scorecardresearch
Friday, 12 June, 2026
होमसमाज-संस्कृतिएक गौरैया, कुछ भूली हुई यादें और अपने ही घर में भूत हो जाने का भय

एक गौरैया, कुछ भूली हुई यादें और अपने ही घर में भूत हो जाने का भय

गीतांजलि श्री के उपन्यास सहसा के इस अंश में एक मामूली-सी घटना से जन्मा संदेह धीरे-धीरे मन, स्मृति और अस्तित्व के गहरे प्रश्नों में बदल जाता है.

Text Size:

सब अभी भी वैसा है, रोज़ सा सुचारु, यों भूले मान रहे थे.

पर भूली यादें अपने खेल करती हैं. बन्द कपाट के पीछे दुबक रहती हैं कि दरार मिले, कपाट भूल से महीन सा खुल जाए, और टंगड़ी लगा वे दाख़िल हो जाएं.

कहीं दूर चेतन मन के दायरे से परे हल्की सी दस्तक थी, पर तूल देने योग्य नहीं. भूले ने इग्नोर मारा.

एक और दिन उगा. वे आ गए वन-प्रांगण में. सवेरा सवेरों सा. किरणें आज भी टहनियों तनों पर ताम्बई प्रभा वाले कलेवा लपेट गई थीं और पक्षी बदसूरत शहर के इस छोर पर बसे हरेभरे में बांस के परदे को चोंच से चूं-चूं सरकाते लहराते आज भी मगन कर रहे थे.

भूले हाथ में चाय लिये, नंगे पांव वन में विचरने लगे. वही हवा धूप पंछी से घिरे. ताम्बई धागों को उठाके हवा को ख़ुद भी थमाते कि लो घुमा दो तरुवर पर ताम्बई आवरण. पत्ते पत्ते पर हाथ ऐसे कि किसी का गला सहलाते हों, किसी के कान मल्हारते हों, या जैसे चिया और श्रवण के पाँव उनके गोदी-दिनों में गुदगुदाते थे और अब तातू की नन्ही नाक उँगलियों की नोक में पकड़ते हैं.

अम्मा की पुकार आई ‘भूले चिरइया.’

‘क्या है’ भूले डपट के अन्दर लपकने पलटे तो देखा अम्मा बरामदे में हैं और वहाँ से बोली हैं ‘भूले बिटवा भुल्लय्या चिरइया.’

‘गिरना है, ख़ुद उठ आईं,’ डांटा.

‘मैंने उठाया सर, मैं लाया सर.’ शम्भु चिल्लाया.

‘हां चिड़िया,’ वे निश्चिन्त हुए. ‘चिरइया हां ओ हां.’

धूप छांव में चिड़ियां बुंदकियां बन फुदक रही थीं.

‘गौरैया.’ अम्मा ने कहा.

‘क्या अम्मा.’ भूले ने फिर डांटा. ‘गौरैया अब कहां दिखती हैं?’

‘गौरैया,’ अम्मा ने तय-बात स्वर में कहा, ख़ुश पर शान्त दिखते.

‘सब कहते हैं अब नहीं दिखती,’ उन्होंने फटकारा, ‘पर दिख तो रही है,’ ज़रा हैरान हुए स्वर में अगले ही पल बोले. क्योंकि नहीं दिखती कहते ही उन्हें दिख गई. गले में भूरी धारी भी, ऐं. दूसरी चिड़ियों के बीच दाना चुगतीं.

गौरैया उड़ी तो अम्मा शोर करतीं चप्पू चलातीं भीतर लौट गईं. खटर खटर ठप छप थपाक छपाक.

