Tuesday, 25 January, 2022
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कोहली-गांगुली विवाद भारतीय क्रिकेट में फिर पुराने बदनुमा दौर की वापसी करा सकता है

गांगुली बीसीसीआई के अध्यक्ष हैं. द्रविड कोच और लक्ष्मण एनसीए के प्रमुख हैं. सर्वविजेता टेस्ट कप्तान कोहली अब निशाने पर क्यों हैं यह समझना मुश्किल है इसलिए तमाम क्रिकेटप्रेमी नाराज हैं.

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भारतीय क्रिकेट और विवादों का रिश्ता शायद ही कभी टूटता है. इतिहास को देखें तो पता चलेगा कि अधिकतर विवादों की वजह पराजय और बेइज्जती हुआ करती थी. 14 मार्च 2001 तक ऐसा ही होता था, जब सौरभ गांगुली की टीम में वीवीएस लक्ष्मण, और राहुल द्रविड ने पूरे दिन बैटिंग करके ऑस्ट्रेलिया को आखिरी क्षणों में चमत्कारी जीत दिलाने का आधार तैयार किया था.

इसके बाद, खासकर टेस्ट क्रिकेट में भारत के वर्चस्व के दो दशक का युग शुरू हुआ. भारत का उत्कर्ष इतनी तेजी से हुआ कि उसके बाद उसने ग्रेग चैपल के बदनुमा दौर को नाक-भौं सिकोड़ते हुए न सही, आराम से परे धकेल दिया.

बीच में महेंद्र सिंह धोनी आए लेकिन समय के साथ विराट कोहली ही गांगुली के सच्चे उत्तराधिकारी साबित हुए. यह गली-मोहल्ले के क्रिकेट की आक्रामकता वाला, उजड्ड कहे जाने पर गर्व करने वाला और ऑस्ट्रेलियाइयों को उनके ऑस्ट्रेलियाइपन में मात देने वाला क्रिकेट था.

यह भी एक विडंबना है कि जिन शानदार लोगों ने भारतीय क्रिकेट को ऐसे गौरवपूर्ण शिखर पर पहुंचाया वे ही अब उसे उस शिखर से नीचे धकेलते दिख रहे हैं. गांगुली बीसीसीआई के अध्यक्ष हैं, द्रविड कोच हैं, लक्ष्मण नेशनल क्रिकेट अकादमी (एनसीए) के प्रमुख हैं और सर्वविजेता टेस्ट कप्तान कोहली अब निशाने पर हैं. इस मुकाम पर हम कैसे पहुंच गए, यह क्रिकेट नाम की सबसे धर्मनिरपेक्ष भारतीय आस्था के बड़े-से-बड़े पंडित या आयातुल्ला के लिए भी समझ पाना मुश्किल है और तमाम क्रिकेटप्रेमी तो नाराज हैं ही.

पहली बात तो यह है कि यह करोड़ों लोगों की भ्रामक मगर मर्मस्पर्शी धारणा को चुनौती दे रहा है. अब तक लोग यही मानते रहे कि भारतीय खेलों, खासकर क्रिकेट के साथ सबसे बुरी बात यह है कि खेलों के तमाम संगठनों की बागडोर गैर-खिलाड़ियों के हाथ में है. पहली बार हमने बागडोर एक आला और काफी हद तक समकालीन क्रिकेटर के हाथ में सौंपी. इसका नतीजा क्या हुआ? हमारी नाव भारतीय क्रिकेट के लिए आखिरी मोर्चे, दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना होने वाली थी कि उसमें छेद हो गया.

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हाल के वर्षों में भारत ऑस्ट्रेलिया में लगातार दो और इंग्लैंड में एक सीरीज़ जीत चुका है, जबकि घर आने वाली टीमों पर झाड़ू फेरता रहा है. वेस्टइंडीज अब टॉप टीम नहीं रह गई है, न्यूजीलैंड का हम अक्सर दौरा करते रहते हैं. लेकिन दक्षिण अफ्रीका में हम सीरीज़ नहीं जीत पाए हैं. फिलहाल दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट नस्लवादी विवाद, खिलाड़ियों के चोटिल होने, और प्रतिभा पलायन आदि के मिलेजुले असर के कारण संकट में है. कोहली के खुशमिजाज़ साथी यात्रियों के लिए इस अंतिम गढ़ को फतह करने का यह सुनहरा मौका है.

