बारामूला: टी ने 2022 में पाकिस्तान से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की, लेकिन भारत में उनकी डिग्री को मान्यता नहीं है, जिससे वह सिर्फ 12वीं पास के बराबर रह गई हैं. इसके बीच की सारी चीज़ें, उनके मेडिकल कॉलेज के पांच साल, एक साल की ‘ज़रूरी’ इंटर्नशिप, पाकिस्तान के फैसलाबाद में उनका रहना और कश्मीर लौटना—सब शक के घेरे में हैं. अब उनकी डिग्री बारामूला में उनके घर में एक सजावट के कागज़ की तरह टंगी हुई है.
अपने हाथ मलते हुए 28 साल की टी ने कहा, “मेरी एमबीबीएस डिग्री भारत में मान्य नहीं है. मैं यहां प्रैक्टिस नहीं कर सकती. पिछले तीन सालों से मैं अपने कमरे में बंद हूं, बेरोजगार.” दिप्रिंट से बात करते समय टी साफ तौर पर घबराई हुई दिख रही थीं. उन्होंने कहा कि यह घबराहट उनके भविष्य को लेकर अनिश्चितता की वजह से है.
जब टी 2023 में कश्मीर लौटीं, तो उनके फोन पर सुरक्षा अधिकारियों के कॉल आने लगे, इसके बाद पाकिस्तान में उनके रहने को लेकर कड़ी पूछताछ हुई. ये कॉल जल्दी ही हर महीने उनके घर आने वाली विजिट में बदल गए. उनका वीजा, एमबीबीएस डिग्री और उनके परिवार के पिछले छह सालों के बैंक रिकॉर्ड की जांच की गई. उन्हें बताया गया कि यह सुरक्षा मंजूरी के लिए है, लेकिन यह ‘मंजूरी’ कभी नहीं मिली.
ऐसी सैकड़ों डिग्रियां अब नरेंद्र मोदी के भारत में शक, सुरक्षा चिंता और बदनामी के बीच फंसी हुई हैं. जो चीज़ पहले कश्मीर की अलगाववादी राजनीति में सामान्य मानी जाती थी, जहां सीमाओं को नहीं माना जाता था, आज वही अस्वीकार्य बन गई है.
कश्मीरी छात्र 2000 के शुरुआती सालों से एमबीबीएस के लिए पाकिस्तान जाने लगे. पाकिस्तान ने कश्मीर के छात्रों के लिए सभी प्रोफेशनल कोर्स, खासकर एमबीबीएस और इंजीनियरिंग में विशेष कोटा दिया, जिसमें रहने और फीस का खर्च शामिल था. यह व्यवस्था हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेताओं जैसे सैयद अली शाह गिलानी द्वारा आसान बनाई गई, जो सिफारिशी पत्र देते थे.
शुरुआत में प्राथमिकता मिलिटेंट्स के परिवारों, कश्मीर में सुरक्षा बलों द्वारा मारे गए लोगों के परिवारों और अलगाववादी समूहों से जुड़े लोगों को दी जाती थी. इनमें से ज्यादातर छात्र कश्मीर लौटने के बाद बेसिक सुरक्षा जांच के बाद मेडिकल सिस्टम में शामिल हो जाते थे.
समय के साथ दायरा बढ़ा. जल्द ही ऐसे छात्र भी पाकिस्तान जाने लगे जिनका अलगाववाद से कोई संबंध नहीं था और जो क्षेत्रीय या राष्ट्रीय मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में सीट नहीं पा सके. जो डिग्री उन्हें यहां बहुत महंगी पड़ती, वह पड़ोसी देश में 5-6 लाख रुपये में मिल जाती थी. हर साल करीब 50 छात्र मेडिकल पढ़ने पाकिस्तान जाते थे.
जल्द ही आरोप सामने आए कि अलगाववादी पाकिस्तान में एडमिशन दिलाने के लिए छात्रों से पैसे मांग रहे हैं.
पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “यह पाकिस्तान की कोशिश थी कि खास पैकेज देकर कश्मीरियों के बीच अपने लिए नरमी पैदा करे. हुर्रियत के नेता और एजेंट, जो कम कीमत पर ये सीटें बेचते थे, अपने लिए बड़ी रकम मांगते थे. एमबीबीएस की डिग्री लगभग बिना खर्च के पाने की चाह में छात्र परिवार यह पैसा दे देते थे.”
‘मैंने पूरी तरह अधिकारियों का सहयोग किया’
हालांकि, नीतियां जल्द ही बदल गईं. 2019 में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) और ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के संस्थानों की डिग्रियों को अमान्य घोषित कर दिया. यह फैसला उस समय आया जब 25 छात्रों ने इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में अपनी डिग्रियों का सत्यापन कराने की कोशिश की.
