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Tuesday, 23 April, 2024
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भारत के डिस्को किंग बप्पी लाहिड़ी, जिनके गोल्ड पर माइकल जैक्सन भी हो गए थे फिदा

लाहिड़ी हमेशा से सबसे अलग थे और स्टाइलिश तरीके से तैयार होना उन्हें अलग करता था. उनके युग का कोई दूसरा गायक ऐसा नजर नहीं आता जिसका फैशन सेंस इतना बोल्ड या ग्लोबल रहा हो.

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मिथुन चक्रबर्ती अगर 80 के दशक के स्टार थे, तो बप्पी लाहिड़ी उनकी आवाज़ और उनके डांसिंग स्टेप्स के पीछे का संगीत थे. भारत के ‘डिस्को किंग’– को लोग प्यार से बप्पी दा पुकारते है, जिनके ‘जिमी-जिमी’, ‘आई एम ए डिस्को डांसर’, और ‘रात बाकी बात बाकी’ जैसे सुपरहिट गानों को सुनते ही कदम खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं.

अपने सभी तड़क-भड़क के बावजूद, वे काम में डूबे रहने वाले व्यक्ति थे और उन्होंने अपने लगभग 50 साल लंबे करियर में 500 से अधिक फिल्मों में काम किया और 5,000 से अधिक गाने बनाए.

साल 1986 में बप्पी दा ने लगभग 33 फिल्मों में काम किया- 180 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए- जिसके लिए उनका नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया. रेडिफ को दिए एक इंटरव्यू में सिंगर आदित्य नारायण ने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि जिस दिन भगवान ने उन्हें बुलाया था, उस दिन तक वह धुन बना रहे थे.’’

15 फरवरी, 2022 को इस दुनिया को अलविदा कहने से कुछ महीने पहले उन्होंने बागी-3 (2020) के लिए ‘भनकास’ गीत में अपनी आवाज़ से लोगों को मदहोश किया था. इस समय वे 69 वर्ष के थे.

लाहिड़ी का मानना था कि फिल्में चलें या न चलें बप्पी दा के गाने चलते रहेंगे. उनकी पहली पुण्यतिथि पर दिप्रिंट उनके संगीतमय और सिनेमाई सफर पर एक नज़र डाल रहा है.

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समय के सीमा से परे

उनके संगीत की लंबी उम्र का श्रेय यह है कि लाहिड़ी के गाने बॉलीवुड में सबसे ज्यादा रीमिक्स किए गए, जिसमें अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर:1’ का गीत ‘कसम पैदा करने वाले की’, आयुष्मान खुराना की समलैंगिक रोमांटिक मूवी ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ का गीत ‘अरे प्यार कर ले’ से लेकर आलिया भट्ट और वरुण धवन अभिनीत ‘बदरी की दुल्हनिया’ का ‘तम्मा-तम्मा अगैन’ इसके उदाहरण हैं.

संगीत जगत के गोल्डन मैन ने केवल बुजुर्गों को ही नहीं बल्कि, युवाओं को भी अपना दीवाना बनाया. बप्पी दा ने 70 से 90 के दशक के दौरान भारतीय सिनेमा में संश्लेषित डिस्को संगीत का जो बीड़ा उठाया उसे 2000 के दशक में ‘टैक्सी नंबर 9211’ (2006) से ‘बंबई नगरिया’ और ‘द डर्टी पिक्चर’ से ‘ऊह ला ला’ (2011) के अलावा, ‘गुंडे’ के ‘तूने मारी एंट्रीयां’ (2014) तक कईं हिट्स के साथ जारी रखा.

उन्होंने फिल्म कंपेनियन की पत्रकार अनुपमा चोपड़ा को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, ‘‘1976 के गीतों पर 2019 में भी बच्चे डांस करते हैं, जबकि माना जाता है कि उन्हें पुराने गाने अच्छे नहीं लगते और मेरे 25-30 साल पुराने गीत आज भी रीमिक्स होते हैं.’’

