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Friday, 17 April, 2026
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आर्टिकल 370 के बाद कश्मीर में ABVP की बढ़ती पकड़, छात्र राजनीति में बड़ा बदलाव

'2019 से पहले, यह स्वीकार करना भी मुश्किल था कि आप ABVP के साथ हैं. आज, मैं यह खुलेआम कहता हूं,' 25 वर्षीय अकील तांत्रे ने कहा, जो ABVP की कश्मीर शाखा का नेतृत्व करते हैं.

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श्रीनगर: नियंत्रण रेखा (LoC) से सटे कुपवाड़ा जिले के अपने साधारण कमरे में, आठवीं कक्षा के एक लड़के ने अपनी दीवार पर एक छोटा तिरंगा टांग दिया था. यह साल 2012 की बात है. यह अपने देश के प्रति उसके प्रेम का एक इज़हार था, लेकिन वह इसे खुलकर दिखाने का जोखिम नहीं उठा सकता था. उस समय कश्मीर में ऐसे प्रदर्शन न के बराबर होते थे और खतरनाक भी माने जाते थे. वही लड़का, अकील तांत्रे, आज 25 वर्षीय कश्मीरी मुस्लिम है और घाटी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के छात्र संगठन, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) का नेतृत्व कर रहा है.

“वक़्त बदल गया है. तब सार्वजनिक रूप से तिरंगा लहराने पर परेशानी हो सकती थी. अब ऐसा नहीं है,” तांत्रे, जो एबीवीपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी परिषद के सदस्य हैं, ने कहा. “2019 से पहले, यह स्वीकार करना भी मुश्किल था कि आप एबीवीपी के साथ हैं. आज मैं इसे खुले तौर पर कहता हूं.”

मुस्लिम-बहुल कश्मीर में एबीवीपी धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है. इसके नेता अब एक अप्रत्याशित वर्ग से सामने आ रहे हैं—कश्मीरी मुसलमान. संगठन कैंपस में छात्रों की समस्याओं को उठाते हुए अपनी जड़ें मजबूत कर रहा है.

कश्मीर में एबीवीपी का स्वरूप दिल्ली या प्रयागराज के इसके समकक्ष संगठनों से बिल्कुल अलग है. श्रीनगर में स्थित इसके दफ्तर के बाहर भी इसकी मौजूदगी के कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलते.

इसने खुद को कश्मीर के हिसाब से ढाल लिया है—एक ऐसा क्षेत्र जहां छात्र सक्रियता को ऐतिहासिक रूप से या तो दबाया गया है या फिर बड़े संघर्ष का हिस्सा मानकर तुरंत राजनीतिक रंग दे दिया जाता है. यहां एबीवीपी आरएसएस की विचारधारा को बढ़ावा नहीं दे रही है. हिंदू राष्ट्र की कोई बात नहीं होती. शाखाएं नहीं लगतीं. इसके बजाय ध्यान कैंपस में मौजूदगी बढ़ाने और कैडर तैयार करने पर है. इसकी राजनीति छात्रों के मुद्दों तक सीमित रहती है—परीक्षा में देरी से लेकर आर्थिक तंगी तक.

उदाहरण के लिए, एबीवीपी के सदस्य उन छात्रों को सेकेंड-हैंड किताबें बांटते हैं जो उन्हें खरीद नहीं सकते, जिससे जमीनी स्तर पर भरोसा बनता है. पिछले साल, एबीवीपी कश्मीर ने घाटी से बाहर पढ़ रहे कश्मीरी छात्रों की मदद के लिए एक छात्र हेल्पलाइन शुरू की. इसने कई बार छात्र आंदोलनों का भी समर्थन किया है, जिनमें परीक्षाओं में देरी के खिलाफ प्रदर्शन शामिल हैं. साथ ही, यह छात्रों के साथ वैश्विक तापमान वृद्धि जैसे व्यापक मुद्दों पर भी संवाद कर रही है.