लेकिन, बीसीसीआई ने क्या किया? टीम के रवाना होने से एक सप्ताह पहले कोहली पर हमला कर दिया, इसके बाद भी उन्हें और तरह से शर्मसार किया. शुरू में ‘दोस्ताना’ मीडिया में अटकलों और अफवाहों को बढ़ावा दिया गया, जिनमें से कुछ तो बिलकुल गलत थीं. इनमें सबसे बेतुकी फैलाई गई कि कोहली ओडीआइ सीरीज़ इसलिए नहीं खेलना चाहते थे क्योंकि उसी दौरान उनकी बेटी का जन्मदिन पड़ेगा.

सबसे पहली बात यह है कि पक्के सूत्रों ने हमें बताया कि कोहली ने बोर्ड को ऐसी कोई बात नहीं कही. बोर्ड के ‘सूत्रों’ का जवाब यह था कि ठीक है, उन्होंने हमसे वैसा कुछ नहीं कहा होगा लेकिन उन्होंने ड्रेसिंग रूम अपने कुछ करीबी दोस्तों से इस बात का जिक्र किया था. अब, हम यह नहीं कह सकते कि बोर्ड ड्रेसिंग रूम में होने वाली बातचीत को गुप्त रूप से सुनने के यंत्र रखता है या नहीं, या खिलाड़ियों के फोन में पेगासस खुफिया यंत्र लगाता है या नहीं.

लेकिन उसे कोहली से बात करने से कौन रोक रहा था? तथ्यों और तारीखों पर गौर करने से पता चलता है कि जिसने भी सफाई देने की कोशिश की उसे पूरी बात नहीं पता थी. बेटी का जन्मदिन ओडीआइ सीरीज़ के बीच नहीं पड़ता था बल्कि तब पड़ता है जब कोहली, अगर फिट रहे और टीम के लिए चुने गए तब, अपना 100वां टेस्ट मैच खेलेंगे. बोर्ड के ज़हीन लोग ऐसी गलती कैसे कर बैठे? क्योंकि उन्होंने अपना होमवर्क ठीक से नहीं किया.

ओमीक्रॉन की वजह से दौरे की तारीखें बदलीं और पूरा कार्यक्रम भी बदल गया. डालमिया, बिंद्रा, ललित मोदी, श्रीनिवासन या अनुराग ठाकुर के दौर में शर्मसार करने वाली कई बातें हुई होंगी. लेकिन उनमें कामकाज की ऐसी गड़बड़ी शामिल नहीं थी. आइपीएल के बाद भारतीय बोर्ड ने दुनिया के सबसे कुशल प्रबंधन वाले बोर्ड की साख बना ली थी.

लेकिन हमने ठोक-पीट करने की महान भारतीय परंपरा को आगे बढ़ाने का फैसला कर लिया. पवित्र सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एक नया निजाम बहाल किया गया और अंततः पवित्रतावादियों की ख़्वाहिश पूरी हुई. क्रिकेट बोर्ड की कमान एक टॉप क्रिकेटर को सौंप दी गई. उम्मीद की गई कि अब व्यवसायियों और खेल वालों के बीच हितों का टकराव नहीं होगा. इसके बाद हमने बोर्ड के चीफ को, शायद क्रिकेट की पूरी दुनिया में एकमात्र मिसाल पेश करते हुए, उन मैचों के प्रसारण के बीच क्रिकेट के एक ‘गेमिंग एप’ के विज्ञापनों में देखा, जिन मैचों में उनकी अपनी टीमें खेल रही हैं और अब यह घालमेल सामने आया है. मानो विराट कोहली 2021-22 के लिए वही हैं, जो ग्रेग चैपल 2005-06 के लिए थे.


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दुखद बात यह है कि टीम के चयनकर्ता और बोर्ड यह तर्क पेश कर सकते हैं कि कोहली क्रिकेट के तीनों फॉर्मेट के लिए कप्तान नहीं बने रह सकते. कोहली ने यह घोषणा करके उनके लिए दरवाजा खोल दिया था कि अब वे टी-20 टीम की कप्तानी नहीं करेंगे. तब चयनकर्ताओं का यह तर्क ठीक हो सकता है कि सफ़ेद गेंद से खेले जाने दोनों फॉर्मेट, टी-20 और ओडीआई के लिए साझा कप्तान रखना महत्वपूर्ण है. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की छोटी-सी दुनिया में अलग-अलग कप्तान रखने का ही चलन है, सिवा न्यूजीलैंड और अब तक भारत के, क्योंकि केन विलियमसन और कोहली अपने कद, सभी फॉर्मेट में शानदार निजी प्रदर्शन और अपनी टीम के प्रदर्शन के कारण निर्विवाद अगुआ बने.

