भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपने वर्तमान अवतार में 1980 में आई थी लेकिन इसके पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ के निर्माण की प्रक्रिया श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सात दशक से भी पहले कलकत्ता में शुरू कर दी थी. इसके बावजूद उसे उस राज्य में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पार्टी बनाने में इतना लंबा समय क्यों लग गया? इसके अलावा, इस बात की कितनी संभावना है कि बंगाल भाजपा को जो नई-नई लोकप्रियता हासिल हुई है उसे वह और बढ़ा पाएगी? इन सवालों का जवाब देने के लिए बंगाल के राजनीतिक इतिहास में उभरे कुछ रुझानों पर नजर डालना जरूरी है.
देश में 1951-52 में जो पहला आम चुनाव हुआ था वह इस राज्य में विभिन्न विचारधाराओं के बीच राजनीतिक तालमेल की साफ तस्वीर पेश करता है. राज्य विधानसभा के चुनाव में जनसंघ को कुल 6 फीसदी और हिंदू महासभा को कुल 4 फीसदी वोट मिले थे, तो वामपंथी दलों को 29 फीसदी, और कांग्रेस को 42 फीसदी वोट मिले थे. यानी वामपंथी झुकाव वाली कांग्रेस पार्टी को सबसे ज्यादा वोट मिले और उसके बाद वाम दलों का नंबर था जबकि दक्षिणपंथी दल पिछड़ गए थे. यह तब हुआ था जब यह राज्य सांप्रदायिक राजनीति के कारण बुरी तरह बंटा हुआ था. गौर करने वाली बात यह थी कि निर्दलीय उम्मीदवारों ने कुल 22 फीसदी वोटों पर कब्जा कर लिया था. इसने संकेत दे दिया था कि मौजूदा राजनीतिक गुटों के लिए काफी गुंजाइश थी.
वाम दलों, खासकर कम्युनिस्ट पार्टी ने मजदूरों के सवालों, नागरिक स्वाधीनताओं, और कृषि सुधारों को लेकर हुए जनांदोलनों के बूते अपना जानाधार विस्तृत किया. ये सारे मुद्दे अंतरराष्ट्रीय समाजवादी तथा साम्यवादी आंदोलनों की प्रेरणा से उभरे महान वैचारिक आख्यान पर आधारित थे. बताने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस पार्टी के साथ आजादी की लड़ाई की विरासत जुड़ी थी. इसके विपरीत दक्षिणपंथी दलों के कार्यक्रम हिंदू हितों की रक्षा पर आधारित थे और उन्हें ऐसा स्वरूप नहीं दिया गया था कि वे वामपंथी दलों और काँग्रेस के विचारों को चुनौती दे पाते.
बंगाल जबकि मुस्लिम लीग के हिंसक ‘डाइरेक्ट एक्शन डे’ (16 अगस्त 1947), नोआखली दंगों, देश के बंटवारे, और लाखों बंगाली हिंदू शरणार्थियों की बाढ़ को झेल रहा था उस समय हिंदू महासभा एक वैचारिक ढांचे और प्रेरणादायी नेतृत्व के अभाव के कारण कोई प्रभावी जवाब देने में विफल रहा. वे बंगाली हिंदू शरणार्थियों को अपना जनाधार नहीं बना सके. हिंदू महासभा कितनी प्रभावहीं थी, यह 1946 के चुनावों से जाहिर हो गया. उन चुनावों में उसे मात्र 2 फीसदी वोट मिले. पश्चिम बंगाल के प्रथम कांग्रेसी मुख्यमंत्री प्रफुल्ल घोष ने हिंदू महासभा को परास्त कर दिया और नवंबर 1947 में विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए.
आखिर हिंदुत्ववादी दल बंगाल में क्यों नहीं पनप पाए?
हिंदुत्ववादी दलों को आजादी के बाद संगठन के स्तर पर बड़े झटके 1948 में महासभा से मुखर्जी के इस्तीफे और महात्मा गांधी की हत्या के बाद इन दलों के खिलाफ सरकार की कार्रवाइयों से लगे. महासभा संगठन के स्तर पर ही कमजोर नहीं हुआ, गांधी की हत्या की साजिश में उसकी मिलीभगत के आरोपों के कारण उसकी छवि भी खराब हुई. तीसरा झटका मुखर्जी की मृत्यु के कारण भी लगा. अभी वे राज्य में जनसंघ को एक राजनीतिक ताकत के रूप में संगठित भी नहीं कर पाए थे. ‘रामराज्य परिषद’ जैसी इस तरह की दूसरी पार्टियां भी बंगाल के मूल्यों से जुड़ाव न होने के कारण कोई प्रभाव न पैदा कर पाईं.
