नई दिल्ली: हवाई यात्रा महंगी और मुश्किल होती जा रही है. भारतीय एयरलाइंस के लिए, जो पहले से ही पाकिस्तान के एयरस्पेस बंद होने से प्रभावित थीं, पश्चिम एशिया की मौजूदा अस्थिर स्थिति इससे खराब समय पर नहीं आ सकती थी.
ईरान संघर्ष ने एयरलाइंस को लंबा और महंगा रास्ता अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है, जिससे ऑपरेशन की लागत बढ़ गई है.
28 फरवरी से, जब यह संघर्ष शुरू हुआ, भारत से पश्चिम की ओर जाने वाली ज्यादातर उड़ानें ईरान के एयरस्पेस और उसके आसपास के इलाकों—जैसे इराक, इज़रायल, कतर, कुवैत, बहरीन और यूएई से बचकर जा रही हैं.
भारत से यूरोप, नॉर्थ अमेरिका और खाड़ी देशों की उड़ानें सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, खासकर यूके, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका, कनाडा, यूएई, कतर और सऊदी अरब के लिए जाने वाली उड़ानें.

इसका सीधा मतलब है कि भारतीय यात्रियों के लिए अंतरराष्ट्रीय किराए कम से कम तीन गुना बढ़ गए हैं क्योंकि रास्ते लंबे हो गए हैं और ईंधन की लागत बढ़ गई है. अब इसमें बड़ी संख्या में फ्लाइट कैंसिलेशन भी जोड़ लें—हवाई यात्रियों के लिए यह बेहद मुश्किल समय है.
नागरिक उड्डयन मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, फरवरी के आखिर से, जब अमेरिका-इज़राइल का ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू हुआ, भारतीय एयरलाइंस ने 10,000 से ज्यादा उड़ानें रद्द कर दी हैं. पश्चिम एशिया के लिए रोजाना उड़ानें 300–350 से घटकर सिर्फ 80–90 रह गई हैं, यानी हर दिन करीब 250 उड़ानें रद्द हो रही हैं और हर हफ्ते करीब 2,000 उड़ानें कैंसिल हो रही हैं.
इंडस्ट्री के अनुमान के अनुसार, यही नहीं, वैश्विक जेट फ्यूल की कीमतें एक महीने में लगभग 100 प्रतिशत बढ़ गई हैं—फरवरी के अंत में करीब 9,300 रुपये प्रति बैरल से बढ़कर 27 मार्च तक 18,000 रुपये से ज्यादा हो गई हैं.
एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) की कीमतों में इस तेज़ बढ़ोतरी का असर किराए पर पड़ा है. एयर इंडिया ग्रुप ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों रूट्स पर फ्यूल सरचार्ज बढ़ा दिया है.
एक एयरलाइन अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “कॉर्पोरेट यात्रा लगभग बंद हो गई है, परिवार अब अंतरराष्ट्रीय छुट्टियों की बुकिंग नहीं कर रहे हैं. ईंधन महंगा होने से एयरलाइंस के पास कीमत बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, जिससे यात्री पीछे हट रहे हैं, लेकिन फायदा भी नहीं हो रहा—यह दोनों तरफ नुकसान की स्थिति है.”
इंडस्ट्री विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर युद्ध जारी रहता है तो भारत आने-जाने वाली उड़ानों में रुकावट से भारतीय और अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस को हर हफ्ते करीब 8.75 अरब डॉलर (लगभग 8.06 लाख करोड़ रुपये) का नुकसान हो सकता है.
एविएशन सबसे ज्यादा प्रभावित सेक्टर में से एक है, जिसका असर पर्यटन, निर्यात, हेल्थकेयर और शिक्षा जैसे कई क्षेत्रों पर पड़ रहा है. एयरस्पेस बंद होने का असर सिर्फ खाड़ी रूट्स तक सीमित नहीं है.
दिप्रिंट ने कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर एयर इंडिया और इंडिगो से प्रतिक्रिया मांगी है. उनका जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.
सबसे ज्यादा प्रभावित रूट्स
सबसे ज्यादा असर भारत-खाड़ी रूट्स पर पड़ा है, इसके बाद यूरोप और नॉर्थ अमेरिका की उड़ानें प्रभावित हुई हैं.

सामान्य स्थिति में, दिल्ली से दोहा/रियाद/दुबई की उड़ान अरब सागर और ईरान के ऊपर से पश्चिम की ओर जाती थी, लेकिन अब क्षेत्रीय तनाव के कारण उड़ानें अरब सागर, ओमान और खाड़ी के दक्षिणी रास्तों से घूमकर जा रही हैं, ताकि ईरान के एयरस्पेस से बचा जा सके.

यूरोप के लिए, पहले उड़ानें पश्चिम एशिया के ऊपर से जाती थीं. अब एयरलाइंस ओमान या अरब सागर के रास्ते खाड़ी में जाकर फिर तुर्की की ओर मुड़ती हैं. कुछ उड़ानों को अफ्रीका के ऊपर से भी जाना पड़ रहा है, जिससे ईंधन की खपत बहुत बढ़ रही है.

