scorecardresearch
Tuesday, 14 April, 2026
होमडिफेंसपश्चिम एशिया में तनाव के बीच सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता लागू किया, इसके क्या मायने हैं

पश्चिम एशिया में तनाव के बीच सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता लागू किया, इसके क्या मायने हैं

ड्रॉप साइट के अनुसार, इस सौदे की मौजूदा शर्तों के तहत—जो पूरी तरह से रक्षात्मक हैं—सऊदी अरब पाकिस्तान से यह अनुरोध नहीं कर सकता कि वह ईरान पर जवाबी हमला करे, भले ही वह हमला सऊदी क्षेत्र से ही क्यों न किया जाए.

Text Size:

नई दिल्ली: सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ साइन किए गए स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (SMDA) को लागू किया है, जिसके तहत पाकिस्तानी सेना ने किंग अब्दुलअज़ीज़ एयर बेस के ईस्टर्न सेक्टर में कुछ F-16 और संबंधित कर्मियों को तैनात किया है.

हालांकि, इस समझौते की असली सीमा अभी साफ नहीं है.

ड्रॉप साइट न्यूज़ ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें बताया गया है कि यह नया समझौता वास्तव में कैसे बना. रिपोर्ट के अनुसार, यह समझौता पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के समय से लंबित था, जिन्होंने एक साल से ज्यादा समय तक इसे साइन करने से मना कर दिया था.

यह भी बताया गया है कि इस समझौते में यह शामिल नहीं है कि अगर पाकिस्तान कोई युद्ध करता है तो सऊदी अरब उसकी मदद करेगा.

ईरान और अमेरिका/इज़राइल के बीच संघर्ष के संदर्भ में, यह भी एक महत्वपूर्ण बात है कि पाकिस्तान खुद इस युद्ध में खींचा जा सकता है, इसलिए पाकिस्तान के नेता लड़ाई खत्म करने के लिए उत्सुक हैं, रिपोर्ट में कहा गया.

ईरान ने अमेरिका के साथ अपने संघर्ष की शुरुआत से ही सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की एक श्रृंखला शुरू की है, जिसमें ऊर्जा और सैन्य ढांचे को निशाना बनाया गया है.

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा समझौता एक गुप्त समझौते से शुरू हुआ था, जो 14 दिसंबर 1982 को साइन किया गया था. इसका एक संशोधित रूप, जिसे मिलिट्री कोऑपरेशन एग्रीमेंट (MCA) कहा गया, 30 जुलाई 2005 को साइन किया गया.

2005 का यह गुप्त समझौता, जिसकी एक कॉपी ड्रॉप साइट को मिली, बताता है कि MCA का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सैन्य क्षेत्र में सहयोग को मजबूत करना है, जिसमें ट्रेनिंग, कर्मियों की तैनाती, रक्षा उत्पादन और तकनीक ट्रांसफर, अनुभव का आदान-प्रदान, हथियारों, उपकरणों और स्पेयर पार्ट्स की खरीद और सैन्य मेडिकल सेवाएं शामिल हैं.

इसमें पाकिस्तान पर यह कोई बाध्यता नहीं थी कि वह असल में सैन्य कार्रवाई करे या सऊदी अरब की रक्षा की जिम्मेदारी ले.

ड्रॉप साइट ने बताया कि अगस्त 2021 में इस रक्षा समझौते में एक नए संशोधन का सार तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार को भेजा गया था.

इस संशोधन में एक नया हिस्सा था, जो पहली बार पाकिस्तान को यह प्रतिबद्धता देता था कि जरूरत पड़ने पर वह सऊदी सरकार की वास्तविक रक्षा करेगा.

