नई दिल्ली: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के बाद चेन्नई की राजनीतिक हलचल अब चुनावी मैदान से निकलकर राजभवन तक पहुंच गई है. अभिनेता-राजनेता विजय की तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) 234 सदस्यीय विधानसभा में 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन 118 सीटों के बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गई.
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के नेतृत्व वाला गठबंधन 73 सीटों पर है, जबकि ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) गठबंधन के पास 53 सीटें हैं. किसी एक पार्टी या गठबंधन को साफ बहुमत नहीं मिलने का मतलब है कि सरकार गठन का रास्ता अब गठबंधन बनाने और राज्यपाल की भूमिका पर निर्भर करेगा.
विजय की टीवीके ने औपचारिक रूप से सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है, लेकिन तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने अभी तक कोई अंतिम फैसला घोषित नहीं किया है.
संविधान का अनुच्छेद 164 प्रक्रिया को विस्तार से नहीं बताता, इसमें सिर्फ इतना कहा गया है: ‘मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेंगे.’ यानी मुख्यमंत्री नियुक्त करने की प्रक्रिया संवैधानिक परंपराओं, राजनीतिक परंपराओं और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के आधार पर तय होती है.
अनुच्छेद और पुराने फैसले
संविधान सरकार गठन में राज्यपाल को अहम भूमिका देता है, लेकिन उनकी शक्तियों की भी सीमाएं हैं. अनुच्छेद 163 के तहत राज्यपाल आमतौर पर मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं, सिवाय उन मामलों के जहां संविधान उन्हें विशेष विवेकाधिकार देता है.
अनुच्छेद 164 राज्यपाल को मुख्यमंत्री नियुक्त करने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 174 के तहत वह विधानसभा बुला सकते हैं, स्थगित कर सकते हैं या भंग कर सकते हैं. अनुच्छेद 356 तब लागू होता है जब सरकार संविधान के अनुसार काम नहीं कर पाती और राष्ट्रपति शासन की जरूरत पड़ती है.
समय के साथ सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि राज्यपाल की शक्तियां असीमित नहीं हैं और उन्हें लोकतांत्रिक परंपराओं के भीतर रहकर काम करना होगा. अदालत ने यह भी कहा है कि राज्यपाल के निजी फैसलों को कानूनी सुरक्षा हो सकती है, लेकिन उनके आधिकारिक फैसलों की न्यायिक समीक्षा हो सकती है.
एस.आर. बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1994) मामले में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने कहा था कि बहुमत साबित करने का एकमात्र सही तरीका विधानसभा में फ्लोर टेस्ट है. राज्यपाल की निजी राय इससे ऊपर नहीं हो सकती. अदालत ने यह भी कहा कि अगर स्थिर बहुमत बनने की संभावना हो, तो राष्ट्रपति शासन लगाना असंवैधानिक होगा.
रामेश्वर प्रसाद बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2006) मामले में कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत काम करना चाहिए. विधानसभा बुलाए बिना उसे भंग करना विवेकाधिकार का गलत इस्तेमाल माना जाएगा.
नबम रेबिया बनाम डिप्टी स्पीकर (2016) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल की शक्तियां पूरी तरह निरंकुश नहीं हैं और उन्हें संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहकर काम करना होगा, किसी राजनीतिक खिलाड़ी की तरह नहीं.
सरकार ने 1983 में केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए सरकारिया आयोग बनाया था. आयोग की 1988 की रिपोर्ट में कहा गया कि राज्यपाल को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल बहुत सावधानी से करना चाहिए और उनका पद राजनीतिक नहीं दिखना चाहिए.
राज्यपाल के पास क्या विकल्प हैं
परंपरा के मुताबिक सबसे पहले सबसे बड़ी पार्टी यानी इस मामले में टीवीके को सरकार बनाने के लिए बुलाया जा सकता है ताकि वह विधानसभा में बहुमत साबित करे. इसका मतलब होगा कि विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाए और फिर उन्हें तय समय के भीतर विधानसभा में बहुमत साबित करना पड़े. त्रिशंकु विधानसभा में यही सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है और इसे एस.आर. बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट का समर्थन भी मिला है.
रामेश्वर प्रसाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था: “संविधान राज्यपाल से उम्मीद करता है कि चुनाव के बाद जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करने वाली लोकप्रिय सरकार बनाने की हर संभव कोशिश की जाए.”
राज्यपाल टीवीके से दूसरे दलों के समर्थन पत्र भी मांग सकते हैं, जिससे उनका आंकड़ा 118 तक पहुंच सके. यही नियम किसी संभावित डीएमके-एआईएडीएमके गठबंधन पर भी लागू होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट टालने की कोशिशों के खिलाफ भी चेतावनी दी है. एस.आर. बोम्मई मामले में कोर्ट ने कहा था, “सरकार की ताकत का आकलन किसी व्यक्ति की निजी राय का विषय नहीं है, चाहे वह राज्यपाल हो या राष्ट्रपति. इसे विधानसभा में सार्वजनिक रूप से साबित किया जाना चाहिए.”
अगर राज्यपाल को लगे कि टीवीके ज़रूरी समर्थन नहीं जुटा पाएगी, तो वह दूसरे गठबंधन विकल्प भी तलाश सकते हैं, लेकिन यह सिर्फ ईमानदार संवैधानिक कोशिश के तहत होना चाहिए, न कि सबसे बड़ी पार्टी को रोकने के लिए.
एक दूसरा विकल्प अनुच्छेद 174 के तहत विधानसभा भंग कर नए चुनाव कराने का भी है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विधानसभा बुलाए बिना उसे भंग करना संदेहास्पद माना जाएगा, क्योंकि इससे सदन को अपनी राय देने का मौका नहीं मिलता.
अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन सबसे कठोर विकल्प माना जाता है. अगर राज्यपाल यह निष्कर्ष निकालते हैं कि कोई भी पार्टी या गठबंधन स्थिर सरकार नहीं बना सकता, तो वह राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकते हैं.
सरकारिया आयोग ने कहा था कि अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल केवल आखिरी विकल्प के तौर पर होना चाहिए. एस.आर. बोम्मई मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि अनुच्छेद 356 तभी लगाया जा सकता है जब बाकी सभी विकल्प खत्म हो जाएं. अदालत ने कहा था, “यह संवैधानिक मशीनरी की विफलता का मामला होगा.”
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