आरएसएस को अपनी मूल संस्था (पैरेंट बॉडी) होने के बावजूद, कश्मीर में छात्र संगठन एबीवीपी ने जानबूझकर बीजेपी से दूरी बनाए रखी है. चाहे कैंप आयोजित करना हो या सदस्यता अभियान चलाना, यह कभी बीजेपी से संपर्क नहीं करता.

इसके कुछ सदस्य मानते हैं कि उनके संगठन का नाम छात्रों को दूर कर सकता है. इसलिए वे शुरुआत में अपनी पहचान छिपाकर रखते हैं और स्टूडेंट्स फॉर सेवा, स्टूडेंट्स फॉर डेवलपमेंट और वॉइस ऑफ स्टूडेंट्स जैसे एबीवीपी-समर्थित मंचों के ज़रिए छात्रों तक पहुंचते हैं. जब वे छात्रों के बीच भरोसा बना लेते हैं, तब धीरे-धीरे अपनी असली पहचान बताते हैं.

An image posted on the ABVP Instagram from the Gen-Z Srinagar Youth Convention. | Mahira Khan
Gen-Z श्रीनगर यूथ कन्वेंशन से ABVP के इंस्टाग्राम पर पोस्ट की गई एक तस्वीर। | माहिरा खान

कश्मीर में एबीवीपी का उभार

अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद, जब कश्मीर कर्फ्यू और इंटरनेट बंदी के दौर से गुजर रहा था, ज़मीनी स्तर पर एक अलग तरह की हलचल शुरू हो चुकी थी. छात्र एबीवीपी से जुड़ने लगे. 2019 में संगठन के पास करीब 300 पंजीकृत छात्र सदस्य थे. 2026 तक यह संख्या बढ़कर 2,643 हो गई है.

एबीवीपी ने पहले ही कश्मीर विश्वविद्यालय, क्लस्टर विश्वविद्यालय और SKUAST में अपनी इकाइयां स्थापित कर ली हैं. तांत्रे के अनुसार, यह संगठन अमर सिंह कॉलेज, एसपी कॉलेज बेमिना और महिला कॉलेज सहित सात कॉलेजों में भी सक्रिय है.

छात्र संगठन ने कश्मीर के सभी दस जिलों में व्हाट्सऐप नेटवर्क तैयार किया है, जिसके माध्यम से छात्रों को आगामी कार्यक्रमों की जानकारी दी जाती है. यह Gen Z नेशन बिल्डिंग जैसे विषयों पर कार्यक्रम आयोजित कर रहा है और केवल टॉप करने वाले छात्रों को ही नहीं, बल्कि 75 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाले छात्रों को भी सम्मानित करता है.

“जब छात्र नेतृत्व करते हैं, तो देश आगे बढ़ता है,” एबीवीपी कश्मीर के सोशल मीडिया पेजों पर लिखा है.

और यह केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है, बल्कि घाटी से बाहर पढ़ रहे कश्मीरी छात्रों के मुद्दे भी उठा रहा है.

हालांकि, इसके कई सदस्य खुद को ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ बताकर अपनी पहचान छिपाते हैं. उन्हें ऐसे समाज में प्रतिक्रिया (बैकलैश) का डर है, जहां राष्ट्रवाद की अवधारणा अभी भी मज़बूती से जड़ नहीं पकड़ पाई है.

जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष नासिर खुएहामी, जो पिछले एक दशक से छात्र राजनीति में सक्रिय हैं, एबीवीपी के उभार को राजनीतिक खालीपन से जोड़ते हैं.

“अनुच्छेद 370 हटने के बाद हमने एक तरह का राजनीतिक अनाथपन देखा,” खुएहामी ने कहा. “कोई निर्वाचित सरकार नहीं थी. रोज़मर्रा के छात्र मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा था. पांच-छह साल तक कोई लोकतांत्रिक ढांचा नहीं था.”

