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Thursday, 13 June, 2024
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पतंजलि विज्ञापन पर SC का प्रतिबंध, उर्दू प्रेस ने कहा — सरकार समर्थकों के अपराध पर आंखें मूंद लेती है

पेश है दिप्रिंट का राउंड-अप कि कैसे उर्दू मीडिया ने पिछले हफ्ते के दौरान विभिन्न समाचार संबंधी घटनाओं को कवर किया और उनमें से कुछ ने इसके बारे में किस तरह का संपादकीय रुख अपनाया.

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नई दिल्ली: भारतीय आयुर्वेद समूह पतंजलि को अगले आदेश तक अपने उत्पादों का विज्ञापन करने से प्रतिबंधित करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी करते हुए इस हफ्ते सियासत में एक संपादकीय में कहा गया है कि सरकार किसी भी प्रकार की असहमति पर नकेल कसते हुए अपने समर्थकों के अपराधों के प्रति “आंख मूंद” लेती है.

28 फरवरी को संपादकीय में — जिसका शीर्षक था ‘सरकार अपराधियों पर आंखें मूंद लेती है’ — सियासत ने असहमत लोगों पर नकेल कसने के साथ-साथ पतंजलि जैसी कंपनियों के गलत कामों को जानबूझकर नज़रअंदाज करने के लिए मोदी सरकार की आलोचना की, जिससे “लोकतंत्र का मजाक” बन गया. संपादकीय 27 फरवरी को आया — सुप्रीम कोर्ट के फैसले के एक दिन बाद.

इसमें कहा गया है, “सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बावजूद पतंजलि आयुर्वेद जैसे सरकारी समर्थकों की चुप्पी, सरकार द्वारा कानून को चुनिंदा ढंग से लागू करने को रेखांकित करती है” और इस पर भी सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकर्षित करने की मांग की गई है. इसने कहा, “शायद यह सरकार की चुप्पी है जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट को उसे और पतंजलि दोनों को फटकार लगानी पड़ी है.”

पतंजलि के फैसले के अलावा, हिमाचल प्रदेश में राजनीतिक संकट, कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा और आगामी आम चुनाव से पहले विभिन्न राजनीतिक दलों में चल रही गतिविधियों को तीनों उर्दू अखबारों — सियासत, इंकलाब और रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा में व्यापक कवरेज मिली.

दिप्रिंट आपके लिए इस हफ्ते उर्दू प्रेस में पहले पन्ने पर सुर्खियां बटोरने और संपादकीय में शामिल सभी खबरों का एक राउंड-अप लेकर आया है.

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हिमाचल प्रदेश और ‘ऑपरेशन लोटस’

इस हफ्ते हुए राज्यसभा के चुनावों के बाद हिमाचल में आए राजनीतिक संकट ने इस हफ्ते उर्दू प्रेस को गुलज़ार रखा. यह संकट छह कांग्रेस विधायकों और तीन निर्दलीय विधायकों के क्रॉस-वोटिंग से निकला, जिन्होंने सत्तारूढ़ सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार का समर्थन किया और राज्य की एकमात्र राज्यसभा सीट पर पार्टी के उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी की हार हुई.

हालांकि, कांग्रेस ने अपने नेताओं को एक साथ रखने और अपना बजट पारित कराने का प्रबंधन करके अस्थायी रूप से संकट को टाल दिया, लेकिन घटनाक्रम ने सियासत को भारतीय जनता पार्टी पर ‘ऑपरेशन लोटस’ के तहत “इंजीनियरिंग” दलबदल का आरोप लगाने के लिए प्रेरित किया.

‘ऑपरेशन लोटस’ एक शब्द है जिसका उपयोग विपक्ष सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा द्वारा अन्य दलों के विधायकों को तोड़ने की घटना का वर्णन करने के लिए करता है.

इस संपादकीय में 29 फरवरी को कहा गया था कि भाजपा ने दलबदल को एक आम प्रथा में बदल दिया है, जिससे देश के लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रियाओं का मजाक बन रहा है.

इसमें कहा गया, “या तो किसी विशेष पार्टी के निर्वाचित विधायकों और सांसदों पर दबाव डाला जाता है, या उन्हें परेशान किया जाता है और पक्ष बदलने के लिए मजबूर किया जाता है. जिन राज्यों में पार्टियां जनता के जनादेश से सत्ता में आती हैं, उन्हें सत्ता से वंचित किया जा रहा है और जनमत का अपमान किया जा रहा है. भाजपा लोगों के जनादेश का सम्मान करने को तैयार नहीं है और देश के हर हिस्से पर शासन करना चाहती है…यह एक ऐसी स्थिति है जिसने भारत में चुनावी प्रक्रिया को एक मज़ाक में बदल दिया है.”

उसी दिन अपने संपादकीय में इंकलाब ने कहा कि कांग्रेस फिलहाल सुरक्षित हो सकती है, लेकिन सुक्खू सरकार की मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं.

इसमें कहा गया, “अब ऐसी अटकलें हैं कि भाजपा देर-सबेर राज्य सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है.”


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लोकसभा चुनाव

आगामी आम चुनाव और विभिन्न राजनीतिक दलों की तैयारियों को भी महत्वपूर्ण कवरेज मिला.

सियासत का 27 फरवरी का संपादकीय राष्ट्रीय राजनीति में उत्तर प्रदेश के महत्व को समर्पित था. उत्तर प्रदेश, भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य, संसद में 80 सांसद भेजता है — जो भारत के किसी भी राज्य से सबसे अधिक है.

सियासत के संपादकीय में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि राज्य में सबसे अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी अक्सर केंद्र में सत्ता में आती है और यूपी की राजनीति की जटिलता का वर्णन करती है.

