Friday, 21 January, 2022
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कृषि कानून रद्द, तृणमूल का धरना, सीएए और अनुच्छेद 370 —कौन-सी घटनाएं इस सप्ताह उर्दू प्रेस की सुर्ख़ियों में रहींं

दिप्रिंट अपने इस राउंड अप में बता रहा है कि पूरे हफ्ते के दौरान उर्दू मीडिया ने विभिन्न खबरों को कैसे कवर किया और उनमें से किस घटना को संपादकीय में जगह दी.

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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को रद्द करने का ऐलान और नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) और अनुच्छेद 370 पर बहस फिर शुरू हो जाना इस पूरे हफ्ते उर्दू अखबारों की सुर्खियों में रहा.

इस सप्ताह उर्दूस्कोप में दिप्रिंट आपको बता रहा है कि इन अखबारों ने हर दिन होने वाली ऐसी घटनाओं को कैसे छापा और इसमें से कुछ पर उनका संपादकीय रुख कैसा रहा.

कृषि कानून

प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से पिछले शुक्रवार को कृषि कानूनों को रद्द करने की घोषणा किए जाने के बाद रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा ने बताया कि अपने दो कार्यकालों में यह केवल दूसरी बार है जब नरेंद्र मोदी सरकार ने कोई विधेयक वापस ले लिया है, पहला भूमि अधिग्रहण अध्यादेश था.

20 नवंबर को ‘जय किसान’ शीर्षक से अपने संपादकीय में इंकलाब ने कानून निरस्त होने को न केवल प्रतिबद्ध किसानों बल्कि लोकतंत्र की भी जीत करार दिया. सहारा ने भी उसी दिन अपने संपादकीय में इसी तरह की राय जताई लेकिन उसने उन 700 लोगों जिन्होंने इस पूरे किसान आंदोलन के दौरान अपनी जान गंवा दी थी उनके साथ-साथ पिछले एक साल में हुए आर्थिक नुकसान पर भी बात की. इंकलाब ने यह भी लिखा कि अगर उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले नहीं होते तो शायद सरकार इस मामले में गेंद कोर्ट के पाले में डालना पसंद करती.

इसी मुद्दे पर 21 नवंबर को एक अन्य संपादकीय में इंकलाब ने लिखा कि प्रतिबद्ध किसान ‘अहंकारी सरकार’ को झुकाने में कामयाब रहे, जो कभी भी विपक्षी दलों या सड़क पर विरोध-प्रदर्शन की परवाह ही नहीं करती थी. इसमें यह भी कहा गया कि जिस तरह किसान आंदोलन चलाया गया—जिसमें एक केंद्रीय समिति के तहत सभी किसान संगठनों के नेता शामिल थे—वो मुस्लिम संगठनों के लिए एक सबक है. संपादकीय में मुस्लिमों से कहा गया कि वे अपने मुद्दों को उठाने के लिए इसी तरह का मॉडल अपनाएं.

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सभी अखबारों ने पूरे सप्ताह तीनों कृषि कानूनों से संबंधित घटनाक्रम को तरजीह देना जारी रखा जिसमें प्रदर्शन जारी रखने की किसानों की घोषणा से लेकर कानून निरस्त करने की मोदी कैबिनेट की मंजूरी तक शामिल है.

23 नवंबर को एक अन्य संपादकीय में इंकलाब ने लिखा कि ‘जब-जब आंदोलन के धुर समर्थकों को भी इसके सफल रहने पर संदेह होने लगा था’ तब मजबूती से आंदोलन का नेतृत्व करने और ‘हवा का रुख मोड़ देने’ के लिए किसान नेता राकेश टिकैत की सराहना की जानी चाहिए.

अनुच्छेद 370, सीएए

कृषि कानूनों पर सरकार के कदम पीछे खींचने के लगातार चर्चाओं में रहने के बीच सीएए को निरस्त करने और अनुच्छेद 370 की बहाली की मांगों को भी फिर से सुर्खियों में जगह मिली.

20 नवंबर को अपने पहले पन्ने में सियासत ने अनुच्छेद 370 की बहाली पर जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की ‘उम्मीदों’ पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसे अगस्त 2019 में निरस्त कर दिया गया था.

25 नवंबर को पहले पन्ने पर छपी एक अन्य रिपोर्ट में सियासत ने मुफ्ती के बयान को आगे बढ़ाया कि अनुच्छेद 370 की बहाली सुनिश्चित करने के लिए संसद में एकजुटता बेहद अहम होगी.

