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पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी वीरेंद्र सहवाग | फेसबुक
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वो कौन सा एक खिलाड़ी था जिसे सिलेक्टर खिलाना चाहते थे, बोर्ड के सचिव खिलाना चाहते थे, लेकिन चीफ़ सिलेक्टर नाम पर मंज़ूरी नहीं दे रहे थे. फिर कुछ ऐसी सूरत बनी कि उस खिलाड़ी को टीम में जगह मिल गई. हालांकि उसके सेलेक्शन से पहले मुख्य चीफ़ सिलेक्टर ने सारी ज़िम्मेदारी बोर्ड के सचिव पर डाल दी. चीफ़ सिलेक्टर ने साफ कह दिया कि अगर उस खिलाड़ी के चयन पर कोई बवाल होता है तो उसके ज़िम्मेदार वो नहीं होंगे. उन्होंने बोर्ड सचिव से उस खिलाड़ी को टीम में शामिल करने के लिए एक शर्त भी रखी, वो ये है कि बोर्ड सचिव मीडिया से कहेंगे कि उस खिलाड़ी के  सेलेक्शन के बारे में जब चीफ़ सिलेक्टर से बात करने की कोशिश की गई थी तो संपर्क नहीं हो पाया. कौन था वो खिलाड़ी, वो बोर्ड सचिव और चीफ़ सिलेक्टर , और टीम में आने के बाद उस खिलाड़ी ने मैदान में कैसा प्रदर्शन किया.

वो खिलाड़ी थे वीरेंद्र सहवाग. सिलेक्टर थे मदन लाल. चीफ़ सिलेक्टर  थे चंदू बोर्डे और उस वक्त बोर्ड के सचिव थे जयवंत लेले. ये किस्सा साल 2000 का है. यूं तो वीरेंद्र सहवाग का वनडे करियर 1999 में मोहाली में पाकिस्तान के खिलाफ़ शुरू हो चुका था लेकिन शुरूआत ऐसी थी कि उसका खामियाज़ा सहवाग को लंबे समय तक उठाना पड़ा. भारत की मेज़बानी में चल रहे पेप्सी कप में भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका की टीमें हिस्सा ले रही थीं. सहवाग को फाइनल से ठीक पहले वाले मैच में प्लेइंग 11 का हिस्सा बनाया गया. करियर के पहले मैच में क्रीज पर 5 मिनट बिताने और 2 गेंद खेलकर सिर्फ 1 रन बनाने के बाद सहवाग पवेलियन लौट गए थे. शोएब अख्तर ने उन्हें एलबीडब्लयू आउट किया था. इसके अलावा गेंदबाजी में भी उन्हें ज़बरदस्त आलोचना मिली थी. उन्होंने 3 ओवर में 35 रन लुटा दिए थे. इस मैच के बाद वीरेंद्र सहवाग टीम से ड्रॉप हो गए. भारतीय टीम पेप्सी कप का वो मैच हार गई. अगले मैच में भी जो कि टूर्नामेंट का फाइनल मैच था पाकिस्तान ने भारत को 123 रनों के बड़े अंतर से हरा दिया. इन दोनों मैचों में भारत की कप्तानी अजय जडेजा कर रहे थे.

वीरेंद्र सहवाग टीम से बाहर कर दिए गए. इसके बाद अगले करीब 20 महीने तक सेलेक्शन कमेटी की बैठक में जब भी उनका नाम आता, उसे तुरंत खारिज कर दिया जाता था. 1983 में भारत की विश्व कप विजेता टीम के सदस्य तेज़ गेंदबाज़ मदन लाल उस वक्त सिलेक्टर थे, उन्होंने लगभग हर मीटिंग में सहवाग के नाम का प्रस्ताव रखा, लेकिन चीफ़ सिलेक्टर  चंदू बोर्डे सहवाग के नाम पर तैयार ही नहीं होते थे. हालांकि उस दौरान वीरेंद्र सहवाग घरेलू क्रिकेट में लगातार रन बना रहे थे. निचले क्रम में बल्लेबाजी करने के बाद भी हर मैच में उनका औसत स्कोर 50 रनों के आस पास का था. फिर भी पहले अंतर्राष्ट्रीय मैच में उनके खराब प्रदर्शन की छाया से वो बाहर नहीं निकल पा रहे थे. ऐसे में मदन लाल को एक आइडिया आया. उन्हें पता था कि बोर्ड सचिव जयवंत लेले और चीफ़ सिलेक्टर चंदू बोर्डे अच्छे दोस्त हैं. 1981 में जब अंडर 19 टीम इंग्लैंड गई थी, तब चंदू बोर्डे और जयवंत लेले टीम के साथ बतौर कोच और मैनेजर गए थे. इसके जयवंत लेले और चंदू बोर्डे ने साथ साथ पढ़ाई भी की थी. ये दोस्ती इतनी गहरी थी कि चंदू बोर्डे जयवंत लेले को पार्टनर बुलाते थे.