बप्पी दा उन गायकों में शुमार थे, जिन्होंने 1970 और 1980 के दशक में किशोर और आर.डी.बर्मन से लेकर 2010 में अरिजीत सिंह और यो यो हन्नी सिंह के दौर में भी अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा. उन्होंने चोपड़ा से कहा, ‘‘आजकल लोग रैप बनाते हैं…मैंने यह सिलसिला 1987 में ‘जहां चार यार मिल जाए’ से किया था.’’

उनका गीत ‘जिम्मी जिम्मी आ जा, आ जा’, जिसे उन्होंने ‘डिस्को डांसर’ (1982) के लिए कंपोज़ किया था, 45 से अधिक विदेशी भाषाओं में डब किया गया. हाल ही में, 2022 में यह देश में कोविड-19 के मामलों में जबरदस्त उछाल के बीच, सख्त प्रोटोकॉल और बार-बार लगाए जाने वाले राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के खिलाफ चीन में यह विरोध एंथम बन गया.

आवश्यक वस्तुओं की कमी से गुस्साए निवासियों ने हाथ में खाली बर्तन लेकर इस गाने पर चीन के टिकटॉक प्लेटफॉर्म ‘दो यूयिन’ पर वीडियो बनाए थे- जो खूब वायरल हुए. दरअसल, ‘जिमी-जिमी’ का मंदारिन में अर्थ ‘जी मी, जी मी’ या ‘मुझे चावल दो, मुझे चावल दो’ होता है.

बप्पी दा ने भले ही डिस्को को लोकप्रिय बनाया हो, लेकिन वे इससे बंधे नहीं थे- ‘चलते चलते’, ‘किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है’ और ‘ऐतबार’, ‘आवाज़ दी है’ के साथ वे अपनी शास्त्रीय रचनाओं और गज़लों के लिए भी जाने जाते थे.

हर दौर का बादशाह

आलोकेश अपरेश लाहिड़ी का जन्म 27 नवंबर 1952 को कलकत्ता के संगीतकार अपरेश और बांसुरी लाहिड़ी के घर हुआ था. अपने गानों से लोगों को झूमने को मज़बूर करने वाले गोल्डन मैन ने माता-पिता के संरक्षण में महज़ तीन साल की उम्र से ही तबला बजाना शुरू किया और 11 साल की उम्र में पहली धुन बनाई थी. दिलचस्प बात यह है कि लाहिड़ी ने महान संगीतकार और उनके परिवार की करीबी लता मंगेशकर के कहने पर कथित तौर पर तबला वादक समता प्रसाद को अपना गुरु बनाया था.

लाहिड़ी बचपन से ही कई इंस्ट्रूमेंट्स बजाते थे- तबला, पियानो, ड्रम, गिटार, सेक्सोफोन और ढोलक बजाने में उन्हें महारथ हासिल थी.

बचपन में वे गायक एल्विस प्रेस्ली की तेजतर्रार शैली से प्रभावित थे, जो बाद में उनके जुदा अंदाज़ में दिखाई देता था. सोने के मोटे-मोटे हार, उसमें लगा बड़ा बड़ा लॉकेट और चमकीले कपड़े लाहिड़ी के व्यक्तित्व का उतना ही अभिन्न हिस्सा थे जितनी कि उनकी रचनाएं और गीत.

उन्होंने एएनआई से कहा था, ‘‘मैं प्रेस्ली का बहुत बड़ा फैन था. मैं सोचता था कि अगर मैं किसी दिन सफल हो गया तो अपनी एक अलग इमेज बनाऊंगा. भगवान की कृपा से मैं इसे सोने के साथ कर सका. पहले लोग इसे सिर्फ दिखावा करने का तरीका समझते थे, लेकिन यह वैसा नहीं है. सोना मेरे लिए लकी है.’’

