सेंटर फॉर इकोनॉमिक डेटा एंड एनालिसिस, अशोका यूनिवर्सिटी के अश्विनी देशपांडे का कहना है कि 'वर्क फ्रॉम होम' कई लोगों के लिए संभव नहीं है क्योंकि भारत की 90% श्रम शक्ति अनौपचारिक क्षेत्र में काम करती है.
शहरी भारत आज जातिवाद खत्म होने के दौर में नहीं है, बल्कि ऐसा दौर है जहां लोग जातिवाद मानना नहीं चाहते. वे ऊंच-नीच के फायदे तो चाहते हैं, लेकिन इसे मानने में शर्म महसूस करते हैं.