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Friday, 19 July, 2024
होमदेशअमरावती हिंसा, दिल्ली का प्रदूषण, कंगना की टिप्पणी- इस हफ्ते किन मुद्दों पर थीं उर्दू प्रेस की निगाहें

अमरावती हिंसा, दिल्ली का प्रदूषण, कंगना की टिप्पणी- इस हफ्ते किन मुद्दों पर थीं उर्दू प्रेस की निगाहें

पेश है दिप्रिंट का इस बारे में दिया राउंड-अप कि कैसे उर्दू मीडिया ने पिछले हफ्ते के दौरान विभिन्न घटनाओं के सम्बंधित ख़बरें प्रकाशित कीं, और कैसे इन मसलों पर अपनी संपादकीय टिप्पणियां कीं.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट द्वारा वायु प्रदूषण के मामले पर दिल्ली सरकार की खिंचाई, त्रिपुरा हिंसा मामले में कार्यवाही जहां दो महिला पत्रकारों को गिरफ्तार कर लिया गया गया था, और बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत की ‘आजादी’ पर विवादस्पद टिप्पणी- ये कुछ प्रमुख मुद्दे थे जिन पर भारत के उर्दू प्रेस ने इस हफ्ते प्रमुखता से ख़बरें छापीं.

उर्दू के अखबारों ने इन रोजाना के समाचार संबंधित घटनाओं पर क्या कुछ लिखा, और इन मामलों पर छपे उनके संपादकीय का क्या मतलब है, इस बारे में दिप्रिंट एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करता है-

भूख से होने वाली मौतों पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

सामुदायिक रसोई के मामले में सरकार पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गयी कठोर टिप्पणीं एक ऐसा मुद्दा था जिसे उर्दू प्रेस लगातार अपने पहले पन्नों पर उजागर करता रहा. इंकलाब और सियासत दोनों ने 17 नवंबर को इस मुद्दे पर अपने पहले पन्नों पर जगह दी. उसी दिन एक संपादकीय में, इंकलाब ने सर्वोच्च अदालत की टिप्पणियों पर प्रकाश डालते हुए यह दलील दी कि यह समस्या खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक योजना के महत्व को उजागर करती है. इसने यह भी लिखा है कि खाद्यान्न उत्पादन में लगातार और तीव्र वृद्धि के बावजूद पिछली कई सरकारों की उदासीनता के कारण भुखमरी से यह मौतें हुई हैं.

अगले दिन, इसने फिर लिखा कि भूख, अर्थव्यवस्था की निराशाजनक स्थिति और बढ़ती बेरोजगारी का एक सूचक है. इसने कहा कि सरकार का यह रवैया कि जब बड़े व्यवसाय अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो उनकी मेहनत का फल सभी को मिलता है, अतीत में कई बार गलत साबित हुआ है, और इस बार भी इसका कोई अलग नतीजा नहीं निकलने वाला.

दिल्ली का प्रदूषण

दिल्ली में छाए प्रदूषण का मसला और इस पर लगाम लगाने के लिए लॉकडाउन लगाए जाने की संभावना लगभग पूरे हफ्ते उर्दू दैनिकों के पहले पन्ने पर बनी रही. उन्होंने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे हर घटनाक्रम पर भी खबरें छापीं.

17 नवंबर को छपे एक संपादकीय में, रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा ने दिल्ली सरकार द्वारा अपने कर्मचारियों के लिए घर से काम करने की योजना लागू करने के दिल्ली सरकार के फैसले और साथ ही निर्माण कार्य पर बंदिश लगाने की इसकी पहल का इस्तकबाल किया, और कहा कि भले ही ये कदम थोड़ी देर से उठाये गए हों पर यक़ीनन इनसे वायु प्रदूषण के स्तर को कम करने में मदद मिलेगी.

इस बीच, 18 नवंबर को इंकलाब की प्रमुख खबर में तीन मामलों – त्रिपुरा हिंसा, लखीमपुर खीरी घटना और दिल्ली प्रदूषण में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही – का विवरण छपा था.


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अमरावती और त्रिपुरा हिंसा

हालांकि, त्रिपुरा की घटनाओं पर रजा अकादमी द्वारा बुलाये गए बंद के बाद महाराष्ट्र में सांप्रदायिक रंगत के साथ ताजा झड़पें शुरू हो गयीं थीं, उर्दू अखबारों का ध्यान इन घटनाओं और इनके व्यापक प्रभाव दोनों पर बना रहा. 13 नवंबर को छपे एक संपादकीय में, रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा ने लिखा कि सामान्य रूप से सभी सरकारों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध के अधिकार को दबाने के लिए दमनकारी तरीकों को अपनाया है. इसने यह भी कहा कि अगर बांग्लादेश की घटनाओं के बाद त्रिपुरा पुलिस चौकस रहती तो राज्य में हुई हिंसा को रोका जा सकता था. संपादकीय में आगे कहा गया है कि इसके बजाय त्रिपुरा पुलिस ने राज्य में तनाव पैदा करने के लिए सांप्रदायिक तत्वों को अपनी तरफ से पूरी मंजूरी दे दी थी और अब यह उन लोगों को निशाना बना रही है जो बाकी दुनिया को जमीनी हालत की झलक दे रहे हैं.

