Friday, 21 January, 2022
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मिराज 2000 के कलपुर्जों के लिए IAF का नया सौदा 40 सालों में चूके अवसरों की गाथा है

भारत के पास 1980 और 2000 के दशक में दो बार मिराज 2000 का निर्माण करने का अवसर था. लेकिन अब उसे अपने 50 विमानों का बेड़ा सेवा में बनाए रखने के लिए चरणबद्ध तरीके से हटाए गए विमान खरीदने पड़ रहे हैं.

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नई दिल्ली: भारतीय वायुसेना की तरफ से 31 अगस्त को एक फ्रांसीसी निजी फर्म के साथ चरणबद्ध तरीके से हटाए गए मिराज 2000 विमानों की खरीद के लिए लगभग 300 करोड़ रुपये के करार पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिनके कलपुर्जों को यहां इस्तेमाल में लाया जाएगा.

फ्रांसीसी वायु सेना ने राफेल के आने के बाद मिराज 2000 को चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह अपने बेड़े से हटा दिया है, लेकिन भारत में अभी 50 मिराज का बेड़ा सेवा में है. पिछले एक साल में भारत ने अपने इन विमानों के लिए आवश्यक कलपुर्जों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए इस तरह का दूसरा सौदा किया है. सूत्रों ने बताया कि आईएएफ ने पिछले साल चरणबद्ध तरीके से हटे 16 मिराज की आपूर्ति के लिए फ्रांसीसी वायु सेना के साथ एक करार पर हस्ताक्षर किए थे, जिनकी डिलीवरी इस साल पूरी हुई है.

भारत में मिराज के लगभग आधे बेड़े का व्यापक स्तर पर अपग्रेड हुआ है, जिससे विमान के इस्तेमाल की अवधि बढ़ गई है. लेकिन अपग्रेड की प्रक्रिया काफी धीमी रही है. अपग्रेड का मतलब है कि भारत के मिराज कम से कम एक दशक तक उड़ान भरते रहेंगे. और इसके लिए यह सुनिश्चित करने की जरूरत महसूस की गई कि विमान के लिए आवश्यक कलपुर्जों की आपूर्ति बनी रहे.

रक्षा और सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े एक सूत्र ने दिप्रिंट को बताया, ‘मिराज का इस्तेमाल करते रहे देश अब धीरे-धीरे इन्हें अपने बेड़े से हटा रहे हैं. समय के साथ कलपुर्जों का उत्पादन कम होगा, और अंततः उन्हें विशेष रूप से हमारे लिए ही उत्पादित किया जाना होगा. इसका सीधा असर ये होगा कि लागत काफी बढ़ जाएगी, और इसलिए यह सुनिश्चित करने के कदम उठाए जा रहे हैं कि हमारे पास कलपुर्जे बने रहें.’

सूत्रों ने स्पष्ट किया कि कुछ रिपोर्टों के विपरीत आईएएफ की तरफ से उठाया गया यह कदम ‘मौजूदा बेड़े की आवश्यकताओं को पूरा करने और उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए’ है, न कि भारत के मिराज 2000 बेड़े में विमानों को बढ़ाने के लिए. एक दूसरे सूत्र ने कहा, ‘यह सौदा उन विमानों के लिए नहीं है जिन्हें उड़ाया जा सकता हो.’

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31 अगस्त के सौदे के पीछे के बारे में बताते हुए सूत्रों ने कहा कि खरीदे गए मिराज नॉक-डाउन वर्जन के तौर पर कंटेनरों में आएंगे.

एक तीसरे सूत्र ने कहा, ‘विमान में कुछ ऐसे हिस्से होते हैं जिनका उपयोग ब्रेकडाउन तक किया जा सकता है; उदाहरण के तौर पर इसके विंग. अगर कल हमारे किसी विमान का विंग टूट जाता है तो पुराने विमान के विंग इस्तेमाल किए जा सकते हैं. इसी तरह, यद्यपि भारतीय मिराज के पास अधिक शक्तिशाली इंजन है, हमारे इंजन का 80 प्रतिशत मूल इंजन के समान है, और इसलिए इसके कई हिस्सों का भी उपयोग किया जा सकता है.’

सेंटर ऑफ एयर पावर स्टडीज के महानिदेशक एयर मार्शल अनिल चोपड़ा (सेवानिवृत्त) इस कदम का स्वागत करते हैं.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘भविष्य में स्पेयर पार्ट्स की जरूरत पूरी करने के लिए सेकेंड-हैंड या बेड़े से हटाए गए मिराज खरीदना एक शानदार कदम है. इससे यह सुनिश्चित होगा कि भविष्य में अपग्रेड किए जाने वाले विमान का रखरखाव महंगा न पड़े, और उसे कम से कम एक दशक तक और भारत के लिए उपयोगी बनाए रखा जाए.’


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1980 के दशक में मिराज भारत कैसे आया?

भारतीय वायुसेना अब भले ही यह सुनिश्चित करने के लिए खासी मेहनत कर रहा हो कि मिराज के कलपुर्जे मिलना कोई समस्या न रहे लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत ने दो बार इन विमानों के निर्माण करने का मौका गंवा दिया—एक बार 1980 के दशक में और फिर 2000 के दशक में.

सूत्रों ने बताया कि 1980 में अमेरिका ने पाकिस्तान को एफ-16 बेचने का फैसला किया, जिससे पाकिस्तान एयरपॉवर के मामले में भारत से आगे निकल जाता. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ वायुसेना ने मिराज 2000 पर ध्यान केंद्रित किया, जो उस समय प्रोटोटाइप स्टेज में ही था.