जनसत्ता अखबार के कोलकाता एडिशन से रिटायर्ड पत्रकार जय नारायण प्रसाद जिन्होंने चार बार गायक-संगीतकार का इंटरव्यू किया, बप्पी दा के गोल्ड के प्रति प्रेम को याद करते हुए उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “बप्पी लाहिड़ी हमेशा 754 ग्राम सोने से बने आभूषण पहनते थे-इनमें कंगन, अंगूठियां, चैन और पेंडेंट तो उनके शरीर पर होता ही होता था.”

उनके सोने की आभा ऐसी थी कि पॉप आइकन माइकल जैक्सन भी इससे बच नहीं पाए. 1996 में मुंबई में लाहिड़ी से मुलाकात के दौरान, जैक्सन उनके सोने के गणेश लॉकेट से आकर्षित हुए, लेकिन लाहिड़ी को वो लॉकेट बहुत प्यारा था  इसलिए उन्होंने वो लॉकेट जैक्सन को गिफ्ट नहीं किया.

उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया था, “उसके (माइकल) पास सब कुछ है; मेरे पास केवल यही सोना है जो मेरे लिए भाग्यशाली है.”


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कामयाबी का दौर

अपने अनोखे अंदाज़ से सबको अपना फैन बनाने वाले लाहिड़ी ने बंगाली फिल्म ‘दादू’ (1972) से संगीत की दुनिया में अपना करियर शुरू किया था, जहां लता मंगेशकर ने उनकी कंपोजिशन को सुर दिया था. पहली बॉलीवुड फिल्म जिसके लिए उन्होंने संगीत तैयार किया वह ‘नन्हा शिकारी’ (1973) थी. उनका पहला हिंदी गाना ‘तू ही मेरा चंदा’, थी जिसे मुकेश ने गाया था.

ताहिर हुसैन को अपना ‘‘सांता क्लॉज’’ मानने वाले गोल्डन मैन के सुर को फिल्म ज़ख्मी (1975) से पंख लगने शुरू हुए, जिसमें सुनील दत्त, आशा पारेख, रीना रॉय और राकेश रोशन अभिनीत, ‘आओ तुम्हें चांद पे ले जाये’, ‘जलता है जिया मेरा भीगी भीगी रात में’ जैसे गाने लोकप्रिय हुए, लेकिन आज भी ‘जख्मी दिलों का बदला’ होली गीतों में विशेष स्थान रखता है. इसके बाद फिल्म ‘चलते-चलते’, ‘सुरक्षा’, ‘कभी अलविदा न कहना’ से उन्हें और प्रसिद्धी मिली और उन्होंने ‘‘डिस्को किंग’’ का खिताब हासिल किया.

उषा उथुप से लेकर आशा भोसले और मोहम्मद रफी तक, लाहिड़ी ने अमिताभ बच्चन की ‘नमक हलाल’ (1982) जैसी बड़े बजट की फिल्मों के लिए हिट संगीत देते हुए बॉलीवुड की संगीत बिरादरी के जाने-माने लोगों के साथ काम किया. प्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित यह फिल्म उनके करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में शुमार की जाती है. इसमें बप्पी दा के मामा किशोर कुमार ने ‘पग घुंघरू’ गीत को गाया था.

अपने करियर के दौरान, उन्होंने – ‘यार बिना चैन कहां रे’, ‘कलियों का चमन’, ‘दे दे प्यार दे’, ‘जवानी जानेमन’ ,‘मुझे नौलखा मंगा दे’ जैसे सुपरहिट गाने बनाए. ‘शराबी’, ‘नौकर बीवी का’ , ‘नया कदम’ , ‘मास्टरजी’ , ‘बेवफाई’ , ‘मकसद’ ‘सुराग’ , ‘इंसाफ मैं करूंगा’ , ‘डांस डांस’, ‘कमांडो’, ‘साहेब’, ‘अधिकार’, ‘आज का MLA’, ‘राम अवतार’ जैसी फिल्मों में अपनी आवाज़ से लोगों को दीवाना बनाया है.

