ट को लेकर राय बंटी हुई है. कई लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं, जबकि दूसरे इसे भारतीय वायुसेना (आईएएफ) की घटती युद्ध क्षमता को रोकने के लिए ज़रूरी अस्थायी व्यवस्था मानते हैं.
भारत-फ्रांस राफेल डील असल में 25 साल के मोड़ों, अटके फैसलों और राजनीतिक हिचकिचाहट की कहानी है.
कारगिल संघर्ष के बाद, आईएएफ ने यह निष्कर्ष निकाला कि उसे तुरंत एक आधुनिक, सटीक हमला करने वाला लड़ाकू विमान चाहिए.
उस छोटे से युद्ध के दौरान, फ्रांस में बना मिराज 2000, आईएएफ का सबसे भरोसेमंद विमान बनकर उभरा. इसमें वह सब था जिसकी भारत को उस समय बहुत कमी थी—सटीक हमला करने की क्षमता, हर मौसम में ऑपरेशन, दृश्य सीमा से परे (बीवीआर) लड़ाई और नेटवर्क आधारित युद्ध की बुनियाद.
मिराज का प्रदर्शन इतना प्रभावशाली था कि उसने आईएएफ के सबसे बहुउपयोगी और भरोसेमंद स्ट्राइक विमान के रूप में अपनी पहचान पक्की कर ली.
खास बात यह है कि मिराज और राफेल—दोनों एक ही कंपनी के उत्पाद हैं: डसॉल्ट एविएशन.
आईएएफ की मिराज योजना
आईएएफ को पता था कि आने वाले सालों में उसके MiG-21 स्क्वाड्रन को धीरे-धीरे हटाना होगा. Su-30MKI, जो उस वक्त सेवा में आना शुरू कर रहा था, एक भारी श्रेणी का एयर-डॉमिनेंस फाइटर था. अंदरूनी तौर पर, आईएएफ चाहता था कि MiG-21 की जगह ज्यादा मिराज विमान लिए जाएं, जबकि लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) प्रोजेक्ट भी चल रहा था. अगर आईएएफ की चलती, तो वायुसेना के पास Su-30MKI से ज्यादा मिराज होते.
सितंबर 2000 में, भारत ने पहले खरीदे गए विमानों (जो दुर्घटनाओं में नुकसान की भरपाई के लिए थे) के अलावा 10 और मिराज 2000 विमान ऑर्डर किए.
डसॉल्ट ने इसमें मौका देखा और भारत को अपग्रेडेड मिराज 2000-5 की पेशकश की, साथ ही फ्रांस से पूरी असेंबली लाइन भारत को देने का प्रस्ताव भी रखा. डसॉल्ट ने यह ऑफर इसलिए दिया क्योंकि वह मिराज के उत्तराधिकारी, राफेल, की ओर बढ़ रहा था.
आईएएफ ने इस प्रस्ताव को सकारात्मक रूप से लिया और इसे सरकार के सामने रखा, लेकिन भू-राजनीतिक हालात बीच में आ गए. रूस और अमेरिका दोनों ने इस पर ध्यान दिया, क्योंकि वे ऐसे सौदे की क्षमता को समझते थे.
तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को भ्रष्टाचार के संभावित आरोपों का डर था और वह सुरक्षित रास्ता अपनाना चाहती थी. इसलिए सरकार ने आईएएफ से कहा कि वह प्रतियोगिता को खोले, ताकि विकल्पों का दायरा बड़ा हो.
सीधे और ज्यादा मिराज खरीदने के बजाय, जरूरत को बदलकर मिराज जैसी क्षमता वाले मीडिमय वज़नी मल्टी-रोल फाइटर के पक्ष में किया गया—जो भविष्य के लिहाज़ से बेहतर हो और जिसे प्रतियोगिता के जरिए खरीदा जाए.
इसी तरह मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (MMRCA) कार्यक्रम की शुरुआत हुई.