अमरावती हिंसा की ख़बरें लगभग पूरे हफ्ते उर्दू अखबारों के पहले पन्ने पर बनीं रहीं. 16 नवंबर को इंकलाब ने इन दंगों के मामले में भाजपा नेता अनिल बोंडे की गिरफ्तारी पर एक खबर छापी. इस ख़बर में एक पुलिसकर्मी के हवाले से दावा किया गया था कि अमरावती हिंसा एक ‘बड़ी साजिश’ का हिस्सा थी. अखबार ने राकांपा नेता नवाब मलिक के उस बयान को भी छापा जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि अमरावती हिंसा भाजपा की साजिश का नतीजा है. इसके अगले ही दिन, इसने राकांपा प्रमुख शरद पवार की उस टिप्पणी पर एक खबर और छापी जिसमें कहा गया था कि अमरावती में फैले सांप्रदायिक तनाव को उत्तर प्रदेश के चुनावों को ध्यान में रखते हुए पैदा किया जा रहा है.

18 नवंबर को इंकलाब ने अमरावती हिंसा के सिलसिले में 14,673 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज होने पर एक ख़बर छापी.

यूपी में प्रियंका गांधी

उत्तर प्रदेश में महिलाओं पर केंद्रित नीतियों के बारे में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी द्वारा किये जा रहे ऐलानों को बहुत अधिक अहमियत नहीं दी जा रही है क्योंकि जमीन पर उनकी पार्टी के प्रति समर्थन बहुत कम है. फिर भी, उनकी गतिविधियां अक्सर उर्दू दैनिकों के पहले पन्नों में जगह बनाती रही हैं.

15 नवंबर को, सियासत ने अपने पहले पन्ने पर उनके उस ऐलान को जगह दी कि कांग्रेस राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव बिना किसी सहयोगी के लड़ेगी. 17 नवंबर को अखबार की प्रमुख रिपोर्ट कांग्रेस द्वारा यूपी में महिलाओं के लिए विधानसभा चुनाव में टिकटों का 40 प्रतिशत आरक्षित करने और प्रियंका की उस चित्रकूट रैली के बारे में थी, जहां प्रियंका ने महिलाओं से राजनीति में उनके हक़ की मांग करने की गुजारिश की थी. दूसरी अहम ख़बर गाजीपुर में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की रैली के बारे में छपी एक रिपोर्ट थी.

सीबीआई/ईडी निदेशकों के बारें में लाया गया अध्यादेश

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के शीर्ष अधिकारियों के कार्यकाल को बढ़ाने वाले हालिया अध्यादेशों और इसके खिलाफ विपक्ष की मुखालफत को भी उर्दू दैनिकों के सम्पादकीय पन्नों पर जगह मिली है. 15 नवंबर को छापे गए एक संपादकीय में, रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा ने कहा कि सरकारों के लिए इन महत्वपूर्ण एजेंसियों में अपने लोगों को शीर्ष पर रखना कुछ हद तक वाजिब तो है, मगर चिंता का सबब यह है कि उन्हीं एजेंसियों पर पक्षपातपूर्ण रुख रखने का आरोप लगाया जाता है और यह भी माना जा रहा है कि उनके द्वारा विपक्षी नेताओं को खास तौर पर निशाना बनाया जा रहा है.

कंगना रनौत और ‘आजादी’

भड़काऊ बयान देने की मशगूल बॉलीवुड अदाकारा कंगना रनौत ने पिछले दो हफ्तों में कई बार उर्दू दैनिकों के पहले पन्ने पर अपनी जगह बनाई है. ‘इतिहास पर शको-शुबहा बढ़ाने की कोशिशें’ शीर्षक वाले अपने 16 नवंबर के संपादकीय में इंकलाब ने यह तर्क रखा कि यह न केवल शिक्षित लोगों, बल्कि सरकार की भी जिम्मेदारी है कि जब भी इतिहास पर संदेह पैदा करने की कोई कोशिश की जाती है, तो वह इस पर तथ्यात्मक स्थिति के साथ बयान जारी करे. इसमें कहा गया है कि समय पर अनुशासनात्मक कार्रवाई किये बिना, इस तरह के बयान जारी करने की प्रवृत्ति कम नहीं होगी. 19 नवंबर को छपे एक अन्य संपादकीय में इंकलाब ने लिखा कि स्वतंत्रता सेनानियों और महात्मा गांधी के खिलाफ टिप्पणियों के लिए दंडात्मक कार्रवाई में की जा रही कोताही दूसरों को इसी तरह के अपराध करने के लिए प्रोत्साहित करती है.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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