भारत को मिराज की पेशकश कथित तौर पर पहली बार 1979 में की गई थी, ताकि एंग्लो-फ्रेंच जगुआर लड़ाकू विमान की किसी भी और खरीद को रोका जा सके. पूरी तरह मूल्यांकन के बाद चुने गए जगुआर के विपरीत मिराज को लगभग सिंगल-वेंडर स्थिति में खरीदा गया था. इसे लेकर बहुत सारे आरोप लगे, ठीक उसी तरह जैसे 2017 में 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर हुआ था. संयोग से, मिराज और राफेल दोनों की निर्माता एक ही विमानन कंपनी डसॉल्ट है.

भारत और फ्रांस के बीच शुरू में 150 मिराज की खरीद की बातचीत हुई थी, जिनमें से 100 का निर्माण भारत में एचएएल की तरफ से किया जाना था.

लेकिन 1982 के अंत में भारत ने 110 के लिए और ऑर्डर करने के विकल्प के साथ 40 विमान खरीदने का फैसला किया. इसका कारण सोवियत संघ की तरफ से दबाव भी था, जिसने अचानक अपने मिग-29 की पेशकश कर दी थी. ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर अंगद सिंह ने कहा कि जबकि उस समय तक तो ‘रूसी मिग-29 के अस्तित्व को नकारने का प्रयास ही करते रहे थे.’

उन्होंने कहा, ‘लेकिन अचानक उन्होंने भारत को इसकी पेशकश कर दी, जिसमें लाइसेंस प्रोडक्शन भी शामिल था. भारत ने यह सोचकर दोनों विमानों को सीमित संख्या में खरीदा कि घरेलू उत्पादन का फैसला इन्हें कुछ वर्षों तक सेवा में रखे जाने के बाद इस मूल्यांकन के आधार पर किया जाएगा कि किस विमान को प्राथमिकता दी जाए.’

मिग-23एमएल की पेशकश करने वाले यूएसएसआर ने इसे मिग-29 में बदल दिया था, जिसे उसने अमेरिका के एफ-16 के जवाब में विकसित किया था. भारत की तरफ से फरवरी 1984 में मिग-29 का मूल्यांकन किया गया और नवंबर 1985 में एक अनुबंध पर हस्ताक्षर कर दिए गए.

जून 1985 में सात मिराज 2000 विमानों का पहला सेट भारत लेकर आने वाले एयर मार्शल चोपड़ा बताते हैं कि मिराज और मिग-29 के लिए भारतीय पायलटों का प्रशिक्षण लगभग एक साथ हुआ था.

अंगद सिंह ने बताया कि हालांकि, 1980 के दशक के अंत में राजनीतिक अस्थिरता और 1990 के वित्तीय संकट का सीधा असर ये हुआ कि मिराज 2000 और मिग-29 में से किसी एक के बजाये दोनों की ही निर्माण योजनाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

सिंह ने बताया कि मिराज 2000 के लिए मूल योजना यह थी कि जिन 110 जो ‘वैकल्पिक’ श्रेणी में रखा गया है, उन्हें भारत में निर्मित किया जाएगा—इसमें 45 को किट की मदद से बाकी 65 कच्चे माल से तैयार किए जाने थे—और इस पर कोई भी फैसला 1984 के मध्य तक लिया जाना था. फिर, जब सोवियत ने मिग-29 की पेशकश की, तो भारत ने मिराज के लाइसेंस प्रोडक्शन को रोक दिया गया, और फिर एक साल बाद मिग-29 के लिए अनुबंध किया.

उन्होंने कहा कि यद्यपि 1982 में भारत ने उत्पादन पर फैसला लेने के लिए इंतजार करने का विकल्प खुला रखने के लिए अतिरिक्त भुगतान भी किया था.


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कारगिल के बाद भारत में मिराज बनाने की नई कोशिश

मिराज 2000 ने 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान अपनी पूरी क्षमताओं को बखूबी प्रदर्शित किया, जब यह ‘स्मार्ट बम’—अमेरिकी पेववे लेजर-गाइडेंस किट—से दुश्मन के ठिकाने नेस्तनाबूद करने में सफल रहा.

वायुसेना और अधिक लड़ाकू विमान चाहती थी और डसॉल्ट एविएशन, जो अपने मिराज 2000 का उत्पादन बंद करने की योजना बना रही थी, ने इसे भारत ट्रांसफर करने की पेशकश की.

समय-समय पर हादसों में गंवाए गए विमानों को बदलने के साथ भारत ने सितंबर 2000 में 10 और मिराज 2000 का आदेश दिया.

वायुसेना फ्रांसीसी प्रस्ताव से रोमांचित थी, क्योंकि इसका मतलब था कि उसे विमान का नवीनतम संस्करण मिल सकेगा, जिसे मिराज 2000-5 के तौर पर जाना जाता है.

हालांकि, सूत्रों ने कहा कि उस समय अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सत्तारूढ़ एनडीए सरकार भ्रष्टाचार के पिछले मामलों के कारण कमजोर हो गई थी.

2004 तक भारत ने मिराज 2000 के निर्माण के बजाये मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) के लिए एक वैश्विक निविदा में हिस्सा लेने का फैसला किया. दो साल बाद डसॉल्ट ने मिराज पर अपना प्रस्ताव वापस ले लिया, और इसके बजाय राफेल पर जोर देना शुरू कर दिया.

2007 में ही ग्लोबल रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया गया था, जिसमें 2012 में राफेल विजेता बनकर उभरा.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढने के लिए यहां क्लिक करें)


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