नयी दिल्ली, 21 अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को अधिकारियों से सवाल किया कि राष्ट्रीय राजधानी में न्यायिक अधिकारियों को निजी सुरक्षा अधिकारी (पीएसओ) क्यों नहीं उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जबकि अन्य राज्यों ने न्यायाधीशों के लिए ऐसी व्यवस्था की है।
दिल्ली पुलिस को फटकार लगाते हुए, दिल्ली न्यायिक सेवा संघ की याचिका पर सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति मनोज जैन ने कहा कि पीएसओ की नियुक्ति एक ‘‘वैध मांग’’ है और इसे देने से इनकार करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता है।
पुलिस के इस रुख पर आपत्ति जताते हुए कि सुरक्षा केवल खतरे की आशंका के मामलों में प्रदान की जा रही है, अदालत ने कहा क्या वे कोई धर्मार्थ कार्य कर रहे हैं।
अदालत ने दिल्ली पुलिस से कहा, ‘‘बताइए, जब खतरे की आशंका हो तो सुरक्षा मुहैया कराकर क्या आप कोई धर्मार्थ कार्य कर रहे हैं? आपकी एकमात्र समस्या सरकारी खजाने पर भार पड़ना है।’’
अदालत ने कहा, ‘‘आप पहले तो यह चाहते हैं कि किसी व्यक्ति पर हमला हो और आप ऐसा माहौल नहीं बनाना चाहते जहां अधिकारी बेखौफ होकर इधर-उधर जा सकें।’’
अदालत ने अधिकारियों की ओर से पेश हुए वकीलों से कहा,‘‘अगर वे (अन्य राज्य) अपने न्यायिक अधिकारियों के लिए व्यवस्था कर सकते हैं, तो दिल्ली जैसे शहर को क्या रोक रहा है, जहां अपराध दर बेहद अधिक है? ऐसी उदासीनता क्यों? फिर आप कहते हैं कि हमें नौकरशाहों को भी देना पड़ेगा, यह कैसा जवाब है? आप न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता कर रहे हैं।’’
अदालत ने मामले की सुनवाई के लिए मई महीने की तारीख दी।
भाषा सुभाष रंजन
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