नई दिल्ली: अर्थशास्त्री और केंद्र सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग के सदस्य अरविंद विरमानी के एक शुरुआती पेपर में कहा गया है कि भारत का स्कूल सिस्टम ऐसे सर्टिफिकेट देता है जो पढ़ाई का सही संकेत नहीं देते और शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून, जिसका मकसद अच्छी शिक्षा तक पहुंच बढ़ाना था, उसने असल में पढ़ाई के नतीजों को खराब किया है.
इसके अलावा, पेपर के मुताबिक भारत के कई अमीर राज्य बुनियादी पढ़ाई की स्किल में पीछे जा रहे हैं. सरकारी व्यावसायिक संस्थानों की बात करें तो आईटीआई के आधे से कम और पॉलिटेक्निक के एक-तिहाई से भी कम छात्र नौकरी के लायक माने जा सकते हैं.
मार्च में प्रकाशित इस पेपर—‘Education and Skilling for Employment: From Credentials to Learning Outcomes’ में भारत की शिक्षा प्रणाली का डेटा के आधार पर आकलन किया गया है, जिसकी बातें आरटीई और नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (एनईपी) 2020 के साथ जुड़ी प्रगति की कहानी से मेल नहीं खातीं.
इसकी शुरुआत में कहा गया है: “अगर प्राइमरी, लोअर सेकेंडरी और अपर सेकेंडरी स्कूल के सर्टिफिकेट सिर्फ यह दिखाते हैं कि छात्र ने कितने साल स्कूल में बिताए और ज्यादातर छात्रों में पढ़ने और गणित की न्यूनतम क्षमता नहीं है, तो शिक्षा को इन सर्टिफिकेट से नहीं मापा जा सकता.” ऐसे सर्टिफिकेट “ज़रूरी नहीं कि मानव संसाधन तैयार करें.”
पेपर भारतीय शिक्षा की एक अलग तस्वीर दिखाता है. इसमें कहा गया है कि देश की बड़ी आबादी के कारण, भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त वयस्कों (जिन्होंने ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया है) की संख्या “चीन के बाद दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा” है. वहीं ग्रामीण इलाकों में, कक्षा 6 के 42 प्रतिशत, कक्षा 7 के 36 प्रतिशत और कक्षा 8 के 29 प्रतिशत छात्र कक्षा 2 के स्तर का पाठ नहीं पढ़ सकते और कक्षा 6 के 64 प्रतिशत, कक्षा 7 के 59 प्रतिशत और कक्षा 8 के 54 प्रतिशत छात्र गणित में भाग नहीं कर सकते.
लेखक ने यह भी कहा है कि एनईपी 2020 के तहत 100 प्रतिशत बुनियादी साक्षरता और गणना (FLN) का लक्ष्य हासिल करना राज्यों के लिए बड़ी चुनौती होगा, जिसकी 2025 की समय सीमा पहले ही निकल चुकी है.
भारत में पढ़ाई के नतीजों की तस्वीर बनाने के लिए, पेपर ने कई सर्वे के ताजा डेटा का इस्तेमाल किया है—जैसे ASER, NAS, FLS और PARAKH राष्ट्रीय सर्वेक्षण (PRS) के 2006 से 2024 तक के आंकड़े. अंतरराष्ट्रीय तुलना के लिए वर्ल्ड बैंक के वर्ल्ड डेवलपमेंट इंडिकेटर्स (WDI) का डेटा लिया गया है. इस अध्ययन में निजी और सरकारी दोनों संस्थानों को शामिल किया गया है.
लेखक अरविंद विरमानी एक मैक्रो अर्थशास्त्री हैं, जिन्होंने 1990 और 2000 के दशक के आर्थिक सुधारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. वे पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार और योजना आयोग में प्रमुख सलाहकार रह चुके हैं.
हालांकि, इसे ‘नीति वर्किंग पेपर’ के रूप में प्रकाशित किया गया है, लेकिन इसमें यह भी लिखा है कि इसमें व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.
आरटीई पर सवाल
पेपर का सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील हिस्सा आरटीई कानून का आकलन है. 2009 में यूपीए सरकार के समय पास हुआ यह कानून बाद की सरकारों में ज्यादा बदला नहीं गया. आरटीई ने मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया और सभी स्कूलों—सरकारी, प्राइवेट सहायता प्राप्त और एनजीओ के लिए न्यूनतम मानक, ज्यादा वेतन और प्रशासनिक नियम तय किए.