उन्होंने कहा कि इस खालीपन में छात्र अपनी पहुंच बनाने लगे. “उन्हें लगा कि अगर उनकी समस्याएं सुनी जानी हैं, तो उन्हें सत्ता के करीब होना होगा. यहीं एबीवीपी सामने आई.”

पार्टी लाइन से परे, अन्य छात्र संगठन इस गति से पीछे रह गए. खुएहामी के अनुसार, मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के छात्र संगठन छात्र मुद्दों को सक्रिय रूप से उठाते हुए शायद ही दिखाई देते हैं.

“नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी या कांग्रेस—किसी के भी छात्र संगठन ने गंभीर रूप से विस्तार नहीं किया. एनएसयूआई लगभग निष्क्रिय है. यहां तक कि सत्ता में होने के बावजूद नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपने छात्र संगठन को मजबूत करने के लिए संसाधन नहीं लगाए. मैंने उन्हें लगातार छात्र मुद्दों—चाहे उत्पीड़न हो या डराने-धमकाने के मामले—उठाते हुए नहीं देखा,” उन्होंने कहा.

नेशनल कॉन्फ्रेंस का छात्र संगठन 2017 तक सक्रिय था, जिसके बाद उसे भंग कर दिया गया और इसके कई वरिष्ठ सदस्य युवा विंग में चले गए. पीडीपी भी इसी तरह के पैटर्न का पालन कर रही है, जहां उसका छात्र संगठन अधिकतर निष्क्रिय है.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक सदस्य ने कहा, “हम अपने छात्र संगठन को फिर से खड़ा करने पर काम कर रहे हैं. 2017 के बाद प्राथमिकताएं बदल गईं और छात्र मुद्दे पीछे चले गए. हालांकि, हमारी युवा विंग कश्मीर में सक्रिय है, जबकि छात्र विंग जम्मू में काम कर रही है.”

आरएसएस के राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर का कहना है कि कश्मीर में एबीवीपी की बढ़ती मौजूदगी के पीछे वर्षों का ज़मीनी काम और भरोसा बनाने की प्रक्रिया है.

“2003 में मैं राष्ट्रीय सचिव के रूप में कश्मीर गया था और वहां लोगों से मिला. हम देशभर में कश्मीरी छात्रों के संपर्क में भी रहे हैं, इसलिए यह ज़मीन तैयार करने की एक लंबी प्रक्रिया रही है,” आंबेकर ने कहा. “उस समय खुलकर सामने आने की कोई गुंजाइश नहीं थी, लेकिन जैसे-जैसे आतंकवाद कमजोर हुआ, हमारी मौजूदगी बढ़ती गई.”

तांत्रे के लिए वह दिन दूर नहीं जब कश्मीर में भी शाखाएं लगेंगी.

Akeel Tantray reading from the ABVP booklet on Chhatra Shakti (Student Power). | Mahira Khan
अकील तांत्रे छात्र शक्ति (छात्र शक्ति) पर एबीवीपी पुस्तिका से पढ़ रहे हैं | माहिरा खान

नेतृत्व कौन करता है?

श्रीनगर की एक संकरी गली में तांत्रे का किराए का मकान ही एबीवीपी का दफ्तर भी है, जो बीएसएफ के जवानों की लगातार निगरानी में चुपचाप काम करता है. यहां छात्र संगठन का कोई साइनबोर्ड या निशान नहीं है. राह चलते किसी व्यक्ति को यह बस एक आम घर ही लगेगा.

यहां तक कि इंटरनेट पर भी श्रीनगर में एबीवीपी दफ्तर की कोई स्पष्ट लोकेशन नहीं मिलती.