एक दिन मदन लाल ने जयवंत लेले से मिलने का समय मांगा और फिर से वीरेंद्र सहवाग के नाम की सिफारिश की. मदन लाल ने यहां तक कह दिया कि वीरेंद्र सहवाग जैसा खिलाड़ी कोई है ही नहीं और अगर जयवंत लेले उनकी सिफारिश करते थे तो उन्हें कभी पछतावा नहीं होगा. जयवंत लेले ने कहा भी कि वो तो सिर्फ बोर्ड के सचिव हैं और टीम के चयन से उनका कोई लेना-देना नहीं है. लेकिन मदन लाल ने उन्हें समझाया कि अगर चंदू बोर्डे किसी की बात मानेंगे तो उन्हीं की, इसलिए जब वो चयन समिति की बैठक में वीरेंद्र सहवाग का नाम लें तो जयवंत लेले को उनका साथ देना होगा. इतनी कवायद करने के बाद भी अगली 4-5 मीटिंग ऐसे ही निकल गईं. मदन लाल ने हमेशा की तरह सहवाग के नाम का प्रस्ताव रखा, लेकिन सहवाग के नाम पर चर्चा तक नहीं हुई. इसकी एक वजह ये थी कि मदन लाल के अलावा बाकी के सिलेक्टर वीरेंद्र सहवाग के नाम से ज़्यादा परिचित नहीं थे.

इसके बाद ज़िम्बाब्वे की टीम को भारत के दौरे पर आना था. मदन लाल जयवंत लेले के पीछे पड़ गए. उन्होंने कहा कि सहवाग को टीम में शामिल करने के लिए इससे अच्छा मौका नहीं हो सकता है. आखिरकार जयवंत लेले ने चंदू बोर्डे से बात की. जयवंत लेले ने चंदू बोर्डे को समझाया कि मदन लाल क्रिकेट का बड़ा नाम है, वो खुद एक सुलझे हुए खिलाड़ी रहे हैं अगर वो बार बार किसी एक खिलाड़ी के लिए कह रहे हैं तो उसे एक और मौका देना चाहिए. लेले ने कहा कि क्या जाता है सहवाग को 15 खिलाड़ियों की टीम में शामिल कर लेना चाहिए. अगली मीटिंग में मदन लाल ने फिर सहवाग का नाम लिया. चंदू बोर्डे ने कहा कि चूंकि हम ज़िम्बाब्वे के खिलाफ खेल रहे हैं, इसलिए सहवाग को 15 खिलाड़ियों में शामिल कर लेते हैं. सहवाग को 15वें खिलाड़ी के तौर पर टीम में शामिल कर लिया गया. इसके बाद सहवाग को पहले और दूसरे मैच के प्लेइंग 11 में जगह नहीं मिली. अगला मैच राजकोट में था. राजकोट वनडे से पहले जयवंत लेले के पास आईसीसी चीफ एक्सीक्यूटिव का फोन आया, उन्होंने फोन पर कहा कि जयवंत तुम्हारे लिए बुरी खबर है. कल के मैच में आपका कप्तान नहीं खेल सकता है. जयवंत लेले ने जब इसकी वजह पूछी तो पता चला कि स्लो ओवर रेट की वजह से सौरव गांगुली पर आईसीसी ने 1 मैच का प्रतिबंध लगा दिया है. जयवंत लेले ने इसकी जानकारी सौरव गांगुली को थी, इसके बाद उन्होंने ही राहुल द्रविड़ को इस बात की जानकारी भी दी कि अगले मैच में गांगुली की गैर मौजूदगी में वो टीम की कमान संभालेंगे. राहुल ने तुरंत सवाल किया कि सौरव की जगह कौन सा खिलाड़ी प्लेइंग 11 में होगा. जयवंत लेले ने उस खिलाड़ी का नाम बता दिया- मज़े की बात ये है कि वो खिलाड़ी वीरेंद्र सहवाग नहीं थे.

इसके बाद जयवंत लेले मदन लाल के पास गए. उन्होंने मदन लाल से कहा कि वीरेंद्र सहवाग को प्लेइंग 11 में खिलाने के लिए इससे अच्छा मौका नहीं हो सकता है. उस वक्त तक मीडिया को सौरव गांगुली के ‘रिप्लेसमेंट’ की जानकारी नहीं दी गई थी. जयवंत लेले ने मदन लाल से कहा कि वो तुरंत चंदू बोर्डे से बात करें और उनको सहवाग के नाम पर राजी करें. मदन लाल ने चंदू बोर्डे को फोन किया, लेकिन चंदू बोर्डे ने सहवाग का नाम सुनते ही मना कर दिया. उन्होंने साफ कह दिया कि किसी भी सूरत में सहवाग को प्लेइंग 11 का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता है. मदन लाल ने इस बात की जानकारी जयवंत लेले को दी, जयवंत लेले आखिरकार फिर से चंदू बोर्डे से बात करने को तैयार हो गए. जयवंत लेले ने चंदू बोर्डे को फोन किया और समझाया कि दो मैच भारतीय टीम पहले ही जीत चुकी है, सहवाग को एक मौका देने में कोई हर्ज नहीं है. आखिरकार चंदू बोर्डे मान गए लेकिन उन्होंने जयवंत लेले के सामने एक शर्त रखी. बोर्डे ने लेले से कहा कि सहवाग को प्लेइंग 11 में शामिल करने की ज़िम्मेदारी उन्हें लेनी होगी. अगर मीडिया में कोई उसने पूछता है तो उन्हें कहना होगा कि सौरव गांगुली के रीप्लेसमेंट के लिए जब उन्होंने चंदू बोर्डे को फोन किया तो उनसे बात नहीं हो पाई ऐसे में एक सिलेक्टर मदन लाल से बातचीत करने के बाद सहवाग को प्लेइंग 11 में शामिल करने का फैसला किया गया. जयवंत लेले ये ‘रिस्क’ उठाने के लिए तैयार हो गए.

शिवेंद्र कुमार सिंह की किताब का अंश (साभार : पेंगुइन)


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