अगस्त 2004 में, भारत ने दुनिया भर के फाइटर विमान निर्माताओं को रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (RFI) जारी की. इसके बाद 2007 में रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी की गई, जिसमें 126 विमानों को तकनीक हस्तांतरण के तहत भारत में खरीदने और बनाने की बात थी, साथ ही 74 और विमानों का विकल्प भी रखा गया.
यह योजना बहुत महत्वाकांक्षी थी और दुनिया का सबसे बड़ा फाइटर जेट खरीद कार्यक्रम था.
योजना के अनुसार, 18 विमान सीधे उड़ान की स्थिति में खरीदे जाने थे और 108 विमान एचएएल द्वारा गहरी तकनीकी ट्रांसफर के साथ बनाए जाने थे. यह विमान मल्टी-रोल होना था, यानी इसका इस्तेमाल हवा-से-हवा की लड़ाई, स्ट्राइक, समुद्री और परमाणु हमले की भूमिकाओं के लिए किया जाना था.
कौन असफल हुआ और क्यों
कुल छह फाइटर विमान इस प्रतियोगिता में थे—फ्रांस का राफेल, यूरोप का यूरोफाइटर टाइफून, अमेरिका के F-16 और F/A-18 सुपर हॉर्नेट, रूस का MiG-35 और स्वीडन का ग्रिपेन. लंबे और गहन परीक्षणों के बाद—जिसमें ऊंचाई वाले इलाकों और रेगिस्तान दोनों में ट्रायल शामिल थे, सिर्फ दो विमान बचे राफेल और टाइफून.
एफ-16 को ज्यादातर इसलिए खारिज किया गया क्योंकि आईएएफ को लगा कि यह भविष्य के लिहाज से पर्याप्त नहीं है. आईएएफ को विमान के पुराने एयरफ्रेम को लेकर चिंता थी, जिससे अपग्रेड की गुंजाइश सीमित थी, इसके सिंगल-इंजन होने और इस बात को लेकर भी कि पाकिस्तान पहले से ही एफ-16 चला रहा है.
सुपर हॉर्नेट एक बेहतरीन विमान होने के बावजूद, गर्म और ऊंचाई वाले इलाकों के ट्रायल में कमज़ोर साबित हुआ और इसे विमानवाहक पोत (कैरियर) के लिए ज्यादा उपयुक्त माना गया, जिससे ज़मीन से संचालित भारतीय ज़रूरतों के लिए समझौते करने पड़ते.
ग्रिपेन इसलिए असफल हुआ क्योंकि उस समय जिस ग्रिपेन एनजी का वादा किया गया था, वह ज्यादातर कागजों पर ही मौजूद था.
रूस का MiG-35 प्रोटोटाइप रूप में पेश किया गया था, जिसमें रडार, एवियोनिक्स और इंजन से जुड़े मुद्दे अभी सुलझे नहीं थे.
2012 में, राफेल को सबसे कम बोली लगाने वाला (एल1) घोषित किया गया, लेकिन इसके बाद हालात बिगड़ते चले गए.
राफेल से जुड़ा हंगामा
पूर्व रक्षा मंत्री स्वर्गीय मनोहर पर्रिकर ने 2015 में कहा था कि लागत पर बातचीत के दौरान, तत्कालीन रक्षा मंत्री ए. के. एंटनी ने फाइल पर एक हैरान करने वाली टिप्पणी की थी. एंटनी ने वार्ताकारों से कहा कि पहले बातचीत पूरी करें और कीमत तय करें, फिर यह सबूत लेकर लौटें कि राफेल वाकई सबसे कम बोली लगाने वाला था.
पर्रिकर ने कहा, “उन्होंने (एंटनी ने) कहा, ‘बातचीत शुरू करो, कीमत तय करो और जब सब कुछ खत्म हो जाए, तब मेरे पास सारे दस्तावेजी सबूत लेकर आओ’ कि कैसे डसॉल्ट या राफेल कंपनी सबसे कम बोली वाली थी.”