अन्दर जाना पड़ेगा, भूले ने सोचा. सूर्य तेज़ होने लगा था और नील में घुली सफ़ेद धूप टपका रहा था, जो पत्तों पर बैठती तो पनियल कंचन का वरक़ हो जाती. पत्तों को शॉक न लगे, वे नम सुनहले हो जाएं और चढ़ते गरम दिन के लिए तैयार. भूले ने हाथ पत्तों पे फेरा जैसे रंग बराबर फैलाते हों. गर्मी से पपड़ाते पत्तों को कोमल छुआ.

‘जाता हूं,’ धीमे से बोले. दूसरे सुनें नहीं, वे पेड़ गाछ से बतियाते हैं इसलिए धीमे, कि छूने पे आवाज़ के स्वतः नरम हो जाने से.

‘आता हूं,’ सीमारेखा पर लगे केले के पेड़ से बोले. उसको भी जाने के पहले छूना था. उसके विशाल पत्तों को पोंछने लगे और बचपन में उस पर खाए, भोग लगे हलवा पूड़ी उबले चने का स्वाद उसे बताया. बोले ‘ऐसा था बचपन,’ ज़रा मुस्करा के.

फिर वही हुआ जो हो जाता था. फिसलते पत्तों के पार रेंगते शहर की झलक पा गए. दृष्टि मधुमालती पर पड़ गई. लटकी हुई, सहमी सहमी, मरियल, मटियाली. सड़क किनारे, विष उगलती मोटर कारों से बचने को, मोहल्ले की बाउंड्री वॉल से चिपटी हुई. दीवार के इधर, धूल अटी ख़ाली जगह, जिसे पार्क का नाम मिला हुआ था, में घूरा उग रहा था. उधर गिरे तो मोटरों से कुचली जाए, इधर, तो घूरे में दब जाए, अपनी जान को चिपटाए अटकी लटकी है.

रज़िया फंस गई गुंडन में, भूले ने सोचा.

मुस्कान सिकुड़ गई. ये नसीब तो नहीं होना था लतर का कि लोहे पत्थर स्टील धुएं में यतीम पड़ी हो. न पानी न घास न प्यार.

किसी ने उसकी डाली से तार बांध दिया था और दूसरा सिरा कुछ दूर खड़े ज़ंग खाए खम्भे में फंसा दिया था. फटे फटीचर कुचैले कपड़े उस पर सूखते रहते.

भूलेराम ने केले के पत्ते वापस समेटे जैसे बुरे नाटक पर

पर्दा गिराने.

अभी बांह उठी ही थी और पत्ते हाथ में ही थे कि एक चिया उसपे आ बैठी. पत्ते पर नहीं, उनकी बांह पर.

वे ठिठके, मुस्कराहट लौटने को हुई, सोचा हिलेंगे तो उड़ जाएगी, हिलें नहीं. देखा ये तो गौरैया है, वही गर्दन पर भूरी धारी वाली गौरैया जिसे उनका हरा भरा भा गया है और आ गई है बाक़ी चिड़ियों के कलरव में, इस डाली उस डाली फुदकने.

मेरी बांह को डाली समझती है, वे मुस्करा दिये, और मज़बूत पेड़ बनके खड़े रहे.

पर पेड़ की खाल के भीतर क्या होता है, उसके सीधे, सतर, स्थिर, बाह्य रूप को देखकर कौन जान सकता है. क्यों उसी पल उनका लहू किसी ठोकर से टकराया, जैसे समुद्र की लहर पत्थर पे ख़ून हुई, और रुका, फिसला, भूले के दिल की एक धड़कन उठा ले गया.

वैसा धचका जिसमें कोई अलग विचार आ जाए, नितदिन के नितपन को गड़बड़ाता.

कुछ कौंधा.

अभी भी वे पेड़ हुए, रुके खड़े थे, गौरैया उनकी बाँह पर. कि कौंधा, डाली समझ के बैठ गई है या क्या इसलिए कि वह मुझे देख ही नहीं रही, अपनी समझ से हवा में डोल रही है?

मैं क्या अदृश्य? हवा? प्रेत?

भूत सा फिरता.

अपने घर में.