“दूसरी पार्टी (पाकिस्तान) पहली पार्टी के अनुरोध पर सऊदी अरब में अपनी सेना भेजने के लिए बाध्य होगी, ताकि उसकी सुरक्षा, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और हितों पर किसी भी खतरे से निपटने में मदद कर सके.” संशोधन में कहा गया. “इस व्यवस्था की जानकारी स्पष्ट करने के लिए दोनों पक्षों के बीच एक प्रोटोकॉल साइन किया जाएगा.”

रिपोर्ट में कहा गया कि यह प्रस्तावित संशोधन एक साल तक इमरान खान के पास पड़ा रहा क्योंकि यह स्पष्ट नहीं था कि जिस खतरे का सामना करना है वह विदेशी होगा या घरेलू.

दो पूर्व अधिकारियों के अनुसार, जिन्होंने गोपनीयता की शर्त पर बात की, खान इस बात को लेकर चिंतित थे कि कहीं यह समझौता पाकिस्तान की सेना को किसी विदेशी युद्ध में शामिल होने के लिए मजबूर न कर दे.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस दस्तावेज़ में पाकिस्तान पर भारी जिम्मेदारी डाली गई थी, लेकिन सऊदी अरब की तरफ से कोई स्पष्ट जवाबी मदद तय नहीं की गई थी. यह संशोधन अंततः फरवरी 2024 में सेना समर्थित केयरटेकर सरकार द्वारा साइन किया गया, जब खान सत्ता से हट चुके थे.

ड्रॉप साइट ने दस्तावेज़ों के आधार पर बताया कि इस संशोधन की भाषा पर सैन्य संस्थान के अंदर काफी बहस हुई.

“यह संशोधन एकतरफा था, और इससे पाकिस्तान को सऊदी अरब की रक्षा करनी पड़ती, जबकि सऊदी अरब पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी. यह भी स्पष्ट नहीं था कि इसमें पारंपरिक और परमाणु बलों में क्या अंतर होगा. दस्तावेज़ बताते हैं कि पाकिस्तानी सेना केवल पारंपरिक बलों को शामिल करना चाहती थी और परमाणु क्षमता को इससे बाहर रखना चाहती थी.”

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यह चिंता भी थी कि सऊदी की सुरक्षा को खतरा सिर्फ उसके अंदर तक सीमित नहीं रहेगा, और इसके लिए बाहर भी सैन्य कार्रवाई करनी पड़ सकती है.

“इनमें से कई चिंताओं को 2025 के SMDA में संबोधित किया गया, जो ईरान युद्ध से कुछ महीने पहले साइन हुआ,” रिपोर्ट में कहा गया. यह दस्तावेज़ लीक हुए दस्तावेज़ों में शामिल नहीं था.

सऊदी-पाकिस्तान के संयुक्त बयान के अनुसार, “इस समझौते में कहा गया है कि किसी एक देश पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा.”

किन परिस्थितियों में यह लागू होगा, यह अभी साफ नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब की क्षमता सीमित है कि वह पाकिस्तान को किसी संघर्ष में सैन्य सहायता दे सके.

“पाकिस्तान का मुख्य रणनीतिक प्रतिद्वंदी भारत है, जिसके सऊदी अरब के साथ अच्छे राजनीतिक और आर्थिक संबंध हैं. पाकिस्तान इस समय अफगानिस्तान के साथ सीमा पर संघर्ष में भी शामिल है, जिसमें सऊदी अरब ने कोई मदद नहीं दी है.”

ड्रॉप साइट के अनुसार, इस समझौते के वर्तमान नियमों के तहत, जो पूरी तरह रक्षात्मक है, सऊदी अरब पाकिस्तान से यह नहीं कह सकता कि वह ईरान पर हमला करे, चाहे वह सऊदी जमीन से ही क्यों न हो. पाकिस्तान की जमीन से हमला करना भी संभव नहीं लगता और यह SMDA के दायरे से बाहर होगा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: ‘विश्वगुरु’ बनने का हमारा-आपका भ्रम, दुनिया को देखने की समझ बिगाड़ रहा है


 

share & View comments