Friday, 27 May, 2022
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मोदी का काशी दौरा, लखीमपुर, तबलीगी जमात पर सऊदी की पाबंदी- इस हफ्ते उर्दू प्रेस ने किन खबरों को दी अहमियत

दिप्रिंट अपने इस राउंड अप में बता रहा है कि पूरे हफ्ते के दौरान उर्दू मीडिया ने विभिन्न खबरों को कैसे कवर किया और उनमें से किस घटना को संपादकीय में जगह दी.

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नई दिल्ली: उर्दू अखबारों में इस हफ्ते दूरस्थ सऊदी अरब की एक पाबंदी और संसद में विपक्ष की गूंज के बीच प्रमुखता पाने की होड़ लगी थी और साथ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपने चुनाव क्षेत्र वाराणसी का दौरा, तथा चुनावी उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में बढ़ते सांप्रदायिक स्वर भी थे.

दिप्रिंट आपको यहां बता रहा है कि इस सप्ताह उर्दू के अखबारों ने किन-किन खबरों पर ज्यादा फोकस किया.


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लखीमपुर खीरी हिंसा

एसआईटी रिपोर्ट कि लखीमपुर खीरी की हिंसा एक पूर्व नियोजित साज़िश थी, 15 दिसंबर को सभी दैनिक उर्दू अखबारों के पहले पन्नों पर थी. अगले दिन, इनकलाब और रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा दोनों ने संसद के भीतर गतिरोध की खबर छापी, जिसमें विपक्ष ने मांग की थी कि केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा को बर्खास्त किया जाए.

सहारा ने उस दिन अपने संपादकीय में, अजय मिश्रा की बर्खास्तगी से इनकार पर सरकार की आलोचना की और मांग उठाई कि इस केस में मिश्रा और उनके बेटे, दोनों पर मुकदमा चलना चाहिए. पेपर ने लिखा कि अगर सरकार माफी मांगती है, तो उससे इसकी किसान-विरोधी छवि मिट सकती है और वो विपक्ष को प्रभावी तरीके से खामोश भी कर सकती है.

इनकलाब ने उसी दिन अपने संपादकीय में कहा कि अगर तीन कृषि कानून वापस नहीं भी लिए गए होते, तो भी साल भर चले किसान आंदोलन ने मिसाल कायम कर दी थी, कि किस तरह आम राय से एक लंबा संघर्ष चलाया जा सकता है और सामुदायिक प्रयासों से सभी की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है.

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17 दिसंबर के अपने संपादकीय में इनकलाब ने सवाल किया कि अजय मिश्रा पर कब कार्रवाई की जाएगी. अखबार ने लिखा कि अगर दबाव न बनाया जाता, तो आशीष मिश्रा को भी गिरफ्तार न किया जाता. अखबार ने इस बात को भी रखा कि सरकार संसद के भीतर चर्चा से किनारा कर सकती है लेकिन वो इस सवाल से नहीं बच सकती कि अजय मिश्रा को बराबर का जिम्मेवार क्यों न समझा जाए क्योंकि घटना से कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपने भाषण में किसानों को धमकी दी थी.

12 दिसंबर को किसानों की ऐतिहासिक जीत पर अपने संपादकीय में इनकलाब ने लिखा कि जनवरी 2021 में एक समय ऐसा था, जब हर किसी को लगा कि आंदोलन खत्म हो गया लेकिन ये राकेश टिकैत के आंसू थे, जिन्होंने चीज़ों को पलट दिया.

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपने संसदीय चुनाव क्षेत्र का दौरा, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उदघाटन और मंदिर में पूजा पर सवार होकर, वाराणसी तकरीबन पूरे हफ्ते पहले पन्नों पर बना रहा. 13 और 14 दिसंबर को सभी उर्दू अखबारों में उद्घाटन की घोषणा और वास्तविक आयोजन दोनों खबरों को प्रमुखता से जगह दी गई.

सहारा ने 14 दिसंबर के अपने संपादकीय में इस दौरे को आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों तथा इस तथ्य की पृष्ठभूमि रखी कि कॉरिडोर के आसपास के विकास कार्य में कुछ सौ लोगों का पुनर्वास जरूरी हो गया था. पीएम के भाषण का हवाला देते हुए अखबार ने पूछा कि क्या बीजेपी अब आगे से काशी की प्रेम की परंपरा को स्थायी बनाएगी. उसी दिन, इनकलाब ने अपने संपादकीय में लिखा कि बीजेपी ऐसे मुद्दों को उठा रही है जिनका संबंध देश के बहुसंख्यक धर्म (यानी हिंदुओं) से है, ताकि लोग महंगाई जैसे जमीन से जुड़े मसले भूल जाएं, जिससे उसे चुनावों के दौरान नुकसान पहुंचने की संभावना है.


