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Wednesday, 24 July, 2024
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अमेरिकी लेखक और प्रोफेसर को भारतीय खाने को ‘बकवास’ कहना महंगा पड़ा

टॉम निकोल्स अमेरिका के नेवल वॉर कॉलेज में पढ़ाते हैं, साथ ही अमेरिकन राजनीति की अच्छी समझ रखते हैं.

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हम भारतीयों को अपने खान-पान और संस्कृति पर बहुत गर्व है, और हो भी क्यों न- विविधता से भरे हुए, तरह-तरह के रंगों और मसालों से भरपूर भारतीय भोजन में हर तरह का स्वाद मिल जायेगा. भले कश्मीर का रोगन जोश हो या तमिलनाडु की चेट्टिनाड करी, राजस्थान का दाल बाटी चूरमा हो या अरुणाचल का लुकतर, यहां सब तरह के स्वाद की भरमार मिलेगी. ऐसे में मजाल है किसी की जो भारतीय व्यंजनों पर ऊंगली उठाये? पर हाल फिलहाल में किसी ने ऐसा सवाल उठाया जिसपर खूब बवाल भी हुआ.

हाल ही में एक अमेरिकी लेखक और प्रोफेसर का भारतीय खाने को ‘बकवास’ कहना महंगा पड़ गया. टॉम निकोल्स अमेरिका के नेवल वॉर कॉलेज में पढ़ाते हैं, साथ ही अमेरिकन राजनीति की अच्छी समझ रखते हैं. 24 नवंबर को उन्होंने ये ट्वीट किया कि ‘भारतीय भोजन बकवास है, और हम सब नाटक करते हैं कि हमें ये पसंद है.’

दरअसल 14 नवंबर को एक ट्विटर यूज़र ने लोगों से ये पूछा कि खाने के मामले में उनकी सबसे विवादास्पद राय क्या है. ऐसे में निकोल्स ने ये ट्वीट जवाब के तौर पर किया जिसके बाद कई भारतीयों व गैर-भारतीयों ने उन्हें निशाना बनाया.

करीब 15 हज़ार कमैंट्स और 13 हज़ार रीट्वीट्स के साथ ये वायरल हो गया. लोगों को निकोल्स की राय पसंद नहीं आयी. इनमें से एक अमेरिकन सेलेब्रिटी होस्ट और शेफ पद्मालक्ष्मी भी थीं जिन्होंने ये कहकर निकोल्स पर निशाना साधा कि क्या उनके पास स्वाद ग्रंथियां नहीं है?

भारतीय खाने के दीवानों की दुनिया भर में कोई कमी नहीं है. देखिये अन्य ट्विटर यूज़र्स ने किस तरह से निकोल्स को आड़े हाथों लिया.

थॉर बेन्सन नाम के एक लेखक ने जवाब दिया, ‘मैं 1000 डॉलर की शर्त लगता हूं की अमेरिकी दूसरे देशों के खाने को नहीं समझ सकते.”

एक अन्य व्यक्ति ने कहा, ‘इतनी बेस्वाद ज़िन्दगी जीने की कल्पना करके देखो.’

पत्रकार आदित्य राज कॉल ने जवाब दिया, ‘कुछ लोगों को इतनी गलतफहमियां होती हैं और वो दिखावा करते हैं की उन्हें सब पता है.

लेखिका रश्मि नाइक ने कहा, ‘तो आप 400 सालों पुराने हमारे मसाले हमें लौटाना चाहते हैं?’

एक अन्य यूजर ने तो इसकी तुलना ट्रम्प को पसंद करने से कर दी.

‘ये राय ट्रम्प को सपोर्ट करने से भी बुरी है’

अन्य लोगों ने तो अमेरिकी खाने तक की बुराई कर दी.

‘मैं आपकी इस बात को समझ सकता हूं अगर आप नाश्ते में कॉर्नफ़्लेक्स, लंच और डिनर में बिना मसालों के पका बेस्वाद मीट और उबली सब्जियां, या कभी कभी ‘मसालों’ के नाम पर सिर्फ नमक और काली मिर्च के साथ पिज़्ज़ा खाकर जीते हैं.

कुछ लोगों ने निकोल्स के इस ट्वीट को रंगभेद और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद से प्रेरित बताया. केन्या की एक्टिविस्ट ने लिखा, ‘महिला हास्य कलाकार बकवास हैं, गोरों के अलावा किसी और का लिखा हुआ साहित्य बकवास है, हमें जो पसंद न आये वो सब बकवास है.’

आखिर यहां ‘हम’ हैं कौन ?

हालांकि इसके बाद कुछ लोगों ने ‘रंगभेद’ वाली बात को अनावश्यक बताया और निकोल्स का साथ दिया.

‘ज़रा सोचिये जब मज़ाक में खाने के ऊपर दी हुई राय को इतना आगे बढ़ा दिया जाए.’

हालांकि ये पहली बार नहीं है जब अपनी दी हुई किसी राय पर निकोल्स को आलोचना का सामना करना पड़ा है.

इस से पहले उन्होंने पर्यावरण को लेकर जागरूक करने वालीग्रेटा थनबर्ग पर भी सवाल उठाये थे. उन्होंने कहा था कि 9 साल कि आटिज्म से पीडित बच्ची को पर्यावरण सरंक्षण जैसी व्यस्क बातों में नहीं उलझना चाहिए.

टॉम निकोल्स इस से पहले डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी का हिस्सा भी थे जो उन्होंने बाद में ट्रम्प द्वारा नियुक्त ब्रेट कावानह के जज बनने पर आपत्ति जताते हुए छोड़ दी थी.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

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