नई दिल्ली: अभी तक प्रकाशित न हुई अपनी आत्मकथा में तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे लिखते हैं कि 31 अगस्त 2020 को रात 10.30 बजे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उनसे कहा था, “जो उचित समझो, वह करो.”
यह बात उन्होंने तब कही, जब जनरल नरवणे ने नेतृत्व को बताया कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास रेज़िन ला नाम के पहाड़ी दर्रे की ओर टैंक और सैनिक बढ़ा दिए हैं और वे भारतीय ठिकानों के और करीब आ रहे हैं.
जनरल नरवणे की यह बात उनकी किताब के अंशों में दर्ज है, जिन्हें दिसंबर 2023 में समाचार एजेंसी पीटीआई ने प्रकाशित किया था. उनकी किताब सेना की मंजूरी का इंतजार कर रही है. नियम के मुताबिक, ऑपरेशनल मामलों पर लिखी गई किसी भी किताब को संबंधित सेनाओं से मंजूरी लेनी होती है.
“31 अगस्त की शाम 8.15 बजे जो (जोशी) ने मुझे फोन किया. वह काफी चिंतित थे. उन्होंने बताया कि पैदल सेना के साथ चार टैंक धीरे-धीरे रेज़िन ला की ओर रास्ते पर आगे बढ़ने लगे हैं. उन्होंने एक रोशनी वाला गोला दागा, लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ. मेरे पास साफ आदेश थे कि ‘सबसे ऊपर से मंजूरी मिलने तक गोली नहीं चलानी है’. इसके बाद अगले आधे घंटे में रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, एनएसए, सीडीएस और मेरे बीच कई फोन कॉल हुए,” अंशों में यह भी कहा गया है. यहां वह तत्कालीन उत्तरी सेना कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल वाई.के. जोशी द्वारा दी गई जानकारी का जिक्र कर रहे थे.
इन अंशों के सामने आने के बाद यह मामला अब राजनीतिक विवाद बन गया है और कांग्रेस ने इसे संसद में उठाया है.
रेज़िन ला में, चीनी कार्रवाई के चलते एलएसी पर पहली बार गोली चली, जिससे चार दशकों से चली आ रही शांति टूटी, जबकि सीमा विवाद लंबे समय से चलता रहा है और हर साल कई बार आमने-सामने की स्थिति बनती है.
सिर्फ रोशनी वाला गोला और पहाड़ी चोटी से रॉकेट लॉन्चर ही चेतावनी के तौर पर नहीं दागे गए, बल्कि हवा में भी कई राउंड फायर किए गए, ताकि चीन को उसकी आक्रामक कार्रवाई रोकने के लिए चेतावनी दी जा सके. इसके बाद चीनी सैनिक पीछे हट गए. इससे पहले चीन ने ही भारतीय सैनिकों को डराने के लिए हवा में फायरिंग की थी.
हालांकि ध्यान 31 अगस्त की घटनाओं पर है, लेकिन असली कहानी उससे पहले की है, जो अब तक इन अंशों में सामने नहीं आई है.
चीन ने वाकई हल्के टैंकों और सैनिकों के साथ रेज़िन ला की ओर बढ़ने की कोशिश की थी, ताकि ऊंचाइयों पर कब्जा किया जा सके. रक्षा प्रतिष्ठान के एक सूत्र ने दिप्रिंट से कहा, “यह भारतीय सैनिकों से ऊंचाइयां छीनने की कोशिश थी, जिन्होंने पहले ही पीएलए को चकमा देकर अहम चोटियों पर कब्जा कर लिया था, जिससे चीन हैरान रह गया था.”
अगस्त 2020 में दक्षिणी बैंक्स पर क्या हुआ
दिप्रिंट की पहले की रिपोर्ट के मुताबिक, 31 अगस्त 2020 की सुबह, 29 और 30 अगस्त की दरम्यानी रात और दिन के दौरान, भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन लेपर्ड स्नो’ के तहत विशेष बलों की मदद से पेंगोंग त्सो के दक्षिणी किनारों पर अहम ठिकानों पर कब्जा किया था.