2020 में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने कहा कि पीओके की डिग्रियां भारत में मान्य नहीं होंगी. यह फैसला उस समय आया जब तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान कश्मीरी छात्रों के लिए करीब 1600 सीटें देने की योजना बना रहे थे.
2021 में जम्मू-कश्मीर की स्टेट इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी (एसआईए) ने नौ लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की, जिन पर कश्मीरी छात्रों को पाकिस्तान में एमबीबीएस सीटें ऊंची कीमत पर बेचने का आरोप था. जांच में पाया गया कि अलगाववादी समूह इस पैसे का इस्तेमाल कश्मीर में अशांति फैलाने के लिए कर रहे थे, जिसमें प्रतिबंधित हिजबुल मुजाहिदीन के पोस्टर बॉय बुरहान वानी की मौत के बाद हुई अशांति भी शामिल थी.
पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “उदाहरण के लिए, एमबीबीएस की डिग्री की कीमत 6 लाख रुपये होती थी, लेकिन अलगाववादी 20 लाख रुपये मांगते थे, जिसमें से 15 लाख खुद रख लेते थे.”
एक साल बाद, नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) ने एक सार्वजनिक नोटिस जारी कर छात्रों को पाकिस्तान में मेडिकल पढ़ाई करने से चेतावनी दी. नोटिस में कहा गया, “कोई भी भारतीय नागरिक/ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया जो पाकिस्तान के किसी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस/बीडीएस या समान कोर्स में एडमिशन लेगा, वह FMGE परीक्षा देने या भारत में नौकरी पाने के लिए पात्र नहीं होगा…”
साथ ही यह भी लिखा था कि दिसंबर 2018 से पहले एमएचए की सुरक्षा मंजूरी लेकर पाकिस्तान के कॉलेजों में दाखिला लेने वालों के लिए छूट दी गई है.
लेकिन टी 2016 में पाकिस्तान गई थी. वह अभी भी एमएचए से सुरक्षा मंजूरी का इंतज़ार कर रही हैं. 2014-2018 बैच के करीब 256 ग्रेजुएट्स भारत में प्रैक्टिस करने के लिए मंजूरी के इंकज़ार में हैं.
शुरुआत में, जब सुरक्षा अधिकारियों ने टी से संपर्क किया, तो उसे बताया गया कि वे आतंक फंडिंग के लिए उसकी जानकारी की जांच कर रहे हैं.
टी ने कहा, “मैंने अधिकारियों का पूरा सहयोग किया और उन्होंने जो भी मांगा, सब दिया, यहां तक कि अपने परिवार की ज़मीन के कागज़ भी, लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला.” उन्होंने बताया कि जब वह एमबीबीएस करने पाकिस्तान गई थीं, तब वह 18 साल की थीं.
10 नवंबर का काला दिन
पिछले सितंबर में, तीन दर्जन से ज़्यादा छात्रों को क्लीयरेंस लेटर मिला. जब उनके फोन पर मैसेज आया, तो उन्हें अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ. वे बार-बार मेल पढ़ते रहे. उनमें टी की एक दोस्त भी थी, जो भावुक होकर घंटों रोती रहीं.
उस मेल ने टी के दिल में उम्मीद जगा दी. अब उन्हें लगा कि उनका क्लीयरेंस लेटर भी जल्द आ जाएगा, लेकिन फिर 10 नवंबर हो गया. विस्फोटकों से भरी एक कार लाल किले के पास फट गई, जिसमें दर्जन भर से ज़्यादा लोग मारे गए. इस हमले के केंद्र में पुलवामा का आत्मघाती हमलावर उमर उन नबी था. नबी भी एक डॉक्टर था. इस घटना के बाद सुरक्षा मंजूरी फिर रुक गई और जांच की प्रक्रिया दोबारा शुरू हो गई.
पुलिस अधिकारी ने कहा, “रेड फोर्ट हमले के बाद ये कश्मीरी छात्र फिर से शक के दायरे में आ गए क्योंकि आरोपी भी एक डॉक्टर था, हालांकि, उसने पाकिस्तान से पढ़ाई नहीं की थी, लेकिन पुलिस ने पाकिस्तान से जुड़ी हर चीज़ पर निगरानी बढ़ा दी.” उन्होंने बताया कि हमले से पहले गृह मंत्रालय 50 से ज़्यादा सुरक्षा मंजूरियां दे चुका था.
टी ने कहा कि खबर देखने के बाद उनकी पहली प्रतिक्रिया डर थी कि इस घटना की छाया उस पर और बाकी छात्रों पर भी पड़ेगी.
