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Thursday, 2 April, 2026
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ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने विदेशी मीडिया से संपर्क तेज़ किया, नई रणनीति पर काम

भारत-पाकिस्तान के तीन दिन के संघर्ष ने दिखाया कि पारंपरिक सैन्य कार्रवाई के साथ सूचना युद्ध भी कितना महत्वपूर्ण हो गया है.

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नई दिल्ली: इस साल फरवरी में 28 देशों के 28 रक्षा पत्रकार भारत आए, जिनमें से कई पहली बार भारतीय उपमहाद्वीप पहुंचे थे. अगले कुछ दिनों में उन्हें सेना, नौसेना और वायुसेना के सैन्य अभ्यास देखने का दुर्लभ मौका दिया गया. इसके साथ ही उन्हें सरकारी रक्षा कंपनियों और ड्रोन व छोटे हथियार बनाने वाले भारतीय स्टार्ट-अप्स का भी दौरा कराया गया.

इस दौरे की खास बात यह रही कि इज़रायल, आर्मेनिया, अर्जेंटीना, मिस्र, इटली, जापान, मलेशिया और फिलीपींस समेत कई देशों के पत्रकारों को सैन्य संचालन महानिदेशक (DGMO), नौसेना संचालन महानिदेशक और वायु संचालन महानिदेशक के साथ बातचीत और ब्रीफिंग का मौका मिला. आम तौर पर घरेलू रक्षा पत्रकारों को भी इतनी पहुंच बहुत कम मिलती है.

इस पहल का परिणाम यह हुआ कि विदेशी पत्रकार भारत की रक्षा और सुरक्षा क्षमताओं को खुद देखकर अपने देशों में रिपोर्ट लेकर लौटे. इससे अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की छवि को मजबूती देने में मदद मिली. सूत्रों के अनुसार, आर्मेनिया के एक पत्रकार ने लाइव पिनाका रॉकेट सिस्टम की फायरिंग देखी और उस पर रिपोर्ट लिखी. आर्मेनिया इस सिस्टम का पहला अंतरराष्ट्रीय ग्राहक रहा है, इसलिए किसी गैर-सरकारी आर्मेनियाई व्यक्ति के लिए इसे करीब से देखना एक बड़ा मौका था.

इतने बड़े स्तर पर और खुले तरीके से किया गया यह प्रयास ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की विदेशी मीडिया से जुड़ने की रणनीति में बड़े बदलाव का हिस्सा है. जानकारी के अनुसार, आगे भी ऐसे और दौरे कराने की योजना है. इस पहल को शुरू करने में विदेश मंत्रालय (MEA), खासकर उसकी एक्सटर्नल पब्लिसिटी डिवीजन और सेना के तीनों अंगों के प्रवक्ताओं की अहम भूमिका रही.

एक सूत्र ने कहा कि विदेशी मीडिया के साथ जुड़ाव को लेकर पहले एक तरह का खालीपन था. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह सामने आया कि पाकिस्तान ने कई सालों से अलग-अलग स्तर पर लगातार संवाद करके वैश्विक मीडिया में अपनी बात प्रभावी तरीके से रखी है.

सूत्रों ने बताया कि भारत और पाकिस्तान के बीच तीन दिन के छोटे संघर्ष ने यह दिखाया कि पारंपरिक सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ सूचना युद्ध भी एक अहम क्षेत्र बन गया है.

हालांकि इस बदलाव को लेकर सुरक्षा और रक्षा व्यवस्था के भीतर कुछ झिझक भी रही है. आम तौर पर विदेशी पत्रकारों को जगहों पर पहुंच देने को लेकर सावधानी बरती जाती रही है, चाहे वे जगहें संवेदनशील न भी हों. लेकिन अब रणनीतिक संचार की जरूरत को देखते हुए इन चिंताओं पर दोबारा विचार किया जा रहा है.

सरकार के स्तर पर भी यह समझ बढ़ रही है कि विदेशी मीडिया को दुश्मन की तरह नहीं देखा जा सकता और उनसे भारत के अंदर और बाहर दोनों जगह संवाद जरूरी है. सूत्रों ने कहा कि पहले विदेशी पत्रकारों को, यहां तक कि भारतीय पत्रकारों को भी, कई विकास परियोजनाओं वाली जगहों पर जाने की अनुमति देने में भी दिक्कत होती थी.