स्नो लेपर्ड उसी बड़े ऑपरेशन का नाम है, जो मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीनी आक्रामकता के बाद शुरू किया गया था.
यह ऑपरेशन जून 2020 में गलवान झड़प के बाद किया गया, जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे और कई अन्य घायल हुए थे. इस झड़प के बाद एलएसी पर एंगेजमेंट के नियमों में बदलाव किया गया था, जिनमें पहले सैनिकों पर कुछ पाबंदियां थीं.
20 जून को दिप्रिंट ने एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में एक सूत्र के हवाले से बताया था, “एंगेजमेंट के नियम बदल दिए गए हैं. अब जमीन पर मौजूद सेना कमांडर तय करेगा कि किसी भी तरह की आक्रामकता का जवाब कैसे देना है. अब ऐसा कुछ नहीं है, जो कमांडर को जरूरी रणनीतिक फैसले लेने से रोके.”
अगस्त ऑपरेशन कैसे आगे बढ़ा
दिसंबर 2020 में दिप्रिंट ने 29 और 30 अगस्त की रात के ऑपरेशन की पहली डिटेल रिपोर्ट दी थी. इसके बाद अब नई जानकारियां सामने आई हैं, जो ऑपरेशन के और बारीक पहलुओं को उजागर करती हैं.
सूत्रों के मुताबिक, गलवान झड़प के बाद सेना को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वह बढ़त हासिल करने के तरीके सुझाए. भारतीय सेना चीनी कदमों के जवाब में रणनीतिक चालों पर काम कर रही थी, जिसे ‘क्विड प्रो क्वो’ कहा जाता है.
जहां लेह स्थित 14 कोर पूर्वी लद्दाख में कई जगहों पर आमने-सामने की स्थिति में डटी रही, वहीं चीन पर केंद्रित एकमात्र स्ट्राइक कोर के कमांडर को पूर्वी सेक्टर से बुलाया गया, ताकि संभावित योजनाएं बनाई जा सकें.
इसके बाद तत्कालीन सेना प्रमुख, उत्तरी सेना कमांडर और अन्य अधिकारियों के बीच कई बैठकें हुईं. आखिरकार एक योजना सरकार को भेजी गई, जिसे मंजूरी मिल गई.
करीब एक महीने तक पूरी गोपनीयता में योजना बनाई गई. विशेष बलों को चुपचाप तैनात किया गया. कई यूनिट्स को अलग तरीके से लगाया गया और भटकाने वाली रणनीतियां अपनाई गईं. इसका नतीजा 29 अगस्त की रात पेंगोंग त्सो के दक्षिणी किनारों और फिंगर इलाके में हुए ऑपरेशन के रूप में सामने आया.
सूत्रों ने बताया कि एलएसी के पास कम से कम आधा दर्जन ऐसे इलाके चिन्हित किए गए थे, जहां भारतीय सैनिक पीएलए पर बढ़त बना सकते थे.
योजना को अंतिम रूप मिलने के बाद, चीन के खिलाफ एकमात्र आक्रामक फॉर्मेशन, पश्चिम बंगाल के पनागरह में स्थित 17 माउंटेन स्ट्राइक कोर को कार्रवाई में लगाया गया.
सेना की एलीट पैरा स्पेशल फोर्स और उत्तराखंड के चकराता में स्थित स्पेशल फ्रंटियर फोर्स की कई यूनिट्स को शामिल किया गया. एसएफएफ में बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थी शामिल हैं.
ऑपरेशन की निगरानी उत्तरी सेना कमान कर रही थी, जबकि 17 माउंटेन स्ट्राइक कोर के तत्कालीन जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल सवनीत सिंह को जमीन पर ऑपरेशन की जिम्मेदारी दी गई थी.
अगस्त की शुरुआत में, सिर्फ 24 घंटे के नोटिस पर, बिना भारी उपकरणों के, लेफ्टिनेंट जनरल सिंह के नेतृत्व में एमएससी की एक चुनी हुई टीम लद्दाख पहुंची. बाहर की दुनिया के लिए यह मूवमेंट सामान्य लगा, क्योंकि न तो कोई बड़ा जमावड़ा दिखा और न ही कुछ असामान्य नजर आया.