उन्होंने कहा, “सब लोग परेशान थे. इस दुखद घटना ने मेडिकल क्षेत्र के सभी कश्मीरियों को शक के घेरे में ला दिया.”
घटना के बाद दिल्ली पुलिस ने निजी अस्पतालों से उन डॉक्टरों की जानकारी मांगी थी जिन्होंने पाकिस्तान, बांग्लादेश, यूएई और चीन से एमबीबीएस की डिग्री ली थी.

छात्रों ने कहा कि उनकी ज़िंदगी थम सी गई है. 20 के आखिरी सालों में पहुंचे लड़के बेरोज़गार हैं और अब परिवारों को शादी के रिश्ते ढूंढने में भी परेशानी हो रही है. लड़कियों को भी संभावित रिश्तों से इसलिए मना किया जा रहा है क्योंकि लोग पाकिस्तान से किसी भी संबंध और उससे होने वाली परेशानी से डरते हैं.
कई छात्रों के माता-पिता का कहना है कि उनके बच्चे डिप्रेशन में चले गए हैं. बारामूला के पूर्व म्युनिसिपल काउंसिल अध्यक्ष तौसीफ रैना ने कहा कि हुर्रियत नेताओं के किए की सजा छात्रों को नहीं मिलनी चाहिए.
रैना ने कहा, “हुर्रियत नेताओं ने जो किया, उसकी छाया इन छात्रों पर नहीं पड़नी चाहिए. ये लगभग एक दशक से सुरक्षा मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं. अगर सुरक्षा जांच में ये छात्र निर्दोष पाए गए हैं, तो उनकी डिग्रियों को मान्यता मिलनी चाहिए.”
इनमें से कुछ छात्र अभी भी निजी अस्पतालों में 6,000-8,000 रुपये पर काम कर रहे हैं. आसपास के लोग उनसे सहानुभूति रखते हैं, लेकिन वे सिर्फ शुरुआती इलाज जैसे छोटे काम कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास लाइसेंस नहीं है और व्यावहारिक अनुभव भी नहीं है.
बिखरे हुए सपने
जब टी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के फैसलाबाद में एमबीबीएस कर रही थीं, तब वह अकेली नहीं थीं. वहां उमके साथ कम से कम 30 और कश्मीरी छात्र थे. वे साथ रहते थे और सिर्फ जगह ही नहीं, बल्कि एक सपना भी साझा करते थे—भारत में काम करने का सपना.
उन्होंने कहा, “हम हमेशा भारत की सेवा करना चाहते थे. मेरे स्कूल के कई सीनियर पाकिस्तान गए, वहां पढ़ाई की और लौटकर कश्मीर और भारत के दूसरे राज्यों में नामी डॉक्टर बने.”
आज, वह सपना बहुत छोटा होकर रह गया है. टी अब कॉल सेंटर में नौकरी करने पर विचार कर रही हैं. अपने फोन पर वह “12वीं पास के लिए नौकरी” के एआई सजेशन देखती हैं, जिसमें कॉल सेंटर एग्जीक्यूटिव से लेकर कंप्यूटर असिस्टेंट तक के विकल्प आते हैं.
उन्होंने कहा, “एक स्वतंत्र महिला बनने का सपना, गले में स्टेथोस्कोप के साथ, खत्म हो गया. 12वीं पास के लिए मार्केट में कोई नौकरी नहीं है.”
उनकी मां, जो सरकारी कर्मचारी हैं, हर जगह मदद मांग चुकी हैं.
उन्होंने रोते हुए कहा, “ऐसा कोई विभाग, कोई नेता नहीं बचा जिसके पास हम न गए हों. जिसका नाम लो, हम वहां जा चुके हैं.”
अनंतनाग में एक और एमबीबीएस छात्र के पिता भी ऐसी ही परेशानी झेल रहे हैं. हर महीने उन्हें सुरक्षा एजेंसियों से फोन आता है—कभी सीआईडी, कभी एसआईए और कभी दूसरी जांच एजेंसियों से और उनसे वही सवाल फिर पूछे जाते हैं.
60 साल के उस व्यक्ति ने कहा, “जब मैं पूछता हूं कि अब क्यों और याद दिलाता हूं कि मैं पिछले महीने ही आया था, तो वे कहते हैं, ‘एक बार आ जाओ, फिर से वही जवाब दे देना’.”

अब उन्हें सारे सवाल याद हो गए हैं: पाकिस्तान क्यों गए? आपका बेटा कहां पढ़ रहा था? आपने कितना पैसा दिया? वह कब लौटा?