तांत्रे कश्मीर में एबीवीपी के पहले फुल-टाइमर हैं. उनका कहना है कि उन्होंने खुद को पूरी तरह संगठन को समर्पित कर दिया है. तांत्रे के मार्गदर्शन में अनंतनाग के 22 वर्षीय शाकिर राशिद भी फुल-टाइमर बने हैं. बारामुला का एक 20 वर्षीय पार्ट-टाइमर भी तांत्रे की राह पर चलना चाहता है.

तांत्रे ने अपने परिवार से दूरी बना ली है और काम की मांग के चलते शायद शादी भी न करें. पिछले दो सालों में उन्होंने अपने माता-पिता से केवल दो बार मुलाकात की है, वह भी गुप्त रूप से.

“मैं अपने माता-पिता को भी नहीं बताता कि मैं आ रहा हूं. मैं शाम को घर में दाखिल होता हूं और सुबह होने से पहले निकल जाता हूं. मैं नहीं चाहता कि मेरी पहचान से मेरे बूढ़े माता-पिता को कोई खतरा हो,” तांत्रे ने कहा.

जब भी वह तिरंगा रैली आयोजित करते हैं, उन्हें व्हाट्सऐप पर धमकियां मिलती हैं. उन्हें एक संदेश याद है जिसमें लिखा था, “करो तुम संघ का काम… हम तुम्हें देख लेंगे.” लेकिन वह पीछे नहीं हटते. वह बस ऐसे नंबरों को ब्लॉक कर देते हैं.

अब वह ऐसी धमकियों के आदी हो चुके हैं.

Akeel Tantray's complaint to the police regarding the threats he's received. | Mahira Khan
अकील तांत्रे की, उन्हें मिली धमकियों के संबंध में पुलिस में की गई शिकायत। | माहिरा खान

“ये धमकी भरे संदेश पाकिस्तान से आते हैं. कॉन्टैक्ट देखकर आसानी से समझ आ जाता है. लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए मैं पुलिस को जानकारी दे देता हूं,” तांत्रे ने कहा.

एक बार, तीन छात्र फेरन पहनकर उनके घर-सह-दफ्तर पहुंचे और उनसे मिलने की बात कही. उन्होंने कहा कि वे एक क्विज़ प्रतियोगिता आयोजित करना चाहते हैं. “उन्हें अंदर नहीं आने दिया गया. उनमें कुछ संदिग्ध लगा,” तांत्रे ने बताया.

2021 में जब वह फुल-टाइमर बने, तब भी वे पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे.

“मुझे लगा था कि मैं यह सिर्फ एक साल के लिए करूंगा,” उन्होंने कहा. लेकिन यह हिचकिचाहट ज्यादा दिन नहीं रही. उनका कहना है कि उन्हें अपने हिंदू साथियों के बीच बराबरी का दर्जा मिला और एक हिंदू संगठन में कभी भेदभाव महसूस नहीं हुआ.

अब वह एबीवीपी के प्रशिक्षण शिविरों और सत्रों में नियमित रूप से शामिल होते हैं. हाल ही में वह ऐसे ही एक शिविर के लिए राजस्थान के माउंट आबू गए थे.

इन शिविरों में, उनके अनुसार, प्रशिक्षण सिर्फ सामान्य जुटाव तक सीमित नहीं होता. कार्यकर्ताओं को छात्रों की समस्याओं को समझने, कैंपस के मुद्दों पर प्रतिक्रिया देने और जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने की ट्रेनिंग दी जाती है. यही ढांचा तांत्रे अब कश्मीर में लागू कर रहे हैं.

जमीनी काम पहले से ही शुरू हो चुका है. उनकी टीम 10,000 पेड़ लगाने के अभियान की तैयारी कर रही है, जिसे वह जल्द शुरू करने की योजना बना रहे हैं.

एबीवीपी उन मुद्दों को उठा रही है जो युवाओं से सीधे जुड़े हैं—रोजमर्रा की परेशानियों से लेकर जलवायु परिवर्तन जैसे बड़े सवालों तक. इस अभियान को भी ग्लोबल वार्मिंग के जवाब के तौर पर पेश किया गया है.