इस तरह पूर्वी लद्दाख में जमीन पर दो कोर कमांडर मौजूद थे. एक लेफ्टिनेंट जनरल सवनीत सिंह और दूसरे 14 कोर के तत्कालीन जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह.
सूत्रों ने बताया कि रक्षा से जुड़े ऑपरेशन 14 कोर कमांडर के तहत थे, क्योंकि वह होल्डिंग कोर थी, जबकि आक्रामक ऑपरेशन 17 माउंटेन स्ट्राइक कोर के जिम्मे थे.
योजना कैसे आगे बढ़ी
भारतीय पक्ष पर दबाव बढ़ाने की कोशिश में या एहतियात के तौर पर, चीन ने पेंगोंग त्सो के दक्षिणी किनारों पर एक रणनीतिक कार्रवाई की और ब्लैक टॉप और हेलमेट नाम की दो ऊंचाइयों तक पहुंचने में सफल रहा. ये इलाके उनके नियंत्रण वाले क्षेत्रों के काफी पास थे.
यह देखते ही भारतीय सैनिकों ने भी अपनी तैनाती शुरू कर दी, जिसे मिरर-डिप्लॉयमेंट कहा गया. इसी दौरान सेना के शीर्ष नेतृत्व ने माउंटेन स्ट्राइक कोर (एमएससी) के कमांडर को अपनी कार्रवाई शुरू करने की हरी झंडी दे दी.
30 अगस्त को कई चुनी हुई यूनिट्स के सैनिक एक साथ जुटे, जबकि उपकरण अलग-अलग जगहों से लाए गए. इसमें मैकेनाइज्ड और आर्मर्ड यूनिट्स के सैनिक और उपकरण भी शामिल थे.
इसी बीच, भारत ने उत्तरी किनारों के फिंगर इलाके में भी एक रणनीतिक कदम उठाया. इससे चीन को यह लगा कि भारतीय सेना का ध्यान वहां है, जबकि असली कार्रवाई दक्षिणी किनारों पर चल रही थी.
एक अन्य सूत्र ने बताया, “उत्तरी किनारों पर किया गया ऑपरेशन भी सफल रहा. भारतीय सैनिक फिंगर 4 की ऊंचाइयों पर चढ़ने में कामयाब रहे और वहां सीधे चीनी सैनिकों के सामने तैनात हो गए, जबकि दक्षिणी किनारों पर सैनिक ऊंचाइयों पर कब्जा करते जा रहे थे.”
दक्षिणी हिस्से में, भारतीय विशेष बलों ने चीन को चौंकाते हुए पेंगोंग त्सो के दक्षिणी किनारों पर बढ़त बना ली और कैलाश रेंज की ऊंचाइयों पर कब्जा कर लिया, जिस पर दोनों देशों का दावा था.
भारतीय सैनिकों के लिए सबसे अहम ऊंचाई मुखपरी थी. जहां एक विशेष प्रशिक्षित टीम ने इन ऊंचाइयों पर कब्जा किया, वहीं बड़ी संख्या में सामान्य सैनिकों को भी भेजा गया, ताकि मजबूत सुरक्षा और लॉजिस्टिक व्यवस्था बनाई जा सके.
दक्षिणी किनारों पर भारतीय सैनिकों के रणनीतिक ऊंचाइयों पर कब्जा करते ही चीन ने भी अपने सैनिक भेजे. लेकिन दर्रों पर कब्जे की इस दौड़ में भारत आगे निकल गया.
अगस्त के अंत तक न तो भारत और न ही चीन ने इन ऊंचाइयों पर कब्जा किया था. इनमें रेज़िन ला और रेज़ांग ला शामिल हैं. इन ऊंचाइयों और कुछ अन्य चोटियों से भारत को चीनी नियंत्रण वाले स्पैंगुर गैप और मोल्डो गैरीसन पर रणनीतिक बढ़त मिली.