वहीं, इंकलाब ने उसी दिन अपनी प्रमुख रिपोर्ट में लिखा कि किसानों के आंदोलन और सीएए के खिलाफ शाहीन बाग के प्रदर्शन (दिसंबर 2019-मार्च 2020) के बीच कई समानताएं रही हैं. इंकलाब और रोजनामा राष्ट्रीय सहारा दोनों ने सीएए को निरस्त करने पर प्रमुख मुस्लिम सामाजिक-धार्मिक संगठनों में से एक जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी के बयान को पहले पन्ने पर प्रमुखता से जगह दी.


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तृणमूल कांग्रेस का धरना

त्रिपुरा में पार्टी नेताओं पर कथित हमलों के खिलाफ सोमवार को नॉर्थ ब्लॉक में तृणमूल कांग्रेस की तरफ से दिया गया धरना भी उर्दू दैनिकों में पहले पन्ने की सुर्खियों में रहा.

इंकलाब ने जहां धरने और इसके बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ पश्चिम बंगाल के सांसदों की बैठक की खबर को प्रमुखता से छापा. वहीं, सियासत ने पहले पेज पर अपनी खबर का शीर्षक शाह द्वारा सांसदों को इस मामले पर त्रिपुरा सरकार से रिपोर्ट तलब करने का आश्वासन देने पर केंद्रित था.

ममता बनर्जी की राष्ट्रीय राजधानी की तीन दिवसीय यात्रा और तृणमूल में शामिल होने वाले वरिष्ठ नेताओं से जुड़ी खबरों को उर्दू मीडिया में प्रमुखता से छापा गया. कांग्रेस नेताओं कीर्ति आजाद और अशोक तंवर और जदयू के पूर्व सांसद पवन वर्मा के तृणमूल में शामिल होने के एक दिन बाद बुधवार को रोजनामा राष्ट्रीय सहारा में यह खबर लीड के तौर पर प्रकाशित हुई.

इस अखबार ने उत्तर प्रदेश में रालोद और समाजवादी पार्टी के बीच सीट बंटवारे को लेकर ‘सहमति’ पर भी एक छोटी-सी रिपोर्ट छपी. इस खबर ने इंकलाब के पहले पन्ने पर भी जगह बनाई.

एआईएमपीएलबी ने किया सौहार्द बनाए रखने का आह्वान

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के उपाध्यक्ष चुने जाने के बाद मौलाना अरशद मदनी ने प्रतिष्ठित मदरसों से आह्वान किया कि कुरान और पैगंबर मुहम्मद साहब के शांति के संदेशों के बारे में जानकारी देने के लिए गैर-मुस्लिम स्थानीय लोगों को अपने कार्यक्रमों में आमंत्रित करें.

मदनी के बयान को इंकलाब ने 25 नवंबर को अपने पहले पन्ने पर छापा था. इसने इस बात का समर्थन करने वाले विभिन्न समुदाय के धार्मिक नेताओं के बयानों पर शुक्रवार को पहले पन्ने पर एक और खबर छापी.

25 नवंबर को सियासत ने मदनी के इस बयान को प्रमुखता से लगाया कि उत्तर भारत में नफरत ज्यादा है. गुरुग्राम में नमाज स्थलों को लेकर विवाद पर अपने संपादकीय में इंकलाब ने इसके लिए जिला प्रशासन की तरफ से जानबूझकर अपनाई जा रही उदासीनता को जिम्मेदार ठहराया और इस तरह की घटनाओं को सामान्य रूप से चुनावी लाभ से जुड़ा बताया. साथ ही उन नागरिकों की सराहना भी की जो नमाज के लिए अपनी जगह देने की पेशकश के साथ आगे आए थे.

कानपुर में हुई बैठक जिसमें मदनी को एआईएमपीएलबी का उपाध्यक्ष चुना गया था उसमें संगठन ने सरकारों और अदालतों से मजहबी मसलों से दूर रहने का आग्रह किया. साथ ही समान नागरिक संहिता का विरोध किया और बेअदबी के खिलाफ कानून बनाने की मांग की. यह खबर 22 नवंबर को अधिकांश उर्दू अखबारों के पहले पन्ने पर रही.

(उर्दूस्कोप को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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