नॉर्थ अमेरिका (अमेरिका और कनाडा) के लिए, पहले विमान मध्य एशिया, रूस और आर्कटिक के ऊपर से या यूरोप के एयरस्पेस से जाते थे. जो उड़ान पहले दिल्ली से सीधे न्यूयॉर्क जाती थी, उसे अब रोम में रुकना पड़ रहा है. फिलहाल इस रूट पर एयर इंडिया उड़ानें चला रही है. इसी तरह, मुंबई-टोरंटो की उड़ान को यूरोप के रास्ते जाना पड़ रहा है, जिससे कम से कम 1.5 घंटे का समय बढ़ गया है.

सबसे ज्यादा किराया आखिरी समय की बुकिंग में बढ़ रहा है, लेकिन असर खास तौर पर लंबी दूरी की उड़ानों पर दिख रहा है, जहां उड़ानें लंबे रास्ते ले रही हैं और कई बार ईंधन भरने के लिए बीच में रुकना पड़ रहा है. इससे न सिर्फ यात्रियों का समय बढ़ रहा है, बल्कि एयरलाइंस की लागत भी बढ़ रही है.
एटीएफ की कीमत बढ़ने के अलावा, लंबे रास्तों का मतलब ज्यादा ईंधन खर्च, ज्यादा दूरी और ज्यादा क्रू व ऑपरेशन लागत है. ये सभी कारण उड़ानों को महंगा और सफर को लंबा बना रहे हैं.

भू-राजनीतिक तनाव का एक असर यह भी है कि पश्चिम एशिया के “सुरक्षित” रास्तों में भीड़ बढ़ गई है. इससे उड़ानों का समय कई घंटों तक बढ़ गया है और कुछ उड़ानों को ईंधन भरने के लिए तकनीकी स्टॉप लेना पड़ रहा है.
उदाहरण के लिए: दिल्ली-शिकागो की उड़ान, जो आमतौर पर करीब 15 घंटे लेती थी, अब 19 से 36 घंटे तक लग रही है और कम से कम एक स्टॉप लेना पड़ रहा है. दिल्ली-लंदन रूट पर भी समय बढ़ गया है, जहां पहले 8.5 से 9 घंटे लगते थे, अब 11 से 13 घंटे लग रहे हैं क्योंकि एयरलाइंस को अरब सागर के ऊपर से लंबा रास्ता लेना पड़ रहा है.
दिल्ली से न्यूयॉर्क की ज्यादातर उड़ानें अब औसतन 15 से 21 घंटे ले रही हैं. पेरिस, फ्रैंकफर्ट, एम्स्टर्डम, ज्यूरिख, विएना, शिकागो, टोरंटो और वैंकूवर जैसी जगहों की उड़ानें भी प्रभावित हुई हैं.