31 अगस्त को क्या हुआ
भारतीय सेना की अचानक की गई इस कार्रवाई से चीन हैरान रह गया. इसके बाद उसने अपने हल्के टैंक आगे बढ़ाए और दक्षिणी किनारों से भारतीय सैनिकों को हटाने के लिए 1,000 से ज्यादा सैनिक तैनात कर दिए.
भारत ने जवाब में कैलाश रेंज की ओर अपने बख्तरबंद दस्ते आगे बढ़ा दिए.
दिसंबर 2023 में पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, जनरल नरवणे लिखते हैं कि 31 अगस्त की शाम 8.15 बजे लेफ्टिनेंट जनरल जोशी ने उन्हें फोन किया. इसके बाद अगले आधे घंटे तक लगातार फोन कॉल होते रहे.
“हर किसी से मेरा एक ही सवाल था, ‘मेरे आदेश क्या हैं?’ रात 9.10 बजे उत्तरी कमान से फिर फोन आया कि टैंक आगे बढ़ते रहे हैं और अब वे चोटी से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर हैं. रात 9.25 बजे मैंने फिर से रक्षा मंत्री को फोन किया, ताजा स्थिति बताई और एक बार फिर साफ निर्देश मांगे. हालात तनावपूर्ण थे. फोन लगातार बज रहे थे,” उन्होंने लिखा. यहां वह रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, एनएसए अजित डोभाल और सीडीएस जनरल बिपिन रावत का जिक्र कर रहे हैं.
जनरल नरवणे लिखते हैं कि पीएलए कमांडर मेजर जनरल लियू लिन के साथ हॉटलाइन पर बातचीत हुई थी. इसमें सुझाव दिया गया था कि दोनों पक्ष कोई भी कदम न उठाएं और अगले दिन सुबह 9.30 बजे दोनों स्थानीय कमांडर दर्रे पर मिलें.
इसके बाद सेना प्रमुख ने रात 10 बजे रक्षा मंत्री और एनएसए को यह जानकारी दी. “मैंने अभी फोन रखा ही था कि 10.10 बजे जो ने फिर फोन किया. उसने बताया कि टैंक फिर से आगे बढ़ने लगे हैं और अब सिर्फ करीब 500 मीटर दूर हैं,” उन्होंने लिखा.
जनरल नरवणे बताते हैं कि लेफ्टिनेंट जनरल जोशी ने सुझाव दिया कि पीएलए को रोकने का एकमात्र तरीका मध्यम तोपखाने से फायर खोलना है, जो तैयार और तैनात था.
“‘हम पहली गोली नहीं चला सकते,’ मैंने उन्हें (लेफ्टिनेंट जनरल जोशी) बताया, क्योंकि इससे चीन को हमें आक्रामक दिखाने और हालात बिगाड़ने का बहाना मिल जाएगा. मुखपरी में भी एक दिन पहले पहली फायरिंग पीएलए ने ही की थी. वहां पीएलए की तरफ से दो राउंड और हमारी तरफ से तीन राउंड चले थे, लेकिन यह मीडिया की नजर में नहीं आया,” उन्होंने लिखा.
“इसके बजाय, मैंने उनसे कहा कि हमारे टैंकों की एक टुकड़ी को दर्रे की आगे की ढलानों तक ले जाएं और तोपों को नीचे की ओर झुका दें, ताकि पीएलए सीधे हमारी तोपों के मुंह देखे,” जनरल नरवणे लिखते हैं. “यह तुरंत किया गया और पीएलए के टैंक, जो तब तक चोटी से कुछ सौ मीटर की दूरी पर आ चुके थे, वहीं रुक गए.”
“उनके हल्के टैंक हमारे मीडियम टैंकों का मुकाबला नहीं कर पाते. यह एक ब्लफ़ का खेल था और PLA ने कदम पीछे खींच लिए.”
इसके बाद आने वाले कुछ दिनों तक चीन भारतीय सैनिकों को हटाने के लिए उकसाने वाली हरकतें करता रहा, लेकिन भारतीय सैनिक एक इंच भी पीछे नहीं हटे.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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