बब्बर सुभाष द्वारा निर्देशित और चक्रवर्ती द्वारा अभिनीत ‘डिस्को डांसर’ फिल्म में बप्पी दा के संगीत ने बॉलीवुड में फ्रीफॉर्म डांसिंग का एक नया रूप पेश किया. उन्होंने अभिनेता से नेता बने मिथुन चक्रबर्ती के साथ ‘प्रेम प्रतिज्ञा’, ‘वारदत’, ‘सुरक्षा’, ‘गुरु’, ‘कसम पैदा करने वाले की’ और ‘कमांडो’ में साथ काम किया.

जय नारायण ने बताया, ‘‘लाहिड़ी जब भी कलकत्ता में किसी प्रोग्राम में आते थे, तो युवा ‌वर्ग उन्हें देखने के लिए टूट पड़ता था. मैंने ‌बप्पी दा का वह दौर कलकत्ता में देखा है.’’

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, ‘‘लाहिड़ी ने नसीरुद्दीन शाह और शर्मिला टैगोर अभिनीत एक और बांग्ला की उल्लेखनीय फिल्म ‘प्रतिदान’ (1983) में भी संगीत दिया था. इस बांग्ला फिल्म का एक गीत ‘मंगलदीप जले’ आज भी बंगाल के हरेक घर में सुना जाता है. प्रभात राय के निर्देशन में बनी यह फिल्म अब भी संपूर्ण बंगाल में टेलीविजन पर जब दिखाई जाती है, तो दर्शक उसे देखना नहीं भूलते.’’

बप्पी दा के गाने केवल हिंदी ही नहीं, तमिल, तेलुगु, बंगाली,कन्नड़, गुजराती, अंग्रेज़ी समेत कई अन्य भाषाओं में प्रसिद्ध हुए.

लाहिड़ी ने न केवल भारत में, बल्कि हॉलीवुड में भी ख्याति अर्जित की. उन्होंने एनिमेटेड डिज्नी फैंटेसी फिल्म ‘मोआना’ (2016) के एक गीत ‘शाइनी’ (जिसे शोना कहा जाता है) के हिंदी संस्करण की रचना की. यहां तक कि उन्होंने हिंदी संस्करण में तमातोआ (मोआना में एक पात्र) को अपनी आवाज़ दी थी. उनके क्लासिक गीत ‘झूम झूम- झूम बाबा’ जिसे उन्होंने ‘कसम पैदा करने वाले की’ (1984) के लिए तैयार किया था मार्वल स्टूडियो के ‘गार्डियंस ऑफ द गैलेक्सी वॉल्यूम’ (2017) के हिंदी प्रचार क्लिप में दिखाया गया था.

राजनीति

हालांकि, सुरों के सरताज़ ने पोलिटिक्स में भी अपनी किस्मत आज़माई, लेकिन उन्हें यहां खास शोहरत नहीं मिली. जनवरी 2014 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने के बाद लाहिड़ी ने महाराष्ट्र के श्रीरामपुर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा था, लेकिन वह तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कल्याण बनर्जी से सीट हार गए थे.

उनके एल्बम, ‘वर्ल्ड पीस-लव एंड हार्मनी’ को 2012 में ग्रैमी पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था, लेकिन वे जीत नहीं सके. हालांकि, उन्होंने उस वर्ष ग्रैमी जूरी में शामिल होने वाले पहले भारतीय संगीतकार बनकर अपनी टोपी में एक और पंख जोड़ लिया था.

बंगाल की धरती हमेशा मीठे सुरों वाले गायकों को जन्म देती रही है और 1952 में जलपाईगुड़ी में पारंपरिक क्लासिकल म्यूजिक फैमिली के घर पैदा होने वाले संगीतकार ने 2018 में 63वें फिल्मफेयर अवार्ड्स में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड जीता था. उनका विवाह चित्रानी से हुआ था और उनके दो बच्चे रेमा-संगीतकार और बप्पा लहरी-कंपोज़र हैं.

2021 में कोविड से बाल-बाल बचने के बाद, सुर कोकिल लता मंगेशकर को खोने के कुछ ही दिनों बाद, 2022 में ओएसए (ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया) के कारण संगीतकार ने इस दुनियों का अलविदा कह दिया था.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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