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Saturday, 25 April, 2026
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भारत की AI नीति: AIGEG बना लेकिन रक्षा, शिक्षा और उद्योग की कमी बड़ी चुनौती

एक सुप्रीम AI काउंसिल होनी चाहिए जो सबसे ऊपर काम करे. इसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री को करनी चाहिए, जिनके पास असली अधिकार, पूरा प्रतिनिधित्व और काम करने का अधिकार हो.

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13 अप्रैल 2026 को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने AI गवर्नेंस एंड इकोनॉमिक ग्रुप—AIGEG—के गठन के लिए एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया. यह दस्तावेज़ केवल एक पेज का है. 1.4 अरब लोगों के देश के लिए, जो मानव इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी बदलाव के दौर में है, यह एक पेज शुरुआत भी है और एक आलोचना भी.

ईमानदारी से कहा जाए तो AIGEG देर से सही लेकिन एक अच्छा कदम है. इस समूह में इलेक्ट्रॉनिक्स और IT मंत्री को चेयरपर्सन बनाया गया है, राज्य मंत्री को वाइस चेयरपर्सन, प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार, मुख्य आर्थिक सलाहकार, नीति आयोग के CEO, और दूरसंचार, आर्थिक मामलों और विज्ञान व प्रौद्योगिकी के सचिव शामिल हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय का एक प्रतिनिधि भी है. MeitY के सचिव सदस्य संयोजक हैं. यह वरिष्ठ अधिकारियों का एक सम्मानजनक समूह है. लेकिन केवल वरिष्ठ अधिकारी होना गवर्नेंस नहीं है. और समन्वय होना शासन नहीं है.

क्या कमी है?

AIGEG की संरचना उसकी सीमाओं को स्पष्ट करती है. रक्षा मंत्रालय इसमें शामिल नहीं है. चाहे यह सुरक्षा कारणों से जानबूझकर किया गया हो या केवल चूक हो, यह कमी महत्वपूर्ण है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पहले ही युद्ध को बदल रहा है—ऑटोनॉमस सिस्टम, प्रेडिक्टिव टारगेटिंग, इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और युद्ध क्षेत्र की लॉजिस्टिक्स सब बदल रहे हैं. एक राष्ट्रीय AI गवर्नेंस बॉडी जिसमें रक्षा मंत्रालय शामिल नहीं है, वह आधी क्रांति को नियंत्रित कर रही है.

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय की मौजूदगी अच्छी है, लेकिन इसे उस नवाचार इकोसिस्टम की स्थायी भागीदारी के साथ संतुलित करना चाहिए जो ये सिस्टम बना रहा है.

शिक्षा मंत्रालय भी इसमें शामिल नहीं है. AI पूरे पाठ्यक्रम को पुराना बना देगा. स्किल्स बढ़ाने की जरूरत प्राथमिक स्कूल की गणित से लेकर पीएचडी रिसर्च तक है. आज कक्षा 1 में दाखिल होने वाला बच्चा 2040 में ऐसे नौकरी बाजार में जाएगा जो आज से बिल्कुल अलग होगा. अगर AI गवर्नेंस बॉडी में मानव संसाधन बनाने वाले मंत्रालय की स्थायी भागीदारी नहीं है, तो वह अर्थव्यवस्था को तो देख रही है लेकिन उन लोगों को नहीं जो उसमें रहेंगे.

उद्योग की स्थायी सदस्यता नहीं है. अकादमिक जगत की स्थायी सदस्यता नहीं है. AI सिस्टम बनाने वाले उद्यमी, उनकी सीमाओं को समझने वाले शोधकर्ता, और वितरण प्रभावों को मॉडल करने वाले स्वतंत्र संस्थानों के अर्थशास्त्री—इनमें से कोई भी AIGEG की मेज पर नहीं है. उन्हें कभी-कभी बुलाया जा सकता है, सब-कमेटियों में शामिल किया जा सकता है और प्रेजेंटेशन के लिए आमंत्रित किया जा सकता है. लेकिन कभी-कभी की सलाह संरचनात्मक भागीदारी नहीं होती. AI को अच्छे से गवर्न करने के लिए जरूरी ज्ञान केवल सिविल सेवा में नहीं है.

रोजगार संकट

भारत की राजनीतिक व्यवस्था अब तक यह समझने में धीमी रही है कि AI पहले से ही व्हाइट कॉलर नौकरियों को बदल रहा है. बैक-ऑफिस प्रोसेसिंग, कानूनी ड्राफ्टिंग, वित्तीय विश्लेषण, मेडिकल डायग्नोस्टिक्स, कस्टमर सर्विस, सॉफ्टवेयर टेस्टिंग और कंटेंट जेनरेशन—ये वे क्षेत्र नहीं हैं जो भविष्य में प्रभावित होंगे. ये वे क्षेत्र हैं जहां AI पहले से ही मानव काम को बदल रहा है. जो नौकरियां खत्म हो रही हैं, वे वही हैं जिन पर भारत का बढ़ता मध्यम वर्ग निर्भर था. कॉल सेंटर नौकरियां, जो हर साल लाखों ग्रेजुएट्स को रोजगार देती थीं, अब कम हो रही हैं. एंट्री लेवल लॉ और अकाउंटिंग का काम, जो पेशेवर करियर की ट्रेनिंग का आधार था, तेजी से ऑटोमेट हो रहा है.