लेकिन, एक नेता वाला फॉर्मूला 2013 के बाद से आइसीसी की ट्रॉफियां जीतने के मामले में कारगर नहीं साबित हुआ है.

चयनकर्ताओं का यह सोचना सही हो सकता है कि रवि शास्त्री और कोहली, दो लोगों की तानाशाही (यह शब्द हम हल्के से नहीं इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, रविचंद्रन आश्विन से पूछ लीजिए) खत्म होनी ही थी. इसके अलावा, कोहली ने जब टी-20 की कप्तानी छोड़ दी तो सफ़ेद गेंद से खेले जाने दोनों फॉर्मेट के लिए दो कप्तान रखने का कोई अर्थ नहीं रह गया. कोहली का फॉर्म भी गड़बड़ हो गया, तो उन्हें बैटिंग की अपनी जबरदस्त प्रतिभा पर देने की जरूरत बढ़ गई. वैसे भी, अब वे 30 से ऊपर की उम्र में पहुंच गए हैं.

हम यह सब मान लेते हैं. एकमात्र सवाल, जिसका कोई जवाब नहीं है और न कोई मान्य जवाब हो सकता है, यह है कि क्या यह सब इतने खराब तरीके से करना जरूरी था? सभी फॉर्मेट में भारत के सबसे सफल कप्तान को खारिज करना? यह डालमिया-बिंद्रा-श्रीनिवासन-पवार-ठाकुर युग की वापसी नहीं है.

वे उस दौर में लौट गए हैं जब बोर्ड बिशन सिंह बेदी या मोहिंदर अमरनाथ को मनमाने तरीके से अपमानित करता था या कोई विजय मर्चेन्ट एक युवा मंसूर अली खान पटौदी को बेआबरू करके, बिना कोई कारण बताए कप्तान के पद से हटा देते थे. यह सब मुझे पानीपत के स्कूल के अपने पुराने दोस्त प्रदीप मैगजीन की नयी किताब ‘नॉट जस्ट क्रिकेट’ से मालूम हुआ और उम्मीद है कि यह सब सच ही होगा. बताया गया है कि मर्चेन्ट परिवार पटौदी परिवार से इसलिए नाराज था कि 1946 में उनकी जगह सीनियर पटौदी इफ्तीखार अली खान को इंग्लैंड के दौरे पर गई टीम का कप्तान बना दिया गया था जबकि वे इसके योग्य नहीं थे. क्रिकेट का रहस्य- सीनियर पटौदी तब तक केवल इंग्लैंड के लिए खेलते रहे थे. वे भारत के लिए इसलिए उपलब्ध हुए थे क्योंकि बदनाम एशेज़ वाले दौरे में जाने से या तो उन्होंने मना कर दिया था या वे टीम में इसलिए शामिल नहीं किए गए थे कि उन्हें डगलस जार्डाइन की ‘बॉडीलाइन’ गेंदबाजी नापसंद थी.

आप प्रदीप की किताब पढ़ लें. वह बताती है कि मंसूर अली खान पटौदी के उत्तराधिकारी अजित वाडेकर का शानदार दौर किस तरह केवल तीन साल (1971-74) ही चला. उसके बाद संहार शुरू हो गया. क्लाइव लॉयड की आक्रामक वेस्ट इंडीज टीम जब भारत के दौरे पर आई तब बीसीसीआई को बुढ़ाते ‘टाइगर’ को वापस लाना पड़ा था. उन्होंने टीम को फिर खड़ा किया और सीरीज़ में उसे 0-2 से पिछड़े होने के बावजूद अविश्वसनीय 2-2 की बराबरी पर लाने के लायक बनाया, जबकि पहली बार खेल रहे विवियन रिचार्ड्स ने अच्छा प्रदर्शन किया था. भारत वह सीरीज़ 3-2 से हारा. बहरहाल, टाइगर ने खुद को साबित कर दिखाया. उनका काम पूरा हुआ मगर इसके बाद भारतीय टीम 25 साल तक गर्त में रही, 1983 के चमत्कार के बावजूद.

जो भी कारण रहा हो, मर्चेन्ट ने 1970 में पटौदी को गरिमा विहीन ढंग से हटा दिया था. अगर बीसीसीआई 2021 में उसी इतिहास को दोहराने में गर्व महसूस करता है, तो वह भारतीय क्रिकेट को पचास साल पीछे धकेल देगा. वह यह समझने की कोशिश भी नहीं करेगा कि भारतीय क्रिकेट, खिलाड़ी और उसके फैन, सब बदल चुके हैं. अहम बात यह है कि वे कोहली के नेतृत्व में जीतने के आदी हो चुके हैं.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

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