2019 में जब उन्होंने एबीवीपी जॉइन की थी, तब तांत्रे इतने मुखर और बेबाक स्वयंसेवक नहीं थे.

“उससे पहले मैं नतीजों को लेकर बहुत डरता था. लेकिन अब मुझे लगता है कि मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे युवाओं के साथ काम करने का मौका मिल रहा है.”

एबीवीपी में उनका प्रवेश पंजाब की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में उनके छात्र जीवन के दौरान हुआ. वह इसे अपने राष्ट्रवाद और उसे व्यक्त करने के मंच के संगम के रूप में देखते हैं. उन्होंने तेजी से संगठन में तरक्की की—जिला संगठन सचिव से राज्य सह-सचिव, फिर राष्ट्रीय कार्यकारिणी परिषद के सदस्य और अब प्रांत संगठन सचिव तक.

समय के साथ उनकी भाषा भी बदल गई. रोजमर्रा की बातचीत में उन्होंने ‘फूड’ की जगह ‘भोजन’ और ‘सॉरी’ की जगह ‘क्षमा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल शुरू कर दिया.

उनका उभार कश्मीर में एक स्थानीय मुस्लिम चेहरे को आगे लाने की संगठन की कोशिश को भी दर्शाता है. उनके सोशल मीडिया पर उन्हें उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के साथ देखा जा सकता है, जहां वे छात्र मुद्दों पर ज्ञापन सौंपते नजर आते हैं. उनके साथ जुड़ने वाले छात्रों के लिए यह सत्ता के करीब होने का संकेत भी देता है.

एक कश्मीर विश्वविद्यालय के छात्र ने, गुमनाम रहने की शर्त पर, कहा, “अगर वे हमारा काम कराते हैं, तो हम एबीवीपी के पास जाएंगे. इसका मतलब यह नहीं कि हम उनकी विचारधारा से सहमत हैं.”

तांत्रे, अन्य सदस्यों की तरह, एक स्पष्ट अंतर बताते हैं. उनके अनुसार, एबीवीपी बीजेपी नहीं है. “हमारा राजनीतिक पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है. हम अलग हैं,” वह जोर देकर कहते हैं.

The BJP office in Kashmir. | Mahira Khan
कश्मीर में भाजपा कार्यालय। | माहिरा खान

उभरता हुआ बारामुला

शाहिद नज़ीर (25) ने 2025 में एबीवीपी जॉइन की. उससे पहले भी वह बारामुला में एक एक्टिविस्ट के रूप में युवाओं के मुद्दे उठाते थे और जरूरतमंदों की मदद करते थे. शहर में हर कोई उन्हें एक भरोसेमंद शख्स के रूप में जानता था. एबीवीपी से जुड़ने के बाद उन्हें एक मंच मिला. अब वह सेमिनार आयोजित कर सकते थे और छात्रों से एक औपचारिक पहचान के साथ मिल सकते थे.

“अब जब मैं सेमिनार आयोजित करता हूं, तो छात्र मुझे ज्यादा सम्मान से देखते हैं. मैं हमेशा से राष्ट्रवादी था. एबीवीपी ने सिर्फ मेरे व्यक्तित्व को और निखारा है,” नज़ीर ने कहा.

उनके सेमिनारों में अक्सर आईपीएस और केपीएस अधिकारियों के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता भी पैनल में शामिल होते हैं. एक रक्तदान सम्मान समारोह में पोस्टर पर बीआर आंबेडकर की तस्वीर के साथ एबीवीपी के मशाल चिन्ह को भी दिखाया गया था. अतिथियों की सूची में केपीएस अधिकारी राजा जुहैब, आईपीएस जीवी चक्रवर्ती और सामाजिक कार्यकर्ता आबिदा वार शामिल थे.