जनसंघ में जो भी ताकत थी वह जून 1953 में मुखर्जी की असामयिक मौत के कारण खत्म हो गई. बंगाल में उसे आगे बढ़ाने के लिए न तो एक मजबूत संगठन था और न मुखर्जी के कद का कोई नेता था. इसके साथ, कांग्रेस और वामपंथी दलोन ने राज्य की राजनीति में अपनी पैठ गहरी कर ली.
1991 के चुनावों से पहले तक जनसंघ या BJP राज्य में किसी चुनाव में कुल 1 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल नहीं कर पाई थी. 1991 के चुनाव में, रामजन्मभूमि आंदोलन के रथ पर सवारी करने के बूते BJP 11 फीसदी वोट हासिल कर पाई. इसके बाद इस पार्टी को 10 फीसदी से ज्यादा वोट 2016 के विधानसभा चुनाव में ही मिले. फिर तो 2019 में वह 40 फीसदी से भी ज्यादा वोट बटोर ले गई. लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में उसके वोटों के आंकड़े में थोड़ी गिरावट आई और वह 38 फीसदी वोट ले पाई. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा थोड़ा बढ़कर 39 फीसदी पर पहुंचा.
BJP ने यह कमाल न तो अपने संगठन की ताकत के बूते किया और न वैचारिक आधार की मजबूती के बूते. कमजोर संगठन और लगभग शून्य जनाधार के बावजूद वह यह कमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देशव्यापी लोकप्रियता, और राज्य की आंतरिक राजनीतिक गति के बूते कर पाई जिसमें वाम दलों के समर्थकों का एकमुश्त वोट उनके पाले से छिटक गया.
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) शहरी तथा ग्रामीण राजनीति पर और राज्य के प्रशासनिक मशीनरी पर पूरी पकड़ बनाकर अपना काफी मजबूत संगठन खड़ा कर लिया. इसके साथ ही उसने महिलाओं, छात्रों, बेरोजगार युवाओं, बुजुर्गों के लिए नकदी भुगतान की कई योजनाओं और स्वास्थ्य सेवा की सुविधाओं के बूते अपना ठोस वोट बैंक तैयार कर लिया. इस नीति के सहारे टीएमसी ने राज्य में कांग्रेस को न केवल पीछे छोड़ दिया बल्कि उसके मूल जनाधार को ही कमजोर कर दिया, जिसे 1970 के दशक के चुनावों को छोड़ किसी चुनाव में 35 फीसदी से कम वोट नहीं हासिल हुए थे.
बंगाल की राजनीतिक संस्कृति की उल्लेखनीय विशेषता यह रही है कि दूसरे राज्यों के मुक़ाबले यहां सरकार विरोधी भावना चुनावों में बड़ी भूमिका नहीं निभाती रही है. इतिहास बताता है कि दूसरे राज्यों की तरह बंगाल में सत्ता परिवर्तन बार-बार नहीं होता रहा है. 1967 से 1972 के बीच थोड़ी अस्थिरता को छोड़ दें तो बंगाल में कांग्रेस ने 25 साल तक राज किया और वाममोर्चे ने 34 साल तक. लेकिन अब सवाल यह उभर रहा है कि क्या टीएमसी अपनी सत्ता 20 साल से आगे बढ़ा पाएगी?
BJP को आज क्या चाहिए
शिक्षकों की नियुक्तियों, सार्वजनिक वितरण सेवा में भ्रष्टाचार के खुलासों, बेरोजगारी, कुछ वर्गों को लाभ पहुंचाने के नये क़ानूनों को अदालत द्वारा असंवैधानिक घोषित किए जाने, जांच एजेंसियों द्वारा मंत्रियों और नेताओं की गिरफ्तारियों, और राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा जबरन वसूली के मामलों का चुनाव नतीजों पर शायद ही कोई उल्लेखनीय असर पड़ता दिखा है.