विदेश मंत्रालय ने बढ़ाई सक्रियता

पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के बाद विदेश मंत्रालय और अन्य एजेंसियों ने द इकोनॉमिस्ट के डिफेंस एडिटर शशांक जोशी को चीन सीमा के पास इंफ्रास्ट्रक्चर विकास देखने के लिए उत्तरी क्षेत्र का दौरा करने की अनुमति दी. उन्हें बिना किसी तय स्क्रिप्ट या सीमित बयान के अभूतपूर्व पहुंच दी गई और सेना ने इस यात्रा को संभव बनाया.

सूत्रों के अनुसार, भारत में काम कर रहे विदेशी पत्रकारों और अंतरराष्ट्रीय संवाददाताओं के लिए आगे और यात्राएं कराने की योजना है. संबंधित विभागों, खासकर विदेश मंत्रालय को विदेशी पत्रकारों को जानकारी और पहुंच देने के लिए तय प्रक्रिया बनाने और खुद पहल करने को कहा गया है. एक सूत्र ने कहा, “अब यह समझ बढ़ रही है कि विदेशी पत्रकारों से दूरी बनाकर नहीं रखा जा सकता और साथ ही उनसे यह उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि वे अपने आप भारत का पक्ष समझ जाएंगे.”

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान विदेश मंत्रालय काफी सक्रिय रहा. कई देशों में तैनात भारतीय राजदूतों ने स्थानीय मीडिया से बातचीत की और टीवी इंटरव्यू दिए, ताकि भारत का पक्ष सामने आ सके. लेकिन दिल्ली से तैयार की गई जानकारी उतनी प्रभावी नहीं हो पाई, क्योंकि रियल टाइम में फैक्ट चेक और जवाबी जानकारी देने की प्रक्रिया उतनी तेज नहीं थी.

अब सरकार ने कई एजेंसियों के साथ मिलकर सूचना युद्ध से जुड़े एक समूह को मजबूत किया है, जिसके जरिए कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं. विदेश मंत्रालय ने अपना फैक्ट-चेक प्लेटफॉर्म भी सक्रिय किया है, जिसे अब तेज और भरोसेमंद माना जा रहा है. पिछले तीन वर्षों में विदेश मंत्रालय 143 देशों के पत्रकारों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को भारत बुला चुका है.

दिलचस्प बात यह है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने प्रस्ताव दिया है कि विदेशों में दूतावासों में अपने अधिकारियों की तैनाती बढ़ाई जाए और वहां मीडिया व सूचना से जुड़े काम भी संभाले जाएं. इस प्रस्ताव ने कूटनीतिक हलकों में कई लोगों को हैरान किया है.

सूत्रों ने बताया कि आम तौर पर विदेशों में दूतावासों में मीडिया से जुड़े पदों पर ऐसे राजनयिक नियुक्त किए जाते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा की जानकारी होती है. उदाहरण के लिए ईरान, जापान, चीन और मॉस्को में तैनात कई अधिकारी स्थानीय भाषा में निपुण हैं.

सूत्रों के अनुसार, किसी भी दूतावास का मीडिया विभाग केवल बयान देने का काम नहीं करता, बल्कि वह राजदूत की आंख और कान की तरह काम करता है. भारत में भी विदेशी दूतावासों के प्रवक्ता आमतौर पर करियर राजनयिक ही होते हैं.

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रस्ताव में विदेशी अखबारों में विज्ञापन देने की बात भी कही गई है, जिसमें न्यूयॉर्क टाइम्स का नाम भी शामिल है, जबकि यह अखबार विदेशी सरकारों या विदेशी नेताओं की तस्वीर वाले विज्ञापन नहीं लेता. प्रस्ताव में बीबीसी और अल जजीरा जैसे मीडिया संस्थानों के साथ साझेदारी की भी बात कही गई है.

प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि विदेशों में तैनात सूचना सेवा अधिकारी विदेश मंत्रालय और प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्रालय के साथ मिलकर काम करेंगे, जबकि प्रवासी भारतीय मामलों का मंत्रालय 2016 में बंद हो चुका है.

सूत्रों ने कहा कि ब्रांड इंडिया को मजबूत करना हर राजनयिक का काम होता है और इसे केवल विज्ञापन के नजरिये से नहीं देखा जा सकता.

एक सूत्र ने बताया, “हर देश के राजदूत और राजनयिक का काम अपने देश का पक्ष सामने रखना होता है. इसमें केवल घरेलू कामकाज ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों जैसे व्यापार वार्ता पर देश का रुख भी शामिल होता है.”

बताया गया कि यह प्रस्ताव अभी दोनों मंत्रालयों के बीच चर्चा में है और इसमें कई बार बदलाव किए जा चुके हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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