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Thursday, 16 April, 2026
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पंजाब का धार्मिक बेअदबी विरोधी कानून न्याय की गारंटी नहीं देता, इसके लिए और क्या किया जाना चाहिए?

AAP सरकार ने बेअदबी के मामलों में जवाबदेही के मुद्दे से अपने किसी भी पूर्ववर्ती की तुलना में कहीं अधिक राजनीतिक लाभ उठाया है. अब उसके पास यह अवसर भी है—और दायित्व भी—कि वह अपनी इस बयानबाज़ी को अदालत में अपने प्रदर्शन से साबित करे.

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सोमवार को पंजाब की विधानसभा का विशेष सत्र हुआ. इसमें एंटी-सैक्रिलेज बिल सर्वसम्मति से पास किया गया और राजनीतिक नेताओं ने तुरंत जीत का ऐलान कर दिया. यह आसान था.

अब आगे जो होगा वह ज्यादा मुश्किल है और काफी अनिश्चित भी है.

जागृत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) बिल, 2026 का महत्व है. यह मानता है कि मौजूदा कानून ऐसे अपराधों की गंभीरता को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं था. यह संकेत देता है कि अब श्री गुरु ग्रंथ साहिब, जो दुनिया भर के सिखों के लिए गुरु का जीवित रूप है, के अपमान को साधारण अपराध की तरह नहीं देखा जाएगा. यह पिछले दस साल से चल रहे लोगों के दर्द और गुस्से का जवाब भी है, जिसे अब तक सही तरीके से नहीं संभाला गया था.

लेकिन मान लेना ही न्याय नहीं है. संकेत देना फैसला नहीं होता. कानून पास करने से वह काम पूरा नहीं हो जाता जो पंजाब अब तक नहीं कर पाया है, यानी दोषियों को सजा दिलाना.

सबसे पहले, राज्यपाल का फैसला

बिल विधानसभा से पास हो चुका है, लेकिन अभी कानून नहीं बना है. राज्यपाल के पास तीन विकल्प हैं. वह इसे मंजूरी दे सकते हैं, दोबारा विचार के लिए वापस भेज सकते हैं, या राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं. अगर राष्ट्रपति के पास भेजा गया तो अनुच्छेद 254(2) के तहत इसे ज्यादा संवैधानिक सुरक्षा मिल सकती है, लेकिन इसमें देरी, अनिश्चितता और पहले के कानूनों की तरह राजनीतिक अटकाव का खतरा रहेगा.

राज्यपाल को इसे जल्द मंजूरी देनी चाहिए. देरी करने का कोई संवैधानिक फायदा नहीं है, जिसे बाद में संसद या अदालत के जरिए बेहतर तरीके से नहीं देखा जा सकता.

लेकिन एक बड़ी सीमा है जिसे लोगों को साफ-साफ बताना चाहिए. मंजूरी मिलने के बाद भी यह कानून सिर्फ पंजाब में लागू होगा. यह चंडीगढ़ में लागू नहीं होगा, जो पंजाब की राजधानी है लेकिन केंद्र शासित प्रदेश है. वहां ऐसे मामलों पर भारतीय न्याय संहिता ही लागू होगी. इस समस्या को राज्य सरकार नहीं सुलझा सकती. इसे सिर्फ संसद ही बदल सकती है.

एक सच्चाई जिसे कोई नहीं बदल सकता

विशेष सत्र में एक बात साफ तौर पर नहीं कही गई, लेकिन लोगों को यह जानना जरूरी है.

नया कानून पुराने मामलों पर लागू नहीं होगा.

संविधान का अनुच्छेद 20(1) कहता है कि किसी भी कानून को पीछे की तारीख से लागू नहीं किया जा सकता. किसी व्यक्ति को ऐसे कानून के तहत सजा नहीं दी जा सकती जो अपराध के समय मौजूद नहीं था या उस समय से ज्यादा सख्त सजा नहीं दी जा सकती. यह कोई छोटी बात नहीं, बल्कि एक मूल संवैधानिक अधिकार है.

2015 में पंजाब में हुए बरगाड़ी सैक्रिलेज मामलों पर यह नया कानून लागू नहीं होगा. नए कानून के तहत बढ़ी हुई सजा सिर्फ उन मामलों में लागू होगी जो इसके लागू होने के बाद होंगे.

जो नेता लोगों को कुछ और समझा रहे हैं, वे या तो संविधान नहीं समझते या जानबूझकर गुमराह कर रहे हैं. यह बिल 2015 के मामलों के लिए न्याय नहीं दिलाएगा. यह सिर्फ भविष्य के लिए सख्त संदेश है. यह फर्क समझना बहुत जरूरी है, ताकि लोगों को गलत उम्मीद न दी जाए.

ट्रांसफर हुए केस और एक जरूरी समस्या

विशेष सत्र की चर्चा से अलग, दो बातों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है.