बदकिस्मती से बंगाल भाजपा ने 2019 में वोटों की बारिश को सहेजे रखने के लिए अपने संगठन को मजबूत बनाने पर विशेष ध्यान नहीं दिया, न ही उसने अपने ‘नरेटिव’ को राज्य की सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक परंपरा और समकालीन हकीकतों के अनुरूप विकसित किया. शिक्षकों, महिलाओं, युवाओं, सरकारी कर्मचारियों जैसे संभावित जनाधारों को उपरोक्त मुद्दों के इर्दगिर्द अपने पक्ष में मजबूत बनाने की जगह भाजपा बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों और उग्रपंथी इस्लाम के खतरों जैसे मुद्दों को ही उछालती रही है.
अपनी हिंदुत्ववादी विचारधारा की अस्पष्टता, और करीब एक तिहाई मुस्लिम आबादी वाले राज्य में इस विचारधारा को लागू करने जैसी समस्या से भी यह पार्टी जूझती रही है.
इसके साथ ही, पार्टी राज्य के मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के लिए अपने केंद्रीय नेतृत्व और मोदी, अमित शाह तथा योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं की छवि पर ही जरूरत से ज्यादा निर्भर रही है. इसके अलावा, विडंबना यह है कि भाजपा केंद्र सरकार की योजनाओं से हासिल लाभों को भी यहां प्रचारित नहीं कर पाई है. स्थानीय स्तर पर एक सुर में बोलने और मिलकर काम करने वाले वरिष्ठ नेताओं की या युवाओं से जुड़ने वाले नए, दूसरी पीढ़ी के नेताओं की कमी ने भी 2019 के बाद अपना वोट प्रतिशत बढ़ाने की पार्टी की क्षमता पर ब्रेक लगा रखा है.
एक बड़ा क्षेत्रीय ‘नरेटिव’ विकसित करने, और एक ताकतवर केंद्रीय पार्टी की कमजोर शाखा के विपरीत एक पारंपरिक बंगाली राजनीतिक पार्टी के रूप में उभरने में BJP की विफलता ने टीएमसी के इस नरेटिव को मजबूत किया है कि भाजपा ‘बहिरागतों’ की पार्टी है. वैसे तो बंगाल में कांग्रेस भी एक राष्ट्रीय दल की शाखा थी, लेकिन आजादी के बाद के शुरू के दशकों में यहां उसके ऐसे भी नेता थे जो राष्ट्रीय नेतृत्व की बराबरी कर सकते थे. एक बार जब राज्य में कांग्रेस कमजोर पड़ी, तो उसने अपना आधार टीएमसी के हाथों खो दिया. उधर, बंगाल के वामपंथी नेता भाकपा और माकपा, दोनों पर जबरदस्त पकड़ रखते थे.
इन कमजोरियों के बावजूद, भाजपा इस बार चुनाव में कहीं बेहतर प्रदर्शन कर सकती है. इसमें योगदान देने वाले जो तत्व सबसे महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं वे हैं : ‘एसआइआर’ के तहत मतदाता सूचियों का संशोधन, स्वतंत्र व निष्पक्ष मतदान के लिए सुरक्षा के अभूतपूर्व उपाय, और चुनाव आयोग द्वारा राज्य प्रशासन में भारी फेरबदल.
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि आरएसएस इस राज्य में हिंदू वोटों को एकजुट करने का जो काम वर्षों से करता आ रहा है उसका कितना असर होगा, लेकिन इससे भाजपा को फायदा ही होने की उम्मीद है. पिछले चुनावों की तुलना में इस बार पार्टी का चुनाव प्रचार बेहतर रूप से संगठित है, और यह भी बेहतर नतीजे दे सकता है.
BJP किसी तरह चुनाव जीत भी जाए, फिर भी उसे अपने संगठन के ढांचे और ‘नरेटिव’ की कई कमजोरियों को दूर करने की जरूरत है. लेकिन अगर उसे फिर से हार का सामना करना पड़ा तो यह इस संदेह को मजबूत करेगा कि दूसरी पार्टियों से जो वोट उसकी झोली में आए उन्हें वह सहेजकर रख पाएगी या नहीं.
चंद्रचूड़ घोष एक लेखक, कॉलमिस्ट और पब्लिक स्पीकर हैं. वह फाउंडेशन फॉर इंडियन हिस्टोरिकल एंड कल्चरल रिसर्च (FIHCR) में इंडियन हिस्ट्री के लिए सर जदुनाथ सरकार फेलोशिप के फेलो हैं. वह X @chandrachurg पर पोस्ट करते हैं. विचार निजी हैं.
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