बड़े आर्थिक असर
इस साल, भारतीय एयरलाइंस आने वाले समर शेड्यूल (यानी 29 मार्च से 24 अक्टूबर तक) में कम उड़ानें चलाएंगी. खाड़ी क्षेत्र की स्थिति के कारण बढ़ती लागत और अनिश्चितता के बीच, भारतीय एयरलाइंस हर हफ्ते (या मार्च से अक्टूबर की अवधि में) करीब 3,000 कम उड़ानें संचालित करेंगी.
भारत आने-जाने वाली उड़ानों में रुकावट से भारतीय और वैश्विक एयरलाइंस को हर हफ्ते करीब 8.75 अरब डॉलर (80,500 करोड़ रुपये) का नुकसान होने का अनुमान है. इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के मुताबिक, एयरस्पेस बंद होने से तिमाही में एयरलाइंस की ऑपरेशन लागत करीब 30 प्रतिशत तक बढ़ सकती है.
एविएशन एक्सपर्ट और Avialaz Consultants के सीईओ संजय लाजर ने दिप्रिंट को बताया, “हम आने वाले तीन से पांच महीने को मुश्किल मान रहे हैं, जिसमें पीक समर सीजन भी प्रभावित होगा. घरेलू बाज़ार और फार ईस्ट रूट कुछ सहारा दे रहे हैं, लेकिन एटीएफ की ऊंची कीमत चिंता बनी हुई है. एयरलाइंस पहले ही अपने समर शेड्यूल से करीब 3,000 उड़ानें कम कर चुकी हैं.”
कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानें चलाने वाली एयरलाइंस के सूत्रों ने कहा कि इस स्थिति से लगातार नुकसान बढ़ रहा है और यह साफ नहीं है कि एयरलाइंस कब सामान्य संचालन पर लौटेंगी.
एक सूत्र ने दिप्रिंट को बताया, “इंश्योरेंस प्रीमियम बहुत ज्यादा हैं, जबकि नैरो बॉडी फ्लाइट्स की ऑपरेशन लागत एक राउंड ट्रिप में 30 लाख रुपये तक है, और बड़े वाइड बॉडी विमान के लिए प्रीमियम 90 लाख रुपये तक पहुंच रहा है. इससे किराए में बड़ी बढ़ोतरी होगी, जो यात्रियों को हतोत्साहित करेगी.”
एक अन्य सूत्र ने कहा कि पश्चिम एशिया के लिए उड़ानें बिना तय शेड्यूल के चल रही हैं, लगभग खाली जा रही हैं और कई सेट क्रू के साथ उड़ान भर रही हैं क्योंकि FDTL (फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन) के नियम भारत और पश्चिम एशिया के देशों में अलग हैं, जिससे एयरलाइंस का नुकसान और बढ़ रहा है.
यात्री ‘बेबस’
अबू धाबी में रहने वाली मैनेजमेंट एग्जीक्यूटिव विजेता श्रीवास्तव अपने पिता की पुण्यतिथि पर पुणे में परिवार के साथ रहने की योजना बना रही थीं. उन्होंने 3 मार्च की यात्रा के लिए टिकट बुक किया था, लेकिन आखिरी समय में उनकी फ्लाइट पहले रीशेड्यूल हुई और फिर कैंसिल हो गई.
उन्होंने फोन पर दिप्रिंट से कहा. “मेरी मां बिल्कुल अकेली हैं. मैंने उन्हें दो साल से नहीं देखा और मैं इतने निजी मौके पर भी उनके साथ नहीं हो पाई. एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब मैंने खुद को बेबस महसूस न किया हो.”
कई अन्य लोग भी अचानक कैंसिलेशन और रुकावटों के कारण बिना तैयारी के फंस गए हैं क्योंकि एयरस्पेस बंद होने से उड़ानें अपने सामान्य रास्तों पर नहीं चल रही हैं.
इंजीनियर सुनील गुप्ता ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी फ्लाइट के आखिरी समय में कैंसिल होने पर नाराजगी जताई. उन्होंने कहा कि वे बिना पैसे, बिना मदद और बिना जानकारी के फंस गए.
उन्होंने पोस्ट किया, “मैं मॉस्को एयरपोर्ट पर पूरी तरह फंसा हुआ हूं…अकेला और बेबस. एयरलाइन या बुकिंग प्लेटफॉर्म से कोई जवाब नहीं दे रहा. मेरे पास पैसे नहीं बचे—खाने या पानी के लिए भी नहीं. मुझे नहीं पता मैं घर कैसे पहुंचूंगा.”
I’m completely stranded at Moscow airport… alone, helpless, and running out of hope.
No one from @makemytripcare or @etihad is answering my desperate messages.
Russia doesn’t accept Visa or Mastercard anymore.
I have ZERO cash left. Not even for food or water.The Etihad…
— Sunil Gupta (@HeySunilGupta) March 2, 2026
‘अभूतपूर्व’
एक वरिष्ठ अधिकारी, जो पिछले 30 साल से एक एयरलाइन में ऑपरेशन संभाल रहे हैं, ने इस स्थिति को “अभूतपूर्व” बताया. उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “हमने 40 साल में ऐसा खराब समय नहीं देखा. नुकसान बढ़ता जा रहा है और यह भी साफ नहीं है कि हालात कब बेहतर होंगे; किसी ने ऐसा होने की उम्मीद नहीं की थी.”
घरेलू क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA ने भारत के एविएशन सेक्टर के लिए अपना रुख स्थिर से बदलकर नकारात्मक कर दिया है. एजेंसी ने 2026 वित्तीय वर्ष में 170-180 अरब रुपये के नेट नुकसान का अनुमान लगाया है.
एजेंसी ने यह भी कहा कि अतिरिक्त एयरपोर्ट चार्ज, फ्लाइट कैंसिलेशन, लंबी दूरी की कुछ अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के रूट बदलने और युद्ध के कारण मुद्रा में गिरावट की वजह से 2026 में इंडस्ट्री का इंटरेस्ट कवर 2025 के 1.8 गुना से घटकर 0.7-0.9 गुना रह सकता है.
एक अंदरूनी सूत्र ने कहा, “हर बाज़ार की एक सीमा होती है…आप कीमतें बहुत ज्यादा नहीं बढ़ा सकते, नहीं तो कमाई भी नहीं होगी.”
सेफ्टी मैटर्स फाउंडेशन के संस्थापक अमित सिंह ने कहा कि एविएशन सेक्टर को लंबे समय तक रुकावट के लिए तैयार रहना चाहिए.
उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “न सिर्फ ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी, बल्कि गैर-लाभकारी रूट्स, सुरक्षा बढ़ाने और GPS बंद होने से लागत बढ़ेगी. यह भारत की एयरलाइंस के लिए एक मौका भी है कि वे मध्य पूर्व के हब की जगह अपना हब बना सकें.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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