हालांकि, नज़ीर ने एबीवीपी से जुड़ने से पहले पूरी जानकारी जुटाई थी. उनका कहना है कि उन्होंने संगठन की विचारधारा और उसकी हिंदू जड़ों को समझते हुए ही इसमें शामिल होने का फैसला किया.

एबीवीपी का उभार मुख्यधारा के छात्र और युवा संगठनों से बढ़ती निराशा से भी जुड़ा है. कैंपस में पारंपरिक राजनीतिक संगठनों को भाई-भतीजावाद और निष्क्रियता के रूप में देखा जाता है. ऐसे में एबीवीपी खुद को उस खाली जगह को भरने वाले संगठन के रूप में पेश करती है.

बारामुला के एक 20 वर्षीय मुस्लिम एबीवीपी सदस्य ने कहा, “हमें पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस में कोई भविष्य नहीं दिखता. वे सिर्फ अपने लोगों को आगे बढ़ाते हैं. लेकिन एबीवीपी में ऐसा नहीं है.”

A recruitment poster for ABVP Baramulla | Mahira Khan
ABVP बारामूला के लिए एक भर्ती पोस्टर | माहिरा खान

2025 में बारामुला में एबीवीपी से जुड़े छात्रों की संख्या सिर्फ आधा दर्जन थी. आज यह बढ़कर 70 हो गई है. व्हाट्सऐप ग्रुप्स में “बारामुला में छात्र आंदोलन पहले से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है” जैसे संदेश लगातार साझा किए जा रहे हैं. इसके साथ ही एबीवीपी बारामुला का इंस्टाग्राम पेज भी शुरू हुआ, जिसे हर महीने 20 हजार से अधिक व्यूज़ मिलते हैं, जबकि फॉलोअर्स की संख्या अभी भी दर्जनों में है.

एबीवीपी एक आक्रामक आउटरीच प्रोग्राम चला रही है, जो मुख्य रूप से सोशल मीडिया के जरिए संचालित होता है. जिला स्तर के सेमिनार पोस्टरों पर क्यूआर कोड होते हैं, जो छात्रों को गूगल फॉर्म तक ले जाते हैं, जहां वे अपनी जानकारी दर्ज करते हैं. इसके बाद ऑफलाइन मीटिंग्स के जरिए उनसे संपर्क किया जाता है और संगठन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया जाता है. ये सेमिनार दोहरे उद्देश्य निभाते हैं—एक तरफ छात्रों को सम्मानित करना और दूसरी तरफ नए सदस्यों को जोड़ना.

कुछ छात्रों के लिए एबीवीपी बदलाव का मंच बनकर उभरी है. यही वजह है कि राजू शौकत भी इससे जुड़े. 19 वर्षीय शौकत पहले संकोच और झिझकने वाले थे. वह कक्षा में बोलने से कतराते थे, बहसों में संघर्ष करते थे और अक्सर मजाक का पात्र बनते थे.

लेकिन नज़ीर से मिलने और एबीवीपी के संपर्क में आने के बाद चीजें बदलने लगीं.

समाचारों के प्रति गहरी रुचि रखने वाले शौकत देशभर में छात्रों के साथ होने वाले अन्याय की खबरों से प्रभावित थे. उनका कहना है कि कोलकाता के आरजी कर रेप केस ने उन पर गहरा असर डाला. वह एक ऐसा मंच चाहते थे जहां वे छात्रों के लिए आवाज उठा सकें और ऐसे घटनाओं को रोकने की कोशिश कर सकें.

“मेरे लिए एबीवीपी एक क्रांतिकारी संगठन है, जहां मैं अपने साथी छात्रों के मुद्दे उठा सकता हूं. अब मेरी आवाज दबाई नहीं जाती,” उन्होंने कहा.