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तबलीगी जमात

तबलीगी जमात को ‘दहशतगर्दी का दरवाज़ा’ करार देते हुए, उस पर पाबंदी लगाने के सऊदी अरब के फैसले की खबर ने जमात के मूल देश भारत में परेशानी पैदा कर दी. उर्दू मीडिया में उन्हीं चिंताओं की झलक नजर आई. 14 दिसंबर को इनकलाब की बड़ी खबर में बहुत से मुस्लिम संगठनों की प्रतिक्रिया थी, जिन्होंने बैन का विरोध किया और तर्क दिया कि सऊदी अरब के फैसले का संगठन के भारतीय चैप्टर पर कोई असर नहीं होना चाहिए.

15 दिसंबर को सहारा की पहले पन्ने की खबर में जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी का ये कहते हुए हवाला दिया गया कि तबलीगी जमात एक धार्मिक संस्था है, कोई राजनीतिक संगठन नहीं है. उन्होंने ये बयान सऊदी राजदूत के साथ मुलाकात के दौरान दिया. 17 दिसंबर को सहारा में पहले पन्ने पर एक छोटी सी खबर छपी कि वीएचपी ने तबलीगी जमात पर पाबंदी लगाने की मांग की है.

तृणमूल कांग्रेस

ऐसा लगता है कि बीजेपी-विरोधी मोर्चे की धुरी बनने की कोशिशों में तृणमूल कांग्रेस को न सिर्फ विपक्षी खेमे बल्कि उर्दू प्रेस के एक वर्ग से भी ठंडी प्रतिक्रिया मिली है.

11 दिसंबर के अपने संपादकीय में, इनकलाब ने लिखा कि अगर सात सालों में बीजेपी का कांग्रेस-मुक्त भारत का सपना साकार नहीं हो पाया है, तो ममता बनर्जी की कांग्रेस-मुक्त विपक्ष की महत्वाकांक्षा कैसे पूरी हो सकती है? पार्टी सांसदों द्वारा भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव पेश किए जाने की खबर, 14 दिसंबर को अखबार के पहले पन्ने पर थी.

16 दिसंबर को सियासत के पहले पन्ने पर ममता की आक्रामक घोषणा की खबर छपी कि 2024 के लोकसभा चुनाव बीजेपी का अंत साबित होंगे. 16 दिसंबर को इनकलाब का संपादकीय, तृणमूल कांग्रेस और पार्टी सांसद महुआ मोइत्रा को ममता बनर्जी की ‘फटकार’ पर था. अखबार कह कहना था कि ये महज एक दिखावा था और बनर्जी अगर वाकई मोइत्रा से नाराज़ होतीं, तो उन्हें चुनावों से पहले पार्टी का गोवा प्रभारी न बनाया होता.

अयोध्या/मथुरा

13 दिसंबर को अपने पहले पन्ने की खबर में इनकलाब ने कहा कि अयोध्या फैसले का ‘जश्न मनाकर’ गोगोई ने अपने असली रंग दिखा दिए हैं. एक लखनऊ-स्थित मुस्लिम धर्म-गुरू की अपील भी थी कि लोग ज्यादा से ज्यादा संख्या में जमा होकर वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद में नमाज़ अदा करें और महमूद मदनी का एक बयान था कि मुसलमानों की पहचान मिटाने की कोशिशें की जा रही हैं. अखबार के पहले पन्ने पर अखिल भारतीय पुरोहित महासभा की मथुरा प्रशासन से अपील भी थी कि उन हिंदू संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए, जो शाही ईदगाह के पास गड़बड़ी फैलाने की कोशिश कर रहे हैं.

11 दिसंबर को इनकलाब और सियासत दोनों में पहली खबर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के बयान के बारे में थी कि खुले में नमाज पढ़ने को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. अखबार ने लिखा कि सीएम ने सांप्रदायिक तत्वों के सामने हथियार डाल दिए हैं.

(उर्दूस्कोप को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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