संपादकीय में कहा गया है कि जहां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों का ऐतिहासिक रूप से यूपी की राजनीति पर दबदबा रहा है, वहीं भाजपा ने सांप्रदायिक रणनीति के जरिए प्रभाव हासिल किया है.

सियासत ने कहा, “ऐसी धारणा है कि बसपा प्रमुख चुनावों में अन्य दलों के वोटों को हटाकर अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की सहायता कर रही है. इन पैंतरेबाज़ी को सपा और कांग्रेस को विफल करने के प्रयासों के रूप में देखा जा सकता है.”

दूसरी ओर, इंकलाब ने अपने संपादकीय में कहा कि यह सराहनीय है कि भाजपा ने अपने लिए 370 से अधिक सीटों और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के लिए 400 से अधिक सीटों का लक्ष्य रखा है, लेकिन यह जांच करना समझदारी होगी कि क्या उसके पास ये संख्याएं हैं.

संपादकीय में कहा गया है कि क्रिकेट के खेल की तरह चुनाव भी अप्रत्याशित हो सकते हैं और किसी भी समय बदल सकते हैं.

इसने कहा, “दक्षिण भारत में संभावनाएं लगभग नगण्य हैं जबकि पूर्वोत्तर भारत में मणिपुर हिंसा जैसी घटनाओं को लेकर असंतोष व्याप्त है. महाराष्ट्र में समीकरण बदलने की कोशिशें भी नुकसानदेह रही हैं. मध्य प्रदेश में सत्ताधारी पार्टी की आलोचना गंभीर रही है और अगर वही पार्टी एक बार फिर सत्ता में हो तो लोगों को कैसा लगेगा, इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है.”

इस बीच, कांग्रेस की भारत जोड़ो न्याय यात्रा को जबरदस्त प्रतिक्रिया मिल रही है.

संपादकीय में कहा गया, “जब भी चुनावों की घोषणा की जाती है, तो इसे लोकतंत्र को कमज़ोर करने के बजाय मजबूत करना चाहिए. इस संबंध में भारत के निर्वाचन आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण है.”

इंकलाब के संपादकीय में कहा गया है कि आयोग को “अपनी गरिमा बनाए रखनी चाहिए और सभी राजनीतिक दलों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए.”

इसमें कहा गया है, “बिना सबूत के किसी भी राजनीतिक दल के खिलाफ कार्रवाई करना न केवल उस संस्था के लिए हानिकारक है, बल्कि लोकतंत्र पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ता है.”

25 फरवरी को सहारा के संपादकीय में कांग्रेस और सपा के बीच सीट बंटवारे की व्यवस्था पर टिप्पणी की गई. इस समझौते के मुताबिक, यूपी की 80 सीटों में से 63 सीटों पर सपा चुनाव लड़ेगी, जबकि बाकी सीटें कांग्रेस के खाते में जाएंगी.

इसमें कहा गया, “कांग्रेस के भीतर असंतोष की खबरें थीं, खासकर फर्रुखाबाद सीट को लेकर और समाजवादी पार्टी को कांग्रेस की प्राथमिकता को समायोजित करने के लिए वाराणसी से अपना उम्मीदवार वापस लेना पड़ा.”

जेल में गर्भवती महिलाएं और अभद्र भाषा

अन्य मुद्दे जैसे कि पश्चिम बंगाल की जेलों में महिला कैदियों के गर्भवती होने के बारे में कलकत्ता हाई कोर्ट की चिंता और आगामी चुनाव के आलोक में अभद्र भाषा का मुद्दा भी इस हफ्ते उर्दू प्रेस में शामिल किया गया था.

1 मार्च को सहारा के एक संपादकीय में बंगाल की जेलों में गर्भवती महिलाओं की बढ़ती संख्या के बारे में बात की गई थी. इसके लिए संपादकीय में कलकत्ता हाई कोर्ट में दायर एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया है, जिसमें दावा किया गया है कि बंगाल की जेलों के कैदियों से पैदा हुए 196 बच्चे वर्तमान में राज्य के विभिन्न सुधार गृहों में हैं.

संपादकीय में कहा गया, “यह जेल प्रणाली के भीतर प्रणालीगत चुनौतियों को रेखांकित करता है, राज्य की 60 जेलों में लगभग 26,000 कैदी हैं, जिनमें कमज़ोर महिलाएं भी शामिल हैं. निष्कर्ष जेल में बंद व्यक्तियों, विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं और उनके बच्चों की सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित करने के लिए सुधारों की तत्काल आवश्यकता पर जोर देते हैं.”

नफरत फैलाने वाले भाषण और सांप्रदायिकता के बारे में सहारा का 29 फरवरी का संपादकीय आगामी आम चुनाव के मद्देनज़र आया. इसमें अखबार ने अक्टूबर 2022 में SC के निर्देश पर प्रकाश डाला, जिसमें राज्यों से नफरत भरे भाषण और सांप्रदायिकता के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने का आग्रह किया गया था.

सहारा के संपादकीय में पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना के संदेशखाली में हुए घटनाक्रम का ज़िक्र करते हुए कहा गया, “अदालत ने सरकारों को ऐसी घटनाओं के लिए तुरंत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था. इसके बावजूद, घृणास्पद भाषण की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता विभाजनकारी बयानबाजी में लगे हुए हैं. पश्चिम बंगाल में, भाजपा नेता सक्रिय रूप से नफरत को बढ़ावा दे रहे हैं, यहां तक कि उनकी पहचान के आधार पर व्यक्तियों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियों का भी सहारा ले रहे हैं.”

(संपादन : फाल्गुनी शर्मा)

(उर्दूस्कोप को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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