पेपर में सर्वे डेटा (ASER रिपोर्ट 2006, 2010, 2018) के जरिए दिखाया गया है कि RTE के बाद (2010–2018) पढ़ाई में गिरावट तेज़ हुई. कक्षा 3 में, जहां गणित की स्किल पहले ही गिर रही थी, वहां घटाव कर पाने वाले बच्चों का प्रतिशत आरटीई के बाद 8.3 प्रतिशत और गिर गया. कक्षा 8 में, पढ़ने की न्यूनतम क्षमता 10 प्रतिशत से ज्यादा कम हो गई. लोअर सेकेंडरी में गणित की स्थिति और तेजी से खराब हुई.
पेपर में कहा गया है, “आरटीई का कुल मिलाकर पढ़ाई के नतीजों पर नकारात्मक असर दिखता है, जिससे पढ़ने और गणित दोनों की न्यूनतम क्षमता प्रभावित हुई. RTE से पहले (2006–2010) कुछ कक्षाओं में गिरावट के साथ स्थिरता थी, लेकिन आरटीई के बाद (2010–2018) ज्यादातर कक्षाओं में ज्यादा गिरावट देखी गई.”
लेखक ने आरटीई के कारण स्कूल बंद होने का भी जिक्र किया है. आरटीई के “कड़े” नियम, जैसे शिक्षक की योग्यता, इंफ्रास्ट्रक्चर और फीस—कम फीस वाले निजी स्कूलों और एनजीओ स्कूलों के लिए लागू करना मुश्किल था, जो गरीब परिवारों के बच्चों को पढ़ाते थे.
पेपर में दिए गए नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस के डेटा के मुताबिक, अक्टूबर 2016 तक 9,300 से ज्यादा निजी स्कूलों को बंद करने की चेतावनी मिली; 7,898 को बंद करने का नोटिस मिला; और 3,332 स्कूल बंद हो चुके थे—ये आंकड़े सिर्फ तीन राज्यों के हैं.
पेपर के एक फुटनोट में कहा गया है: “यह आंशिक रूप से छात्रों की संख्या कम होने की वजह से था, क्योंकि एनजीओ/एनपीओ स्कूल बंद हो गए.”
‘पैसा पढ़ाई नहीं सुधारता’
पेपर का राज्यों के बीच का विश्लेषण शिक्षा खर्च पर सीधा सवाल उठाता है. भारत के राज्यों में, प्रति व्यक्ति आय और प्राइमरी स्कूल के पढ़ाई के नतीजों के बीच कोई संबंध नहीं है. कक्षा 5 में पढ़ने की क्षमता और प्रति व्यक्ति आय के बीच संबंध 0.16 है. गणित के लिए यह नकारात्मक है: -0.08.
पेपर में कहा गया, “ऐसा कोई सबूत नहीं है कि स्कूल का इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षक की सैलरी या बच्चों के परिवार को दी जाने वाली सहायता, प्राइमरी और लोअर सेकेंडरी स्तर पर पढ़ाई को बेहतर बनाती है.”
2018 से 2024 के बीच छात्र-शिक्षक अनुपात बेहतर हुआ—प्राइमरी स्कूल में यह 27 से घटकर 20 हो गया और प्रशिक्षित शिक्षकों का प्रतिशत 20 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा. लेकिन इसका यह असर नहीं पड़ा कि बच्चे पढ़ या गणित कर सकें. राज्यों में छात्र-शिक्षक अनुपात और गणित की क्षमता के बीच संबंध 0.03 था; पढ़ने की क्षमता के लिए यह -0.09 था. पेपर ने 2024 के UDISE+ डेटा और ASER 2024 के डेटा की तुलना की है.
पेपर में दिए गए अंतरराष्ट्रीय उदाहरण भी यही दिखाते हैं. इंडोनेशिया में, शिक्षकों की सैलरी बढ़ाने के बाद भी तीन साल में छात्रों की पढ़ाई (गणित, भाषा, विज्ञान) में कोई सुधार नहीं हुआ. “हालांकि, शिक्षकों की संतुष्टि बढ़ी, आर्थिक तनाव कम हुआ और दूसरे काम कम हुए.” पेपर में शोधकर्ताओं का कारण भी बताया गया है: “सरकारी सिस्टम में, जहां नौकरी सुरक्षित होती है और जवाबदेही कम होती है, बिना शर्त वेतन बढ़ाने से उत्पादकता नहीं बढ़ती.”
पेपर के मुताबिक, जो काम करता है, वह है पढ़ाने का तरीका. खासकर सही स्तर पर पढ़ाना—बच्चों को उम्र या कक्षा के बजाय उनकी असली क्षमता के अनुसार समूह में बांटना और नियमित टेस्ट लेकर पीछे रह रहे बच्चों की पहचान करना और उनकी मदद करना.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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