AIGEG के टर्म्स ऑफ रेफरेंस में रोजगार पर असर का जिक्र है. समूह को AI उपयोग को “डिप्लॉय”, “पायलट” या “डिफर” में वर्गीकृत करना है और प्रभाव कम करने की रणनीति बनानी है. ये अच्छे उद्देश्य हैं. लेकिन उद्देश्य बिना अधिकार के केवल इच्छाएं होते हैं. एक 10 सदस्यीय अंतर-मंत्रालयी समिति, जिसे जॉइंट सेक्रेटरी स्तर का अधिकारी चलाता है, किसी मंत्रालय को उसके स्किलिंग कार्यक्रम बदलने के लिए मजबूर नहीं कर सकती. यह किसी ऑटोमेशन वाले निर्णय को रोक नहीं सकती. यह पूरे सार्वजनिक क्षेत्र में AI तैयारी की समयसीमा तय नहीं कर सकती. बिना शक्ति के समन्वय रिपोर्ट बनाता है, परिणाम नहीं.

भारत को वास्तव में क्या चाहिए

एक सुप्रीम AI काउंसिल होनी चाहिए जो सबसे ऊपर हो—जो राष्ट्रीय AI रणनीति बनाए, बाध्यकारी नियम तय करे और मंत्रालयों के बीच टकराव का समाधान करे. इसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करें और इसे वास्तविक अधिकार, पूरी भागीदारी और निर्णय लेने का मैनडेट मिले—सिर्फ बैठकें करने का नहीं.

AIGEG को, अगर इसे ठीक से बढ़ाया और बदला जाए, तो उस काउंसिल की कार्यान्वयन और निगरानी शाखा के रूप में काम करना चाहिए—जो रणनीति को विभागीय कार्रवाई में बदले और अनुपालन और परिणामों की रिपोर्ट दे.

दोनों निकायों की संरचना को पूरी तरह से व्यापक बनाना होगा. रक्षा मंत्रालय स्थायी रूप से शामिल होना चाहिए. शिक्षा मंत्रालय स्थायी रूप से शामिल होना चाहिए. उद्योग के नेता—रोटेशन पर नहीं बल्कि स्थायी सदस्य के रूप में—शामिल होने चाहिए. AI, अर्थशास्त्र, कानून और नैतिकता के अकादमिक शोधकर्ताओं को शासन संरचना में शामिल करना चाहिए, न कि केवल जरूरत पड़ने पर बुलाना चाहिए.

मुख्य चुनौती

कोई भी गवर्नेंस सिस्टम तब तक सफल नहीं होगा, जब तक वह मानव पूंजी के बदलाव को अपने केंद्र में नहीं रखता.

भारत की शिक्षा प्रणाली—प्राइमरी स्कूल से लेकर पोस्टग्रेजुएट रिसर्च तक—को इस तरह बदलना होगा कि AI की समझ एक बुनियादी जरूरत बने, न कि कोई वैकल्पिक चीज. इसका मतलब सिर्फ बच्चों को चैटबॉट इस्तेमाल करना सिखाना नहीं है. इसका मतलब है ऐसी सोच और समझ विकसित करना, जिससे नई पीढ़ी AI सिस्टम के साथ काम कर सके, उनसे मुकाबला कर सके, और आखिर में उन्हें संभालने और नियंत्रित करने की जिम्मेदारी भी निभा सके, भले ही हम आज उन्हें पूरी तरह समझ नहीं पाते.

केंद्रीय बजट में इस प्राथमिकता को साफ दिखना चाहिए. राष्ट्रीय शिक्षा नीति एक ढांचा देती है. अब जरूरत है तय समय में लागू करने की, पर्याप्त फंडिंग के साथ, और क्लास 6 से AI को अनिवार्य रूप से शामिल करने की. कानून, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, अर्थशास्त्र और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों के यूनिवर्सिटी कोर्स को भी पूरी तरह बदलना होगा. भारतीय AI के लिए रिसर्च फंडिंग—सिर्फ विदेशी मॉडल अपनाने के लिए नहीं बल्कि अपनी क्षमता विकसित करने के लिए—काफी ज्यादा बढ़ानी होगी.

एक मेमो आदेश नहीं होता

AIGEG का ऑफिस मेमोरेंडम उस समय के रूप में देखा जाएगा जब भारत ने आधिकारिक तौर पर माना कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को गवर्नेंस की जरूरत है. लेकिन यह सिर्फ शुरुआत है.

भारत पहले भी तकनीकी बदलावों से गुजरा है—ग्रीन रिवोल्यूशन, आर्थिक उदारीकरण, और IT सर्विसेज का उभार. हर बार सिर्फ नीतियों का तालमेल काफी नहीं था, बल्कि कई सालों तक शीर्ष स्तर पर मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत पड़ी, और उसी स्तर के संस्थान बनाए गए.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन सब से बड़ा बदलाव है. इसलिए इसका जवाब भी बड़ा होना चाहिए. AIGEG एक छोटा कदम है. भारत को बहुत बड़ा कदम उठाने की जरूरत है.

प्रधानमंत्री को खुद नेतृत्व करना होगा. इससे कम कुछ भी पर्याप्त नहीं होगा.

लेखक पंजाब कैडर के रिटायर्ड IAS अधिकारी और पंजाब सरकार के पूर्व स्पेशल चीफ सेक्रेटरी हैं. वह गवर्नेंस, पब्लिक पॉलिसी और संवैधानिक मामलों पर लिखते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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