उनका बेटा पीओके के एक कॉलेज में एमबीबीएस के दो साल पूरे कर चुका था, तभी यह नोटिफिकेशन आया, लेकिन वह वापस नहीं लौटा. इसके बजाय वह कराची के जिन्ना मेडिकल कॉलेज चला गया, जहां उसने 2024 में अपनी डिग्री पूरी की. अब उसने, उसके पिता ने और उनके सात सदस्यों वाले पूरे परिवार ने अपने बैंक रिकॉर्ड अधिकारियों को दिए हैं ताकि यह साबित हो सके कि कोई आतंक फंडिंग नहीं हुई.
उन्होंने पूछा, “और अब तक ऐसा कोई छात्र नहीं है जिसके खिलाफ आपराधिक मामला हो या विदेशी फंडिंग का आरोप हो. फिर हमारे साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है?”
‘मेरे पिता मिलिटेंट थे, मैं नहीं’
के सिर्फ छह महीने का था जब उसके पिता, जो हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर थे, 1990 के दशक में मारे गए. उसकी मां ने 2010 में दूसरी शादी कर ली. उसे अपने पिता की कोई याद नहीं है. सुरक्षा बलों और एजेंसियों की लगातार नज़र ने घाटी में के की ज़िंदगी को प्रभावित किया है.
लेकिन जब उसने पाकिस्तान में एमबीबीएस करने का फैसला किया, तो किसी ने उसे नहीं रोका. न वाघा बॉर्डर पर और न ही घाटी के अंदर सुरक्षा बलों ने.
उसने कहा, “हमें बॉर्डर पर कभी नहीं कहा गया कि पाकिस्तान मत जाओ.” के ने पाकिस्तान के सिंध के जमशोरो में लियाकत यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल एंड हेल्थ साइंसेज में दाखिला लिया. वह 2021 में वापस आया और उसी तरह की परेशानी झेल रहा है.
उसकी किस्मत में कुछ और ही था. 2022 से 2024 के बीच, के ने कम से कम चार बार पासपोर्ट के लिए आवेदन किया; हर बार उसका आवेदन बिना किसी वजह के खारिज हो गया और उसे जो एकमात्र कारण समझ में आता है, वह यह है कि उसके पिता मिलिटेंट थे.
उसने पूछा, “लेकिन अगर मेरे पिता मिलिटेंट थे, तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं भी मिलिटेंट हूं. मैंने अपने पिता को कभी देखा ही नहीं. वह मुझे कैसे प्रभावित कर सकते हैं?”
लेकिन अब उसने हार मान ली है. उसने खुद को छह महीने का समय दिया है कि अगर तब तक क्लीयरेंस नहीं मिला, तो वह गुज़ारा करने के लिए छोटे-मोटे मजदूरी के काम शुरू कर देगा.
जहां भारत में ये छात्र डॉक्टर नहीं माने जाते, वहीं उनकी पाकिस्तान की एमबीबीएस डिग्री आयरलैंड, यूके और दूसरे देशों में मान्य है. इसी वजह से बडगाम के एक और छात्र ने आयरिश मेडिकल काउंसिल (आईएमसी) में रजिस्ट्रेशन कराया. उसने रजिस्ट्रेशन के लिए 60,000 रुपये दिए और साथ ही पासपोर्ट के लिए आवेदन किया, लेकिन यह रजिस्ट्रेशन सिर्फ छह महीने के लिए मान्य है और पासपोर्ट अभी तक नहीं आया है.
और उसे यह भी नहीं पता कि अगर पासपोर्ट मिल भी गया, तो क्या वह ज़रूरी परीक्षा पास कर पाएगा क्योंकि उसके पास क्लिनिकल अनुभव नहीं है.
28 साल के इस युवक ने कहा, “जिस भी देश में मैं आवेदन कर रहा हूं, वे मुझसे गैप के बारे में पूछते हैं. अगर मैं उन्हें सुरक्षा क्लीयरेंस के बारे में बताऊं, तो वे मुझे कभी नौकरी नहीं देंगे.”
उसने जम्मू-कश्मीर कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (JKCET) दो बार दिया और .5 और .25 अंकों से रह गया. फिर उसने बीडीएस के लिए एक कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन उसके माता-पिता और रिश्तेदार कहते रहे कि उसे बांग्लादेश में एमबीबीएस करना चाहिए.
उसने अपनी लंबी दाढ़ी सहलाते हुए कहा, “कश्मीरी समाज डॉक्टर बनने को लेकर बहुत ज्यादा सोचता है. जब मैंने फीस देखी, तो वह मेरी पहुंच से बहुत ज्यादा थी. तभी एक पड़ोसी ने सुझाव दिया कि मैं एमबीबीएस के लिए पाकिस्तान जाऊं.”
टी बार-बार अपना फोन चेक करती हैं. वेबसाइट पर उनकी सुरक्षा मंजूरी के सामने अभी भी “awaiting” लिखा हुआ है.
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