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Thursday, 20 June, 2024
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Budget 2023: अफगानिस्तान को विकास के लिए मिलेगा पूरा फंड, श्रीलंका, म्यांमार के लिए कटौती

बाहरी देशों और परियोजनाओं की विकास सहायता के लिए MEA के खर्च का कुल अनुमान वित्त वर्ष 23 में 6,750 करोड़ रुपये से 13 प्रतिशत गिरकर 5,848.58 रुपये (बजट अनुमान) हो गया है.

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नई दिल्ली: 2023-24 के केंद्रीय बजट में, भारत ने युद्धग्रस्त अफगानिस्तान के लिए अपनी विकास सहायता में कोई बदलाव नहीं किया है. इस बीच, नकदी संकट से जूझ रहे श्रीलंका और म्यांमार के जुंटा को सहायता में क्रमशः 25 प्रतिशत और 33 प्रतिशत की कटौती की है.

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बुधवार को घोषित, बजट में अफगानिस्तान को खर्च अनुदान और लोन के लिए विदेश मंत्रालय (MEA) को 200 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं.

यह पिछले बजट के अनुमानों से अपरिवर्तित है, लेकिन 2021-22 (बजट अनुमान) के 350 करोड़ रुपये से अभी भी कम है, जब काबुल एक लोकतांत्रिक सरकार के अधीन था.

हालांकि, FY23 के लिए संशोधित अनुमान – एक मध्य-सत्र का सर्वेक्षण यह दिखाता है कि यह खर्च कैसे खत्म होगा– अफगानिस्तान पर 350 करोड़ रुपये का व्यय दिखाया गया है.

तालिबान शासन भी भारत से अफगानिस्तान में कई बड़े पैमाने की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को फिर से शुरू करने का आग्रह करता रहा है जो पहले भारतीय अनुदान और अन्य प्रकार की सहायता के जरिए चालू थे. उदाहरण के लिए, अफगानिस्तान के काबुल में प्राचीन किले बाला हिसार के जीर्णोद्धार का काम रुका हुआ है.

अगस्त 2021 में तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद से, भारत ने उसके मामलो में हस्तक्षेप करने से खुद को पीछे ही रखा है. हालांकि, पिछले जून में भारत ने काबुल में स्थित भारतीय दूतावास को प्रभावी ढंग से फिर से खोलने के लिए अधिकारियों की एक ‘तकनीकी टीम’ भेजी थी.

बाहरी देशों और परियोजनाओं की विकास सहायता के लिए MEA के खर्च का कुल अनुमान वित्त वर्ष 23 में 6,750 करोड़ रुपये से 13 प्रतिशत गिरकर 5,848.58 रुपये (बजट अनुमान) हो गया है.


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म्यांमार और श्रीलंक को मदद में कटौती

भारत ने म्यांमार को विकास सहायता में कटौती की है, जो फरवरी 2021 से एक सैन्य तख्तापलट के अधीन शासन में है, जो बजट 2022 में 600 करोड़ रुपये से बजट 2023 (बजट अनुमान) में 400 करोड़ रुपये से एक तिहाई से अधिक है.

इस बीच, श्रीलंका, जो पिछले साल अपने इतिहास में पहली बार कर्ज चुकाने में विफल रहने के बाद बढ़ती आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, भारत इसकी विकास सहायता को 200 करोड़ रुपये से घटाकर 150 करोड़ रुपये कर दिया है.

श्रीलंका और म्यांमार के पूर्व राजदूत राजीव भाटिया के अनुसार, दोनों देशों को सहायता में कटौती की अलग-अलग व्याख्या की जानी चाहिए.

‘म्यांमार के संबंध में, यह दिखाता है कि भारत सरकार को लगता है कि वह वहां की जटिल राजनीतिक स्थिति के कारण भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग और कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट जैसी प्रमुख परियोजनाओं के साथ आगे नहीं बढ़ सकता.’

उन्होंने कहा कि नई दिल्ली को शायद लगता है कि वह शिक्षा और क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में म्यांमार में नई पहल शुरू करने की स्थिति में नहीं है.

पूर्व राजनयिक ने कहा, ‘श्रीलंका के लिए, यह विकास सहायता में मामूली कमी है. भारत आईएमएफ से बेलआउट पाने के श्रीलंका के प्रयासों का समर्थन करता रहा है, इसलिए शायद उन्होंने सोचा कि वे दोनों के बीच कुछ संतुलन बना सकते हैं.’

16 जनवरी को, भारत ने आईएमएफ को बताया था कि वह श्रीलंका को आर्थिक मदद और ऋण राहत देने के लिए प्रतिबद्ध है – आईएमएफ समर्थित कार्यक्रम के मद्देनजर द्वीप देश को आश्वासन जरूरी है. आईएमएफ को लिखित आर्थिक आश्वासन भेजने के लिए चीन और जापान जैसे देशों के अलावा भारत द्वीप राष्ट्र का पहला आधिकारिक ऋणदाता है.

अन्य द्वीप देश, मालदीव को आर्थिक मदद वित्तीय वर्ष 23 में 360 करोड़ रुपये से बढ़ाकर वित्त वर्ष 24 में 400 करोड़ रुपये कर दी गई है. यह पिछले महीने, विदेश मंत्री एस जयशंकर की मालदीव यात्रा के बाद आया है, जहां उन्होंने कई विकास परियोजनाओं पर समझौते पर हस्ताक्षर किए और हाई-प्रोफाइल हनीमाधू अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा विकास परियोजना शुरू की.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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