scorecardresearch
Wednesday, 12 June, 2024
होमसमाज-संस्कृतिमोदी का ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’, कर्तव्य और शासन के इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ — उर्दू प्रेस

मोदी का ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’, कर्तव्य और शासन के इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ — उर्दू प्रेस

पेश है दिप्रिंट का राउंड-अप कि कैसे उर्दू मीडिया ने पिछले हफ्ते के दौरान विभिन्न समाचार संबंधी घटनाओं को कवर किया और उनमें से कुछ ने इसके बारे में किस तरह का संपादकीय रुख अपनाया.

Text Size:

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव करीब आने के साथ, इस हफ्ते उर्दू प्रेस में शासन के मुद्दे सबसे ऊपर रहे, रोजनामा राष्ट्रीय सहारा के एक संपादकीय में चिंता व्यक्त की गई है कि कैसे नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा कम हस्तक्षेप का मतलब रोज़गार और स्वास्थ्य क्षेत्र जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अधिक व्यक्तिगत जिम्मेदारी है.

6 मार्च को इसके संपादकीय में कहा गया कि पिछले दशक में मोदी के नेतृत्व में राजनीति और शासन में “महत्वपूर्ण परिवर्तन” हुए हैं, जो मुख्य रूप से सांप्रदायिकता और धन के बढ़ते प्रभाव से प्रेरित हैं. संपादकीय में कहा गया है कि सरकार की “न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन” की कहावत “शासन और कर्तव्यों के इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ” है.

इसमें कहा गया है, “यह बदलाव सरकारी समर्थन पर कम निर्भरता के साथ आजीविका, रोज़गार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में अधिक व्यक्तिगत जिम्मेदारी दर्शाता है.”

इसके अलावा, संपादकीय में चुनावों से पहले विभिन्न भारतीय राजनीतिक पार्टियों की गतिविधियों, पाकिस्तान में हाल ही में हुए चुनावों और पिछले कुछ महीनों में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों पर गहन बहस हुई.

दिप्रिंट आपके लिए इस हफ्ते उर्दू प्रेस में पहले पन्ने पर सुर्खियां बटोरने और संपादकीय में शामिल सभी खबरों का एक राउंड-अप लेकर आया है.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें


यह भी पढ़ें: बीजेपी की रणनीति पर गौर कीजिए, 2024 नहीं बल्कि 2029 की तैयारी कर रही है


लोकसभा चुनाव

जैसा कि अपेक्षित था, आगामी चुनाव और विभिन्न राजनीतिक खेमों में गतिविधियां उर्दू प्रेस में सबसे महत्वपूर्ण रहीं.

7 मार्च को सियासत के संपादकीय में कांग्रेस में प्रियंका गांधी के महत्व पर प्रकाश डाला गया. संपादकीय में कहा गया है कि अक्सर दिवंगत भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सच्चे उत्तराधिकारी के रूप में मानी जाने वाली प्रियंका जनता के बीच महत्वपूर्ण प्रभाव रखती हैं.

इसमें कहा गया, “पिछले पांच साल में वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रूप से शामिल रही हैं, जिसमें उन्होंने हाथरस घटना और किसानों के संघर्ष से लेकर विभिन्न मुद्दों की वकालत की है. उनके चुनाव लड़ने की संभावना के साथ, यह आशावाद है कि उनकी उपस्थिति कांग्रेस पार्टी की चुनावी संभावनाओं को बढ़ावा देगी, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां भाजपा प्रभावी है.”

हालांकि, इसके बावजूद, संपादकीय में बेहतर चुनावी नतीजों के लिए समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस के गठबंधन को महत्वपूर्ण माना गया. संपादकीय में कहा गया है, “प्रियंका गांधी की सक्रिय भागीदारी और जोरदार प्रचार अभियान से इस प्रयास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद है.”

4 मार्च को अपने संपादकीय में सहारा ने बीजेपी की 195 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट का विश्लेषण करते हुए कहा कि उसके 34 मौजूदा सांसदों और कई नए चेहरों को मौका दिया गया है.

इसमें कहा गया, “दिलचस्प बात यह है कि भाजपा ने उन लोगों पर भरोसा किया है जो हाल ही में कुछ दिन पहले अन्य राजनीतिक दलों से इसमें शामिल हुए हैं, जैसे कि झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा.” इसमें कहा गया है, “दिलचस्प बात यह है कि उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में केरल के मलप्पुरम से मुस्लिम उम्मीदवार अब्दुल सलाम को जगह मिली है, लेकिन उत्तर प्रदेश में टिकट की कोशिश कर रहे कई मुस्लिम नेताओं को निराशा हुई है.”

2 मार्च को सियासत के संपादकीय में लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा की तैयारी का विश्लेषण जारी रहा. इसमें कहा गया है कि भाजपा मुसलमानों और धर्मनिरपेक्ष वोटों को विभाजित करना चाहती है ताकि वे राजनीतिक लाभ और लगातार तीसरी बार जीत हासिल कर सके. संपादकीय में कहा गया है कि इसके लिए भाजपा उन लोगों का इस्तेमाल कर रही है जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हैं.