पर्रिकर ने बताया कि केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के दिशानिर्देश कहते हैं कि सरकार सबसे कम बोली लगाने वाले के अलावा किसी और से बातचीत नहीं कर सकती. “अगर आपने किसी कंपनी को सबसे कम माना है, तो आप उससे बातचीत कर सकते हैं, लेकिन आप किसी से पहले बातचीत कैसे कर सकते हैं और बाद में यह कैसे साबित कर सकते हैं कि वही सबसे कम था? इसलिए…ढाई साल तक फाइल चक्कर काटती रही (यूपीए सरकार के दौरान).”
सूत्रों ने बताया कि टेंडर टीम हमेशा बोली लगाने वाली कंपनियों द्वारा दी गई लागत की डिटेल्स की जांच करती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी जानबूझकर असली लागत से कम बोली न लगाए. आखिर में जब लागत पर बातचीत पूरी होती है, तो महंगाई और अन्य लागत कारणों के चलते कीमतें हर हाल में बढ़ती हैं.
MMRCA प्रक्रिया में परेशानी तब और बढ़ गई जब डसॉल्ट और एचएएल के बीच मैन-आवर्स को लेकर बड़ा विवाद हुआ. एचएएल ने डसॉल्ट द्वारा आंकी गई लागत से 2.57 गुना ज्यादा मानव संसाधन लागत बताई, जिससे अनुमानित कीमत बहुत ज्यादा बढ़ गई. डसॉल्ट ने एचएएल द्वारा बनाए गए विमानों की गारंटी देने से भी इनकार कर दिया.
2015 तक, यह सौदा व्यावहारिक रूप से खत्म हो चुका था.
राफेल रीसेट
उसी साल, मोदी सरकार ने अचानक 36 राफेल लड़ाकू विमानों के लिए सरकार-से-सरकार सौदे की घोषणा की. संख्या कम थी, लेकिन इसे आईएएफ की तेज़ी से घटती स्क्वाड्रन ताकत को संभालने के लिए एक अस्थायी कदम माना गया.
उम्मीद थी कि इसके बाद एक और बड़ी प्रतियोगिता होगी—MMRCA 2.0, जिसे बाद में MRFA कहा गया. शुरुआत में विचार था कि राफेल के साथ-साथ एक सिंगल-इंजन फाइटर खरीदा जाए. मनोहर पर्रिकर ने 2016 में पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में इसकी पुष्टि की थी.
इसका मतलब होता कि मुकाबला एफ-16 और ग्रिपेन E के बीच होता.
उस समय आईएएफ के शीर्ष अधिकारियों ने पत्रकारों को बताया था कि प्रक्रिया बहुत तेज होगी और उन्हें MMRCA जैसे पूरे ट्रायल से नहीं गुज़रना पड़ेगा क्योंकि विमान वही थे.
आईएएफ ने 2018 में आखिरकार 114 फाइटर विमानों को खरीदने का प्रस्ताव भेजा, लेकिन तब रक्षा मंत्रालय, जिसकी अगुवाई निर्मला सीतारमण कर रही थीं, ने आईएएफ से कहा कि वह वापस जाकर ऐसा प्रस्ताव लाए जिसमें सिंगल और ट्विन इंजन—दोनों तरह के विमान शामिल हों.
यही नया प्लान था जिसे आखिरकार 2025 में सरकार की मंजूरी मिली, जिससे आईएएफ को 2018 से इंतज़ार करने के बाद प्रस्ताव आगे बढ़ाने की अनुमति मिली.
कई विशेषज्ञों ने, वायुसेना के अंदर और बाहर, कहा था कि शुरुआती 36 विमानों की डिलीवरी शुरू होने या पूरी होने के बाद सरकार और राफेल का ऑर्डर देगी.