मिशन पर निकला एक शख्स

जब तांत्रे ने फुल-टाइमर के रूप में एबीवीपी के सेमिनार में जाना शुरू किया, तो उन्होंने देखा कि कई सदस्यों में मुसलमानों को लेकर पूर्वाग्रह हैं. उनका कहना है कि कश्मीर से होने के कारण वह उन्हें मुसलमानों की एक अलग तस्वीर दिखा पाए. उन्हें मंदिर जाने में कोई आपत्ति नहीं है. वह प्रचारकों के साथ बैठते हैं और उनके अनुभवों से सीखते हैं.

उनके आदर्श एपीजे अब्दुल कलाम हैं. एबीवीपी के एक सेमिनार के जरिए उन्हें पूर्व राष्ट्रपति की उपलब्धियों के बारे में पता चला. उसमें कलाम के जीवन को एक असाधारण मुसलमान के रूप में प्रस्तुत किया गया था. तांत्रे इससे प्रभावित हुए. इसके बाद उन्होंने कलाम के बारे में विस्तार से पढ़ा—कैसे वह एक धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम थे, मंदिर जाते थे और देश से प्रेम करते थे. “मैं भी उसी रास्ते पर चलने की कोशिश कर रहा हूं,” उन्होंने कहा.

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से उनकी मुलाकातों ने भी उन्हें प्रेरित किया. “एलजी साहब हमेशा मुझे इस आंदोलन को आगे बढ़ाने और छात्रों के लिए काम करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.”

कुपवाड़ा स्थित उनके घर पर, उनके माता-पिता पर लगातार दबाव डाला जाता है कि वे अपने बेटे से संगठन छोड़ने के लिए कहें. 2019 में, अनुच्छेद 370 हटने के बाद, उन्होंने पहली बार राष्ट्रीय ध्वज पकड़े हुए एक भावुक वीडियो पोस्ट किया था, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. लेकिन घर पर उनके माता-पिता को फोन आने लगे, जिनमें पूछा जाता था कि क्या उनका बेटा ठीक है और चेतावनी दी जाती थी कि वह मुसीबत को बुला रहा है.

तांत्रे का राष्ट्रवाद से पहला परिचय स्कूल के दिनों में हुआ. एक सेब किसान के बेटे के रूप में उन्होंने आर्मी गुडविल स्कूल में पढ़ाई की, जहां उन्हें एकता और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के मूल्यों के बारे में सिखाया गया.

आखिरी बार वह ईद की शाम को घर गए थे. अगली सुबह, उन्होंने सोते हुए अपने माता-पिता को चूमा और श्रीनगर के लिए निकल गए, और वहां से राजस्थान में अपने प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए रवाना हो गए.

Instagram impression statistics of the ABVP Kashmir page. | Mahira Khan
ABVP कश्मीर पेज के इंस्टाग्राम इंप्रेशन के आंकड़े। | माहिरा खान

उनका छोटा भाई सेना की ‘सद्भावना’ योजना के तहत पढ़ाई कर रहा है और उसने अपनी शिक्षा के लिए छात्र ऋण लिया है.

कश्मीर में एबीवीपी के पीछे तांत्रे ही मुख्य ताकत हैं. संगठन के सदस्य उनके फैसलों का इंतजार करते हैं.

उनका फोन लगातार छात्रों की समस्याओं से गूंजता रहता है. एक और अलर्ट आता है: “एक छात्रा को किसी अज्ञात नंबर से बार-बार कॉल कर परेशान किया जा रहा है. उसने एसएसपी को भी लिखा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.”

वह तुरंत अपना बैग उठाते हैं, घाटी भर के एबीवीपी के दर्जनों व्हाट्सऐप ग्रुप्स में संदेश भेजते हैं और वरिष्ठों को सूचित करते हैं. “हमें उसकी मदद करनी है,” उन्होंने कहा, एक ऐसे व्यक्ति की तत्परता के साथ जो मिशन पर हो. कश्मीर में, एबीवीपी के लिए यह सिर्फ एक्टिविज़्म नहीं, बल्कि एक ऑपरेशन है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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