संपादकीय में कहा गया, “इसके लिए भाजपा ने अपने सहायक तत्वों को भी सक्रिय कर दिया है…अधिकांश का मानना है कि ये तत्व भाजपा के हाथों का मोहरा बनने के लिए मजबूर हैं और अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को कानूनी कार्रवाई से बचने और उनके काले कामों को छिपाने में मदद करने के लिए मजबूर हैं. उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है.”

8 मार्च को अपने संपादकीय में राष्ट्रीय सहारा ने कहा कि भारत के निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के लिए केंद्रीय बलों की 920 कंपनियों को तैनात किया — जो किसी भी राज्य में सबसे अधिक है. ये बल चुनाव की घोषणा से पहले ही राज्य में पहुंचने शुरू हो गए हैं और उन्हें समायोजित करने के लिए राज्य में स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए गए हैं.

संपादकीय में कहा गया है, लेकिन ममता बनर्जी सरकार इसके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकती क्योंकि राज्य में शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान कराना चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी है.

पाकिस्तान

4 मार्च को सियासत के संपादकीय में पिछले महीने के चुनाव के बाद पाकिस्तान के शासन परिवर्तन पर टिप्पणी करते हुए कहा गया कि यहां चाहे कोई भी शासन करे, लेकिन इस देश में शासन करना मुश्किल है.

इसमें कहा गया है कि ज़िम्मेदारी अब नए प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ पर है. इसमें कहा गया, अच्छी बात यह है कि शरीफ और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) देश की शक्तिशाली सेना के साथ अपने मतभेदों को सुलझाने में सक्षम हैं.

संपादकीय में कहा गया, “इन मतभेदों को सुलझाने से दोनों पक्षों को फायदा हुआ, जिसके परिणामस्वरूप शहबाज़ शरीफ और उनकी पार्टी को सेना का समर्थन मिला. अगर सेना तटस्थ रहती, तो शहबाज़ शरीफ या अन्य दलों के लिए इमरान खान को रोकना या हराना आसान नहीं होता. यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शहबाज़ देश की भलाई के लिए सेना के समर्थन से क्या योजना बनाते हैं.”

अदालत और सरकार

उर्दू प्रेस ने संवैधानिक लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका के महत्व पर भी टिप्पणी की. यह ज्ञानवापी विवाद की देखरेख करने वाले पूर्व न्यायाधीश अजय कृष्ण विश्वेश के प्रकाश में आया है, जिन्हें उनकी रिटायरमेंट के ठीक बाद एक मार्च को डॉ शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय का लोकपाल नियुक्त कर दिया गया.

सहारा ने 7 मार्च को एक संपादकीय में कहा, “एक मजबूत अदालत विधायी दबाव से प्रतिरक्षित होती है और अखंडता और निष्पक्षता को बरकरार रखती है. हालांकि, आज की न्यायपालिका इस मानक से भटक रही है, न केवल निचली और अधीनस्थ अदालतें बल्कि उच्च न्यायपालिका को भी इससे बाहर नहीं रखा जा सकता है.”

यह इसके दो दिन बाद आया है जब इसके एक अन्य संपादकीय में नोट के बदले वोट मामले पर सुविचारित फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट की सराहना की गई थी. इस हफ्ते की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट की सात-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि सांसद और विधायक संसद या राज्य विधानसभा में भाषण या वोट के संबंध में रिश्वत लेने के लिए संसदीय छूट का दावा नहीं कर सकते. इस फैसले ने 1998 के उस फैसले को पलट दिया जिसमें कहा गया था कि विधायक संसद में अपने भाषणों या वोटों से जुड़े मामलों में संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत अभियोजन से छूट का आनंद ले सकते हैं.

ताज़ा मामला झारखंड मुक्ति मोर्चा की विधायक सीता सोरेन पर रिश्वतखोरी के आरोप से जुड़ा है.

5 मार्च को सियासत के संपादकीय में कहा गया, “उस फैसले में न्यायमूर्ति भरूचा (भारत के भावी मुख्य न्यायाधीश एस.पी. भरूचा, जो बहुमत के फैसले का हिस्सा थे) ने कथित अपराधों की गंभीरता को स्वीकार किया, लेकिन संसदीय भागीदारी और बहस को बनाए रखने की ज़रूरत पर जोर दिया. यह फैसला पिछली मिसाल से एक महत्वपूर्ण प्रस्थान का प्रतीक है.”

(संपादन : फाल्गुनी शर्मा)

(उर्दूस्कोप को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: पतंजलि विज्ञापन पर SC का प्रतिबंध, उर्दू प्रेस ने कहा — सरकार समर्थकों के अपराध पर आंखें मूंद लेती है


 

share & View comments