अब जाकर, दो दशक से ज्यादा पहले शुरू हुई यह प्रक्रिया आखिरकार अपने अंतिम चरण के करीब पहुंची है. जैसा कि पिछले हफ्ते रिपोर्ट किया गया था, भारत और फ्रांस ने आईएएफ के लिए 114 राफेल एफ4 लड़ाकू विमानों की खरीद के तौर-तरीकों पर सहमति बना ली है, जिनकी आधिकारिक औपचारिकताएं 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत तक पूरी हो जाएंगी.
प्रस्तावित परियोजना की लागत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये होगी. इसके तहत 18 विमान सीधे उड़ान योग्य हालत (फ्लाई-अवे कंडीशन) में खरीदे जाएंगे और बाकी विमान भारत में बनाए जाएंगे, जिनमें चरणबद्ध तरीके से 60 प्रतिशत तक स्वदेशी सामग्री होगी—ठीक वैसे ही जैसे सी-295 परिवहन विमान के मामले में हुआ था.
आईएएफ के पास पहले से मौजूद राफेल विमानों को भी इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत एफ4 वर्जन में अपग्रेड किया जाएगा.
एफ4 स्टैंडर्ड का फोकस नए सैटेलाइट और इन-फ्लाइट लिंक, कम्युनिकेशन सर्वर और सॉफ्टवेयर रेडियो के जरिए राफेल की कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने पर है. इससे नेटवर्क-केंद्रित युद्ध में इसकी क्षमता बढ़ेगी और भविष्य के फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) का रास्ता साफ होगा.
अगर सौदा 2027 की शुरुआत में साइन हो जाता है, तो फ्लाई-अवे कंडीशन वाले पहले 18 विमानों की डिलीवरी 2030 के बाद शुरू होगी.
बताया जा रहा है कि राफेल की फाइनल असेंबली लाइन नागपुर स्थित डसॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड (DRAL) में लगेगी, जो अब फ्रांसीसी विमान निर्माता डसॉल्ट एविएशन की सहायक कंपनी है.
पिछले साल सितंबर में, डसॉल्ट एविएशन ने इस जॉइंट वेंचर में बहुमत हिस्सेदारी खरीद ली थी. यह भी जानकारी है कि अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस अपनी अल्पांश हिस्सेदारी किसी दूसरी भारतीय कंपनी को बेच सकती है, जिसके बाद योजनाएं आगे बढ़ने पर DRAL का नाम बदला जा सकता है.
टाटा, महिंद्रा, डायनमैटिक टेक्नोलॉजीज लिमिटेड सहित 3 दर्जन से ज्यादा भारतीय कंपनियों के इस राफेल प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने की उम्मीद है. टाटा को पहले ही राफेल के फ्यूज़लाज (ढांचा) के निर्माण का कॉन्ट्रैक्ट मिल चुका है, जो फिलहाल विदेशी ऑर्डर्स में इस्तेमाल होगा.
यह भी बताया गया है कि फाइनल असेंबली लाइन (FAL) आगे चलकर राफेल की वैश्विक मांग को पूरा करेगी और फ्रांसीसी विमान निर्माता का दूसरा मैन्युफैक्चरिंग हब बनेगी.
सूत्रों ने कहा कि समय के साथ भारत के कुल विमानों की संख्या और बढ़ सकती है.
दिप्रिंट ने अप्रैल 2025 में सबसे पहले रिपोर्ट की थी कि भारतीय सरकार ने आईएएफ के लिए 114 राफेल लेने का फैसला किया है और औपचारिक प्रक्रिया उसी साल बाद में शुरू होगी.
2025 के दूसरे हिस्से में, आईएएफ ने राफेल खरीदने का औपचारिक प्रस्ताव भेजा, जिसके बाद रक्षा मंत्रालय और सरकार-से-सरकार स्तर पर बातचीत हुई.
25 साल के मोड़ों, अड़चनों और राजनीतिक हिचकिचाहट के बाद, आईएएफ की मिराज से शुरू हुई यात्रा आखिरकार पूरी हो गई है—डसॉल्ट के पास लौटकर, राफेल के पास लौटकर और उसी फाइटर के पास, जिसे वह हमेशा चाहता था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