बाक़ी सब जिसे बिना देखे उसकी बगल से नहीं, उसके बीच से निकल जा रहे हैं.

तभी गौरैया?

और तभी क्या चिया भी…? भूला रिसने लगा.

जो अवचेतन में डोल रहा था चेतन में जा पहुंचा. हल्की सी बेचैनी जो भूले के स्वभाव में नहीं थी, उनमें आ गई. ऊपर से कितना भी सब कुछ नियमित ढंग से करें, भीतर कोई घुस गया जो कभी भी टंगड़ी मार देता और दिल एक धड़कन गंवा देता और फ़ालतू ख़याल आ जाता.

अवकाशप्राप्त हिज़ लॉर्डशिप भूलेराम जी मिसिर के मन में वह सन्देह आ गया जिसने उनके सधे सँभले, हिला भी तो फिर संभल जाने वाले स्वभाव, को हिला दिया. और लहू को बिन चेताए एकदम से कूद मारने की लत पड़ने लगी. कभी नींद से जाग जाएं, कभी काम के बीच घबराएँ.

सब गड्डमड्ड होने लगा और सन्देह में सन्देह जुड़ने लगा.

मैं क्या अदृश्य? या प्रेत?

अपने घर में भूत सा फिरता.

बाक़ी सब जिसे बिना देखे उसकी बगल से नहीं, उसके बीच से निकल जा रहे हैं?

सन्देह कोई स्वस्थ चीज़ नहीं. क्योंकि सन्देह से सन्देह जनमता है और फिर उसका वंश ऐसा बढ़ जाता है कि हर चीज़ की सीवन उधड़ जाती है. और सन्देह उधड़ी सीवन से सब जगहों में केंचुए की तरह घुस लेता है. रेंगता लिपटता. इधर सिर उधर पैर निकालता है. बंद बंद दुखता है.

बाहर को देखते नेत्र में छेद कर केंचुआ नेत्र के दूसरी तरफ़, यानी अन्दर की तरफ़, पांव नीचे लटकाता है, तो आंखें भीतर भी खुल जाती हैं और दोनों तरफ़ फटी फटी ताकती हैं. बाहर आंख बन्द भी कर लें तो भीतर को खुले नेत्र नये घाव से फटे रहते हैं. इससे पपोटों में दर्द होने लगता है. बाहर देखो, जैसे वन-प्रांगण की खुली हवा और स्पष्ट मंज़र की तरफ़, तो आंखों को आराम मिलता था, खुली जगह में निगाहें कलाबाज़ियां लगातीं तो भी न दुखतीं. वही आंखें भीतर को विस्फारित होने लगें तो अनजान अंधेरे में कहां जाएं के असमंजस में हो रहेंगी, मेढक की आंखों सी फूल जाएंगी, फटेंगी, अंधेरे से टकराएंगी और मानस मज्जा रग स्नायु में घुटेंगी और पूरे भीतर में पीड़ फैलेगी और बाहर भी आना चाहेगी.

यही होने लगा. अवकाशप्राप्त हिज़ लॉर्डशिप भूलेराम जी मिसिर के मन में सन्देह आया और फिर सन्देहों की कड़ी बनती गई. जो उनके लहू में कभी भी कूद लगा देती. और कभी न झपकती भीतर ताकती आंखें सारे में थकन भरने लगीं. छोटा सा लमहा अनंतकाल बन गया और भूले की धमनियों में उतरी छोटी एक ठोकर पुराना दर्द बनके बहने लगी. कहीं भी आराम से सोने वाले भूले, इन चन्द दिनों के पूरे होते होते, बे-आराम हो गए और जब सोना हो तो जगे हैं, जब जागना तो सोये पड़े.

(गीतांजलि श्री के सहसा उपन्यास को राजकमल प्रकाशन ने छापा है. इसका अंश प्रकाशन की अनुमति से छापा जा रहा है.)

share & View comments