पंजाब ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन ने सैक्रिलेज मामलों की जांच के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर जारी किया है. पहली बार ऐसा हुआ है कि पूरे राज्य में जांच के लिए एक समान तरीका तय किया गया है. इसमें सबूत संभालना, घटनास्थल की सुरक्षा, डिजिटल सबूत के नियम और अधिकारियों की जिम्मेदारी शामिल हैं. यह सुनने में साधारण लगता है, लेकिन बहुत जरूरी है. बिना एक जैसे नियमों के जांच में कमियां रह जाती थीं और केस अदालत में टिक नहीं पाते थे. बिना इस व्यवस्था के बरी होना लगभग तय होता था.

सबसे जरूरी बात यह है कि कोटकपूरा और बहबल कलां पुलिस फायरिंग मामले अब पूरी तरह फरीदकोट से चंडीगढ़ ट्रांसफर हो गए हैं, जहां इनकी सुनवाई साथ-साथ लेकिन अलग-अलग होगी. इससे अदालत को लेकर चल रहा विवाद खत्म हो गया है, जिससे काफी देरी हो रही थी. इसका श्रेय देना चाहिए.

लेकिन एक बड़ी समस्या अभी भी है, जिस पर सरकार ने खुलकर बात नहीं की है. चंडीगढ़ एक केंद्र शासित प्रदेश है, इसलिए वहां की अभियोजन व्यवस्था केंद्र सरकार के अधीन आती है, पंजाब सरकार के नहीं. इससे राज्य और केंद्र के बीच जिम्मेदारी को लेकर टकराव हो सकता है. इस समस्या से बचने के लिए पंजाब सरकार को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट से एक वरिष्ठ वकील को विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त करने की मांग करनी चाहिए. ऐसा वकील जो सक्षम हो, ईमानदार हो और जिसकी अच्छी साख हो. वह सिर्फ अदालत के प्रति जिम्मेदार हो और राज्य या केंद्र की राजनीति से अलग रहे. यही तरीका है जिससे इन मामलों की सुनवाई निष्पक्ष तरीके से हो सकती है.

AAP सरकार का पंजाब के प्रति कर्तव्य

कोटकपूरा और बहबल कलां के मामले सामान्य अदालत के मामले नहीं हैं. इनमें संस्थागत जिम्मेदारी का पूरा सवाल शामिल है. इसमें यह देखना है कि आदेश किसने दिए, आम प्रदर्शनकारियों पर जानलेवा बल का इस्तेमाल सही था या नहीं, और गंभीर हालात में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का व्यवहार कैसा था. इन मामलों में सबूत बहुत जटिल हैं. एक सामान्य सरकारी वकील पर राजनीतिक दबाव होना तय है. कमजोर पैरवी, बार-बार तारीख पड़ना और जिम्मेदारी का बिखर जाना, जो पंजाब की आपराधिक न्याय व्यवस्था की पुरानी समस्याएं हैं, इनका खतरा भी वास्तविक है.

AAP सरकार ने सैक्रिलेज मामलों में जवाबदेही को लेकर अपने पहले की सरकारों से ज्यादा राजनीतिक फायदा उठाया है. अब उसके पास मौका भी है और जिम्मेदारी भी कि वह अपने बयानों को अदालत में प्रदर्शन से साबित करे. पंजाब ने कई बार देखा है कि कानून बनाए गए, लेकिन अदालत में केस कमजोर पड़ गए. तेज राजनीतिक बयानबाजी हुई, लेकिन मुकदमे लंबित रहे और आखिर में आरोपी बरी हो गए, जिससे पीड़ित और आरोपी दोनों ही अधूरी शिकायत के साथ रह गए.

आगे क्या होगा, यही तय करेगा

पंजाब के नेता अब सर्वसम्मति के दिखावे से संतुष्ट होकर आगे बढ़ रहे हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए.

यह तय करने वाली बात कि 13 अप्रैल एक बदलाव का दिन बनेगा या फिर न्याय में देरी की एक और कहानी बनेगा, ज्यादा कठिन नहीं है. राज्यपाल को जल्दी फैसला लेना होगा. सरकार को बिल पास होने को ही अंतिम न मानना चाहिए. लोगों को साफ बताया जाना चाहिए कि अनुच्छेद 20(1) के कारण पुराने मामलों में सजा नहीं दी जा सकती. SOP को सख्ती से लागू करना होगा. और पंजाब को हाई कोर्ट से विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति की मांग करनी चाहिए, इससे पहले कि चंडीगढ़ में चल रहे मुकदमे अधिकार क्षेत्र की राजनीति और प्रक्रिया की धीमी चाल में फंस जाएं.

कुछ चीजें अब सही जगह पर हैं. एक कानून पास हो चुका है, संवैधानिक रास्ता मौजूद है, जांच की प्रक्रिया तय हो गई है और ट्रायल की व्यवस्था भी तय है. यह छोटी बात नहीं है. लेकिन पंजाब पहले भी ऐसी तैयारी कर चुका है और फिर सब बिखर गया.

आखिर में यही देखा जाएगा कि क्या यह सरकार अपने कानूनों को अदालत में लागू कर पाने की गंभीरता रखती है या नहीं.

बहबल कलां और कोटकपूरा के परिवार पिछले दस साल से भाषण नहीं, बल्कि न्याय का इंतिजार कर रहे हैं.

के बी एस सिद्धू पंजाब के पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए हैं. उनका एक्स हैंडल @kbssidhu1961 है. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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